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मध्य प्रदेश : जयस को नजरंदाज करना कांग्रेस को पड़ा महंगा

चर्चाएं निराधार नहीं हैं। मसलन, जयस का आदिवासी बहुल क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव है और चुनाव पूर्व इसे राज्य में तीसरे मोर्चे के रूप में देखा जा रहा था। जयस संगठन ने 80 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान भी किया था। बता रहे हैं राजन कुमार

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 का नतीजा 163 बनाम कांग्रेस को मिले 66 सीट के अंतर के साथ भाजपा के पक्ष में गया है। इस नतीजे ने न सिर्फ कांग्रेस पार्टी को चौंकाया है, बल्कि वे लोग भी आश्चर्यचकित हैं, जो राज्य में सत्ता परिवर्तन की आस लगाए थे। इन लोगों में खास तौर से अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, ओबीसी संगठनों के लोग शामिल थे। अब जबकि परिणाम सामने है सूबे में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) व गोंडवाना गणतंत्र पार्टी आदि को नजरअंदाज करना कांग्रेस को महंगा पड़ा।

ये चर्चाएं निराधार नहीं हैं। मसलन, जयस का आदिवासी बहुल क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव है और चुनाव पूर्व इसे राज्य में तीसरे मोर्चे के रूप में देखा जा रहा था। जयस संगठन ने 80 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान भी किया था। 

जयस किसी पार्टी के रूप में पंजीकृत न होकर एक सामाजिक संगठन है और इसकी गतिविधियों में सामाजिक के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियां भी शामिल हैं। चुनाव के पहले जयस के राष्ट्रीय संरक्षक डॉ. हिरालाल अलावा ने कहा था कि उनके संगठन के उम्मीदवार या तो निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे या फिर किसी पार्टी से गठबंधन होने की स्थिति में उस पार्टी से चुनाव लड़ेंगे।

लेकिन विधानसभा चुनाव नजदीक आते-आते जयस के अधिकतर लोग जो अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव की तैयारी कर रहे थे, वे बिखर गए। ऐसा इसलिए भी हुआ, क्योंकि जयस के राष्ट्रीय संरक्षक डॉ. हिरालाल अलावा, जो खुद कांग्रेस पार्टी से विधायक थे, और वे कांग्रेस पार्टी से समझौते के पक्षधर थे। ऐसा इसलिए भी कि कहीं न कहीं उनका मानना था कि भाजपा जयस की विचारधारा से वास्ता नहीं रखती है। इसलिए जयस का समझौता कांग्रेस के साथ हुआ। 

इसकी जानकारी स्वयं डॉ. अलावा ने देते हुए कहा था कि कांग्रेस ने जयस समर्थित चार उम्मीदवारों को टिकट दिया है। इसमें खुद डॉ. हिरालाल अलावा की मनावर विधानसभा सीट भी शामिल रही। इसके अलावा सेंधवा से मोंटू सोलंकी, रतलाम ग्रामीण से लक्ष्मण डिंडोर और निवास से चैनसिंह वरकड़े शामिल हैं। वहीं कांग्रेस ने बड़वानी विधानसभा क्षेत्र से आदिवासी एकता परिषद से जुड़े राजन मंडलोई को उम्मीदवार बनाया, जिसके बारे में कहा गया कि यह जयस की अनुशंसा के उपरांत किया गया। 

इस प्रकार जो लोग जयस के माध्यम से मध्य प्रदेश विधानसभा में जाने का सपना देख रहे थे, उनकी उम्मीदों को तब झटका लगा जब कांग्रेस ने जयस समर्थित केवल 4 लोगों को ही उम्मीदवार बनाया। चर्चा यह भी हुई कि रतलाम ग्रामीण से जिस लक्ष्मण डिंडोर को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है, अब उन्हें जयस का समर्थन हासिल नहीं है। वहीं दूसरी ओर यह भी कहा गया कि जयस अब कांग्रेस की बी-टीम बनकर रह गई है। 

हालांकि इसके बाद जयस बिखराव की ओर बढ़ा और उसके कई गुट बन गए। जयस के कई ऐसे कार्यकर्ता, जो अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली रहे, और विधानसभा चुनाव की काफी तैयारी कर चुके थे, संगठन के निर्णय के खिलाफ जाकर अन्य पार्टियों में अपनी भूमिका तलाशने लगे। जबकि कईयों ने चुनाव में निर्दलीय उतरने का निर्णय लिया। इसके अलावा राजस्थान में हाल ही में गठित भारत आदिवासी पार्टी ने भी जयस के कुछ लोगों को मध्य प्रदेश में अपना उम्मीदवार बनाया। 

देखा जाय तो अलग-अलग पार्टियों से या निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जयस के कार्यकर्ताओं के चुनावी मैदान में उतरने से कांग्रेस को ज्यादा नुकसान हुआ। मध्य प्रदेश की लगभग 80 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभानेवाले आदिवासी वोटरों को जयस ने कुछ हद तक लामबंद करने में सफलता हासिल की, जबकि बहुत से आदिवासी मतदाता भ्रम के शिकार भी हुए, क्योंकि जयस के अलग-अलग गुटों के कई उम्मीदवार, या जयस के ही बागी लोग चुनावी मैदान में खड़े थे। 

जयस के ही एक गुट – ‘जयस कोर कमेटी’ – जिसका नेतृत्व जयस संगठन के संस्थापक सदस्यों में से एक विक्रम अछालिया करते हैं, उन्होंने चुनाव पूर्व कहा था कि हम लोग जयस को किसी पार्टी की बी टीम नहीं बनने देंगे। चाहे सफलता देर से मिले, लेकिन हम लोग स्वतंत्र आदिवासी नेतृत्व तैयार करेंगे। 

हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया था कि उनकी टीम से भी कांग्रेस पार्टी के लोगों ने समझौता करने की प्रयास किए थे, लेकिन बात नहीं बनी।

करीब 80 विधानसभा क्षेत्रों में है आदिवासियों की निर्णायक भूमिका

उसके बाद ‘जयस कोर कमेटी’ ने 19 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा की। दूसरी ओर जयस मध्य प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष रह चुके अंतिम मुझाल्दा अलग गुट बनाकर स्वघोषित प्रदेश अध्यक्ष बने रहे और चुनाव में अपनी तरफ से 39 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा की। जबकि भारत आदिवासी पार्टी ने 9 विधानसभा सीटों पर जयस के ही लोगों को उम्मीदवार बनाया। इसके साथ ही, जयस के कई कार्यकर्ता संगठन अथवा इन गुटों के समर्थन नहीं दिए जाने के बावजूद चुनाव में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार उतरे।

इसका परिणाम यह हुआ कि – जयस (अंतिम मुझाल्दा गुट), जयस कोर कमेटी (विक्रम अछालिया गुट), और भारत आदिवासी पार्टी – तीनों द्वारा घोषित उम्मीदवारों की सूची में कुछ नाम साझा थे। जैसे कि पेटलावद विधानसभा क्षेत्र में जयस कोर कमेटी और भारत आदिवासी पार्टी के उम्मीदवार बालुसिंह गामड़ साझा उम्मीदवार थे, जबकि अंतिम मुझाल्दा गुट की तरफ से प्रेम भूरिया उम्मीदवार थे। परिणाम की बात करें तो पेटलावद सीट कांग्रेस प्रत्याशी वालसिंह मेड़ा 5647 वोट के अंतर से भाजपा के निर्मला भूरिया से हार गए। यहां बालुसिंह गामड़ को 15,611 वोट मिले, जबकि प्रेम भूरिया को 802 वोट मिले।

ऐसे ही थांदला, महेश्वर, सरदारपुर, राजपुर, मंधाता विधानसभा सीट पर जयस कोर कमेटी, भारत आदिवासी पार्टी और जयस अंतिम मुझाल्दा गुट के उम्मीदवार एक ही थे। जबकि झाबुआ, बागली, टिमरनी, भीकनगांव, भगवानपुर, बैतूल जयस के उपरोक्त दोनों गुट ने अपने अलग-अलग उम्मीदवार उतारे थे। वहीं धरमपुरी और बड़वाह के लिए, दोनों ने एक ही नाम की घोषणा की थी, लेकिन इन दोनों जगह पर जयस के उम्मीदवार चुनावी मैदान में नहीं आए। इन दोनों सीटों पर भाजपा की जीत हुई है। वहीं धरमपुरी विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के दो बार के विधायक रह चुके पांचीलाल मेड़ा केवल 356 वोट से हार गए। लेकिन यहां जयस से जुड़ी राजूबेन चौहान और श्रीराम डावर क्रमशः 3964 और 1086 वोट प्राप्त किए, जिसे पांचीलाल मेड़ा की पराजय का कारण माना जा सकता है।

इसी प्रकार मंधाता (सामान्य) सीट भी भाजपा की झोली में जाने पर जयस को कारण माना जा रहा है, क्योंकि इस विधानसभा क्षेत्र में लगभग 65 हजार के आसपास आदिवासी वोटर हैं। मंधाता में कांग्रेस प्रत्याशी के हारने का अंतर मात्र 589 वोट था। जयस के उपरोक्त दोनों गुटों की तरफ से एक ही उम्मीदवार राहुल चंदेल मंधाता सीट से उम्मीदवार थे। उन्हें 2908 वोट मिले। 

वहीं नेपानगर से बिल्लोरसिंह जमरा जयस के उम्मीदवार थे। उन्हें 16,365 वोट मिले। इस सीट पर भी कांग्रेस को हार मिली है। कांग्रेस द्वारा पानसेमल सीट गंवाने की वजह भी जयस को माना जा रहा है, क्योंकि यहां कांग्रेस प्रत्याशी चंद्रभागा किराड़े का काफी विरोध था, साथ ही जयस का यहां व्यापक प्रभाव भी था। उपरी तौर पर बेशक जयस यहां चंद्रभागा किराड़े के साथ था, लेकिन यह भी खबर मिली कि भीतरी तौर पर जयस के कई कार्यकर्ता कांग्रेस के विरोध में रहे। इसके अलावा जयस से ही जुड़े निर्दलीय प्रत्याशी रमेश चौहान को 12,950 वोट प्राप्त हुए।

इसके अलावा पंधाना, अलीराजपुर, रतलाम ग्रामीण सीट पर भी जयस के कारण ही कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। रतलाम ग्रामीण सीट पर कांग्रेस ने लक्ष्मण डिंडोर को जयस समर्थित उम्मीदवार बताया था, जबकि उसी सीट पर जयस कोर कमेटी के उम्मीदवार डॉ. अभय ओहरी कांग्रेस की हार के जिम्मेदार माने जा रहे हैं।

बेतूल जिले के भैंसदेही और घोड़ाडोंगरी में भी, जहां कि जयस का काफी प्रभाव था, कांग्रेस द्वारा जयस कार्यकर्ताओं को उम्मीदवार नहीं बनाए जाने के कारण ये दोनों सीटें गंवानी पड़ी। ऐसा इसलिए कि भैंसदेही से जयस समर्थित उम्मीदवार संदीप धुर्वे को 10,478 वोट मिले। जीत भाजपा के महेंद्र सिंह चौहान को मिली, जिन्हें 97,938 वोट और कांग्रेस के उम्मीदवार धरमूसिंह सिरसाम को 89,708 वोट मिले। 

यहीं हाल घोड़ाडोंगरी में भी हुआ। यहां से कांग्रेस उम्मीदवार राहुल उईके को जयस समर्थित उम्मीदवार स्मिता राजा धुर्वे के कारण हार का सामना करना पड़ा। स्मिता राजा धुर्वे को 6150 वोट मिले। चुनाव पूर्व संदीप धुर्वे और राजा धुर्वे कांग्रेस पार्टी से टिकट मांग रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि कांग्रेस पार्टी टिकट देगी, क्योंकि जिला पंचायत चुनाव में बेतूल जिले में खास तौर से भैंसदेही और घोड़ाडोंगरी में जयस ने जिस तरह प्रदर्शन किया था, वह काफी प्रभावशाली था। जयस को नजरअंदाज करने का परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस बेतूल की दोनों सीटें हार गई, जो पारंपरिक रूप से उसकी अपनी सीटें थीं।

खैर, इस बार के विधानसभा चुनाव में जयस संगठन से जुड़े डॉ. हिरालाल अलावा मनावर से, मोंटू सोलंकी सेंधवा से, चैनसिंह वरकड़े निवास से कांग्रेस पार्टी से विधायक चुने गए, जबकि कमलेश्वर डौडियार सैलाना से भारत आदिवासी पार्टी से विधायक चुने गए। आदिवासी एकता परिषद और जयस से जुड़े राजन मंडलोई भी बड़वानी से कांग्रेस पार्टी से विधायक चुने गए। वहीं जयस समर्थित कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार चैनसिंह वरकड़े ने निवास विधानसभा से भाजपा के दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते को हराया।

वैसे देखा जाय तो जयस के कारण भाजपा को भी कई सीटों पर नुकसान हुआ है। माना जा रहा है कि अमरवाड़ा क्षेत्र से मोनिका बट्टी की हार की वजह जयस है। ऐसा इसलिए कि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवार देवराम भलावी, जिन्हें जयस का भी समर्थन प्राप्त था, ने 18,231 वोट लाकर मोनिका बट्टी के उम्मीदों पर पानी फेर दिया। 

इसके अलावा जयस ने मालवा-निमाड़ और अन्य क्षेत्र में भी भाजपा को कई सीटों पर नुकसान पहुंचाया है, जिसमें बदनावर, बड़वानी, जोबट, बमोरी, टिमरनी आदि सीट प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन सीटों पर अब कांग्रेस का कब्जा है।

रही बात कांग्रेस की तो उसके हिस्से अधिक पराजय मिली। जयस के अलावा कांग्रेस पार्टी को गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, भारत आदिवासी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के कारण भी कुछ सीटें गंवानी पड़ी हैं। हालांकि कांग्रेस पार्टी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के साथ चुनाव में गठबंधन करना चाहती थी, लेकिन किसी कारणवश दोनों के बीच गठबंधन नहीं हो सका, जिसका खामियाजा दोनों को भुगतना पड़ा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

राजन कुमार

राजन कुमार फारवर्ड प्रेस के उप-संपादक (हिंदी) हैं

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