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बिहार के पास तमिलनाडु की तर्ज पर ‘श्रमण मॉडल’ तैयार करने का अवसर

बिहार विधानसभा ने हाल में जाति सर्वेक्षण के नतीज़ों के आधार पर आरक्षण 50 प्रतिशत से बढाकर 65 प्रतिशत करने का प्रस्ताव पारित कर दिया है। अब बिहार भी विकास की उसी राह पर आगे बढ़ सकता है, जिसे तमिलनाडु ने दशकों पहले चुना था

बहुत समय नहीं गुज़ारा जब तमिलनाडु, बिहार से भी ज्यादा गरीब था। कलैयासरन ए. और विजयभास्कर एम. अपनी पुस्तक ‘द द्रविड़ियन मॉडल’ (कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 2021) में बताते हैं कि सन् 1960-61 में तमिलनाडु में ग्रामीण निर्धनता की दर 51.7 प्रतिशत थी, जो राष्ट्रीय औसत (38.8 प्रतिशत) से कहीं ज्यादा थी। उस समय बिहार (जिसमें आज का झारखंड शामिल था) में यह दर 49.7 प्रतिशत थी। आज विभिन्न मानव विकास सूचकांकों पर तमिलनाडु मध्य या उच्च स्तर पर है। औद्योगिकीकरण की दृष्टि से तमिलनाडु देश में दूसरे नंबर और ओबीसी उद्यमियों के प्रतिशत की दृष्टि से पहले नंबर का राज्य है। 

तमिलनाडु के विकास की दिशा का निर्धारण एक आंदोलन ने किया था, जिसने आरक्षण के जरिए राज्य में सभी को प्रतिनिधित्व दिया और सामाजिक समावेशिता पर आधारित अर्थव्यवस्था के निर्माण पर जोर दिया। राज्य तंत्र के प्रतिनिधिक बनते ही उसने शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सभी को पहुंच दिलवाने और दमित आमजनों को अर्थव्यवस्था में हितधारक बनाने के लिए आवश्यक नीतियां बनानी और लागू करनी शुरू कर दीं।

स्वतंत्रता के बाद से तमिलनाडु में राज्य तंत्र को प्रतिनिधिक बनाने के लिए समय-समय पर कई कदम उठाए गए। सन् 1970 के दशक की शुरुआत में सत्तनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप उच्च शिक्षा और सार्वजनिक नियोजन में आरक्षण को 49 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया। फिर, 1980 के दशक में इसे और बढ़ा कर 69 प्रतिशत कर दिया गया (इसमें पिछड़ी जातियों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण शामिल था)। सन् 1980 के दशक के अंत में पिछड़ी जातियों के लिए निर्धारित 50 प्रतिशत कोटा में से 20 प्रतिशत अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए सुरक्षित कर दिया गया। सन् 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के चलते सरकारी क्षेत्र में अवसर कम होने लगे और निजी क्षेत्र का विस्तार होने लगा। इसके बाद भी ये सभी कदम तमिलनाडु के लिए उपयोगी सिद्ध हुए।

बिहार विधानसभा ने हाल में जाति सर्वेक्षण के नतीज़ों के आधार पर आरक्षण 50 प्रतिशत से बढाकर 65 प्रतिशत करने का प्रस्ताव पारित कर दिया है। अब बिहार भी विकास की उसी राह पर आगे बढ़ सकता है, जिसे तमिलनाडु ने दशकों पहले चुना था। मगर इसके लिए ज़रूरी होगा शिक्षा में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक और निजी निवेश और आरक्षण के प्रावधानों का ईमानदारी से पूरा पालन। ‘द्रविड़ियन मॉडल’ के लेखक इस बात को रेखांकित करते हैं कि इंजीनियरिंग की सीटों के मामले में तमिलनाडु देश में अव्वल है। सरकारी और सरकार से अनुदान प्राप्त इंजीनियरिंग कॉलेजों में 69 प्रतिशत सीटें पिछड़ी जातियों, अत्यंत पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए आरक्षित हैं। निजी कॉलेजों में भी 50 प्रतिशत सीटें सरकारी कोटे में हैं, जिन पर आरक्षण के प्रावधान लागू होते हैं। इसके विपरीत, जाति सर्वेक्षण से पता चलता है कि बिहार की आबादी के एक बहुत छोटे हिस्से की पहुंच उच्च शिक्षा तक है। बारहवीं कक्षा से आगे पढ़ने वालों का प्रतिशत पिछड़ी जातियों में 8.69, अति पिछड़ी जातियों में 5.32, एससी में 3.72 और एसटी में 4.21 है। ये सभी समुदाय, प्रदेश की कुल आबादी का करीब 85 प्रतिशत हैं। 

बिहार में 1.57 प्रतिशत आबादी सार्वजनिक क्षेत्र, 1.22 प्रतिशत निजी संगठित क्षेत्र, और 2.14 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में नियोजित है। करीब 3.05 प्रतिशत लोग स्वनियोजित हैं, 7.7 प्रतिशत कृषक या कृषि श्रमिक हैं और 16.73 प्रतिशत कुशल श्रमिक, श्रमिक या अन्य हैं। अंतिम दो श्रेणियों को छोड़कर, अन्य सभी में आबादी के अनुपात के हिसाब से उच्च जातियों की भागीदारी,  पिछड़ा वर्ग (बीसी), अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) से ज्यादा  है। 

इसी वर्ष पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने दिवंगत पिता एम. करुणानिधि की जीवनी की प्रति भेंट करते हुए तमिलनाडु के मुख्यमत्री एम.के. स्टालिन

चाहे आज आर्थिक विकास की दृष्टि से तमिलनाडु और बिहार दो विपरीत छोरों पर खड़े हों, मगर दोनों ही राज्यों में स्वतंत्रता के पहले और उसके बाद एक ही तरह प्रकृति की गैर-ब्राह्मण सामाजिक-राजनीतिक लामबंदी हुई थी। हालांकि दोनों राज्यों में इस लामबंदी के पैमाने और प्रभाव में फर्क था। सन् 1920 के दशक में शुरू हुए  पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन ने मद्रास प्रांत में तहलका मचा दिया था। लगभग उसी समय, बिहार में त्रिवेणी संघ सक्रिय था। तमिलनाडु और बिहार में ओबीसी राजनीति का उदय भी लगभग एक ही साथ हुआ। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के सी.एन. अन्नादुरई और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के बी.पी. मंडल सन् 1960 के दशक के अंत में क्रमशः तमिलनाडु और बिहार के मुख्यमंत्री बने। आगे चलकर मंडल, दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष बने। कर्पूरी ठाकुर 1970 के दशक की शुरुआत में बिहार के मुख्यमंत्री बने। अपनी दूसरी पारी में उन्होंने मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशों के अनुरूप आरक्षण 1978 लागू किया। इसके चार दशक से भी ज्यादा अवधि के बाद बिहार में जो जाति सर्वेक्षण हुआ, वह भी उसी गैर-ब्राह्मण सामाजिक-राजनीतिक लामबंदी का नतीजा है। 

कलैयासरन और विजयभास्कर अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि “राजनैतिक लामबंदी और राज्य-स्तरीय नीतियों के चलते पूंजी संचय की संभावनाएं बढ़ीं और इस क्षेत्र में निम्न जातियों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित हो सकी।” उनका कहना है कि यह तीन तरीकों से हुआ। इनमें से पहला था आम जनता को यह समझाना कि “उत्पादन एक आवश्यक और श्रेष्ठ गतिविधि है और यह भी कि सामाजिक पदक्रम को कमज़ोर करने के लिए औद्योगीकरण आवश्यक है।” इसके नतीजे में इन दोनों मुद्दों पर व्यापक राजनीतिक एकमत बन गया और औद्योगीकरण और उत्पादन को बढ़ाने की मांग जनता की ओर से होने लगी। दूसरा, बढ़ती मांग के नतीजे में भौतिक और सामाजिक अधिसंरचना में निवेश हुआ, जिससे पूंजी संचय के क्षेत्र में एक अधिक व्यापक वर्ग का प्रवेश संभव हो सका। तीसरा तरीका था– औद्योगीकरण और सेवा अर्थव्यस्था के निर्माण के लिए विशिष्ट नीतियां बनाया जाना। 

लेखक कहते हैं, “सकारात्मक कार्यवाही द्वारा सामाजिक न्याय की स्थापना का आख्यान, द्रविड़ समझ का हिस्सा बन गया और इसके नतीजे में, अन्य राज्यों की तुलना में तमिलनाडु में सकारात्मक विभेद की नीतियों को लागू करने वाले संस्थानों का कामकाज बेहतर रहा। जहां वामपंथी आंदोलन ने संसाधनों के पुनर्वितरण के लिए भू-सुधारों को सबसे महत्वपूर्ण माना, वहीं द्रविड़ समझ यह थी कि भारत में सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए शिक्षा और रोज़गार तक सभी को पहुंच दिलवाना ज़रूरी है। केवल भू-सुधारों से सदियों से संचित असमानता ख़त्म नहीं होगी। आधुनिक दुनिया में आर्थिक प्रगति, सेवा और औद्योगिक क्षेत्र से चालित है और ऐसे में उपलब्ध अवसरों का उपयोग करने के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण है।”

स्वामी के जाति समूह के आधार पर तमिलनाडु में उद्यमों का वितरण 

अ) सभी उद्यम (कर्मियों की संख्या के आधार पर) 

जाति समूह तमिलनाडु गुजरातमहाराष्ट्र
एससी-एसटी6,45,455 (14.1)6,11,289 (17.3)7,30,440 (13.1)
ओबीसी31,26,013 (68.2)14,43,918 (40.2)13,24,793 (23.8)
उच्च जातियां 8,11,683 (17.7)15,34,952 (42.6)35,14,846 (63.1)
कुल45,83,151 (10035,90,159 (100)55,70,079 (100)

बी) उद्यम (20-99 श्रमिक) 

जाति समूह तमिलनाडु गुजरातमहाराष्ट्र
एससी-एसटी2,532 (9.7)1,249 (15.9)1,022 (7.0)
ओबीसी18,777 (72.0)917 (11.6)1,442 (9.9)
उच्च जातियां 4,771 (18.3)5,714 (72.5)12,095 (83.1)
कुल26,080 (100.0)14,559 (100.0)14,559 (100.0)

स) उद्यम (100 या अधिक श्रमिक) 

जाति समूह तमिलनाडु गुजरातमहाराष्ट्र
एससी-एसटी100 (5.8)115 (12.1)109 (6.0)
ओबीसी1,169 (67.4)102 (10.8)143 (7.90)
उच्च जातियां 466 (26.9)730 (77.1)1,552 (86.0)
कुल1,735 (100.0)947 (100.0)1,804 (100.0)

स्रोत : इकनोमिक सेन्सस 2013-14 से परिकलित (कलैयासरन ए. और विजयभास्कर एम. की ‘द द्रविड़ियन मॉडल’ से)

आज प्रतिव्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलु उत्पाद में बिहार सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे नीचे है जबकि तमिलनाडु, बड़े राज्यों में तीसरे क्रम पर है। सकल राज्य घरेलु उत्पाद के मामले में तमिलनाडु केवल महाराष्ट्र से पीछे है। जैसा कि उपर्युक्त तालिका में बताया गया है, तमिलनाडु में 100 या उससे अधिक श्रमिकों वाले उद्यमों में से 67.4 प्रतिशत के मालिक ओबीसी हैं।

सन् 1970 के दशक की शुरुआत में अपने द्रविड़ मॉडल के साथ तमिलनाडु जिस मोड़ पर था, बिहार आज उसी मोड़ पर नज़र आ रहा है। बिहार अपना गैर-ब्राह्मणवादी आर्थिक मॉडल – संभवतः श्रमण मॉडल – तैयार कर सकता है, जिसका जुड़ाव उसकी जनता के विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास और उनके उत्पादन पर फोकस से हो। लेकिन इस प्रक्रिया के आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि सरकार अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण करे – और मुख्यतः कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से औद्योगिक अर्थव्यवस्था की ओर बढ़े – और दमित समुदायों को अर्थव्यवस्था का प्रमुख हितधारक बनाए। तमिलनाडु से सीख लेकर, बिहार बेहतर ढंग से औद्योगीकरण कर सकता है। वह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना उद्योगों को प्रोत्साहन दे सकता है ताकि तमिलनाडु के वेल्लोर और तिरुपर औद्योगिक केंद्रों की तरह, जल स्त्रोत प्रदूषित न हों। 

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल)


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लेखक के बारे में

अनिल वर्गीज

अनिल वर्गीज फारवर्ड प्रेस के प्रधान संपादक हैं

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