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काश, भारतीय वामपंथी ग़दर की राह पर चलते

वर्तमान और पुराने कम्युनिस्टों, समाजवादियों और नास्तिकों को यह समझना चाहिए कि ग़दर ने जिस तरह से मृत्यु के पश्चात् भी नवयान बौद्ध धर्म में अपनी आस्था दर्शाई, वही भारत में हिंदुत्व की ताकतों से मुकाबला करने का सही रास्ता है। बता रहे हैं प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड

गत 6 अगस्त, 2023 को ग़दर की आकस्मिक मृत्यु के बाद बौद्ध रीति-रिवाज़ों से हुए उनके अंतिम संस्कार में हजारों लोगों की भागीदारी, भारतीय वामपंथियों को एक नई राह दिखी होगी। ग़दर की पहचान वामपंथी क्रांतिकारी गायक, गीतकार और रंगमंच कलाकार के रूप में थी। माओवादी होने के कारण उन्हें कुछ सालों तक भूमिगत भी रहना पड़ा था। क्रांतिकारी गायक और कलाकार के रूप में वामपंथी विचारों को उन्होंने अपने गीतों के जरिए घर-घर तक पहुंचाया।

वे कई दशकों तक राज्य तंत्र के दमन का शिकार रहे। सन् 1997 में उन्हें सुरक्षा बलों की गोलियों का सामना भी करना पड़ा। उस समय चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। एक गोली उनकी रीढ़ में आजीवन अटकी रही। जब ग़दर को सुपुर्देखाक किया गया तब भी वह गोली उनके शरीर में थी। वह सदियों तक वहीं रहेगी। अगर उनके शव को जला दिया जाता तो उनके दमन की गवाह, वह गोली, राख में तब्दील हो जाती। वे माओवादी थे और बाद में आंबेडकरवादी बौद्ध बने। लेकिन बौद्ध कर्मकांडों के साथ उनके अंतिम संस्कार ने उन्हें शांति का नुमाइंदा बना दिया — एक ऐसा व्यक्ति, जिसे 25 साल तक चाहे दिन हो या रात अपने घायल शरीर के दर्द से कभी मुक्ति नहीं मिली; और जिसने फिर भी लिखना, गाना और नृत्य करना बंद नहीं किया।

वर्तमान और पुराने कम्युनिस्टों, समाजवादियों और नास्तिकों को यह समझना चाहिए कि ग़दर ने जिस तरह से मृत्यु के पश्चात् भी नवयान बौद्ध धर्म में अपनी आस्था दर्शाई, वही भारत में हिंदुत्व की ताकतों से मुकाबला करने का सही रास्ता है। उनकी राह हिंदुत्व राष्ट्रीयता का कम्युनिस्ट-बौद्ध विकल्प प्रस्तुत करती है। यह एक कठिन समस्या का अहम समाधान है। नास्तिकतावाद से हिंदुत्व की ताकतों का कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि धर्म के नाम पर अंधश्रद्धा और मंत्रों पर आधारित जो रहस्यवाद उन्होंने फैला रखा है, उसके जाल में आम लोग फंसे हुए हैं। अगर सभी कम्युनिस्ट, समाजवादी और नास्तिक ग़दर के रास्ते पर चलें तो भारत को एक नई दिशा मिल सकती है। एक क्रांतिकारी के रूप में ग़दर का कोई मुकाबला नहीं था। उन्होंने अपने गीतों, नृत्यों और भाषणों से एक अत्यंत रचनात्मक संदेश लोगों तक पहुंचाया। उनका एक भी समकालीन कम्युनिस्ट यह नहीं कर सका। वे एक ऐसे दार्शनिक थे, जिसने अपना दर्शन गीत-संगीत के ज़रिए लोगों तक पहुंचाया। वे सिद्ध गायक और शानदार कलाकार थे और उनकी धुनें अत्यंत मीठी हुआ करतीं थीं। वे सुदर्शन देहधारी थे, मज़बूत कद-काठी के थे और जब वे मंच पर होते थे तब उनका शरीर मानों रबर का रोबोट बन जाता था। सांस्कृतिक नायक अक्सर सामाजिक-आध्यात्मिक सुधारक बन जाते हैं और ग़दर तो हिंदुत्व से मुकाबले के लिए ज़रूरी सभी मूलभूत तत्वों से लैस थे। आंबेडकर के बाद हमें नया रास्ता दिखने वाले ग़दर, एक दलित परिवार से थे, कम्युनिस्ट संस्कृति में रचे-बसे थे और तेलुगु भूमि की संतान थे। ज्ञातव्य है कि तेलंगाना में ही सामंतवाद के खिलाफ पहला बड़ा सशस्त्र संघर्ष हुआ था। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यह दावा कर सकता है कि ज्योति बसु, चारू मजूमदार, पुचमपल्ली सुंदर्या, कोंडापल्ली सीतारमैय्या, तरिमल नागी रेड्डी, देवुलापल्ली वेंकटेश्वर राव और चंद्रपुल्ला रेड्डी हिंदू थे। इन लोगों को कभी जाति-केंद्रित हिंदू धर्म, जिसे अब सनातन धर्म बताया जा रहा है, का आध्यात्मिक विकल्प नही दिखा। भारत में ब्राह्मणवाद कई रूप लेता रहा है, लेकिन वह कभी भी बुद्ध, अयोथी दास, आंबेडकर और ग़दर को अपने में अवशोषित नहीं कर सकता, क्योंकि इन लोगों ने अपने जीवन में हर कदम पर यह सिद्ध किया कि वे ब्राह्मणवाद, सनातनवाद और हिंदू धर्म का विकल्प हैं। 

ग़दर (1949 – 6 अगस्त, 2023)

सीताराम येचुरी, प्रकाश करात और डी. राजा तब तक हिंदुओं की सूची से अपना नाम नहीं कटवा सकते, जब तक कि वे उसका आध्यात्मिक विकल्प न सामने रख दें। साम्यवाद, समाजवाद और राष्ट्रवाद के सम्मिश्रण के साथ, नवयान बौद्ध धर्म छद्म हिंदुत्व राष्ट्रवाद का मुकाबला कर सकता है। 

ग़दर रीढ़ की हड्डी में धंसी गोली के साथ 25 साल से अधिक जिए। यह बेमिसाल है। उन्हें शरीर के अलग-अलग हिस्सों में छह गोलियां लगीं, पर वे उनकी जान न ले सकीं। दोनों विश्वयुद्धों समेत किसी भी लड़ाई में छह गोलियों लगने के बावजूद किसी योद्धा के बच जाने का एक भी उदाहरण हम नहीं जानते। और यहां तो ग़दर शरीर में एक गोली के साथ लंबे समय तक जीवित रहे। ग़दर की दास्तां मानव के इतिहास में अनोखी है।

ऐसी जिंदगी के चलते उनकी लोकप्रियता जबरदस्त थी। लोग उनसे प्यार करते थे, उनका सम्मान करते थे। संयुक्त आंध्र प्रदेश (सन् 2014 में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विभाजन के पूर्व) में उनके गानों और नृत्यों के प्रशंसक बड़ी संख्या में थे। वे भूख और शोषण से मानव को मुक्ति दिलाने के प्रति प्रतिबद्ध थे और यही कारण है कि वे जिंदगी भर दुख ही भोगते रहे, इसके बावजूद कि वे गाते और नाचते रहे।

आंध्र प्रदेश के लोगों को भले ही अलग राज्य के विभाजन की मांग को लेकर 1996 से लेकर 2014 तक चले तेलंगाना आंदोलन में उनकी भूमिका बहुत पसंद नहीं आई होगी, लेकिन वे आंध्र प्रदेश में भी लोकप्रिय बने रहे। लेखक और कलाकार के बतौर वे पूरे देश में एक बेजोड़ राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक नायक के रूप में जाने जाते थे।

सन् 2012 में उन्होंने गंभीर विचारधारात्मक मतभेदों के चलते अपनी भूमिगत माओवादी पार्टी से संबंध तोड़ लिये। उन्होंने प्रस्तावित किया कि भारत की ज़मीनी सच्चाईयों को देखते हुए पार्टी को मार्क्स, लेनिन और माओ के अलावा फुले और आंबेडकर को भी मान्यता देनी चाहिए तथा जाति और वर्ग के खिलाफ भी लड़ना चाहिए। उन्होंने भारत में जाति की नकारात्मक भूमिका के बारे में गीत लिखना और प्रस्तुतियां देना भी शुरू कर दिया था। उनके प्रस्ताव को नामंज़ूर कर दिया गया और उनके काम को पार्टी-विरोधी और उनकी समझ को गैर-मार्क्सवादी बताते हुए उन्हें 2010 में ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी किया गया। 

ग़दर को पता था कि पार्टी से उनका निष्कासन तय है और इसलिए उन्होंने 2012 में उससे इस्तीफा दे दिया। भारत में व्याप्त वर्गीय और जातिगत शोषण के चलते उनकी पार्टी की नीतियां बदलवाने के उनके प्रयास को मान्यता दी जानी चाहिए। 

उन्होंने आंबेडकरवादी नवयान बौद्ध धर्म से अपने आध्यात्मिक और सामाजिक जुड़ाव की खुल कर घोषणा की और दलितों और महिलाओं के दमन पर कई गीत लिखे। उनका एक गीत घरों में महिलाओं की बेगारी की बारे में हैं– “ए मेरे पति, ज़रा बताओ तो कि बर्तन और कपड़े धोने की मेरी मजदूरी क्या है; घर में झाड़ू लगाने की मेरी मजदूरी क्या है; बच्चे को जन्म देने और पालने-पोसने ताकि वह भविष्य में मनुष्य बन सके – क्या है उसकी मजदूरी?” जाहिर है कि उनकी मानवीयता बहुत गहरी थी। 

वे केवल विचार के स्तर पर मार्क्सवादी, बौद्ध या अंबेडकरवादी नहीं थे। वे उच्च संवेदशीलता वाले मनुष्य थे। वे चिंतक थे और अपने आखिरी वक्त तक लेखक, गायक और नर्तक बने रहे। अपनी मौत के कुछ पहले उन्होंने अपना मर्सिया लिखा था। जिसमें वे लिखते हैं– “उसके शरीर में बैठी गोली को कौन सुरक्षित रखेगा?” अब वह गोली उनकी कब्र में सुरक्षित है – शासकों की मनुष्यता पर भीषण अत्याचारों के सुबूत के रूप में। 

हम सब जानते हैं कि भारत के कम्युनिस्ट नेताओं ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि वर्ग संघर्ष के साथ-साथ समाज सुधार भी ज़रूरी है। भारत में समाज सुधार में आध्यात्मिक सुधार के अतिरिक्त श्रम की गरिमा और महिलाओं की बराबरी सुनिश्चित करना शामिल है। और भारत में समाज सुधार की अंतिम मंजिल होनी चाहिए– जाति का विनाश और निर्धनता, भूख और महिलाओं की गैर-बराबरी का उन्मूलन। 

जहां तक अध्यात्म का प्रश्न है, भारतीय कम्युनिस्टों ने स्वयं को नास्तिक घोषित कर दिया और वर्गों की केवल आर्थिक दृष्टि से व्याख्या की। सच यह है कि उनमें से अधिकांश हिंदू के रूप में मरते हैं। उनकी नास्तिकता उन्हें किसी प्रकार का समाज सुधार करने की प्रेरणा नहीं देती।

ग़दर ने अपनी मृत्यु को एक सामाजिक और आध्यात्मिक सुधार कार्यक्रम बना दिया। आंबेडकर ने कहा था– “मेरा दुर्भाग्य था कि मैं अछूत होने के कलंक के साथ पैदा हुआ, लेकिन इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी। लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं, क्योंकि यह मेरे वश में है।” और उन्होंने अपनी मौत से पहले बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया।

ग़दर अछूत के रूप में पैदा हुए थे। उनका इस पर कोई वश नहीं था। उन्होंने एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी में काम किया, जिसके अनेक हथियारबंद दस्ते थे। वे उसकी “प्रजा युद्ध नौका” थे। इस युद्ध पोत को कई दशकों तक चलाने के बाद उन्हें यह अहसास हुआ कि आंबेडकर, जिन्होंने बौद्ध के रूप में मृत्यु को प्राप्त होकर शांति का संदेश दिया, के अनुसरण के बिना परिवर्तन संभव नहीं होगा। उन्हें यह अहसास हुआ कि बंदूकें उन्हें ‘अछूतपन’ से मुक्ति नहीं दिला सकतीं। इसलिए उन्होंने बौद्ध धर्म अंगीकार किया और अछूत होने के कलंक से मुक्ति पा ली।

इससे भी महत्वपूर्ण यह कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने उस राज्य के खिलाफ संघर्ष किया, जिसने सैकड़ों लोगों को यातना दी और फर्जी मुठभेड़ के सबूतों को मिटाने के लिए उनके शवों को जला दिया, उन्होंने यह इच्छा व्यक्त कि उनके शव को उनके द्वारा उनके बस्ती के बच्चों के लिए स्थापित अंग्रेजी माध्यम के स्कूल के प्रांगण में दफनाया जाए और उनकी कब्र को चिन्हित किया जाय।

अगर कथित मुठभेड़ों में मारे गए लोगों के शवों को दफनाया गया होता तो दशकों बाद भी उन्हें कब्र से निकल कर उनकी पड़ताल की जा सकती थी। इसलिए ग़दर ने यह तय किया था कि उन्हें उनके शरीर में धंसी गोली के साथ दफनाया जाय। 

ग़दर की रीढ़ की हड्डी में धंसी गोली, चंद्रबाबू नायडू के क्रूर शासनकाल की गवाह है। यह दिलचस्प है कि नायडू की पार्टी तेलुगु देशम थी, जिसे उनके ससुर ने स्थापित किया था और ग़दर, तेलुगु भूमि के सबसे प्रभावशाली लेखक, गायक और विचार संवाहक थे। 

यदि अब भी नायडू महाबोधि विद्यालय में ग़दर की कब्र, जिसमें उनका शव और उन्हें लगी गोली दोनों हैं, पर जाकर, सिर झुकाकर सच-सच बता दें कि उनके मुख्यमंत्रित्व काल में 6 अप्रैल, 1997 को क्या हुआ था, तो देश उन्हें माफ़ कर सकता है।। 

और इस स्वीकारोक्ति के बाद ही ही नायडू अपना शेष जीवन एक मनुष्य की तरह बिता सकेंगे।

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)  

लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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