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वे अंतिम हमला आंबेडकर पर ही बोलेंगे

सच यह है कि हिंदू राष्ट्र जितना मुसलमानों या अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए खतरा है, उससे अधिक वह हिंदू धर्म का हिस्सा कही जानी वाली महिलाओं, पिछड़ों और दलितों के लिए भी खतरनाक है, जिन्हें हिंदू धर्म दोयम दर्जे का ठहराता है। बता रहे हैं सिद्धार्थ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के समक्ष भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने के मार्ग में तीन व्यक्तित्व सबसे बड़ी बाधाएं हैं – गांधी, नेहरू और आंबेडकर। गांधी यदि उनके हृदय में कांटे की तरह चुभें हुए हैं, तो नेहरू खंजर के माफिक धंसे हैं। लेकिन डॉ. आंबेडकर उनके सीने में इस पार से उस पार तक तलवार की तरह उतरे हुए हैं। अभी फिलहाल हिंदू राष्ट्र की परियोजना को साकार करने में लगे संगठन, संस्थाएं और व्यक्ति आंबेडकर पर सीधा हमला करने से बच रहे हैं, लेकिन उन्हें हिंदू राष्ट्र के अपने स्वप्न को पूरी तरह साकार करने लिए, आंबेडकर को अपने मार्ग से हटाना ही पड़ेगा, जो हिंदुत्व का प्रतिपक्ष और संविधान का पर्याय बनकर हिमालय की तरह हिंदू राष्ट्र के मार्ग में खड़े हैं। इस सच से हिंदू राष्ट्रवादी बखूबी परिचित हैं।

सर्वविदित है कि गांधी, नेहरू और आंबेडकर; तीनों अपने-अपने तरीके से अलग-अलग स्तर पर भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने के विरोधी थे। गांधी बेशक खुलेआम हिंदू धर्म, दर्शन और सामाजिक व्यवस्था (वर्ण-व्यवस्था), आदर्शों (रामराज्य), मूल्यों और हिंदू धर्म की किताबों (वेद-गीता) की पुरजोर तरीके से वकालत करते हैं, लेकिन एक सच्चे धार्मिक की तरह दूसरे धर्मों को भी एक समान दर्जा और महत्व देते रहे हैं। गीता की तरह कुरान और बाइबिल भी उनके लिए महान किताबें हैं। राम, अल्लाह और गॉड उनके लिए समान रूप से आदरणीय हैं। वे ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ के धार्मिक दर्शन में यकीन रखते थे। 

हिंदू धर्म-दर्शन में गांधी के विश्वास के बावजूद भी हिंदू राष्ट्रवादियों और गांधी बीच कुछ बुनियादी मतभेद हैं। गांधी मानते थे कि कोई धर्म, किसी धर्म का ईश्वर और किसी धर्म की किताब किसी दूसरे धर्म के ईश्वर और किताब से श्रेष्ठ नहीं होती है। सभी धर्मों का सार तत्व एक है। जबकि हिंदू राष्ट्रवादियों का मानना है कि हिंदू धर्म इस्लाम, क्रिश्चियन और अन्य धर्मों से श्रेष्ठ और महान है। दूसरी जिस बात से हिंदू राष्ट्रवादियों को गांधी से नफरत और चिढ़ है, वह यह कि उनका मानना था कि भारत पर जितना हक हिंदुओं का है, उतना ही हक मुसलमानों और ईसाईयों का भी है। वह भारत में हिंदुओं को किसी प्रकार का विशेषाधिकार देने के हिमायती नहीं थे, वे  किसी भी तरीके से मुसलमानों को दोयम दर्जे का ठहराने के पुरजोर विरोधी थे। वे हिंदू राष्ट्र के विचार को भारत को टुकड़े-टुकड़े करने वाला विचार मानते थे। गांधी की तीसरी बात जो हिंदुत्वादियों को नागवार गुजरती है, वह यह कि उन्होंने हिंदू-मुसलमानों के बीच नफरत और हिंसा फैलाने की हर कोशिश को नाकाम करने के लिए प्रयास करते रहे। इसके लिए उन्होंने कई बार अपनी जान तक जोखिम में डाली। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए शहादत देने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी को अपना आदर्श मानते थे। उन्होंने तो यहां तक लिखा है कि वे विद्यार्थी जी की तरह ही मरना चाहते हैं।

गांधी, नेहरू और आंबेडकर

आज गांधी का हत्यारा हिंदुत्वादी गोडसे हिंदू राष्ट्रवादियों की गांधी के प्रति घृणा और नफरत का सबसे मूर्त प्रतीक है। आज भी गांधी की ‘ईश्वर-अल्ला तेरो नाम’ वाली वैचारिकी पर हमला जारी है। यह वैचारिकी दूसरे धर्मों से घृणा करने वाली हिंदू राष्ट्र की वैचारिकी के मार्ग में अभी एक बड़ा अवरोध है। इस अवरोध को हटाने की हर कोशिश हिंदुत्ववादी कर रहे हैं। 

गांधी के बाद, मात्रा और गुण दोनों में जो व्यक्ति हिंदू राष्ट्रवाद के लिए चुनौती है और हिंदू राष्ट्रवादियों को रत्ती भर भी नहीं सुहाता है, वह जवाहर लाल नेहरू हैं। आज की तारीख में सबसे अधिक नेहरू पर हिंदू राष्ट्रवादी हमला बोल रहे हैं। वे भारत की परिकल्पना एक आधुनिक यूरोपीय लोकतांत्रिक-गणतांत्रिक संवैधानिक राज्य के रूप में करते थे, जिसके केंद्र में तर्क और विज्ञान हो। व्यक्तिगत तौर पर नेहरू ईश्वर और धर्म दोनों को खारिज करते थे। वे धर्म और ईश्वर विहीन राज्य की परिकल्पना करते थे। वे धर्म और ईश्वर को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह बाहर कर निजी आस्था और प्रार्थना तक सीमित रखना चाहते थे। वे एक इतिहासकार के रूप में हिंदू, इस्लाम, क्रिश्चियन, बौद्ध धम्म और अन्य धर्मों के उदय, विकास, विस्तार और उनकी सकारात्मकता-नकारात्मकता की व्याख्या तो करते हैं, लेकिन इनमें से किसी को राज्य और सार्वजनिक जीवन के संचालन में कोई निर्णायक भूमिका देने को तैयार नहीं थे। वे यूरोपीय अर्थों में भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाना चाहते थे। इसके चलते उन्हें कांग्रेस के भीतर और बाहर के हिंदुत्वादियों, दोनों से एक साथ टकराना पड़ा। संविधान निर्माण प्रक्रिया में वैचारिक स्तर पर उनके सबसे नजदीक आंबेडकर थे। नेहरू ने जिस आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की नींव डाली, उसमें भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने की परियोजना के लिए प्रत्यक्ष तौर पर कोई जगह नहीं थी। नेहरू आस्था के बरक्स, तर्क और धर्म के बरक्स विज्ञान को जगह देते थे। वे व्यक्तिगत तौर पर भी आधुनिक जीवन पद्धति, मूल्यों और आदर्शों के हिमायती थे। 

तर्क, विज्ञान, धर्मनिरपेक्षता और आधुनिक मूल्यों के हिमायती नेहरू की वैचारिकी और व्यक्तित्व के प्रभाव को भारतीय जनमानस से खत्म किए बिना हिंदू राष्ट्र की परियोजना पूरी तरह से साकार रूप नहीं ले सकती है, यह बात हिंदू राष्ट्रवादी अच्छी तरह जानते हैं। नेहरू, उनकी वैचारिकी और विरासत पर हमला हिंदू राष्ट्र की परियोजना को साकार करने और आधुनिक संवैधानिक लोकतांत्रिक भारत की विचार और विरासत को ध्वस्त करने के लिए किया जा रहा है। तर्क और विज्ञान पर आधारित लोकतांत्रिक भारत के स्वप्न को खत्म करने के लिए नेहरू पर हमला करना हिंदूवादियों की बड़ी जरूरत बन गई है। अकारण नहीं है कि आज भी सभी हिंदू राष्ट्रवादियों के निशाने पर नेहरू हैं। 

गांधी-नेहरू हिंदू राष्ट्र की परियोजना के लिए अलग-अलग मात्रा और अलग-अलग रूपों में चुनौती तो हैं, लेकिन जिस व्यक्ति ने हिंदू राष्ट्र की बुनियादी पर सबसे प्राणघातक हमला बोला है, उसकी रीढ़ को निशाना बनाया और जिस हिंदू धर्म पर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा आधारित है, उसे निशाना बनाकर नेस्तनाबूद करने के लिए पूरा जीवन खपा दिया, उस व्यक्ति का नाम डॉ. आंबेडकर है। वे ब्राह्मण धर्म, सनातन धर्म और हिंदू धर्म को एक दूसरे के पर्याय के रूप में ही देखते थे।

हालांकि नेहरू यह समझने में पूरी तरह असफल रहे कि हिंदू धर्म का मूल तत्व वर्ण-व्यवस्था है। जबकि गांधी यह समझते थे, लेकिन जीवन के अंत तक वर्ण-व्यवस्था के हिमायती बने रहे। गांधी और नेहरू, दोनों यह नहीं समझ पाए कि हिंदू धर्म कोई धर्म नहीं, बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था है, जिसका मूल उद्देश्य सवर्ण हिंदू मर्दों (द्विज मर्दों) के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक वर्चस्व को पिछड़े-दलितों और महिलाओं पर कायम रखना है। इसे मुकम्मिल तौर पर जिस व्यक्ति ने समझा, वह आंबेडकर हैं।

यह सच है कि हिंदू राष्ट्रवाद का महत्वपूर्ण तत्व मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति घृणा है। लेकिन यह घृणा, हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा की केवल ऊपरी सतह है। सच यह है कि हिंदू राष्ट्र जितना मुसलमानों या अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए खतरा है, उससे अधिक वह हिंदू धर्म का हिस्सा कही जानी वाली महिलाओं, पिछड़ों और दलितों के लिए भी खतरनाक है, जिन्हें हिंदू धर्म दोयम दर्जे का ठहराता है। एक अर्थ में तो हिंदू धर्म ब्राह्मणों को छोड़कर सभी को दोयम दर्जे का मानता है। इस तथ्य को रेखांकित करते हुए आंबेडकर ने लिखा कि ‘‘हिंदू धर्म एक ऐसी राजनीतिक विचारधारा है, जो पूर्णतः लोकतंत्र-विरोधी है और जिसका चरित्र फासीवाद और नाजी विचारधारा-जैसा ही है। अगर हिंदू धर्म को खुली छूट मिल जाए – और हिंदुओं के बहुसंख्यक होने का यही अर्थ है – तो वह उन लोगों को आगे बढ़ने ही नहीं देगा, जो हिंदू नहीं हैं या हिंदू धर्म के विरोधी हैं। यह केवल मुसलमानों का दृष्टिकोण नहीं है। यह दलित वर्गों और गैर-ब्राह्मणों का दृष्टिकोण भी है।” (आंबेडकर, सोर्स मॅटेरियल ऑन डॉ. आंबेडकर, महाराष्ट्र शासन प्रकाशन, खंड 1, पृ. 241) 

गांधी-नेहरू या किसी अन्य ने खुले शब्दों में हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति घृणा नहीं प्रकट किया है। आंबेडकर हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति खुलेआम घृणा प्रकट करते हैं और इस घृणा का कारण बताते हुए लिखते हैं “मैं हिंदुओं और हिंदू धर्म से इसलिए घृणा करता हूं, उसे तिरस्कृत करता हूं क्योंकि मैं आश्वस्त हूं कि वह गलत आदर्शों को पोषित करता है और गलत सामाजिक जीवन जीता है। मेरा हिंदुओं और हिंदू धर्म से मतभेद उनके सामाजिक आचार में केवल कमियों को लेकर नहीं हैं। झगड़ा ज्यादातर सिद्धांतों को लेकर, आदर्शों को लेकर है।” (भीमराव आंबेडकर, जाति का विनाश, पृ. 112)

डॉ. आंबेडकर साफ शब्दों में कहते हैं कि हिंदू धर्म के प्रति उनकी घृणा का सबसे बड़ा कारण जाति आधारित भेदभाव है, उनका मानना था कि हिंदू धर्म का प्राण-तत्त्व जाति है और इन हिंदुओं ने अपने इस जाति के जहर को सिखों, मुसलमानों और क्रिश्चियनों में भी फैला दिया है। वे लिखते हैं कि “इसमें कोई संदेह नहीं कि जाति आधारभूत रूप से हिंदुओं का प्राण है। लेकिन हिंदुओं ने सारा वातावरण गंदा कर दिया है और सिख, मुस्लिम और क्रिश्चियन सभी इससे पीड़ित हैं।” स्पष्ट है कि भारतीय उपहाद्वीप में मुसलमानों और ईसाईयों के बीच जाति की उपस्थिति के लिए वे हिंदू धर्म को जिम्मेदार मानते हैं।

वे हिंदू धर्म का पालन करने वाले हिंदुओं को मानसिक तौर पर बीमार कहते थे।  ‘जाति का विनाश’ किताब का उद्देश्य बताते हुए उन्होंने लिखा है कि “मैं हिंदुओं को यह अहसास कराना चाहता हूं कि वे भारत के बीमार लोग हैं, और उनकी बीमारी अन्य भारतीयों के स्वास्थ्य और खुशी के लिए खतरा है।”

आंबेडकर हिंदुओं को आदिम कबिलाई मानसिकता के बर्बर लोगों की श्रेणी में रखते हैं– “हिंदुओं की पूरी की पूरी आचार-नीति जंगली कबीलों की नीति की भांति संकुचित एवं दूषित है, जिसमें सही या गलत, अच्छा या बुरा, बस अपने जाति बंधु को ही मान्यता है। इनमें सद्गुणों का पक्ष लेने तथा दुर्गुणों के तिरस्कार की कोई परवाह न होकर, जाति का पक्ष लेने या उसकी अपेक्षा का प्रश्न सर्वोपरि रहता है।” डॉ. आंबेडकर को हिंदू धर्म में अच्छाई नाम की कोई चीज नहीं दिखती थी, क्योंकि इसमें मनुष्यता या मानवता के लिए कोई जगह नहीं है। अपनी किताब ‘जाति का विनाश’ में उन्होंने दो टूक लिखा है कि “हिंदू जिसे धर्म कहते हैं, वह कुछ और नहीं, आदर्शों और प्रतिबंधों की भीड़ है। हिंदू धर्म वेदों व स्मृतियों, यज्ञ-कर्म, सामाजिक शिष्टाचार, राजनीतिक व्यवहार तथा शुद्धता के नियमों जैसे अनेक विषयों की खिचड़ी संग्रह मात्र है। हिंदुओं का धर्म बस आदेशों और निषेधों की संहिता के रूप में ही मिलता है, और वास्तविक धर्म, जिसमें आध्यात्मिक सिद्धांतों का विवेचन हो, जो वास्तव में सार्वजनीन और विश्व के सभी समुदायों के लिए हर काम में उपयोगी हो, हिंदुओं में पाया ही नहीं जाता और यदि कुछ थोड़े से सिद्धांत पाए भी जाते हैं तो हिंदुओं के जीवन में उनकी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं पायी जाती। हिंदुओं का धर्म ‘आदेशों और निषेधों’ का ही धर्म है।” वे हिंदुओं की पूरी व्यवस्था को ही घृणा के योग्य मानते हैं। उन्होंने हिंदुओं के पुरोहित वर्ग (ब्राह्मण) के बारे में लिखा है– “यह एक ऐसा कीट है, जिसे लगता है, देवताओं ने जनता के बीच उसके मानसिक और नैतिक क्षय के लिए खुला छोड़ दिया है। … ब्राह्मणवाद एक ऐसा विष है, जिसने हिंदू धर्म को नष्ट कर दिया है।”(आंबेडकर, जाति का विनाश, फारवर्ड प्रेस, 2018, पृ. 118-119)

हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से आंबेडकर इस कदर घृणा करते थे कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र के निर्माण को किसी भी कीमत पर रोकने की बात कही। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा, “अगर हिंदू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा। हिंदू कुछ भी कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, समता और बंधुता के लिए खतरा है। इन पैमानों पर वह लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाता है। हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।” (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया, पृ. 338) हिंदू धर्म की यह समझ डॉ. आंबेडकर को गांधी-नेहरू से गुणात्मक तौर पर भिन्न बना देती है और हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए आंबेडकर को सबसे अधिक खतरनाक। 

आंबेडकर वर्ण-जाति व्यवस्था के पोषक हिंदू धर्मग्रंथों को डायनामाइट से उड़ाने की तक की बात करते हैं। उन्होंने ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ और ‘प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति’ और ‘जाति का विनाश’ जैसी किताबें लिखकर हिंदू धर्म दर्शन, विचारधारा, ईश्वरों, देवी-देवताओं, हिंदू धर्म की किताबों, आदर्शों-मूल्यों, जीवन-पद्धति और जीवन-दृष्टि की धज्जियां उड़ा दी हैं। वेदों से लेकर आधुनिक युग तक हिंदू धर्म के पक्ष में दिए गए तर्कों और हिंदू धर्म के पैरोकारों के हर तर्क का उन्होंने ठोस और सटीक जवाब दिया है, ‘जाति का विनाश’ किताब इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक शब्द में कहें तो भारत के अब तक इतिहास में सनातन धर्म और ब्राह्मण धर्म के पर्याय हिंदू धर्म या ब्राह्मणवाद पर इतना मर्मांतक और निर्णायक हमला किसी ने नहीं बोला है, जितना आंबेडकर ने बोला है।

हिंदू धर्म पर दार्शनिक-वैचारिक हमले के साथ आंबेडकर ने संविधान के रूप में हिंदू राष्ट्र के मार्ग में एक पहाड़ खड़ा कर दिया है, इस पहाड़ को रास्ते से हटाए बिना हिंदू राष्ट्र स्थायी और मुकम्मल शक्ल नहीं ले सकता है और मंजिल तक नहीं पहुंच सकता। क्योंकि संविधान हर वयस्क नागरिक को वोट का अधिकार देता है। पांच साल में चुनाव और सरकार बदलने का भी उन्हें अधिकार देता है। जनता इस अधिकार का इस्तेमाल करके हिंदू राष्ट्र के पैरोकारों को सत्ता से हटा सकती है। संसद में ऐसी सरकार को बहुमत दे सकती है, जो हिंदू राष्ट्र के खिलाफ हो। इसका खतरा हमेशा हिंदुत्वादियों के सामने मंडराता रहेगा। हालांकि इस संविधान के साथ लगातार हिंदू राष्ट्रवादी छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसकी मूल भावना को रौंद रहे हैं, उसकी मनमानी व्याख्या कर रहे हैं, उसका हिंदू राष्ट्रवाद की परियोजना के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं और अब तो उसे बदलने की खुलेआम बातें भी करने लगे हैं। फिर भी संविधान उनके मार्ग में बड़ा रोड़ा बना हुआ है।

हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए संविधान को पूरी तरह बदलना इसलिए भी जोखिम भरा काम है, क्योंकि दलितों-पिछड़े और आदिवासियों का एक बड़ा हिस्सा संविधान और आंबेडकर को एक दूसरे के पर्याय के रूप में देखता है। संविधान से छेड़छाड़ या संविधान बदलने की बात उसे आंबेडकर के विचारों-सपनों से छेड़-छाड़ लगती है। फिर भी हिंदू धर्म के लिए इतने खतरनाक और हिंदू राष्ट्र के मार्ग में सबसे बड़े अवरोध आंबेडकर पर हमला बोले बिना भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के स्वप्न को हिंदू राष्ट्रवादी साकार नहीं कर सकते। वे आंबेडकर पर हमला बोलेंगे, लेकिन गांधी और नेहरू को पूरी तरह से निपटाने के बाद। वे अंतिम हमला आंबेडकर पर ही बोलेंगे।

अब प्रश्न यह है कि हिंदू राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी बाधा आंबेडकर और उनकी वैचारिकी पर हमला करने से क्यों हिंदुत्ववादी बच रहे हैं और गांधी, नेहरू पर आक्रामक तरीके से हमलावार क्यों हैं?

तो इसका पहला कारण यह है कि देश में गांधी-नेहरू के समर्थक (वोटर) बहुत कम संख्या में बचे हैं। जो ऊंची जाति गांधी और नेहरू का मजबूत समर्थक और पैरोकार है, उसका बहुलांश हिस्सा हिंदुत्वादियों के साथ पूरी तरह खड़ा हो गया है। यह ऊंची जाति आजादी के दौरान गांधी और आजादी के बाद नेहरू को अपना सबसे बड़ा नेता, हितैषी और पैरोकार मानती थी। यह सत्य भी है कि इन दोनों ने इनके हितों की भरपूर पूर्ति भी की।

अब ऊंची जातियों के लोगों को अपना सबसे बड़ा हितैषी हिंदुत्वादी लग रहे हैं और वे उनके साथ वह पूरी मुस्तैदी के साथ खड़े हैं। ऊंची जातियों के कुछ मुट्ठी-भर लोगों के बीच, विशेषकर सचेतन बुद्धिजीवियों के बीच अब गांधी-नेहरू की कद्र रह गई है, जो संख्या में बहुत कम हैं। गांधी-नेहरू कभी भी बहुजनों (दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों) के सहज-स्वाभाविक नायक नहीं रहे हैं, भले ही विभिन्न वजहों से बहुजन उनके साथ खड़े हुए हों और नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को वोट भी देते रहे हों। आज भी पिछड़े-दलितों और आदिवासियों के सहज स्वाभाविक नायक जोतीराव फुले, शाहू जी, पेरियार, जगदेव प्रसाद, रामस्वरूप वर्मा, ललई सिंह यादव, बिरसा मुंडा, तिलका मांझी और आंबेडकर हैं। आंबेडकर कभी भी द्विज पुरुषों के चहेते नहीं रहे हैं, न आज हैं, न भविष्य में कभी हो सकते हैं।

चूंकि गांधी-नेहरू के कभी अनुयायी रहे ऊंची जातियों के लोग उनका साथ छोड़ चुके हैं और पूरी तरह हिंदुत्वादियों के साथ खड़ा हो गए हैं, ऐसे में उनके पर आक्रामक हमला करना हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए आसान है। लेकिन आंबेडकर को जो समूह अपना नायक मानता है आज भी उन्हें उतने ही पुरजोर तरीके से उन्हें अपना नायक मानता है, भले ही आंबेडकर का जो रूप उसे पसंद हो। यह बात बहुजनों, उनमें विशेष तौर पर दलितों के बारे में पूरी तरह लागू होती है। यदि आज की तारीख में हिंदू राष्ट्रवादी आंबेडकर पर गांधी और नेहरू की तरह आक्रामक और निर्णायक हमला बोल दें, तो बहुजनों का एक बड़ा हिस्सा उनके खिलाफ खड़ा हो जाएगा। यहां तक कि सड़कों पर भी उतर सकता है।

ऐसी स्थिति में हिंदू राष्ट्रवादी आंबेडकर पर निर्णायक हमले के लिए उचित समय का इंतजार कर रहे हैं। यह उचित समय उनके लिए तब होगा, जब वह बहुजनों के एक बडे़ हिस्से का हिंदुत्वीकरण (कम से कम राजनीतिक तौर पर) करने में सफल हो जाएं, जिसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिली है। वे पहले बडे़ पैमाने पर पिछड़ों का हिंदुत्वीकरण करेंगे और कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में वे पिछड़ों को दलितों से अलग करने की कोशिश करेंगे, जिसमें उन्हें एक हद तक सफलता भी मिलती दिख रही है। इस प्रक्रिया में वे बहुजन अवधारणा को तोड़ेंगे। पिछड़ों से दलितों को अलग-थलग करने के बाद वे दलितों को भी अपने साथ खड़ा करने की कोशिश करेंगे। यदि इसमें सफलता नहीं मिली तो, ऊंची जातियों और पिछड़ों का गठजोड़ बनाकर वे आंबेडकर यानी दलित वैचारिकी पर निर्णायक हमला बोलेंगे। पिछड़ों को ऊंची जातियों के साथ जोड़ने का प्रयोग कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ था, जिसे नरेंद्र मोदी (तथाकथित पिछड़े) के नेतृत्व में एक अलग मुकाम तक पहुंचाया जा चुका है।

अंतिम तौर पर आंबेडकर पर हमला बोलने की हिंदू राष्ट्रवादियों की दो रणनीति दिख रही है। पहली, नरेंद्र मोदी जैसे तथाकथित ओबीसी व अन्य दलित नेताओं को अपने साथ करके दलितों को हिंदुत्व की राजनीति के लिए पूरी तरह अपने साथ कर लेना और साथ में आंबेडकर का नाम भी लेते रहना। यह भी आंबेडकर पर हमला ही होगा, लेकिन पीठ पीछे से। 

यदि इसमें सफलता नहीं मिली तो वे ऊंची जातियों और पिछड़ों के गठजोड़ का इस्तेमाल आंबेडकर पर निर्णायक हमला के लिए करेंगे, क्योंकि पिछड़े यदि दलितों से अलग हो जाते हैं, तो दलित वोटर अल्पसंख्यक वोटर बनकर रह जाएगा। दलितों के सहज-स्वाभाविक राजनीतिक दोस्त मुसलमानों को हिंदू राष्ट्रवादी पहले ही राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर करने के तरीके निकाल चुके हैं या निकाल रहे हैं। ऐसी स्थिति में वे आंबेडकर पर निर्णायक हमला बोलेंगे। लेकिन यह उनका अंतिम विकल्प होगा, जिसका वे सबसे अंत में ही इस्तेमाल करेंगे। इसका क्या परिणाम होगा यह भविष्य के गर्भ में है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सिद्धार्थ

डॉ. सिद्धार्थ लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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