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मध्य प्रदेश : नकार के बावजूद भाजपा की मजबूरी बने हैं शिवराज

पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा का मुख्यमंत्री उच्च जाति से है। राहुल गांधी जातिगत जनगणना की बात जोर-शोर से कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा मध्य प्रदेश में किसी उच्च जाति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने से पहले दस बार सोचेगी। बता रहे हैं अमरीश हरदेनिया

मध्य प्रदेश के रिकॉर्ड 76.22 प्रतिशत मतदाताओं ने अपनी-अपनी पसंद ईवीएम में दर्ज करवा दी है और अब ये मशीनें प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों में स्ट्रांगरूमों में रख दिए गए हैं। 

सूबे की 230 सदस्यों वाली विधानसभा को चुनने के लिए गत 17 नवंबर, 2023 को वोट डाले गए। वोटों की गिनती आगामी 3 दिसंबर को होगी और उसी दिन दोपहर बाद तक यह साफ़ हो जाएगा कि राज्य में अगली सरकार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की होगी या कांग्रेस की।  

हालांकि दोनों ही पार्टियां सार्वजनिक रूप से यही कह रही हैं कि वे बड़े बहुमत से चुनाव जीतने जा रही हैं। मगर सियासी विश्लेषकों का कहना है कि मुकाबला इतना कड़ा है कि जीत किसी भी पार्टी की हो, मगर बहुमत चंद सीटों के अंतर से ही निर्धारित होगा।  

समग्रता से देखें तो हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों यथा – उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा – के विपरीत, और राजस्थान और छत्तीसगढ़ की तरह, मध्यप्रदेश की राजनीति मूलतः द्विध्रुवीय रही है। राज्य की वर्तमान विधानसभा के 230 सदस्यों में से 226 या तो भाजपा के हैं या कांग्रेस के। राज्य से निर्वाचित सभी 29 लोकसभा और 11 राज्यसभा सदस्य इन दोनों पार्टियों में से किसी एक के हैं। पिछले (वर्ष 2018) विधानसभा चुनाव में इन दोनों पार्टियों ने कुल मिलाकार डाले गए मतों में से 82 प्रतिशत हासिल किए थे। हिंदी पट्टी के अन्य राजनैतिक दल जैसा समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड) आदि कई दशकों से मध्य प्रदेश की राजनीति में अपना स्थान बनाने की कोशिशों में लगे हैं, लेकिन इनमें से किसी को भी नाममात्र की सफलता भी हासिल नहीं हो सकी है। इन दलों की सूची में अब आम आदमी पार्टी का नाम भी शामिल हो गया है।

कहना अतिरेक नहीं कि राज्य में 3 दिसंबर के बाद जो सरकार बनेगी वह या तो भाजपा की होगी या कांग्रेस की।

सियासी दृष्टिकोण से देखें तो अगर कांग्रेस को सफलता मिलती है तो उसकी सरकार का मुखिया कौन होगा, यह लगभग तय है। करीब 77 साल के कमलनाथ मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक और घोषित दावेदार हैं। कमलनाथ की जाति के बारे में किसी को पता नहीं है। उनके बारे में जो पता है, वह यह है कि वे कोलकाता के उद्योगपति परिवार से रहे हैं और दून स्कूल में संजय गांधी के साथ पढ़ते थे। अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो कमलनाथ – जो दिसंबर, 2018 से लेकर मार्च 2020 तक राज्य में कांग्रेस सरकार के मुखिया थे – ही मुख्यमंत्री बनेंगे। 

मगर अगर भाजपा आधी से ज्यादा सीटें जीतने में सफल हो जाती है तो मुख्यमंत्री पद की दौड़ दिलचस्प बन जाएगी। 

सितंबर, 2023 में भोपाल में एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच पर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया

यह इस कारण कि भाजपा सन् 2003 से मध्य प्रदेश में सत्ता में है। बीच में 15 महीने का अंतराल ज़रूर था जिसमें कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार सत्ता में थी। इस पूरी अवधि में भाजपा ने केवल ओबीसी नेताओं को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त किया। उमा भारती (लोधी जाति की) दिसंबर 2003 से अगस्त 2004 तक मुख्यमंत्री थीं। हुबली (कर्नाटक) की एक अदालत द्वारा एक फौज़दारी मामले में उनके खिलाफ गिरफ़्तारी वारंट जारी किए जाने के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा। उनकी जगह आए बाबूलाल गौर (यादव), जो अगस्त 2004 से नवंबर 2005 तक मुख्यमंत्री रहे। उन्हें कुछ कारणों से त्यागपत्र देना पड़ा। 

गौर की जगह शिवराज सिंह चौहान ने ली, जो किरार जाति से हैं। यह जाति भी ओबीसी श्रेणी में शामिल है। वर्ष 2005 से लेकर अब तक चौहान मुख्यमंत्री बने हुए हैं। यह उनकी चौथी पारी है। वे करीब 17 साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इस प्रकार चौहान मध्य प्रदेश के सबसे लंबी अवधि के मुख्यमंत्री हैं और पूरे देश में अब तक केवल 13 अन्य ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं, जिनका कुल कार्यकाल, चौहान से अधिक अवधि का रहा हो। 

अपनी ओबीसी पृष्ठभूमि के अलावा, चौहान इतने लंबे समय तक मुख्यमंत्री इसलिए रह सके क्योंकि वे जनता से जुड़ना जानते हैं, मेहनती हैं, विवादों में फंसने से बचते हैं और उनका ‘हिंदुत्व’ उतना कट्टर नहीं है। वे लालकृष्ण अडवाणी के प्रिय थे और बाद में नरेंद्र मोदी के भी प्रिय बन गए।  

लेकिन अब उनकी लंबी पारी ही उनके लिए मुसीबत बन गई है। हाल ही में संपन्न हुए मतदान के पूर्व  चुनाव के प्रचार के दौरान भाजपा के नेतृत्व ने यह साफ़ कर दिया था कि पार्टी के फिर से सत्ता में आने पर शिवराज ही मुख्यमंत्री बनेंगे, ऐसा ज़रूरी नहीं है। एक पत्रकारवार्ता में यह पूछे जाने पर कि क्या चुनाव में शिवराज सिंह चौहान, भाजपा का मुख्यमंत्री चेहरा हैं, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पत्रकारों से कहा था, “आप लोग परेशान न हों। हम किसी न किसी को खोज निकालेंगे।” शिवराज की चर्चित ‘लाडली बहना’ योजना को उनकी पार्टी ने चुनाव का प्रमुख मुद्दा नहीं बनाया। पार्टी द्वारा लगवाए गए होर्डिंग में मोदी ही छाए थे और चौहान का चित्र, प्रदेश भाजपा के दस अन्य नेताओं के साथ उसी आकार में एकदम नीचे था। भाजपा के चुनाव अभियान के केंद्र में मोदी थे। 

यहां तक कि भाजपा के उम्मीदवारों की शुरुआती सूचियों में चौहान का नाम भी नहीं था। इससे यह चर्चा शुरू हो गई कि शायद उन्हें चुनाव लड़वाया ही नहीं जाएगा। चौहान आमसभाओं में जनता से पूछते थे (प्रश्न दरअसल पार्टी के नेतृत्व को संबोधित होता था), “बताओ, चुनाव लडूं या नहीं?”   

बताया जाता है कि पार्टी को ऐसा लग रहा था कि चौहान को देखते-देखते जनता थक गई है और लोग उनसे ऊब गए हैं तथा कोई नया चेहरा देखना चाहते हैं। इस डर से कहीं चौहान पूरी पार्टी को न ले डूबें, भाजपा ने उन्हें हाशिए पर धकेल दिया। उनके समर्थक कहते हैं कि यह एक रणनीतिक फैसला था और इसका यह मतलब नहीं है कि शिवराज को हमेशा के लिए दरकिनार कर दिया गया है या पार्टी ने उन्हें फिर मुख्यमंत्री न बनाने की कसम खा ली है।

लेकिन इस दावे में कुछ छेद हैं। पहला यह कि पार्टी ने तीन वरिष्ठ नेताओं – केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और प्रह्लाद पटेल और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय – को विधानसभा चुनाव में उतारा है। अगर वे जीत जाते हैं तो उनमें से कोई भी मुख्यमंत्री से छोटा पद स्वीकार करना नहीं चाहेगा। इनमें तोमर राजपूत जाति के हैं, विजयवर्गीय बनिया हैं और पटेल लोधी (ओबीसी) हैं।  

पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा का मुख्यमंत्री उच्च जाति से है। राहुल गांधी जातिगत जनगणना की बात जोर-शोर से कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा मध्य प्रदेश में किसी उच्च जाति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने से पहले दस बार सोचेगी। कई लोगों का तो कहना है कि पार्टी के पास चौहान पर फिर से भरोसा जताने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। मुख्यमंत्री पद की एक अन्य ओबीसी दावेदार उमा भारती को पार्टी ने दूध से मक्खी की तरह बाहर निकाल फ़ेंक दिया है। उन्हें न तो टिकट दिया गया और ना ही चुनाव प्रचार में कोई भूमिका दी गई। 

इस पृष्ठभूमि में शिवराज के कुछ समर्थक कह रहे हैं कि बाजी उनके हाथ ही लग सकती है। 

(अंग्रेजी मूल से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अमरीश हरदेनिया

अमरीश हरदेनिया फारवर्ड प्रेस के संपादक (ट्रांसलेशन) हैं। वे 'डेक्कन हेराल्ड', 'डेली ट्रिब्यून', 'डेली न्यूजटाइम' और वीकली 'संडे मेल' के मध्यप्रदेश ब्यूरो चीफ रहे हैं। उन्होंने कई किताबों का अनुवाद किया है जिनमें गुजरात के पूर्व डीजीपी आर बी श्रीकुमार की पुस्तक 'गुजरात बिहाइंड द कर्टेन' भी शामिल है

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