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पश्चिम बंगाल : कौन कर रहा चाय बागान मजदूरों की हकमारी?

चाय बागान के श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जा रही है। इसे लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है। सवाल है कि वे कौन हैं जो चाय बागान के मजदूर, जिनमें अधिकांश आदिवासी हैं, के हकों की हकमारी कर रहे हैं? बता रहे हैं राजन कुमार

भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है और इसमें असम व पश्चिम बंगाल का हिस्सा लगभग 82 प्रतिशत है। इन दोनों राज्यों में चाय उद्योग मुख्य उद्योग है। फिर भी इन राज्यों में चाय श्रमिकों की स्थिति अत्यंत ही दयनीय है। पश्चिम बंगाल की बात करें तो वहां आलम यह है कि दैनिक मजदूरी के रूप में केवल 232 रुपए दिया जा रहा है। हालांकि राज्य सरकार ने उनकी मजदूरी में 18 रुपए की वृद्धि करने की बात कही है। लेकिन चाय बागान के मलिकों को यह भी नागवार गुजरा और इसके खिलाफ उन्होंने कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी। वहीं राज्य सरकार ने चाय बागान श्रमिकों को पांच डिसमिल जमीन देने की बात कही तो यह भी चाय बागान मालिकों को नागवार गुजरा है। 

पहले न्यूनतम मजदूरी के सवाल पर बात करते हैं। इस संदर्भ में बीते 3 अगस्त, 2023 को कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक टिप्पणी काबिल-ए-गौर है, जिसमें उसने चाय बागान मालिकों को कड़ी फटकार लगाई। न्यायमूर्ति राजा बसु चौधरी की एकल पीठ ने कहा कि “श्रम आयुक्त के न्यूनतम मज़दूरी संबंधी समझौते पर सहमति के बाद भी चाय बागान मालिकों का कोर्ट पहुंचना बताता है कि वे श्रमिकों के न्यूनतम मेहनताने को भी लटका कर रखना चाहते हैं।”

साथ ही न्यायालय ने प्रतिवादी यानी राज्य सरकार को भी निर्देशित किया कि वह प्रमुख वैधानिक प्राधिकारी के तौर पर या एक समिति बनाकर वैधानिक कार्य को संविधान के अनुच्छेद 43 के अनुसार यह सुनिश्चित करे कि श्रमिकों को जीवनयापन योग्य वेतन और काम की परिस्थितियां सभ्य जीवन स्तर और अवकाश का लाभ व सामाजिक तथा सांस्कृतिक अवसर प्राप्त हो। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में न्यायादेश जारी किया जा चुका है।। 

दरअसल भारत में राष्ट्रीय स्तर और पश्चिम बंगाल में राज्य स्तर पर जो न्यूनतम मजदूरी तय है उससे भी कम मजदूरी 232 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से पश्चिम बंगाल के चाय बागान श्रमिकों को मिलती है। चाय बागान मालिकों की सहमति और न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति के अनुशंसा पर विगत 27 अप्रैल, 2023 को पश्चिम बंगाल के श्रम आयुक्त ने चाय श्रमिकों की दिहाड़ी में 18 रुपए का इजाफा करने का आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत 1 जून, 2023 से चाय श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी 250 रुपए प्रतिदिन देने का प्रावधान किया गया। 

उधर चाय बागान मालिकों का कहना है कि “मज़दूर हड़ताल पर न चले जाएं इसलिए दवाब में बढ़ी हुई दिहाड़ी पर सहमति दी गई।”

पश्चिम बंगाल के चाय बागान श्रमिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता व ‘निरंग पझरा’ के संपादक अर्जुन इंदवार कहते हैं, “चाय बागान मालिक चाय बागान श्रमिकों को गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। बागान मालिक श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी नहीं देना चाहते हैं, जमीन का अधिकार नहीं पाने देना चाहते हैं। और वे चाहते हैं कि कम पैसे में श्रमिक चाय बागानों में काम करें।”

चाय बागान में काम करती एक महिला श्रमिक

अर्जुन इंदवार कहते हैं, “बाजार में मजदूरों को 600 रुपए मिलते हैं तो 200 रुपए में बागान के श्रमिक कैसे काम करेंगे। चाय बागान श्रमिकों के न्यूनतम मजदूरी तय करने के लिए फरवरी, 2015 में न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति गठित किया गया। उस समिति को छह माह के अंदर न्यूनतम मजदूरी अधिनियम-1948 के तहत न्यूनतम मजदूरी पर फैसला करना था। अभी आठ साल हो गए और इस दौरान 18 बैठकें भी हो गईं। लेकिन ये लोग किसी भी नतीजे पर अब तक नहीं पहुंचे हैं।” 

वे आरोप लगाते हैं, “सरकार भी नहीं चाहती कि चाय बागान श्रमिकों को उचित मजदूरी मिले और ना ही सुलभ शौचालय, पीने का पानी, स्वास्थ्य एवं अस्पताल और अन्य मूलभूत सुविधाएं प्राप्त हों। पश्चिम बंगाल में जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, अलीपुरदुआर और उत्तर दिनाजपुर जिले में चाय उद्योग पर लगभग 20-22 लाख लोग आश्रित हैं। यहां लगभग 3 लाख स्थायी और 2 लाख अस्थायी श्रमिक हैं। इन पांच लाख लोगों का अपना परिवार है, जो लगभग 20-22 लाख हो जाते हैं। बहुत से ऐसे परिवार भी हैं, जिनमें चार-चार बेटें हैं तो एक बेटे को ही काम मिलता है, और तीन बेटे की फैमिली उसी बागान में रहती है। इन श्रमिकों में 60 प्रतिशत आदिवासी हैं और कुल श्रमिकों में 50 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं हैं। महिला श्रमिकों को मातृत्व सुविधाएं, शिशु गृह की सुविधा, अवकाश, उचित दिहाड़ी इत्यादि सुविधाएं नहीं मिलती हैं।” 

वे कहते हैं कि सरकार श्रमिकों को मूलभूत अधिकार इसलिए नहीं देना चाहती क्योंकि जिस पार्टी की सरकार है उस पार्टी को चाय बागान मालिक खरबों रुपए का भारी चंदा देते हैं। और वे इसलिए देतें हैं क्योंकि वे लोग पार्टी प्रमुखों के अपने जाति समुदाय के लोग हैं। तो वह पार्टी चाहती है कि वह खरबों रुपए उसे मिलता रहे, और वह इसलिए चाय बागान श्रमिकों के मूलभूत अधिकारों पर ध्यान नहीं देती। 

अर्जुन इंदवार

इंदवार कहते हैं, “चाय बागान श्रमिकों के वोट के लिए ये लोग किसी तरह मैनेज कर लेते हैं। मजदूरों के लिए ये लोग ‘जय जोहार पेंशन स्कीम’ लाए हैं। जिसके तहत प्रति माह एक हजार रुपए उन्हें मिलता है। इसके अलावा एक-दो ऐसे ही छोटे-मोटे स्कीम हैं। मतलब यह कि ‘श्रमिकों को वो ढेला देंगे और वे खुद मिठाई खाएंगे।’ तो इस तरह सरकार और चाय बागान मालिक मिलकर श्रमिकों को वाजिब हक देना नहीं चाहते हैं। चाहे वह जमीन का अधिकार हो या न्यूनतम मजदूरी का।”

वे कहते हैं, “चाय बागान श्रमिकों को नियमतः न्यूनतम दिहाड़ी 590 रुपए मिलना चाहिए था, लेकिन अभी उनको 232 रुपए देकर काम चला रहे हैं। इसमें 18 रुपए बढ़ा तो चाय बागान मालिक चले गए हाई कोर्ट। जब हाई कोर्ट ने देखा कि ये 18 रुपए भी चाय श्रमिकों को नहीं देना चाहते और 232 रुपए में ही सभी काम करवाना चाहते हैं तो इनको फटकार लगाई। कोर्ट ने तो यह भी कहा है कि चाय बागान श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी अधिनियम-1948 के तहत न्यूनतम मजदूरी भी नहीं देना गलत है। छह माह के अंदर राज्य सरकार को समिति बनाकर श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी देना चाहिए।”

श्रमिकों को उनकी ही जमीन का पट्टा

एक और मसला जमीन के पट्टे से भी जुड़ा है। पश्चिम बंगाल सरकार चाय बागान के श्रमिकों को जमीन का पट्टा भी देने की घोषणा की है। इस संबंध में एक अधिसूचना 1 अगस्त, 2023 को जारी की गई। 

अधिसूचना में कहा गया है कि “इसका उद्देश्य बागानों में रहने वाले ‘भूमिहीन’ चाय श्रमिकों और अन्य निवासियों की सदियों पुरानी समस्या का समाधान करना है। दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरदुआर, कूचबिहार और उत्तरी दिनाजपुर के जिलाधिकारी चाय बागानों की अप्रयुक्त और अधिशेष भूमि का सर्वेक्षण करेंगे। पात्र परिवारों को 5 डिसमिल भूमि तक के होमस्टेड पट्टे दिए जाएंगे। ये पट्टे विरासत योग्य होंगे, लेकिन हस्तांतरणीय नहीं होंगे।” 

सरकार ने न केवल वर्तमान में कार्यरत चाय बागान श्रमिकों को बल्कि ‘सेवानिवृत्त या सेवानिवृत्त भूमिहीन मजदूरों और चाय बागान के दीर्घकालिक कब्जेदारों’ को भी भूमि का अधिकार देने का फैसला किया है।

लेकिन चाय बगान के मालिकों को यह भी स्वीकार नहीं है। फरवरी, 2023 में जब राज्य सरकार ने श्रमिकों को भूमि अधिकार प्रदान करने के मामले में चाय बागान मालिकों से सुझाव मांगी थी तो बागान मालिकों ने इसका विरोध किया था। बागान मालिकों के एसोसिएशन के तरफ से 14 मार्च, 2023 को लैंड कमिश्नर को 19 पेज की चिट्ठी लिखी गई थी, जिसमें बार-बार जिक्र किया गया था कि श्रमिकों को जमीन का पट्टा मिलेगा तो श्रमिक काम पर नहीं आएंगे। साथ ही यह भी कहा गया था कि पहाड़ [दार्जिलिंग और कलिम्पोंग जिले] के चाय बागानों में नेपाल से बड़ी संख्या में लोग आने लगेंगे, जो भारतीय जमीन पर अतिक्रमण करेंगे।

इस पर अर्जुन इंदवार कहते हैं, “बागान मालिक के अनुसार श्रमिक काम पर नहीं आएंगे, इसका मतलब श्रमिक बागान मालिकों के नियंत्रण में नहीं रहेंगे। यानि श्रमिक बागान मालिकों की गुलामी नहीं करेंगे। यह बात घुमाकर वे सब कर रहे हैं।”

अर्जुन इंदवार राज्य सरकार को भी कटघरे में खड़ा करते हैं। उनके मुताबिक, “अभी राज्य सरकार आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर लुभाने की कोशिश कर रही है। इस क्षेत्र में पिछली बार तृणमूल कांग्रेस बुरी तरह हार गई थी तो वह अपनी वोट की जमीन बचाने के लिए अभी एक नया पांसा फेका है कि हमारी सरकार चाय बागान श्रमिकों को जमीन का अधिकार देगी। लेकिन यह जमीन सिर्फ 5 डिसमिल, यानि 2177 वर्गफुट होगी। जो श्रमिक यहां पहले से ही 10 हजार वर्गफुट में रह रहे हैं, उनको दो हजार वर्गफुट देकर क्या उनका आठ हजार वर्गफुट जमीन छीनी जाएगी? जबकि श्रमिकों की ये जो जमीन है, अंग्रेजों के जमाने में सरकार उनको इसलिए दी थी, क्योंकि ये लोग जंगलों को काटकर चाय बागान बनाते थे। उस समय से मजदूर लोग इस जमीन पर अपना गांव बसाकर रह रहे हैं। और बाद में गांव से लोग बागान में काम करने के लिए जाने लगे। इनलोगों की अपनी जमीन थी, अपनी बहुत बड़ी खेती-बाड़ी थी, स्वतंत्र रूप से ये लोग रहते थे। ये लोग खेती-बाड़ी भी करते थे और बागान में काम करके पैसे भी कमाते थे। तो इस तरह से उनका खुशहाल जीवन था, लेकिन 1951 में टी प्लांटेशन लेबर एक्ट संसद में बनाया गया, जिसमें प्रावधान किया गया कि मजदूरों को प्लांटेशन एरिया में आवास देना पड़ेगा। इसके तहत वेस्ट बंगाल टी प्लांटेशन लेबर एक्ट भी बनाया गया। लेकिन इस एक्ट को लागू करने के लिए सरकार के पास जमीन नहीं थी, क्योंकि जो जमीन पहले से थी, वहां तो टी प्लांटेशन हुआ था। फिर सरकार ने वेस्ट बंगाल लैंड एक्वीजीशन एक्ट 1953 बनाया, और जिस जमीन पर मजदूर पहले से ही गुजर-बसर कर रहे थे, उसी जमीन को सरकार ने, मजदूरों के अनपढ़ होने का लाभ उठाकर, अपने कब्जे में ले लिया। फिर उसी जमीन को चाय बागान मालिकों को मजदूरों के आवास बनाने के लिए सौंप दिया। चाय बागान प्रशासन उसपर कब्जा करके लगभग 20-30 प्रतिशत जमीन पर क्वार्टर बना दिया, और बाकी जमीन अधिग्रहित कर अपने अधीन रख लिया। अब सरकार इन मजदूरों की क्वार्टर वाली जमीन लेकर उसमें से एक छोटा हिस्सा 5 डिसमिल जमीन वापस इन मजदूरों देने का योजना ला रही है। तो बागान मालिक बोल रहे हैं कि यदि इन मजदूरों को जमीन का अधिकार मिल गया तो ये मजदूर लोग काम पर नहीं आएंगे। तो इस तरह से चाय बागान मालिक बागान चलाने के लिए मजदूरों के मूल अधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं। मजदूरों के मूल अधिकारों को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।” 

अर्जुन इंदवार के अनुसार पश्चिम बंगाल के चाय श्रमिकों में लगभग 60 प्रतिशत आदिवासी हैं, जबकि 25 प्रतिशत गोरखा हैं। बाकी 15 प्रतिशत में कुछ बंगाली हैं, कुछ दक्षिण भारतीय तमिल-तेलुगु हैं, कुछ उत्तर प्रदेश, बिहार और ओड़िशा के हैं। 

वहीं ‘दलित आदिवासी दुनिया’ अखबार के संपादक मुक्ति तिर्की का कहना है, “सरकार द्वारा चाय बागान श्रमिकों को सिर्फ 5 डिसमिल जमीन देना श्रमिकों के साथ धोखा है। पूरा चाय बागान ही मजदूरों का है। चाय बागान मालिक तो बाद में आए और सरकार ने उन्हें पूरा बागान दे दिया। जबकि चाय बागान श्रमिकों ने ही चाय बागान बनाए हैं, और अंग्रेजों के समय से ही यहां रह रहे हैं। कानूनी तौर पर भी चाय श्रमिक बागान की भूमि के मालिक होने चाहिए और वनाधिकार कानून 2006 के तहत भी वे उस पूरी जमीन के मालिक होने चाहिए।”

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

राजन कुमार

राजन कुमार फारवर्ड प्रेस के उप-संपादक (हिंदी) हैं

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