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आदिवासी ही पढ़ा सकते हैं तथाकथित सभ्य दुनिया को मानवता का पाठ

आधुनिक सभ्य समाज आदिवासियों से यह सीख सकता है कि उतना ही उत्पादन किया जाय, जितना बहुत जरूरी है। भविष्य के कठिन हालातों के लिए भी थोड़े ही संग्रह की आवश्कता होती है। संग्रह करने और मुनाफा कमाने की हवस आदिवासियों में नहीं पाई जाती है। विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर बता रहे हैं सिद्धार्थ

तथ्य चीख-चीख कर कह रहे हैं कि मानव समुदाय ने चाहे उत्पादक शक्तियों का जितना भी विकास कर लिया हो, चाहे जितने वैज्ञानिक आविष्कार कर लिए हों, चाहे जितना तकनीकी कौशल हासिल कर लिया हो और चाहे जितने उन्नत स्तर के उपकरण बना लिए हों, इसके बावजूद भी वह मानवता का बुनियादी पाठ भी नहीं पढ़ पाया है। मानवता का यह बुनियादी पाठ सिर्फ और सिर्फ उसे आदिवासी समुदाय ही पढ़ा सकता है।

गैर-आदिवासी तथाकथित सभ्य और आधुनिक समाज को आदिवासियों से पहला पाठ यह पढ़ना होगा कि वह इस सोच-समझ को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ दे कि मनुष्य ने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर लिया है या मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है या मनुष्य को प्रकृति पर विजय प्राप्त करना चाहिए। जिसे हम आधुनिक युग या विज्ञान का युग कहते हैं, उसकी बुनियादी सोच यह रही है कि मनुष्य प्रकृति के नियमों को जानकर प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है। इस सोच ने मनुष्य जाति को यहां तक पहुंचा दिया कि वह पृथ्वी और स्वयं सहित अन्य प्राणियों के अस्तित्व के लिए खतरा बन चुका है। यह खतरा कोई दूर की चीज नहीं है, बल्कि बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन की मार पूरी दुनिया झेल रही है। बारिश की तबाही और सूखे की मार का सामना दुनिया को एक साथ करना पड़ रहा है। तापमान वृद्धि के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ने के चलते समुद्र तट के पास के कुछ रिहायशी इलाके डूब चुके हैं या डूबने के कगार पर हैं। समुद्र तटीय कुछ देशों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। उत्पाद और उपभोग की आधुनिक जीवन शैली ने पोखरों, झीलों, नदियों और समुद्रों को गंदगी और कचरे से पाट दिया है। हवा को इस कदर प्रदूषित कर दिया है कि दुनिया के बड़े हिस्से में सांस लेना दूभर होता जा रहा है। खाने-पीने की वस्तुएं बड़े पैमाने पर प्रदूषित हो चुकी हैं।

इस स्थिति से दुनिया को बचाने का पाठ आदिवासियों से जानना होगा। प्रकृति के प्रति उनके नजरिए और उससे साहचर्य कायम करने के उनके तरीकों को सीखना होगा। गैर-आदिवासी तथाकथित ‘आधुनिक’ और ‘सभ्य’ लोगों को प्रकृति के बारे में आदिवासियों से दूसरा पाठ यह सीखना होगा कि आप प्रकृति के अभिन्न हिस्से हैं, उसके मालिक नहीं। आपको प्रकृति पर विजय पाने की दृष्टिकोण का पूरी तरह परित्याग करना पड़ेगा। उसके ऊपर वर्चस्व कायम करने के अहंकार छोड़ना पडे़गा। जो आधुनिक तथाकथित सभ्यता की चालक शक्ति रही है और अभी भी बनी हुई है। आदिवासी समाज खुद को प्रकृति के हिस्से के रूप में देखता है। वह उस पर विजय पाने के बारे में नहीं सोचता। वह प्रकृति की सृजनात्मक और विनाशकारी दोनों शक्तियों के प्रति सम्मान और आदर का भाव रखता है, यहां तक कि उसके प्रति श्रद्धा का भाव भी रखता है। प्रकृति को नमन करता है क्योंकि उसे पोषण, वस्त्र और छांव (घर) देती है। इन्हीं अर्थों में वह प्रकृति पूजक होता है। 

ओडिशा के कालाहांडी जिले में जंगल से खाद्य सामग्री ले जाती एक आदिवासी वृद्धा

गैर-आदिवासी समाज आदिवासियों से प्रकृति के बारे में जो तीसरा पाठ पढ़ सकता है, वह यह कि प्रकृति से उतना ही लो, जितना बहुत जरूरी हो। कभी भी प्रकृति का गैर जरूरी दोहन न करो। आदिवासी प्रकृति से उतना ही लेते हैं, जितना उनके जीवन-यापन के लिए जरूरी होता है। कभी बड़े पैमाने के संग्रह के लिए प्रकृति को दोहन नहीं करते। आदिवासी प्रकृति के जिस चीज का भी उपयोग या उपभोग करते हैं, उसे प्रकृति के उपहार के रूप में ग्रहण करते हैं। प्रकृति से कुछ भी लेने से पहले उसके पहले एक सम्मान प्रकट करते हैं। इस आधार पर आदिवासियों के बहुत सारे त्यौहार और पर्व बने हुए हैं।

हम सभी जानते हैं कि आज का आधुनिक औद्योगिक समाज हर साल जो उत्पाद और वस्तुएं पैदा करता है, उसका बड़ा हिस्सा बिक न पाने के चलते नष्ट हो जाता है, और फेंक दिया जाता है, क्योंकि यहां उत्पादन लोगों की जरूरतों के हिसाब नहीं होता, बल्कि मुनाफा कमाने के लिए होता है। दुनिया को कितनी और किस चीज की जरूरत है और कितना उत्पादन होना चाहिए, यह सब योजनाबद्ध तरीके से नहीं होता। ये उत्पाद प्रकृति के संसाधनों का इस्तेमाल करके बनाए जाते हैं, इनके नष्ट होने का मतलब है प्राकृतिक संसाधनों का गैर-जरूरी तरीके से नष्ट किया जाना। आधुनिक सभ्य समाज आदिवासियों से यह सीख सकता है कि उतना ही उत्पादन किया जाय, जितना बहुत जरूरी है। भविष्य के कठिन हालातों के लिए भी थोड़े ही संग्रह की आवश्कता होती है। संग्रह करने और मुनाफा कमाने की हवस आदिवासियों में नहीं पाई जाती है। अकूत मुनाफा की चाहत और असीम संग्रह की भावना आज मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन बन गई है। संग्रह व संरक्षण की यह सीख आदिवासियों से आधुनिक सभ्य समाज को सीखनी होगी। बुद्ध के अपरिग्रह (संग्रह) की शिक्षा का आधार आदिवासियों की यही जीवन-पद्धति थी।

आदिवासी प्रकृति पूजक होता है। इसका सीधा अर्थ है कि वह प्रकृति को हमेशा पवित्र भाव से देखता है। वह पोखरे, झील और नदी में प्रवेश करने, पहाड़ पर चढ़ने से पहले, यहां तक कि किसी पेड़ पर चढ़ने से पहले उसे नमन करता है। एक तरह से अनुमति लेता है। किसी फल को तोड़ने से पहले भी प्रकृति से एक तरह की आज्ञा लेता है। वह प्रकृति से जो कुछ लेता है, उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करता है। आदिवासी प्रकृति से लेना अपना सहज-स्वाभाविक अधिकार या विशेषाधिकार नहीं समझता। जबकि आधुनिक सभ्य समाज प्रकृति का मनमाना और अकूत दोहन अपना विशेषाधिकार समझता है। इसे ही उसने विकास नाम दे रखा है। विकास को प्रकृति के विनाश के पर्याय में बदल दिया गया है।

आधुनिक सभ्यता ने लोगों से सामूहिकता और साझेपन का भाव-विचार छीन लिया है। यहां हर व्यक्ति दूसरे से होड़ करता हुआ दिखाई देता है। व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति ही सबसे बड़ा ध्येय बन गया है। अलगाव और अकेलापन आज की सभ्यता का सबसे बड़ा लक्षण  है। हर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत सुख-दुख में डूबा हुआ है, उसके पास दूसरे के बारे में सोचने और जीने के लिए फुरसत नहीं है। इस स्थिति ने लोगों को मानसिक तौर पर बीमार-सा बना दिया है।

आधुनिक सभ्यता की इस व्यक्तिवाद की बीमारी से उबरने का पाठ आदिवासी पढ़ा सकते हैं और उनसे पढ़ना भी चाहिए। आदिवासी सामूहिक और साझेपन के जीवन में विश्वास करते रहे हैं। आदिवासी समाज में इस बात की कल्पना करना भी मुश्किल है कि किसी का कोठार धान से भरा हो और बगल का परिवार भूखा सोए। जो आदिवासी अभी शिकार करते हैं, उनके यहां सामान्य नियम है कि जब वे शिकार करके लाएंगे तो उसका एक हिस्सा उन लोगों के परिवारों को भी देंगे, जो शिकार में शामिल नहीं हो सकते हैं। जैसे विकलांग, बीमार और बूढ़े। इसी तरह जिस घर में पुरूष सदस्य की मृत्यु हो गई है, सिर्फ महिला है, जो शिकार पर नहीं जा सकती। उसे शिकार में हिस्सा दिया जाएगा। 

मिल-बांट कर खाना और जीना आदिवासी संस्कृति की बुनियादी विशेषता है। आज का सभ्य समाज यदि मिल-बांटकर खाना और जीना उनसे सीख ले तो दुनिया की करीब सभी बुनियादी समस्याओं और संघर्षों का समाधान हो जाए। आज की तारीख में दुनिया में हर चीज का इतना अधिक उत्पादन हो रहा है कि सबकी जरूरतें पूरी हो सकती हैं। भूख, कुपोषण, गरीबी और अभाव को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। सबके साथ बाटंने और साझेदारी की संस्कृति गैर-आदिवासी ‘आधुनिक सभ्य समाज’ को आदिवासियों से ही सीखना पडे़गा। तभी दुनिया को सुंदर और जीने लायक बनाया जा सकता है। आधुनिक विज्ञान और तकनीकी प्रगति ने हमारी समृद्धि तो बढ़ाई, लेकिन मिल-बांटकर खाने और सामूहिकता-साझेपन के साथ जीने का शऊर मनुष्यों को अभी तक नहीं सिखा पाई। यह शऊर उसे आदिवासियों से सीखना पड़ेगा।

आदिवासी समाज से दुनिया, विशेषकर भारतीय समाज जो सबसे बड़ी बात सीख सकता है, वह है– जन्मना ऊंच-नीच की भावना और सोच से मुक्ति का पाठ। भारत में सिर्फ एकमात्र आदिवासी समाज ही है, जो वर्ण व जाति-व्यवस्था के ऊंच-नीच की भावना और व्यवस्था से मुक्त है। वह शेष भारतीयों को सिखा सकता है कि किसी को ऊंच-नीच माने बिना कैसे बंधुता के भाव से जीया जा सकता है। जो समता-बंधुता बुद्ध-आंबेडकर का सबसे बड़ा मूल्य था, वह बीज रूप में आदिवासियों में मौजूद है। समता-बंधुता का पाठ भारतीय समाज आदिवासियों से ही सीख सकता है।

आधुनिक सभ्य समाज आज भी लैंगिक समता को अपनी संस्कृति का हिस्सा नहीं बना पाया। आदिवासी समाज में स्त्री कमोबेश पुरूष के बराबर की स्थिति में रहती है, कुछ आदिवासियों में उसके पास पुरूषों से अधिक अधिकार भी हैं। स्त्री को दोयम दर्जे का मानने और उसे अपनी संपत्ति समझने की भावना और समझ आदिवासियों में नहीं पाई जाती है। आदिवासी स्त्रियां आमतौर पर गरिमामय जीवन जीती हैं। उनकी गरिमा को अक्सर गैर-आदिवासी पुरूष ही रौंदते हैं। बलात्कार, यौन उत्पीड़न और व्यभिचार जो आधुनिक सभ्य समाज में आम बात बन चुकी है, आदिवासी समाज कमोबेश इससे मुक्त हैं। बलात्कार, यौन उत्पीड़न और व्यभिचार मुक्त समाज बनाने की सीख गैर आदिवासी समाज आदिवासियों से ले सकता है और उसे लेना ही चाहिए।

आदिवासियों की अन्याय विरोधी चेतना प्रखर और तीव्र होती है। वे हर तरह के अन्याय की मुखालिफत के लिए उठ खड़े होते हैं। वे अपनी स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा हर कीमत पर करते हैं। दुनिया में सबसे अन्याय विरोधी योद्धा आदिवासियों के बीच पैदा हुए हैं। वे अपने साहस, ताकत और फुर्ती का इस्तेमाल अन्याय के खिलाफ संघर्ष के लिए करते हैं। भारत के आदिवासी समाज ने बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, सिदो-कान्हू जैसे अनेकानेक योद्धाओं को जन्म दिया है। आज भी जिस समाज ने देश-दुनिया के महाबलशाली कार्पोरेट घरानों को जंगलों, नदियों और पहाड़ों पर कब्जा करने से एक हद तक रोक रखा है तो वह आदिवासी समुदाय ही है। इसके लिए यह समुदाय अकूत कुर्बानियां दे रहा है। साहस और संघर्ष की मिसाल कायम कर रहे हैं।

आधुनिक सभ्यता ने विज्ञान, तकनीक और वैज्ञानिक उपकरणों का विकास कर मनुष्य की क्षमता को बहुत बढ़ा दिया है, लेकिन इस उपयोग प्रकृति, मनुष्य और प्राणीमात्र के हित में नहीं, बल्कि इनके विनाश के लिए किया जा रहा है, जिसे विकास नाम दिया जा रहा है। विकास के इस रास्ते से मुक्ति का पाठ आदिवासी समाज ‘आधुनिक सभ्य समाज’ को सिखा सकता है। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सिद्धार्थ

डॉ. सिद्धार्थ लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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