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इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक को जनजातीय मुक्त बनाने की साजिश, दलित और ओबीसी की भी हकमारी

विगत कुछ वर्षों में मूल उद्देश्यों से परे जाकर इस विश्वविद्यालय में आदिवासी छात्र-छात्राओं के प्रतिनिधित्व को काफी सीमित कर दिया गया है। साथ ही, विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक पदों को भरने में विवाद की स्थिति पैदा कर दी गई है। बता रहे हैं राजन कुमार

वर्ष 2008 में तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह द्वारा संसद में एक विधेयक पेश किया गया था, जो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अधिनियम-2007 के रूप में अधिनियम बना। इसी अधिनियम के तहत मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। इस विश्वविद्यालय के स्थापना के मुख्य उद्देश्य थे– आदिवासी अंचलों में ही आदिवासियों को उच्च शिक्षा और अनुसंधान का अवसर प्रदान करना; उनकी कला, संस्कृति, परंपरा, भाषा, चिकित्सीय पद्धितियों, इत्यादि से संबंधित शिक्षण और अनुसंधान की सुविधा देना; आदिवासियों की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक दशाओं को सुधारने तथा उनके कल्याण, उनके बौद्धिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक विकास के लिए विशेष ध्यान देना, इत्यादि।

लेकिन विगत कुछ वर्षों में मूल उद्देश्यों से परे जाकर इस विश्वविद्यालय में आदिवासी छात्र-छात्राओं के प्रतिनिधित्व को काफी सीमित कर दिया गया है। साथ ही, विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक पदों को भरने में विवाद की स्थिति पैदा कर दी गई है। अब यह सवाल उठने लगा है कि यह सच में आदिवासी विश्वविद्यालय है या आदिवासी विश्वविद्यालय की आड़ में यहां उच्च वर्गों का प्रतिनिधित्व और वर्चस्व बढ़ाने की कोशिश की जा रही है?

पहला मामला चार-पांच वर्षों से शैक्षणिक पदों पर नियुक्तियों में विवाद का है। लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि बिना रोस्टर तैयार किए आरक्षण नियमों का उल्लंघन कर मनमाने ढंग से नियुक्तियां की गई हैं। लेकिन 15 जुलाई, 2023 को विश्वविद्यालय द्वारा शिक्षकों की भर्ती के लिए प्रकाशित विज्ञापन (क्रमांक आईजीएनटीयू/आरईसी. सेल/2023/टी-वन) पर ही सवाल उठने लगे हैं। विश्वविद्यालय के ही शिक्षक संघ और अनुसूचित जनजातीय (एसटी) प्रकोष्ठ, अनुसूचित जाति (एससी) प्रकोष्ठ और ओबीसी प्रकोष्ठ ने भर्ती विज्ञापन पर सवाल उठाए हैं। 

गत 21 अगस्त, 2023 को विश्वविद्यालय के एससी प्रकोष्ठ के लायजन (समन्वय) अधिकारी प्रोफेसर तन्मय घोराई ने कुलसचिव को पत्र लिखकर नियुक्ति प्रक्रिया में चल रही अनियमितता के खिलाफ विरोध दर्ज किया। उन्होंने पत्र में लिखा कि विश्वविद्यालय द्वारा बिना रोस्टर बनाए ही मनमाने तरीके से नियुक्ति की जा रही है, जो कि भारत सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्वारा समय-समय पर जारी आदेशों का स्पष्ट उल्लंघन है। जबकि कई विभागों में पूर्व से सहायक प्राध्यापक के जिन पदों पर एससी और एसटी के लोग नियुक्त थे, उन पदों के रिक्त होने पर उसे जान-बूझकर अनारक्षित और ईडब्ल्यूएस श्रेणी में बदल दिया गया है। ऐसे कुल 7 पद हैं, जिनमें 5 पद एससी और 2 पद एसटी के लिए आरक्षित थे। जबकि बैकलॉग के तीन पद एससी और ओबीसी के लिए आरक्षित एक पद पर दिव्यांग की अतिरिक्त शर्त जोड़ कर उसकी पूर्ति को दुरूह बना दिया गया है, जो पूरी तरह से नियम विरुद्ध है। इस प्रकार रोस्टर रजिस्टर को पूरी तरह से प्रभावित कर दिया गया है। सर्वविदित है कि रोस्टर में पहले से चिह्नित आरक्षित पदों की श्रेणी बदलना आरक्षण के नियमों के विरुद्ध है। 

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक

इसी तरह की आपत्ति एसटी प्रकोष्ठ और ओबीसी प्रकोष्ठ ने भी दर्ज कराई है। पत्र में इस पर भी ध्यान आकर्षित किया गया कि कुछ विभागों जैसे मनोविज्ञान, शिक्षा विभाग, राजनीति विज्ञान, बायोटेक्नोलोजी इत्यादि में पहली बार ही श्रेणी में विज्ञापित पदों को जान-बूझकर बैकलाग निर्धारित कर दिया गया है, जबकि पहली बार में ही विज्ञापित पद को बैकलॉग के रूप में निर्धारित नहीं किया जाता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि विश्वविद्यालय के कुछ लोग चाहते हैं कि अपने मनपसंद विभागों (जिसमें अभ्यर्थियों की संख्या अधिक रहती है) में अनारक्षित और ईडब्लूएस श्रेणी के अभ्यर्थियों की नियुक्ति की जा सके और अवैधानिक रूप से बैकलॉग घोषित पदों को लंबे समय तक खाली रखा जा सके, जो कि आरक्षण की संकल्पना के मूलतः विरुद्ध है। साथ ही यह भी ध्यान दिलाया गया है कि जनजातीय अध्ययन विभाग में एक भी पद जनजातीय वर्ग के लिए विज्ञापित नहीं किया गया है और न ही पूर्व में किया गया था। इस प्रकार जनजातीय विभाग में एक भी शिक्षक जनजातीय वर्ग का नहीं है। 

वहीं 23 अगस्त, 2023 को शिक्षक संघ ने एससी प्रकोष्ठ के पत्र के हवाले से रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर भर्ती विज्ञापन में विसंगति होने का आरोप लगाया और आरक्षित पदों सहित विज्ञापन में अन्य तरह की विसंगतियों को दूर करने हेतु रोस्टर रजिस्टर की त्रुटि को सुधारकर 200 प्वाईंट रोस्टर के तहत भर्ती विज्ञापन निकालने का अनुरोध किया। इसके बाद रोस्टर समिति की पुनः बैठक बुलाई गई, लेकिन इस बैठक में भी कोई परिणाम नहीं निकला।

यह भी सूचना मिली कि बैकलॉग पदों में दिव्यांग की शर्त जोड़ने मामले पर भी विरोध होने के बाद आनन-फानन में दो सदस्यीय रोस्टर पुनरीक्षण समिति बनाई गई, जिसमें बाहर से दो विशेषज्ञ आए थे। एक के.जी. वर्मा, जो केंद्रीय कार्मिक व लोक शिकायत निवारण मंत्रालय (डीओपीटी) के रिटायर्ड अधिकारी हैं और दूसरे नीरज त्रिपाठी, जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार हैं। गत 1 सितंबर, 2023 को समिति की बैठक में दोनों ने स्पष्ट कहा कि बैकलॉग आरक्षित पदों में दिव्यांग की शर्त जोड़ना त्रुटि है। इसे सुधार कर दोबारा विज्ञापन निकाला जाए। यह बात बैठक के मिनट में भी लिखी हुई है। 

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह विगत जुलाई और अप्रैल माह में #ट्राइबल_यूनिवर्सिटी_बचाओ_आदिवासी_छात्रों_की_शिक्षा_बचाओ हैशटैग के तहत एक्स और फेसबुक पर लिखा कि “शहडोल संभाग में स्थित जनजातीय विश्वविद्यालय में आदिवासी छात्र-छात्राएं पढ़ने के लिए तरस रहे हैं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी जी ने इस विषय में कुछ नही बोला। क्या आदिवासी छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा की पढ़ाई से वंचित रखना भाजपा की आदिवासी विरोधी मानसिकता का परिचायक नही है? आदिवासी छात्र-छात्राओं ने मुझे बताया कि विश्वविद्यालय में आदिवासी वर्ग के छात्र-छात्राओं को प्रवेश में 50 प्रतिशत आरक्षण को घटाकर 7.5 प्रतिशत कर दिया गया है।

“प्रधानमंत्री जी, आदिवासी छात्र छात्राओं को उच्च शिक्षित करने के जिस उद्देश्य से जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी यदि वही पूरा नहीं होगा तो फिर कैसे आप कह सकते हैं कि आपकी सरकार आदिवासियों के हित में काम कर रही है? यदि वे पढ़ेंगे नही तो बढ़ेंगे कैसे? मेरा आपसे अनुरोध है कि शहडोल संभाग में स्थित आदिवासी बाहुल्य राज्य मध्य प्रदेश के एकमात्र जनजातीय विश्वविद्यालय में आदिवासी छात्र-छात्राओं को प्रवेश में 50 प्रतिशत आरक्षण दिलवाने के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति व कुलाधिपति से चर्चा कर विषय का निराकरण करवाएं।”

विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों के हितों की उपेक्षा भी की गई है। इसके मद्देनजर विश्व दलित परिषद नामक एक संस्था ने भी विश्वविद्यालय में आरक्षण के साथ की गई हेर-फेर के विरुद्ध राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, नई दिल्ली में शिकायत कर जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने और जबतक निराकरण न हो जाए, भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाने का अनुरोध किया। अनुसूचित जाति आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति, यूजीसी के सचिव और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के सचिव को नोटिस जारी कर सात दिन के भीतर जवाब मांगा। फिलहाल जवाब देने की तिथि बीत चुकी है और आयोग ने भी अभी तक आगे की कोई कार्यवाही नहीं की है। 

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा जारी पत्र की प्रति

विदित हो कि 15 जुलाई, 2023 को प्रकाशित उपरोक्त विज्ञापन में एसटी के लिए 10 पद हैं, जिसमें से 8 पद बैकलॉग के हैं। सितंबर, 2020 और फिर दिसंबर, 2020 में एसटी के लिए आरक्षित शैक्षणिक पद साइकोलॉजी, फिजिकल एजुकेशन, फिजिकल एजुकेशन (आरसीएम), नर्सिंग, कंप्यूटर साइंस (आरसीएम), बायोटेक्नोलॉजी विभागों में विज्ञापित पद खाली रह गए थे, जिसे पुनः 15 जुलाई, 2023 के विज्ञापन में प्रकाशित किया गया है। इस प्रकार से एसटी के लिए यह सभी पद पिछले 9 महीने से खाली रह रहे हैं। कहा जा रहा है कि आगे जारी होने वाले विज्ञापनों में अब एसटी के लिए बैकलॉग के 10 पद हो जाएंगे।

विश्वविद्यालय में ही मुख्य छात्रावास अधीक्षक रह चुके प्रोफेसर नवीन शर्मा ने पिछले दिनों अपने फेसबुक पोस्ट (‘घटतीघटना डॉट कॉम’ द्वारा प्रकाशित आलेख में यथा उद्धृत) में लिखा था कि “नो वन फाउंड सूटेबल” के नाम पर कुलपति आदिवासियों के साथ साजिश रच रहे हैं तथा जनजातीय विश्वविद्यालय में पिछले 9 वर्षों से आदिवासियों के लिए आरक्षित अनेक पदों को जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है। विश्वविद्यालय के भर्ती विभाग द्वारा जमकर धांधली किया जा रहा है, लेकिन आदिवासी समाज से आवाज उठाने वाला कोई नहीं है।” इस फेसबुक पोस्ट में उन्होंने यह भी जिक्र किया है कि स्थानीय आदिवासी छात्रों को विश्वविद्यालय में प्रवेश ना मिल सके, इसके लिए भी सीयूईटी (कॉमन यूनिवर्सिटी इंट्रेंस टेस्ट) 2022-23 का परीक्षा केंद्र विश्वविद्यालय में नहीं बनाया गया, जिससे बड़ी संख्या में स्थानीय आदिवासी छात्र-छात्राएं परीक्षा में बैठने और प्रवेश पाने से वंचित रह गए। 

इस संबंध में आदिवासी छात्र संगठन मध्य प्रदेश के प्रदेश उपाध्यक्ष रोहित सिंह मरावी ने बताया कि वर्ष 2008 में जब इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी, तो उस समय यह देश का एकमात्र राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय था। इसे मध्य प्रदेश में इस लिए खोला गया था ताकि मध्य भारत में जहां सबसे ज्यादा आदिवासी निवास करते हैं, उन्हें उच्च शिक्षा देकर मुख्यधारा से जोड़ा जाए और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराया जाए। उस समय विश्वविद्यालय में आदिवासी छात्रों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण था और 2008 से 2013 तक जितने भी एडमिशन हुए थे, उसमें 80 से 90 प्रतिशत छात्र-छात्राएं आदिवासी थे। 2014 में कुलपति बदलने के बाद आदिवासी छात्र-छात्राओं की संख्या 50 से 60 प्रतिशत तक रह गई। 2017 से 2019 आते-आते आदिवासी छात्र-छात्राओं की संख्या 25 प्रतिशत तक ही रह गई। आज 2023 में हालत यह है कि केवल 7.5 प्रतिशत स्टूडेंट्स ही आदिवासी हैं और वे मध्य प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत के राज्यों के हैं। 

विश्वविद्यालय में आदिवासी छात्र-छात्राओं की संख्या कम होने के मामले में रोहित मरावी कहते हैं कि अभी विश्वविद्यालय में एडमिशन सीयूइटी के द्वारा हो रहा है। यह 2022 से प्रारंभ हुआ है। जबकि पहले सीयूईटी जैसी परीक्षा नहीं होती थी। विश्वविद्यालय अपने स्तर पर जो प्रवेश परीक्षा लेता था, केवल वहीं होता था। वे आरोप लगाते हैं कि आदिवासी फंड लेकर विश्वविद्यालय का निर्माण किया गया और शुरू में आदिवासी बच्चों को उच्च शिक्षा देना रिपोर्ट में दिखाया गया और हजारों करोड़ का बजट लिया गया। लेकिन अब यह विश्वविद्यालय चल चुका है, इसका एक ब्रांच मणिपुर में भी है, जहां आज भी 50 प्रतिशत आरक्षण आदिवासी स्टूडेंट्स के लिए है। लेकिन अमरकंटक में सीयूईटी लाकर यह प्रावधान खत्म कर दिया गया है, जिससे मध्य भारत के लगभग सभी आदिवासी छात्र-छात्राएं इस विश्वविद्यालय से बाहर हो गए हैं। 

सीयूईटी से आदिवासी छात्र-छात्राएं विश्वविद्यालय से कैसे बाहर हो गए, इस प्रश्न पर जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन मध्य प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष इंद्रपाल मरकाम कहते हैं कि शुरू में जब ऑफलाइन प्रवेश परीक्षाएं होती थीं, तो उस समय लगभग 90 प्रतिशत आदिवासी छात्र होते थे, जो डिंडोरी, मंडला, बालाघाट, अनूपपुर, उमरिया, शहडोल, पेंड्रारोड, मरवाही, बिलासपुर आदि से आए होते थे। मतलब यह कि इसमें मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जिले के आदिवासी सब शामिल थे। लेकिन अभी वर्तमान के कुलपति के आने और पिछले कुछ सालों में विवादित ढंग से सामान्य वर्ग के शिक्षकों की नियुक्तियां होने से विश्वविद्यालय में आदिवासी छात्र-छात्राओं की संख्या को कम करने का षड्यंत्र हुआ है। चूंकि यहां के गरीब आदिवासी बच्चे मध्य प्रदेश बोर्ड और छत्तीसगढ़ बोर्ड से पढ़े होते हैं और वे सीयूईटी के प्रश्नों से परिचित नहीं होते, जो कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) पाठ्यक्रमों पर आधारित होते हैं। इस कारण विश्वविद्यालय में 7.5 प्रतिशत से भी कम आदिवासी छात्र-छात्राओं  रह गए हैं।

रोहित मरावी कहते हैं कि जब पहले अधिक संख्या में आदिवासी बच्चे यहां थे तो स्थानीय इलाके में विश्वविद्यालय की बसें चलती थीं। करीब 20-22 किलोमीटर दूर पेंड्रारोड मरवाही (छत्तीसगढ़) भी दो बसें जाती थीं। अनूपपुर के राजेंद्र ग्राम, डिंडोरी जिले के करंजिया से दो बसें चलती थीं। ये सभी बसें अब विश्वविद्यालय ने बंद करा दिए हैं, क्योंकि अब आदिवासी बच्चों का एडमिशन होना बंद हो गया तो बस भी बंद कर दिया। इसके अलावा स्थानीय बच्चों को ना तो हॉस्टल की सुविधा मिलती है और न ही पढ़ने की सुविधा मिल पा रही है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

राजन कुमार

राजन कुमार फारवर्ड प्रेस के उप-संपादक (हिंदी) हैं

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