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लोक शाहीर गदर को याद करते हुए

लोकतांत्रिक ताकतों पर बढ़ते जुल्म के मद्देनजर 1983 में अखिल भारतीय क्रांतिकारी सांस्कृतिक संघ की स्थापना की गई, जिसमें गदर की अहम भूमिका थी। प्रतिरोध का स्वर जन नाट्य मंडली बना रहा। गदर को श्रद्धांजलि दे रही हैं कुसुम त्रिपाठी

“भारत अपनी महान भूमि / इसकी कहानी सुनो रे भाई / सुजलाम्, सुफलाम् इसी देश में रोटी मंहगी क्यों रे भाई?” अक्सर इसी सवाल से गदर (4 मई, 1949 – 6 अगस्त, 2023) अपने कार्यक्रम का आगाज करते थे। यही सवाल मानो उनका आह्वान भी था। उनका पूरा नाम गुम्मादी विठ्ठल राव था। जन्म 4 मई, 1949 में आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) में मेडक जिले के तूपरान गांव में एक दलित परिवार में हुआ था। उनकी मां का नाम सेशैंन और पिता का नाम लच्छूमम्मा था। पिता डाॅ. आंबेडकर के विचारों से गहराई तक प्रभावित थे। इसका असर गदर पर भी पड़ा। वे अपने गांव में हायर सेंकेंडरी की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले पहले छात्र थे। आगे उनके पिता ने उन्हें उस्मानिया विश्वविद्यालय में इंजिनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए भेज दिया। छात्र जीवन में ही गदर ने आवाज उठाना प्रारंभ कर दिया। 

दरअसल, इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में गदर ने देखा कि प्रत्येक सौ विद्यार्थियों के लिए एक शौचालय की व्यवस्था है, जिसके कारण सभी विद्यार्थियों को सुबह चार बजे उठकर शौचालय की लाइन में लगना पड़ता था। गदर उन दिनों लाइन में खड़े होकर यह गाना गाते–

“सौ छात्रों के लिए एक पाॅट है,
हम क्यों हगना चाहते है?
हमारे भात (चावल) में सौ-सौ कीड़े है,
फिर भी हम क्यों खाना चाहते है?”

सभी विद्यार्थी इस गाने को सुनकर मजा लेते थे। बहुत जल्द गदर ने महसूस किया कि गरीब विद्यार्थी इंजिनियरिंग की पढ़ाई नहीं कर सकते। उन्होंने गरीबी के कारण अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ दी और आजीविका का दूसरा रास्ता अपनाया।

यह 1970 का दशक था जब देश में क्रांति की लहर दौड़ रही थी। इसकी पृष्ठभूमि में भूमि संघर्ष का आंदोलन भी था। 1967 के आखिरी दिनों में नक्सलबाड़ी आंदोलन ने देश भर में संसदीय राजनीति के घिनौने चेहरे को नंगा कर दिया। पूरी राजनीति दो हिस्सों में बंट गयी। एक ओर सभी संसदीय पार्टियां थीं, जो किसी न किसी तरह इस व्यवस्था को कायम रखना चाहती थीं, तो दूसरी ओर वामपंथी संगठन थे, जो सामंती, अर्द्ध-सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म कर जनवादी व्यवस्था को कायम करना चाहते थे। सशस्त्र संघर्ष के इस दौर ने तमाम शोषित वर्गों में जोश भर दिया। गदर भी इसी विचारधारा से प्रभावित हुए और पीपुल्स वार ग्रुप (माओवादी-लेनिनवादी) में शामिल हो गए। गदर ने जन नाट्य मंडली की स्थापना की और पीपुल्स वार ग्रुप के सांस्कृतिक अगुआ बने। 

स्मृति शेष : गदर (4 मई, 1949 – 6 अगस्त, 2023)

इस बीच 1973 के दौरान भारत-पाक युद्ध, अकाल, मंहगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी थी। पूरे देश में तत्कालीन सत्ता को उखाड़ने के लिए आंदोलन चल रहा था। इस आंदोलन में समाजवादी और वामपंथी दोनों सक्रिय थे। सरकार आंदोलन का बर्बरतापूर्वक दमन कर रही थी। वामपंथी संगठनों के अनेक कार्यकर्ताओं को शहादत देनी पड़ी। इसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। गदर को भी भूमिगत होना पड़ा।

करीब उन्नीस महीने के बाद जब आपातकाल खत्म किया गया और 1977 में हुए चुनाव के बाद कांग्रेसी सरकार का पतन हुआ तब लोगों को यह दूसरी आजादी के माफिक महसूस हुआ। लोगों ने खुली आंखों से बेहतर जीवन का सपना देखना शुरू किया, किंतु यह दूसरी आजादी भी पहली आजादी की तरह ही भ्रम मात्र थी। यह अकारण नहीं था कि जिस देश की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बीता रही हो, जहां अब भी हमारे गांव अशिक्षा, शोषण, और सांस्कृतिक पिछड़ेपन के अंधकार में डूबे हों, उस देश की जनता को 1978 में फिर से राज्य सत्ता का विरोध करना पड़ा। यह सर्वविदित है कि तमाम दावों के बावजूद वास्तव में घोर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संकट गहराता रहा है। महिलाओं पर हिंसा, असुरक्षा, बेरोजगारी और अशिक्षा, भ्रष्टाचार, नैतिक मूल्यों का पतन, मंहगाई, विश्व बैंक के समक्ष देश का आत्मसमर्पण, जन विरोधी औद्योगिक नीतियां, अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाना आदि सवाल आज भी कायम हैं। ये परिस्थितियां 1980 के बाद उभरकर सामने आई थीं। यह एक भयानक सांस्कृतिक शून्यता का परिचय देने वाली स्थिति थी। ऐसे में गदर की जन नाट्य मंडली ने गीतों के माध्यम से तमाम शोषित, पीड़ित जनता को अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध प्रेरित करना शुरू किया। 1982 के आसपास आंध्र प्रदेश में संस्कृति कर्मियों को पुलिस मुठभेड़ के नाम पर मारा जाने लगा और गिरफ्तार कर यातनाएं दी जाने लगीं। जन नाट्य मंडली पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। ऐसे में गदर को एक बार फिर भूमिगत होकर आंदोलन करना पड़ा।

लोकतांत्रिक ताकतों पर बढ़ते जुल्म के मद्देनजर 1983 में अखिल भारतीय क्रांतिकारी सांस्कृतिक संघ (एआईएलआरसी) की स्थापना की गई, जिसमें गदर की अहम भूमिका थी। प्रतिरोध का स्वर जन नाट्य मंडली बना रहा।

गदर की लोकप्रियता का आलम यह था कि चौक-चौराहों, गली-मोहल्लों, झुग्गी-झोपडियों, गांवों, आदिवासी इलाकों व हड़ताल, आंदोलनों में, फैक्ट्रियों के आसपास तथा विश्वविद्यालयों में उनके गीत गाए जाते थे। उन्हें सुनने के लिए लोग उमड़ पड़ते थे। यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं कि उनके गीतों से प्रभावित होकर लोग पीपुल्स वार ग्रुप में शामिल हो रहे थे। इसी कारण 3 अप्रैल, 1997 को उनके ऊपर जानलेवा हमला किया गया, जिसमें एक गोली उनकी रीढ़ में लगी जो अंत तक धंसी रही। 2004 में जब देश की अनेकों नक्सलवादी पार्टियों ने मिलकर माओवादी पार्टी बनाई तब गदर भी उसमें शामिल हुए। 2004 में जब ‘मुम्बई रेस्सिटेंन्स’ नामक कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की गई थी, उसमें गदर ने सांस्कृतिक कार्यक्रम किया, जबकि कुछ ही दिन पहले उनके बेटे की मृत्यु हुई थी।

आगे चलकर गदर तेलंगाना आंदोलन में यह सोचकर शामिल हुए कि इस आंदोलन से इस क्षेत्र के लोगों को बेरोजगारी और गरीबी से मुक्ति मिलेगी। लेकिन अलग राज्य बनने के बावजूद कुछ नहीं मिला। वर्ष 2010 में गदर ने माओवाद छोड़ कर स्वयं को आंबेडकरवादी घोषित किया। उन्होंने अपनी खुद की पार्टी ‘गदर प्रजा पार्टी’ बनाई।

गदर अपनी निशानी के तौर पर जन नाट्य मंडली छोड़ गए हैं। वे मानते थे कि लोक-कलाएं और लोक-संगीत, लोक संस्कृति से उत्पन्न होती हैं, वे अपनी संस्कृति की संपूर्ण अभिव्यक्ति होने के कारण दर्शकों को गहरे रूप से प्रभावित करती हैं। इसी कारण गदर ने आंध्र प्रदेश की लोक-कला से बुर्रा कथा और ओगूकथा शैली का इस्तेमाल अपने क्रांतिकारी गानों में किया। जब वे ‘रेला-रेला रे’ गाते थे तो दर्शक उत्साह से भर जाते थे। 

गदर ने अपने लिए पारंपरिक पोशाक ही रखा। अपनी प्रस्तुतियों के दौरान वे धोती पहनते, देह पर कंबल रखते, और पैर में घुंघरू पहनते। हाथ में डंडा और लाल झंडा लेकर जैसे ही वे मंच पर प्रस्तुत होते तो लोगों की भीड़ सारी सीमाओं को पार कर जाती। ।

गदर के सभी गानों का हिंदी अनुवाद विलास घोगरे ने किया था। विलास ने गदर को अन्नाभाऊ साठे के बारे में बताया था। जिस तरह अन्नाभाऊ साठे ने महाराष्ट्र में पोवाड़ा शैली का प्रयोग कर मेहनतकशों, मजदूरों, दलितों, शोषितों के लिए गीत गाए थे। उसी तरह गदर भी आंध्र प्रदेश में उन्हीं की परंपरा के लोक गायक थे। आन्ध्र प्रदेश में गदर के गानों ने वह काम किया, जो हजारों भाषण, नारे, और पत्रक नहीं कर पाते। अधिकारों के हनन के लिए तत्पर तंत्र के खिलाफ प्रतिरोध की संस्कृति के समर्थन में गदर के गाने हमेशा अमर रहेगें। जब तक इस देश में भूख है उनके गाने इस देश की हवाओं में गूंजते रहेगें। 

“आग है ये आग है
ये भूखे पेट की आग है
ये आंसुओं की अंगार है
ये और भड़कती जा रही
ये धधकती हुई आग है”

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कुसुम त्रिपाठी

स्त्रीवादी आलोचक कुसुम त्रिपाठी की एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हैं , जिनमें 'औरत इतिहास रचा है तुमने’, स्त्री संघर्ष के सौ वर्ष' चर्चित हैं

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