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गोरखपुर में भूमिहीन दलित, आदिवासी, पिछड़े और पसमांदा समाज के लिए मांगी जमीन, मिली जेल

आंबेडकर जनमोर्चा द्वारा उत्तर प्रदेश में दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और पसमांदा समाज के भूमिहीनों को एक-एक एकड़ जमीन देने को लेकर तीन साल से आंदोलन चलाया जा रहा है। गत 10 अक्टूबर को गोरखपुर में एक कार्यक्रम का आयोजन कमिश्नर कार्यालय परिसर में किया गया। इसके लिए प्रशासन से अनुमति भी मांगी गई थी। इसके बावजूद एस.आर. दारापुरी, श्रवण निराला और डॉ. सिद्धार्थ सहित 7 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। पढ़ें, यह खबर

क्या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह शहर गोरखपुर में दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और पसमांदा समाज के भूमिहीन लोगों के लिए एक-एक एकड़ जमीन देने की मांग करना अपराध है? शायद यही कारण है कि यह मांग करने पर गोरखपुर पुलिस ने आंबेडकर जनमोर्चा के सदस्यों के अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस के सेवानिवृत्त डीआईजी एस.आर. दारापुरी सहित सात सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया और 11 अक्टूबर की रात में स्थानीय अदालत ने सभी को जेल भेज दिया। इनमें आंबेडकर जनमोर्चा के संयोजक श्रवण निराला के अलावा लेखक व पत्रकार डॉ. सिद्धार्थ भी शामिल हैं।

इस बीच निचली अदालत द्वारा सभी गिरफ्तार लाेगों की जमानत याचिका खारिज कर दी गई। आंबेडकर जनमोर्चा के सदस्यों ने जानकारी दी है कि वे अब कल जिला सत्र अदालत में जमानत के लिए अपील करेंगे।

इनके अलावा पुलिस ने फ्रांसीसी फिल्म निर्देशक हेराल्ड वैलेटिन जीन रोजर को भी इस मामले में गिरफ्तार कर लिया है। उनके ऊपर कमिश्नर कार्यालय परिसर में आयोजित आंदोलन में शामिल होने का आरोप लगाया गया है। जबकि आंबेडकर जनमोर्चा के सदस्यों का कहना है कि वे दलितों से जुड़े सवालों को लेकर एक डॉक्यूमेंट्री के निर्माण के लिए आए थे।

जीन रोजर के मामले में गोरखपुर के कलेक्ट्रेट चौकी के इंचार्ज अभिषेक सिंह ने तहरीर दर्ज कराया है।

इस पूरे मामले में गोरखपुर पुलिस की कार्रवाई के ऊपर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। दरअसल, गत 10 अक्टूबर, 2023 को आंबेडकर जनमोर्चा के द्वारा दलित, पिछड़ा, मुस्लिम, गरीब मजदूर भूमिहीन परिवारों को एक-एक एकड़ जमीन देने की मांग को लेकर कमिश्नर कार्यालय में एक दिवसीय ‘डेरा डालो, घेरा डालो आंदोलन’ का आयोजन किया गया। आंदोलन में हजारों लोग आए। इनमें महिलाओं की संख्या सर्वाधिक थी, पूरा कमिश्नर कार्यालय परिसर लोगों से भर गया। पूरे दिन वक्ता इस मुद्दे पर बोलते रहे। शाम को ज्ञापन देने के बाद आंदोलन समाप्त होना था, लेकिन देर शाम तक कोई अधिकारी ज्ञापन लेने नहीं आया तो सभी लोग कमिश्नर कार्यालय में जमे रहे। देर रात अधिकारी कमिश्नर कार्यालय पहुंचे और ज्ञापन लेकर कार्यवाही का आश्वासन दिया।

एस.आर. दारापुरी, श्रवण निराला और डॉ. सिद्धार्थ रामू

लेकिन गोरखपुर पुलिस और प्रशासन कुछ और ही खिचड़ी पका रही थी। हुआ यह कि ज्ञापन दिए जाने के बाद आंदोलन में शामिल होने आए लोग जाने लगे तभी कमिश्नर कार्यालय से ही लेखक-पत्रकार डाॅ. सिद्धार्थ को पुलिस हिरासत में लेकर कैंट पुलिस थाने चली गई। कुछ ही देर में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी आंबेडकर जनमोर्चा के मुख्य संयोजक श्रवण कुमार निराला के घर पहुंच गए और उनके घर में घुसकर तलाशी ली। इधर कमिश्नर कार्यालय से लौट रहे श्रवण कुमार निराला को पैडलेगंज में पुलिस ने घेर लिया। उस वक्त निराला के साथ सैकड़ों लोग थे। आधी रात बाद सभी लोगों को देवरिया बाईपास के पास हिरासत में ले लिया गया और बस से कौडीराम ले जाया गया। वहीं आंदोलन में वक्ता के बतौर आए पूर्व डीआईजी एवं दलित चिंतक व सेवानिवृत्त डीआईजी एस.आर. दारापुरी जो कि तारामंडल स्थित एक होटल में रूके हुए थे, 11 अक्टूबर की सुबह पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। 

पुलिस द्वारा इस मामले में एक और अजीबोगरीब कार्रवाई किए जाने की सूचना मिली है। आंबेडकर जनमोर्चा के सदस्यों ने बताया कि इस पूरे मामले में 13 नामजद और 10-15 अज्ञात लोगों के खिलाफ कैंट थाने में एफआईआर दर्ज कराया गया। इनमें श्रवण निराला, डॉ. सिद्धार्थ रामू, एस.आर. दारापुरी के अलावा ऋषि कपूर आनंद, सीमा गौतम, राजेंद्र प्रसाद, नीलम बौद्ध, सविता बौद्ध, निर्देश सिंह, अयूब अंसारी, जयभीम प्रकाश, देवी राम और सुधीर कुमार झा आदि शामिल हैं। इन लोगों के खिलाफ सरकारी काम काज में बांधा डालने, तोड़-फोड़ करने, निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में आईपीसी की धारा 147, 188, 342, 332, 353, 504, 506, दंड विधि संशोधन अधिनियम 1932 की धारा 7, सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 की धारा 3 और विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 138 के तहत केस दर्ज किया गया। लेकिन 11 अक्टूबर की शाम जब पुलिस ने सभी गिरफ्तार लोगों को निचली अदालत में पेश किया तब भारतीय दंड संहिता की धारा 307 का मामला भी जोड़ दिया गया।

बहरहाल, आंबेडकर जनमोर्चा द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि इस आंदोलन के लिए प्रशासन से अनुमति मांगी गई थी और शाम को प्रशासन को ज्ञापन भी दिया गया। आंदोलन में कोई हंगामा भी नहीं हुआ। इसके बावज़ूद इस तरह की गिरफ़्तारियां यह बताती हैं कि अब सरकार और उसकी एजेंसियां किस तरह संविधान के ख़िलाफ़ काम कर रही हैं। आज देश भर में जन आंदोलनों को कुचला जा रहा है। लेखकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का दमन और गिरफ़्तारियां हो रही हैं। यह घटना भी उसी की एक कड़ी है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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