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मध्य प्रदेश में किसके साथ गए दलित, आदिवासी और ओबीसी?

आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 विधानसभा सीटों के परिणामों पर नजर डालें तो भाजपा ने पिछली बार जीती सीटों में आठ का इजाफा करते हुए इस बार 24 सीटों पर कब्जा किया है। जबकि कांग्रेस को इतनी ही सीटें गंवाकर महज 22 पर संतोष करना पड़ा। बता रहे हैं मनीष भट्ट मनु

हाल ही में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को जो झटके लगे हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण राज्य मध्य प्रदेश है। कमलनाथ के नेतृत्व में लगभग पंद्रह महीने की कांग्रेस सरकार का कार्यकाल हटा दिया जाए तो वर्ष 2003 से यहां भारतीय जनता पार्टी का शासन कायम है। ओबीसी वर्ग से आने वाले शिवराज सिंह चौहान 2023 के परिणाम आने से पहले बतौर मुख्यमंत्री चार पारी खेल चुके थे। कमलनाथ सरकार के तख्तापलट के बाद 23 मार्च, 2020 को चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके कार्यकाल में कई ऐसे आरोप लगे जो उनकी सरकार को बहुजन विरोधी साबित करते थे। इसके साथ ही पुरानी पेंशन व्यवस्था और पदोन्नति में लगी रोक के चलते शासकीय कर्मचारियों में भी आक्रोश साफ नजर आता था। 

फिर सीधी का पेशाब कांड हो अथवा कथित नर्सिंग घोटाला, या चाहे राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं और नियुक्तियों में हो रही देरी का मामला रहा या फिर कुपोषण के सामने आते मामले, शिवराज संभवतः स्वयं भी इस बार के चुनाव में भाजपा की जीत को लेकर सहज नहीं थे। मंत्रियों और अधिकारियों के भ्रष्टाचार के आरोप भी हवा में तैर रहे थे। ऐसे में स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के चाणक्य के नाम से पुकारे जाने वाले अमित शाह ने भी इस निर्वाचन में शिवराज सिंह चौहान को भाजपा का चेहरा बताने से परहेज किया था। मगर, परिणाम आने के बाद भाजपा की प्रचंड जीत ने सबको हैरत में डाल दिया। 

लगभग 48.5 प्रतिशत वोट शेयर लेकर भाजपा ने राज्य विधान सभा की कुल 230 सीटों में से 163 पर विजयी पताका फहराई। जबकि कांग्रेस ने जाति आधारित जनगणना, आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पांचवीं अनुसूची लागू करने और पुरानी पेंशन व्यवस्था लागू करने के साथ ही समाज के हर वर्ग के लिए कोई न कोई गारंटी देने से गुरेज नहीं किया था। ऐसे में देश में सर्वाधिक आदिवासी जनसंख्या, लगभग 17 प्रतिशत अनुसूचित जाति और राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार 48 प्रतिशत ओबीसी आबादी वाले राज्य में बहुजन मतदाताओं ने किसका साथ दिया, यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है।

हालांकि, भाजपा द्वारा मोदी लहर और शिवराज सरकार की योजनाओं से पहुंचे लाभ को लेकर किए जा रहे दावों से उलट आंकड़े इस बात की भी गवाही देते हैं कि भले ही कमलनाथ के नेतृत्व में इस बार कांग्रेस विगत निर्वाचन की 114 विधान सभा सीटों की तुलना में महज 66 पर सिमट गई हो, मगर उसे मिलने वाले मतों की संख्या में कुछ खास गिरावट नहीं आई है। प्रतिशत में बात की जाए तो वर्ष 2018 के चुनाव में कांग्रेस को जहां 40.89 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे, वहीं इस बार वह मामूली घट कर 40.4 प्रतिशत तक आ गए। इसकी तुलना में भाजपा ने 2018 में प्राप्त 41.02 प्रतिशत मतों की तुलना में 48.5 प्रतिशत मत प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि भाजपा को यह अतिरिक्त मत प्राप्त कहां से हुए? 

फिर सामने आया दलित-बहुजन मतों में बिखराव

इसका स्पष्ट उत्तर है कि मध्य प्रदेश के मतदाताओं ने एक बार फिर दो दलीय चुनावी व्यवस्था पर यकीन किया है। भाजपा और कांग्रेस से उलट अन्य सभी दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों को उसने जहां पिछली बार 18.9 प्रतिशत वोट दिए थे, वहीं इस बार यह महज 11.1 प्रतिशत रह गया।

आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 विधानसभा सीटों के परिणामों पर नजर डालें तो भाजपा ने पिछली बार जीती सीटों में आठ का इजाफा करते हुए इस बार 24 सीटों पर कब्जा किया है। जबकि कांग्रेस को इतनी ही सीटें गंवाकर महज 22 पर संतोष करना पड़ा। इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश में 29 विधानसभा सीटें ऐसी भी हैं, जिन पर आदिवासी मतदाता ही निर्णायक भूमिका में माने जाते हैं। इनमें भी इस बार भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए 20 पर कब्जा जमाया जबकि कांग्रेस के खाते में नौ सीटें ही आईं। 

समूहवार बात करें तो भील, भिलाला और बारेला आदिवासी समाज ने कांग्रेस का साथ दिया। इनके प्रभाव वाली 19 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को 12 सीटें मिलीं। मगर विंध्य, महाकौशल, मालवा और मध्य क्षेत्र की कोरकू, कोल और गोंड आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भाजपा हावी रही। कमलनाथ के प्रभाव वाले छिंदवाड़ा और नवगठित पांढुर्णा जिलों को हटा दिया जाए तो कांग्रेस का प्रदर्शन उसके तमाम दावों से बेहद कमजोर रहा है। हैरत की बात यह भी है कि गोंड बहुल महाकौशल क्षेत्र में भाजपा के बड़े आदिवासी चेहरे में शुमार केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते को भी हार का सामना करना पड़ा है।

अनुसूचित जाति वर्ग की बात की जाए तो मध्य प्रदेश में इनके लिए 35 विधान सभा सीटें आरक्षित है। इनमें से वर्ष 2018 में भारतीय जनता पार्टी को 18 तथा कांग्रेस को 17 में जीत प्राप्त हुई थी। मगर वर्ष 2023 में यहां भी भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए आंकड़ा 26 पर पहुंचा दिया जबकि कांग्रेस को महज 9 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है। चौंकाने वाली बात यह है कि ग्वालियर-चंबल तथा महाकौशल क्षेत्र के अतिरिक्त कांग्रेस कहीं भी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई है। बुंदेलखंड अंचल में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित छह में पांच पर और मालवा की नौ में से आठ सीटों पर भाजपा ने अपना कब्जा जमाया। वहीं मध्य क्षेत्र में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सभी सात सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी विजयी हुए हैं। विंध्य में सभी चार सीटों पर भाजपा को विजय मिली है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में सात में पांच और महाकौशल की तीन में दो सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी जीतने में सफल रहे हैं।

कांग्रेस को सबसे बड़ा धक्का ओबीसी बहुल सीटों पर लगा है। हालात इस कदर कांग्रेस के विरोध में थे कि ओबीसी वर्ग से आने वाले उसके बड़े नाम जीतू पटवारी (राऊ), कमलेश्वर पटेल (सिंहावल) और लाखन सिंह यादव (भितरवार) को हार का सामना करना पड़ा। मध्य प्रदेश में 72 विधान सभा सीटों पर ओबीसी का प्रभाव माना जाता है। यहां कुल मतदाताओं में से इस वर्ग आबादी 40 प्रतिशत अथवा उससे अधिक है। मगर इनमें से 55 पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। जबकि वर्ष 2018 के निर्वाचन में इनमें से 43 पर कांग्रेस के प्रत्याशी जीते थे। 

राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश में चुनावी प्रचार करते हुए जिस कालापीपल विधान सभा क्षेत्र से जाति आधारित जनगणना का समर्थन किया था, उसे भी वर्ष 2023 में भाजपा ने कांग्रेस से छीनने में कामयाबी हासिल की है। भाजपा ने ओबीसी वर्ग से आने वाले 68 प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था, जिनमें से 44 ने जीत हासिल की है। वहीं कांग्रेस के 59 ओबीसी चेहरों में से 16 ही विधानसभा पहुंचने में सफल रहे हैं। मगर, आदिवासी मतदाताओं की ही तरह ओबीसी मतदाताओं ने भी भाजपा के प्रमुख ओबीसी नेताओं में शुमार सतना के वर्तमान सांसद गणेश सिंह और पूर्व मंत्री गौरीशंकर बिसेन को भी हार का मुंह देखने पर मजबूर कर दिया। ज्ञात हो कि गणेश सिंह ओबीसी संसदीय समिति के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, जबकि बिसेन पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं। हालांकि भाजपा ने मूल रूप से उनकी जगह उनकी पुत्री को विधान सभा समर में उतारने का निर्णय लिया था।

इस चुनाव में सबसे बड़ा सदमा मध्य प्रदेश में अपनी जड़ें तलाश रहे अन्य दलों को लगा है। बसपा का मत प्रतिशत वर्ष 2018 के 5.1 प्रतिशत से घटकर 3.4 प्रतिशत पर आ गया। समाजवादी पार्टी को पिछली बार निर्वाचन में प्राप्त 1.3 प्रतिशत मतों की तुलना में आधे प्रतिशत से भी कम मत प्राप्त हुए हैं। अपनी जड़ें तलाश रही आम आदमी पार्टी का मत प्रतिशत भी सपा के नजदीक ही है। वहीं नोटा का प्रयोग लगभग एक प्रतिशत मतदाताओं ने किया। एक समय में महाकौशल अंचल में किंग-मेकर का खिताब प्राप्त कर चुकी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को जहां वर्ष 2018 के निर्वाचन में 1.77 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे, इस बार का आंकड़ा केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा सार्वजनिक नहीं किया गया है। 

बहरहाल मध्य प्रदेश के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि भाजपा के उग्र हिंदुत्व और कांग्रेस के नरम हिंदुत्व के मध्य दलित-बहुजन केंद्रित राजनीतिक दलों को आत्म चिंतन करना पड़ेगा। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

मनीष भट्ट मनु

घुमक्कड़ पत्रकार के रूप में भोपाल निवासी मनीष भट्ट मनु हिंदी दैनिक ‘देशबंधु’ से लंबे समय तक संबद्ध रहे हैं। आदिवासी विषयों पर इनके आलेख व रपटें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।

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