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बिहार जाति आधारित गणना रिपोर्ट : फिर से सतह पर आया हिस्सेदारी और भागीदारी का सवाल!

अमित शाह ने जाति आधारित गणना को नीतीश का ‘छलावा’ कहा था। राजनीतिक तौर पर जाति आधारित गणना का समर्थन करनेवाली भाजपा पर इसके विरोध को हवा देने के प्रामाणिक आरोप लगते रहे हैं। पढ़ें, हेमंत कुमार का विश्लेषण

जाति आधारित गणना रिपोर्ट, 2022-23 के जरिए बिहार के लोगों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति सार्वजनिक होते ही हिस्सेदारी और भागीदारी का सवाल पूरी मजबूती के साथ सतह पर आ गया है। इसके साथ ही यह भी तय हो गया है कि जाति जनगणना और सामाजिक न्याय का एजेंडा 2024 के लोकसभा चुनाव का केंद्रबिंदु भी बनने जा रहा है। 

बिहार विधानमंडल के शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन 7 नवंबर, 2023 को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक आंकड़े जारी होने के तत्काल बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में  अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग को मिलने वाले आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने का ऐलान कर दिया। इसमें ईडब्ल्यूएस श्रेणी को मिलने वाले 10 प्रतिशत आरक्षण को जोड़ कर बिहार में अब आरक्षण का दायरा 75 प्रतिशत हो जाएगा। 

नीतीश कुमार ने आरक्षण का दायरा बढ़ाने के साथ ही केंद्र की‌ नरेंद्र मोदी सरकार से देश में जातीय जनगणना कराने और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की। माना जा रहा है कि इसके साथ ही नीतीश ने सामाजिक न्याय के एजेंडे पर भाजपा की घेराबंदी शुरू कर दी है।

मुख्यमंत्री ने आरक्षण पर अपनी घोषणा को अमली जामा पहनाने के लिए सदन की बैठक के दो-ढाई घंटे के भीतर ही इस पर कैबिनेट की भी सहमति प्राप्त कर ली। आरक्षण के नये प्रस्ताव पर आगामी 9 नवंबर, 2023 को बिहार विधानमंडल में सरकार विधेयक लाएगी।

बिहार विधानसभा को संबोधित करते नीतीश कुमार

नीतीश कुमार ने सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े बिहार की तरक्की के लिए जब आरक्षण की सीमा बढ़ाने का ऐलान किया तो मुख्य विपक्षी दल भाजपा के सदस्यों ने हुलस कर इसका स्वागत किया। लेकिन मुख्यमंत्री ने जैसे ही पिछड़ापन दूर करने के लिए केंद्र सरकार से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग रखी तो भाजपा के खेमे में सन्नाटा पसरा गया। लगा जैसे भाजपा ने उम्मीद ही नहीं की थी कि नीतीश कुमार करीब-करीब दफन हो चुके इस मुद्दे को अचानक से लाकर सतह पर रख देंगे।

आरक्षण का दायरा बढ़ाने और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा की मांग उठाने का सबसे अधिक असर आरएसएस-भाजपा की विभाजनकारी हिंदुत्व की राजनीति की धार पर पड़ता दिख रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह एक साल के भीतर जब अपनी सातवीं बिहार यात्रा पर 5 नवंबर को मुजफ्फरपुर पहुंचे थे तो वहां पताही हवाई अड्डे पर आयोजित सभा में नीतीश कुमार पर सीधा आरोप लगाया कि लालू के दबाव में यादवों और मुसलमानों की आबादी के आंकड़े बढ़ा-चढ़ा कर दिखाए गए हैं। गृहमंत्री शाह के इस आरोप को बिहार की सबसे बड़ी आबादी वाली जाति यादव और मुसलमानों के खिलाफ जातीय ध्रुवीकरण को बढ़ाने वाला माना गया। शाह के इस बयान की दबी जुबान से भाजपा के भीतर भी आलोचना हो रही है। आरएसएस और भाजपा का एक समूह इसे राजनीतिक तौर पर नुकसानदेह मान रहा है। 

अमित शाह ने जाति आधारित गणना को नीतीश का ‘छलावा’ कहा था। राजनीतिक तौर पर जाति आधारित गणना का समर्थन करनेवाली भाजपा पर इसके विरोध को हवा देने के प्रामाणिक आरोप लगते रहे हैं। 

इधर बिहार के संसदीय कार्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने जाति आधारित गणना की रिपोर्ट पेश करते हुए कहा कि सदन के 111 साल के इतिहास में कई ऐतिहासिक काम हुए हैं। जाति आधारित गणना भी बड़ा ऐतिहासिक काम है, जो सभी दलों की सहमति से नीतीश कुमार के नेतृत्व में संपन्न हुआ है। 

लेकिन सरकार की सहयोगी पार्टी भाकपा माले ने इस रिपोर्ट पर गंभीर सवाल खड़े किये हैं। पार्टी ने कहा है कि सामाजिक-आर्थिक सर्वे से बिहार में गरीबी के भयावह आंकड़े आए सामने! जमीन की मिल्कियत के आंकड़े के बिना रिपोर्ट आधी-अधूरी है! शिक्षा व रोजगार में दलित अति-पिछड़ी व पिछड़ी जातियों की कमतर भागीदारी चिंताजनक है!

आवासीय स्थिति की रिपोर्ट भी चिंताजनक है, झोपड़ी में रह रहे परिवारों को जमीन पर मालिकाना हक नहीं है।

माले के राज्य सचिव कुणाल ने कहा है कि रिपोर्ट से राज्य में गरीबी की भयावह तस्वीर उभर कर सामने आई है। सरकार ने 6000 रुपये मासिक से कम आमदनी वाले परिवार को गरीबी रेखा से नीचे माना है और इस पैमाने पर 34.13 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं। सबसे अधिक 42.93 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग हैं। अनुसूचित जनजाति में यह आंकड़ा 42.70 प्रतिशत, अत्यंत पिछड़ा वर्ग में 33.58 प्रतिशत ओर पिछड़ा वर्ग में यह 33.16 प्रतिशत है।

रिपोर्ट यह बतलाती है कि शिक्षा व रोजगार में दलित अति पिछड़ी व पिछड़ी जातियों की भागीदारी अभी भी बहुत कम है। सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक अनुसूचित जाति के 23.45 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के 16.08 प्रतिशत, अति पिछड़ा वर्ग के 15.49 और ओबीसी समुदाय के 10.04 प्रतिशत लोग झोपड़ी डालकर रह रहे हैं। यह बात जान लेना जरूरी है कि ये लोग जिस जमीन पर बसे हैं, उस जमीन का मालिकाना हक उनके पास नहीं है। उन्हें हमेशा बुलडोजर की मार व विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है। कुणाल ने कहा कि हम लगातार कहते आए हैं कि सरकार एक मुकम्मल सर्वे कराकर नया वास-आवास कानून बनाए और जो जहां बसे हैं, उस जमीन का उन्हें मालिकाना हक दे। रिपोर्ट ने हमारी मांग को पुष्ट किया है।

खपरैल, एक कमरे अथवा दो कमरे के मकान में रहने वाले परिवारों में भी अधिकांश लोगों को अपने आवासीय जमीन पर मालिकाना हक नहीं है और उन्हें भी बुलडोजर की मार सहनी पड़ती है। सर्वे में जमीन की मिल्कियत का भी सर्वे कराया गया था, लेकिन उसके आंकड़े रिपोर्ट में शामिल नहीं है। यह चिंताजनक है। भूमिहीनता के आंकड़े को सामने लाए बिना यह रिपोर्ट आधी-अधूरी है। यह जानना बेहद जरूरी है कि किस समुदाय के पास जमीन की कितनी मिल्कियत है, ताकि भूमि सुधार की बरसों से लटकी प्रक्रिया को आगे बढ़ाई जा सके। हम मांग करते हैं कि सरकार जमीन की मिल्कियत की रिपोर्ट भी सार्वजनिक करे और तदनुरूप भूमि सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाए। कृषि प्रधान बिहार के समाज में आज भी जो समुदाय वास्तव में खेती करता है, उन्हें खेती की जमीन पर मालिकाना हक नहीं है। यह माना जाता है कि यहां की 70-80 प्रतिशत बटाईदारों के जरिए चलती है। इन आंकड़ों को सरकार सार्वजनिक करे और बटाईदारों को उनका कानूनी हक दिया जाना चाहिए।

इस रिपोर्ट ने अगड़ी जातियों के बौद्धिक समूहों के पाखंड को भी उजागर किया। यह बौद्धिक समूह ‘गिनती नहीं करायेंगे, आरक्षण का लाभ उठायेंगे’ के फार्मूले में विश्वास करता है। लेकिन रिपोर्ट जब बताती है कि दबंग और संपन्न कहीं जानेवाली जाति भूमिहारों में 25 प्रतिशत से अधिक गरीबी है तो इसी बिरादरी का बौद्धिक समूह मुंह बिचकाते दिखता है। उसे लगता है कि उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है। सवर्णों में भूमिहार सबसे गरीब और कायस्थ सबसे अमीर पाए गए हैं। सात सामान्य जातियों (हिंदू और मुस्लिम सवर्ण जातियां) में 25.09 प्रतिशत गरीबी है। भूमिहार 27.58 प्रतिशत, शेख 25.84 प्रतिशत, ब्राह्मण 25.22 प्रतिशत, राजपूत 24.89 प्रतिशत, पठान 22.20 प्रतिशत, सैयद 17.61 प्रतिशत और कायस्थ 13.83 प्रतिशत गरीब पाए गए हैं। 

ये आंकड़े बताते हैं कि बिहार में ग़रीबी और बेरोज़गारी की मार सभी जाति बिरादरी के लोग झेल रहे हैं। लेकिन संकट यह है कि अगड़ी बिरादरी का बड़ा हिस्सा या अगुआ हिस्सा गरीबी और बेरोज़गारी के मुक़ाबले धर्म आधारित राजनीति का झंडाबरदार बना हुआ है। लिहाजा गरीबी और बेरोज़गारी के खिलाफ लड़ाई का ऐतिहासिक कार्यभार श्रमिक जातियों यानी दलित-पिछड़ों के कंधों पर ही निर्भर है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

हेमंत कुमार

लेखक बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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