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गुरु घासीदास की सतनाम क्रांति के दो सौ साल बाद

गुरु घासीदास जातिवाद और अछूत प्रथा के जड़-मूल से उन्मूलन के पक्षधर थे। वे मूर्ति पूजा, मंदिर और भक्ति को भी ख़ारिज करते थे। उस काल में यह एक क्रांतिकारी सोच थी। गोल्डी एम. जॉर्ज बता रहे हैं कि गुरु घासीदास ने किस तरह छत्तीसगढ़ की दमित जनता में आत्मगर्व और आत्मसम्मान के भाव जगाए

गुरु घासीदास (18 दिसंबर 1756 – 1836) पर विशेष

अछूत अस्मिता का निर्माण 

छत्तीसगढ़ में अछूत अस्मिता की दीर्घकालिक पृष्ठभूमि है, जिसमें अछूत प्रथा का खुल्लम-खुल्ला आचरण, इससे जनित वंचना, कुंठा व बहिष्करण और सामंती व्यवस्था द्वारा सामाजिक रिश्तों और भूस्वामित्व का निर्धारण शामिल हैं। (गुर्र 1970: 7) 

वंचना से कुंठा उपजती है और जैसे-जैसे कुंठा बढ़ती जाती है वैसे-वैसे कुंठा के कारण और उसके स्त्रोत के प्रति आक्रामकता भी बढ़ती जाती है। इसलिए साझा वंचना, सामूहिक प्रतिरोध का प्रारंभिक बिंदु होती है। लुई (2003: 126) के अनुसार, पहचान के निर्माण के पीछे दो कारक होते हैं– पहला, अपना स्वयं के बारे में अनुभव और दूसरा, ऐसे लोगों का अनुभव जो अपने से अलग हैं, के बरक्स अपना अनुभव। हम कह सकते हैं कि पहचान का निर्माण एक अंतःक्रियात्मक प्रक्रिया है।

फ्रेंको (2002: 16) का कहना है कि अस्मिता के निर्माण के दो अंतर्संबंधित घटक होते हैं। इनमें पहला है– विचारधारात्मक व प्रतीकात्मक। इससे आशय है आस्था और आचरण की ऐसी प्रणाली, जो अपनी व अपने समूह की दूसरों के बरक्स स्थिति की समझ से उपजती है। ये आस्थाएं और उनकी विभिन्न सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां किसी समूह को यह समझने में मदद करतीं हैं कि वे कौन हैं और किसी विशिष्ट सामाजिक संदर्भ में उनकी क्या भूमिका है। दूसरा घटक है– आर्थिक-उत्पादक। इससे आशय उन भौतिक, पारिस्थितिकीय व आर्थिक परिस्थितियों से है जो किसी समूह की प्राथमिक जीविकोपार्जन गतिविधियों का निर्धारण करतीं हैं और उन्हें आकार देती हैं। 

मैला साफ़ करने वाले, मृत जानवरों की खाल उतारने वाले, चमड़ा तैयार करनेवाले और जूते बनानेवाले, कपडे धोनेवाले और अन्य आवश्यक सेवाएं उपलब्ध करवाने वाले अक्सर गांव के बाहर रहते थे। उनके घर कहां बन सकते हैं, यह तो निर्धारित था ही, यह भी तय था कि उनके घर निम्न गुणवत्ता के होंगे और उनमें किसी तरह की सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी। (जॉर्ज: 2013) उनसे होने वाले ‘प्रदूषण’ से बचने के लिए कई वर्जनाएं प्रचलित थीं। इन सब कारणों से वे समाज के सबसे निचले पायदान पर धकेल दिए गए थे। 

आंबेडकर ने अछूत पहचान के उदय और उसके विभिन्न पहलुओं की पड़ताल की। वे लिखते हैं– “एक तथ्य तो है अंत्य, अंत्यज व अंत्यवस जैसे वे नाम, जो हिंदू शास्त्रों द्वारा कुछ समुदायों को दिए गए हैं। ये नाम बहुत प्राचीन काल में दिए गए थे। समाज के एक वर्ग के लिए इन नामों का प्रयोग क्यों किया गया? ऐसा लगता है कि इन नामों को चुनने के पीछे कोई मतलब था। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये सभी शब्द व्युत्पन्न हैं। इन की व्यत्पुत्ति ‘अंत’ शब्द से हुई है। अंत शब्द का क्या अर्थ है?…शास्त्रों का तर्क है कि अंत्य का अर्थ है वह जो अंत में जन्मा। अब चूंकि सृष्टि के निर्माण की हिंदू कथा के अनुसार अछूत सबसे अंत में जन्मे, इसलिए अंत्य शब्द का अर्थ है अछूत। यह तर्क बेहूदा है और सृष्टि निर्माण के हिंदू सिद्धांत से मेल नहीं खाता। 

“इस सिद्धांत के अनुसार तो अंत में शूद्र जन्मे। अछूत तो सृष्टि के निर्माण की कथा में हैं ही नहीं। शूद्र सवर्ण हैं। अछूत अवर्ण हैं, अर्थात वर्ण-व्यवस्था से बाहर हैं। इसलिए सृष्टि निर्माण में किसे प्राथमिकता मिली, इस संबंध में हिंदू सिद्धांत अछूतों पर न तो लागू होता है और ना ही हो सकता है। मेरे मत से तो अंत्य शब्द से आशय सृष्टि के निर्माण के अंत से नहीं, बल्कि गांव के अंत से है। यह नाम उन लोगों को दिया गया, जो गांव के बाहरी हिस्से में रहते थे। अंत्य शब्द हमें पुरातन काल के बारे में बताता है। और यह बताता है कि एक समय था जब कुछ लोग गांव के अंदर रहते थे और कुछ बाहर – अर्थात गांव के अंत में। और इन लोगों को अंत्यज कहा जाता है।” (आंबेडकर, खंड 7, 1990: 278-279) 

अछूत से सतनामी 

छत्तीसगढ़ में जाति प्रथा, अछूत प्रथा, अछूतों की स्थिति और अछूतों की अपने लिए नई पहचान के खोज की जद्दोजहद को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ऐसी ही एक महत्वपूर्ण जद्दोजहद थी– सतनामी आंदोलन की शुरुआत। किसी नए पंथ का गठन या किसी नए धर्म को अपना लेना, नई पहचान के निर्माण के सबसे पुराने तरीकों में से एक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ब्राह्मणवादी जातिगत कठोरताओं और उत्पीड़न के कारण दलितों ने हिंदू धर्म छोड़ा। (जॉर्ज 2006: 34)

अपनी सामाजिक हैसियत में बेहतरी लाने के लिए जो तरीके भारत में प्रयुक्त किए जाते रहे हैं, धर्मपरिवर्तन उनमें से प्रमुख है। (लोबो 1996: 167-168) समानता का उद्घोष करने वाले हिंदू धर्म के जितने भी पंथ थे, उन सबने बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित किया। उदाहरण के लिए 13वीं सदी के बाद भक्ति आंदोलन देश भर में फैल गया और इसमें कबीर, एकनाथ, चोखामेला, तुकाराम, नरसी मेहता, रामानुजम, बासव और निम्बार्क जैसे चमत्कारिक व्यक्तित्वों का योगदान था। इन सबसे समानता की बात की और अछूत समानता हासिल करने के उत्कट आकांक्षी थे। 

इस्लाम को भी इसीलिए पसंद किया गया। इस्लाम, समाज के चिर-दमित तबके के लिए आशा की एक किरण था। वह उन्हें समानता देता था और आर्थिक दृष्टि से आगे बढ़ने के मौके भी। इस्लाम व ईसाई और सिक्ख धर्मों में सामूहिक परिवर्तन से ऊंची जातियों का साम्राज्य हिलने लगा। यही वह संदर्भ है, जिसके चलते सतनाम पंथ के रूप में नई अस्मिता का उदय होना महत्वपूर्ण बन जाता है।

छत्तीसगढ़ के विलासपुर शहर के महंतवाड़ा इलाके में गुरु घासीदास के एक मंदिर के गर्भगृह का दृश्य। इसमें प्रदर्शित गुरु घासीदास की तस्वीर को लेकर लोगों में मतभिन्नता है। (तस्वीर साभार : संजीत बर्मन)

दुबे (2001: 1) के अनुसार, “उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में, सन् 1820 के आसपास, एक खेत मजदूर घासीदास ने एक नए पंथ के शुरुआत की, जिसमें मुख्यतः छत्तीसगढ़ के चमार शामिल थे। घासीदास का जन्म अठारहवीं सदी के अंत में संभवतः 1770 में रायपुर (अब बालोदाबाजार) जिले के उत्तर-पूर्व में स्थित गिरौदपुरी में हुआ था। इस पंथ का नाम था सतनाम पंथ और इसके अनुयायी सतनामी कहलाते थे।” 

19वीं सदी की शुरुआत में सतनामी पंथ के गठन से छत्तीसगढ़ के अंत्यजों को एक नई पहचान मिली। 18वीं सदी के अंत से लेकर 19वीं सदी की शुरुआत का काल इस क्षेत्र में बदलाव का काल था। इस दौर में कृषि का विकास हुआ, राज्य द्वारा कर की मांग बढ़ने लगी और राज्य की शक्तियां ब्राम्हणों के वर्चस्व वाली नौकरशाही के हाथों में केद्रित होने लगीं। 

दुबे (2001: 25) लिखते हैं कि मराठों और अंग्रेजों द्वारा उठाए गए विभिन्न प्रशासनिक कदमों के छत्तीसगढ़ के चमारों पर परस्पर विरोधी आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव पड़े। सतनाम पंथ एक ओर लोक-परंपराओं पर आधारित था तो दूसरी ओर वह शुद्धता और प्रदूषण की कर्मकांडीय व्याख्या और ऊंच-नीच को खारिज करता था। हिंदू देवकुल पर आधारित सामाजिक पदक्रम, जिसे “ईश्वर द्वारा निर्धारित” बताया जाता था, को भी सतनाम पंथ स्वीकार नहीं करता था। सतनाम पंथ ने पारंपरिक प्रतीकों को नए अर्थ दिए। उसने चमारों को निम्न अछूत का दर्जा दिए जाने पर प्रश्न उठाए और उसे चुनौती दी। उसने इस धारणा को भी चुनौती दी कि पवित्र गाय के शव को छूने के कारण चमार अपवित्र हो जाते हैं। जो चमार इस नए पंथ के सदस्य बनते थे, वे अपनी अपवित्रता से मुक्त हो जाते थे और कर्मकांडीय परतंत्रता से भी। वे सतनामी की नई पहचान पाते थे। 

इस नए सतनामी पंथ का निर्माण मनु की धर्म संहिता का नकार था और इसके जरिए सतनामियों को उनके लिए एक वैकल्पिक आस्था उपलब्ध हुई। सतनाम पंथ, ब्राम्हणवाद, जिसे चमारों के कष्टों की मूल जड़ माना जाता था, को सिरे से खारिज करता था। छत्तीसगढ़ में सतनाम आंदोलन ब्राम्हणवाद के नकार की सबसे मुखर अभिव्यक्ति था। सतनाम पंथ का मानना था कि दलितों की मुक्ति के लिए हिंदू धार्मिक-वैचारिक प्रभुत्व को उखाड़ फेंकना आवश्यक है। 

घासीदास को गुरु मानकर जो चमार सतनामी बन गए, उन्हें ऐसा करने के बाद भी किस तरह के दमन और अत्याचारों का सामना करना पड़ा, यह जानने के लिए एक आलोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है। ऑस्कर लोहर को उद्धृत करते हुए दुबे (2001: 55) सतनामियों के समक्ष उपस्थित समस्याओं का विवरण इन शब्दों में करते हैं– “इस समुदाय को दिए गए निम्न दर्जे के चलते समुदाय के सदस्य कौन-से कपड़े, गहने व अन्य चीजें पहन-ओढ़ सकते थे, उस पर कई तरह की रोक थीं। सतनामी पुरूषों से पूरी लंबाई की धोती पहनने, सिर पर पगड़ी बांधने और ऊंची जातियों के सामने जूते-चप्पल पहनकर आने की अपेक्षा नहीं की जाती थी। सतनामी महिलाएं रंगीन किनारे वाली साड़ी नहीं पहन सकती थीं और उन्हें सोने या चांदी के गहने पहनने की इजाजत भी नहीं थी। यहां तक कि छतरी का इस्तेमाल केवल ऊंची जातियों के लोग कर सकते थे। कदाचित ऐसा इसलिए था क्योंकि छतरी को राजाओं और देवताओं के छत्र से जोड़ा जाता था। यह छत्र राजघरानों के ईश्वरत्व और ईश्वर के राज दोनों का प्रतीक था। इसी सांस्कृतिक नजरिए के चलते सतनामी घोड़े या हाथी की सवारी नहीं कर सकते थे और ना ही शादियों में पालकी का इस्तेमाल कर सकते थे।”

गुरू घासीदास की सतनाम क्रांति

घासीदास महंगूदास और अमरोतिन देवी के पुत्र थे। उन्होंने सतनाम (सत्य पथ) पंथ की स्थापना की, जो विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के दलितों के लिए था। घासीदास को अपनी युवावस्था में ही जातिप्रथा की बुराईयों का अनुभव हो गया था और उन्हें यह समझ में आ गया था कि जाति प्रथा से पीड़ित समाज में किस तरह की स्थितियां व्याप्त हैं। इसी के चलते उन्होंने सामाजिक असमानता को पूरी तरह खारिज किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ के कोने-कोने की यात्रा की, जिसका उद्देश्य इस असमानता को समाप्त करने के तरीके ढूंढ़ना था। गुरु घासीदास ने सत्य का एक प्रतीक बनाया, जिसका नाम जैतखंभ है। सफेद रंग से पुते लकड़ी के खंभे पर लगे सफेद रंग के झंडे को जैतख्ंभ कहा जाता है। झंडे का स्तंभ सत्य का स्तंभ माना जाता है और सफेद झंडा शांति का प्रतीक होता है। ऐसी सतनामी मान्यता है। 

गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ में जाति-विरोधी क्रांति के प्रणेता थे। चिसहोल्म (1869: 46-47) लिखते हैं कि सतनामी पंथ कबीर पंथ से प्रेरित था। घासीदास इस नए पंथ के गुरु बने। उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि वे मूर्ति पूजा न करें, केवल इस ब्रह्मांड के निराकार निर्माता सतनाम में आस्था रखें और सामाजिक समानता की एक संहिता का पालन करें। सतनाम पंथ के सदस्य सतनामी कहलाते हैं। सतनाम पंथ के अधिकांश सदस्य छत्तीगढ़ के चमार हैं यद्यपि इसमें सामाजिक दृष्टि से वंचित कुछ अन्य समूहों के लोग भी बहुत छोटी संख्या में शामिल हैं। 

छाता पहाड़ – वह चट्टान जिस पर गुरू घासीदास ध्यान करते थे

ऐसी मान्यता है कि छत्तीसगढ़ में अपनी यात्राओं के दौरान एक बार जब घासीदास उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी जा रहे थे तब रास्ते में उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का विचार त्याग दिया और तपस्वी का जीवन जीने लगे। उन्होंने सारंगगढ़ के जंगलों में ध्यान किया और उसी से उन्हें ‘सतनाम’ का ज्ञान प्राप्त हुआ। उसके बाद से वे नियमित रूप से वन में जाकर ध्यान करने लगे। उनके गांव से करीब एक मील दूर एक पथरीली पहाड़ी पर तेंदू का एक बहुत विशाल वृक्ष था। ऐसा कहा जाता है कि वे उसी के नीचे बैठकर ध्यान करते थे। यह स्थल अब सतनामियों का तीर्थ बन गया है और वहां दो सतनामी मंदिर भी हैं। 

घासीदास ने अपने अनुयायियों को मानवता की बेहतरी और भलाई के लिए सात सिद्धांतों का पालन करने को कहा। इनमें शामिल हैं– सतनाम में आस्था, वर्ण-व्यवस्था और मूर्ति पूजा का निषेध, हिंसा न करना, नशे की लत और व्यभिचार से दूर रहना और मवेशियों को आराम देने के लिए दोपहर बाद खेतों में जुताई न करना। अपने बचपन से ही घासीदास जाति और अछूत प्रथा और पशु बलि जैसी अमानवीय प्रथाओं के खिलाफ थे। गुरु की शिक्षाओं ने दमित जनसाधारण में आत्मविश्वास पैदा किया। उन्हें एक नई पहचान दी और उनमें दमन और अन्याय के खिलाफ लड़ने का जज्बा पैदा किया। (जार्जः 2013) 

रसेल एवं हीरालाल (1916: 406) लिखते हैं कि सतनामियों के लिए मांस, शराब, तंबाकू और कुछ विशिष्ट सब्जियां और दालें प्रतिबंधित थीं। उनसे कहा जाता था कि वे दोपहर के खाने के बाद खेत न जोतें ताकि पशु आराम कर सकें। चमारों की एक बड़ी उपजाति, जिन्हें कनौजिया चमार कहा जाता है, से भी सतनामी दूरी बनाए रखते थे। कनौजिया चमार सतनाम पंथ में शामिल नहीं हुए और उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाए रखी। 

गुरू घासीदास के जन्मस्थान गिरौदपुरी का मुख्य मंदिर

जन स्मृति, घासीदास पर वाचिक परंपरा और अंदाजिया इतिहास के आधार पर चिसहोल्म (1869) लिखते हैं कि उस समय यह आंदोलन पचास वर्ष से अधिक पुराना नहीं था और शायद इसकी शुरूआत 1820 और 1830 के बीच हुई थी। घासीदास और उनके आंदोलन ने बहुत जल्दी जबरदस्त लोकप्रियता हासिल कर ली। दूर-दूर से लोग उनके पास आते थे, श्रद्धापूर्वक उनके पैर छूते थे और उन्हें चढ़ावा चढ़ाते थे। दुबे (2001: 55) के अनुसार, लोहर यह जानकार चकित थे कि अत्यंत प्रदूषणकारी होने के कलंक के चलते सतनामियों पर कितने तरह के सार्वजनिक प्रतिबंध थे। इस समुदाय को नाई और धोबी की सुविधाएं प्राप्त नहीं थीं। वे मेलों में भाग नहीं ले सकते थे और मंदिरों और सार्वजनिक भवनों के अंदर घुसना भी उनके लिए प्रतिबंधित था। वे दुकानों के बहुत नजदीक नहीं जा सकते थे, जिसके चलते वे कोई चीज खरीदने से पहले उसे देख-परख नहीं पाते थे। फिर बेगारी प्रथा भी थी। भूस्वामी सतनामियों से साल के उस समय जबरदस्ती बेगार करवाते थे, जिस समय उन्हें अपने खेतों में काम कराना होता था। जहां तक भूमिहीन सतनामियों का प्रश्न है, वे लगभग दास थे। उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती थी और उन्हें केवल खाने और कपड़ों के बदले काम करना पड़ता था। 

इतिहास के इस दौर में चमारों को बदलाव की आवश्यकता थी और यही कारण है कि उन्होंने घासीदास के आह्वान पर अत्यंत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। घासीदास ने जाति प्रथा और औपनिवेशिक सत्ता दोनों को चुनौती दी। उन्हें अनेक बार धमकियां दी गईं और कई बार ऊंची जातियों ने उनके उपर हमले करवाए। वर्चस्वशाली जातियों को यह मंजूर न था कि सतनामी बतौर चमार सांगठनिक और संस्थागत दृष्टि से आगे बढ़ें। घासीदास की मृत्यु करीब 80 वर्ष की उम्र में हो गई। उनकी मृत्यु के समय सतनाम पंथ के लगभग ढाई लाख सदस्य थे और घासीदास की शिक्षाएं इन लोगों को आगे भी प्रेरित करती रहीं। (रसेल एवं हीरालाल 1916: 47)

ब्रिग्ग्स (1920: 27) सतनाम पंथ को एक नया समूह कहते हैं, जो कबीर, उनकी शिक्षाओं और उनके प्रभाव से जुड़े पूर्व के सतनाम समूहों से भिन्न था। (वही: 205)

छत्तीसगढ़ का सतनाम पंथ आंदोलन, दलितों का सामाजिक-सांस्कृतिक विद्रोह था और इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से आगे बढ़ने का यह संघर्ष, उसकी राह रोकने के सारे प्रयासों के बाद भी काफी हद तक सफल रहा। 

लेकिन चमड़े का काम बंद कर देने के बाद भी सतनामी अछूत ही बने रहे। जैसे-जैसे जाति-विरोधी सतनाम पंथ मज़बूत होता गया, ऊंची जातियों ने ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था को और मज़बूती देना प्रारंभ कर दिया। सतनाम पंथ के निर्माण के कई ऐतिहासिक पक्षों की पड़ताल अभी बाकी है। आगे चलकर सतनाम पंथ आगे बढ़ने और पीछे हटने के कई दौरों से गुज़रा।

आज सतनाम पंथ के समक्ष उपस्थित चुनौतियाँ 

इसमें कोई संदेह नहीं कि सतनाम आंदोलन ने 19वीं सदी में अछूतों पर गहरा प्रभाव डाला। वर्तमान में कई जटिलताओं के चलते यह आंदोलन अपनी गति खो बैठा है। आज ज़रुरत इस बात की है कि आंदोलन अपने-आप को एक नया रूप दे। एक नयी ताकत से लैस करे क्योंकि आज जातिवाद से लड़ने के लिए उसके पास संवैधानिक प्रावधानों और कानूनों के रूप में कई हथियार उपलब्ध हैं। 

जैतखंभ – जो सांकेतिक रूप में सत्य और शांति का प्रतिनिधित्व करता है

पिछले कुछ दशकों में छत्तीसगढ़ में दलितों पर अत्याचार की घटनाओं के विश्लेषण से पता चलता है कि उनमें से अधिकांश, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, पीड़ित सतनामी थे। लेकिन सतनामी समुदाय ने इस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं की। उसने संविधान, नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 व अन्य कानूनों के तहत कोई कार्यवाही करने का प्रयास नहीं किया। यही नहीं, ऐसे कई अंतर्राष्ट्रीय कानून, समझौते और संधियां हैं, जिन पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं और हस्ताक्षर करने का अर्थ यह है कि इन कानूनों, समझौतों और संधियों में जो कुछ कहा गया है उसे पूरी से लागू करना राज्य के लिए आवश्यक है। दलितों के शिक्षा, चिकित्सा, आरक्षण और सामाजिक सुरक्षा प्राप्त करने संबंधी सकारात्मक अधिकार कागज़ पर तो हैं, मगर व्यावहारिक धरातल पर वे उन्हें उपलब्ध नहीं हो पाते। यह भी दलितों के अधिकारों के उल्लंघन की सूची में आता है। 

आधुनिक भारत में जाति सबसे शक्तिशाली संस्था बनी हुई है और यह देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए सबसे बड़ा खतरा है। छत्तीसगढ़ में स्थिति और गंभीर है क्योंकि वह नव-उदारवादी प्रयोगों की विशाल प्रयोगशाला बन गया है। इसके नतीजे में दलितों की बस्तियों पर हमले हो रहे हैं, उनकी ज़मीनों को कॉर्पोरेट पूंजीपतियों क सौंपा जा रहा है और हिंदूकरण या संस्कृतिकरण के ज़रिए उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से ठगा जा रहा है। आज सतनामी न केवल जाति-आधारित अत्याचारों और भेदभाव के शिकार हैं, वरन् उन्हें सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से बर्बाद करने के प्रयास भी हो रहे हैं। 

निष्कर्ष 

पूरे छत्तीसगढ़ में दलित भय के साये में जी रहे हैं। वर्चस्वशाली जातियों ने उनके मन में यह डर बैठा दिया है कि जो भी जाति की बेड़ियां काटने का प्रयास करेगा, उसकी हार तय है। जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक, प्रशासनिक और मनोवैज्ञानिक ढांचे का हिस्सा बन गई है। सतनामी भी इन बेड़ियों को तोड़ने की दिशा में कोई प्रयास करते नहीं दिख रहे हैं। यह तथ्य सामाजिक शक्ति और दमन की प्रक्रिया से उसके रिश्ते की परिकल्पना को पूर्ण करता है। 

छत्तीसगढ़ में जाति की राजनीति मज़बूत हो रही है और इससे गुलामी का एक नया स्वरुप उत्पन्न हो रहा है। परिसीमन के नाम पर आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या कम कर दी गई है। केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों के कारण, शिक्षा और रोज़गार में आरक्षण पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है। जातिवाद के नए-नए रूप राज्य में सामने आ रहे हैं। जैसे पिछले दो दशकों में दलित समूह कई ऐसे मामले प्रकाश में लाए हैं, जिनमें दलित सरपंचों को स्वतंत्रता और निष्पक्षता से काम नहीं करने दिया गया। स्कूलों में अध्यापकों द्वारा छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव के कई मामले भी सामने आए हैं। प्रश्न यह है कि आगे का रास्ता क्या हो? 

गुरु घासीदास द्वारा समाज में समानता स्थापित करने के लिए चलाया गया आंदोलन गंभीर खतरे में हैं। घासीदास ने सृष्टि के निर्माण और सर्वशक्तिशाली ईश्वर के हिंदू सिद्धांत को खारिज किया था। वे केवल ‘सतनाम’ की बात करते थे– वह एक ईश्वर जो निर्गुण है और जो सभी चीज़ों का निर्माता और सभी घटनाओं का कारण है। इस पंथ में सर्वशक्तिमान ईश्वर का न तो कोई प्रतीक है और ना ही उसका कोई निरूपण है। मगर आज सतनामी उनकी शिक्षाओं के खिलाफ जाकर मूर्तिपूजा कर रहे हैं। मंदिरों, सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रमों और भक्ति के घासीदास के विरोध को भी सतनामी भुला चुके हैं। घासीदास का आंदोलन आज एक चौराहे पर खड़ा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि 200 साल पुराने सतनाम आंदोलन ने हमेशा से दमन का शिकार रहे समाज के तबकों में आत्मगर्व और स्वाभिमान के भाव उत्पन्न किये और उन्हें यह लगा कि वे अपने भविष्य का निर्धारण स्वयं कर सकते हैं। परन्तु आज प्रश्न यह है कि क्या सतनामी, ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था से मुक्त हैं? क्या उन्होंने गुरु घासीदास के आंदोलन को वर्चस्व-आधारित हिंदू-व्यवस्था का भाग नहीं बना दिया है? क्या आज सतनामी जातिवाद से मुक्त हैं? क्या सतनाम पंथ न्याय, समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे जैसे उन मूल्यों पर कायम है, जो सभी जाति-विरोधी आंदोलनों का आधार रहे हैं? इन प्रश्नों के उत्तर जानना महत्वपूर्ण है। 

 संदर्भ

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(मूल अंग्रेजी से अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल/अनिल) 


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लेखक के बारे में

गोल्डी एम जार्ज

गोल्डी एम. जॉर्ज फॉरवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक रहे है. वे टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज से पीएचडी हैं और लम्बे समय से अंग्रेजी और हिंदी में समाचारपत्रों और वेबसाइटों में लेखन करते रहे हैं. लगभग तीन दशकों से वे ज़मीनी दलित और आदिवासी आंदोलनों से जुड़े रहे हैं

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जगदेव प्रसाद की नजर में केवल सांप्रदायिक हिंसा-घृणा तक सीमित नहीं रहा जनसंघ और आरएसएस
जगदेव प्रसाद हिंदू-मुसलमान के बायनरी में नहीं फंसते हैं। वह ऊंची जात बनाम शोषित वर्ग के बायनरी में एक वर्गीय राजनीति गढ़ने की पहल...
समाजिक न्याय के सांस्कृतिक पुरोधा भिखारी ठाकुर को अब भी नहीं मिल रहा समुचित सम्मान
प्रेमचंद के इस प्रसिद्ध वक्तव्य कि “संस्कृति राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है” को आधार बनाएं तो यह कहा जा सकता है कि...
‘मनखे मनखे एक समान’ का नारा देने वाले गुरु घासीदास
गुरु घासीदास ने बुद्ध, कबीर और रैदास के द्वारा शुरू किए गए आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए शोषित वंचित समाज को जागरूक करने का...