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ब्राह्मणों ने बुद्ध कथा के आयोजन स्थल पर हमला क्यों किया?

दिल्ली और यूपी में आरएसएस-भाजपा की सत्ता ने सवर्णों को पहले से ज्यादा आक्रामक और मनबढ़ू बनाया है। पहेवा गांव की बुद्ध कथा पर हमला इस आक्रामकता और मनबढ़ू होने का एक और सबूत है। कानपुर के पहेवा गांव से लौटकर बता रहे हैं डॉ. सिद्धार्थ

दलितों की बस्ती, दलितों की बारात, घोड़ी पर बैठे दलित दुल्हे और दलितों के आयोजनों पर सवर्णों के हमले का एक सिलसिलेवार लंबा इतिहास रहा है। सभी के बहाने अलग-अलग होते हैं। इस बार सवर्णों के हथियारबंद हमले के निशाने पर पहेवा गांव की दलित बस्ती रही। यह घटना कानपुर नगर (जिला) के सांढ़ थाने के पहेवा गांव की है। वहां के आंबे़डकर पार्क में आयोजित बुद्ध कथा पंडाल पर बीते 19 दिसंबर, 2023 की रात करीब 2 बजे हथियारबंद अपराधियों ने हमला बोल दिया, जिसमें दो लोग विकास कुशवाह उर्फ पिंटू और नितिन पाल बुरी तरह घायल हो गए। तीसरे व्यक्ति पंकज (सोनकर) को भी चोट लगी। तीनों को बुरी तरह लोहे की रॉड से पीटा गया। जिस आंबेडकर पार्क में आयोजन हो रहा था, उस पार्क में स्थित रैदास की प्रतिमा को हमलावरों ने तोड़ दिया। हमलावरों ने आयोजन स्थल पर दो बार फायरिंग की और दो बम फोड़े। पुलिस के अनुसंधान के दौरान आयोजन स्थल से जिंदा कारतूस भी बरामद हुआ। 

स्थानीय लोगों के मुताबिक, हमलावरों ने कुर्सियों को तोड़ा और टेंट को तहस-नहस कर दिया। इसके अलावा 20 हजार नकद और एक बाइक उठा ले गए। हमलावर कोई बाहरी नहीं, बल्कि उसी गांव के ब्राह्मण टोले के लोग थे।

बताते चलें कि इस मामले में आठ लोगों को अभियुक्त बनाया गया है और रपट लिखे जाने तक 6 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। नामजद अभियुक्तों में चंद्रभान मिश्रा, गोलु मिश्रा, शिवम मिश्रा, जीतू मिश्रा, अरूण कोटदार, किन्नर मिश्रा, विशंभर मिश्रा और मनीष तिवारी शामिल हैं। इनमें से एक मनीष तिवारी को छोड़कर अन्य सभी अभियुक्त पहेवा गांव के हैं। वहीं मनीष तिवारी बगल के रार गांव का निवासी है तथा उसके ऊपर पहेवा गांव के दलित लोगों का आरोप है कि यह हमलावरों का सरंक्षणदाता है। उनके मुताबिक, मनीष तिवारी अपना दल के स्थानीय (घाटमपुर सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र) विधायक सरोज कुरील का जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) है। पहेवा गांव इस विधानसभा में आता है। 

दलित बस्ती के बुद्ध कथा के पंडाल पर हमले के बारे में प्राथमिकी बुद्ध कथा के आयोजन के मुख्य संयोजक रामसागर पासवान ने दर्ज कराई है। इस प्राथमिकी के अनुसार– “19 दिसंबर को रात 2 बजे अराजक तत्वों ने कथा स्थल पर लेटे हुए पिंटू (विकास कुशवाहा), नितिन (पाल) और पंकज (सोनकर) को गाली-गलौज करते हुए बहुत मारा और रायफल से फायरिंग की। रैदास महाराज की मूर्ति तोड़ी और एक बाइक और 20 हजार रुपए पंडाल से उठा ले गए व टेंट-कुर्सी तोड़ी।” 

पुलिस ने इस संदर्भ में अभियुक्तों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 146, 149, 323, 504, 427, 395, 295, 295-ए, 336 और एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया है। आश्चर्य का विषय यह है कि विकास कुशवाहा के ऊपर जानलेवा हमला कर गंभीर रूप से घायल किए जाने के बाद भी अभियुक्तों पर धारा 307 नहीं लगाई गई।

पहेवा गांव स्थित आंबेडकर पार्क में संत रैदास की प्रतिमा के पास तथ्यान्वेषी टीम के सदस्य व स्थानीय (तस्वीर साभार : अहद आजमी)

बीते 19 दिसंबर को पहेवा गांव में घटी इस घटना की सूचना अखबारों-यूट्यूब चैनलों और फेसबुक से मिल रही थी। घटना को विस्तार से जानने और गांव की वास्तविकता से रू-ब-रू होने के लिए चार लोगों की टीम लखनऊ से 27 दिसंबर को पहेवा गांव गई। इस टीम में उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री दद्दू प्रसाद, दलित एक्टिविस्ट डॉ. आर.पी. गौतम, बांस शिल्पी संघ के अध्यक्ष संतोष कुमार धरिकार और इस रपट के लेखक (सिद्धार्थ) शामिल थे। बाद में इस टीम में स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता धर्मेंद्र संखवार भी शामिल हो गए।

जब हम पांच लोगों की टीम पहेवा गांव स्थित घटनास्थल पर पहुंची, पूरा गांव पुलिस छावनी में तब्दील था। उत्तर प्रदेश की सशस्त्र पुलिस (पीएसी) की बटालियन के साथ पुलिस भी बड़ी संख्या मौजूद थी। वातावरण तनावपूर्ण लग रहा था। सबसे पहले हम बुद्ध कथा के मुख्य संयोजक रामसागर पासवान से मिले। धीरे-धीरे गांव के अन्य लोग भी जुटने लगे। दो बार के पूर्व प्रधान रामऔतार वर्मा से लंबी बातचीत हुई। फिर इस बातचीत में महिलाएं, नौजवान और बच्चे भी शामिल हो गए। गांववालों से लंबी बातचीत के बाद हम लोग घायलों से मिलने कानपुर के लाला लाजपत राय अस्पताल (पूर्व नाम हेलेट अस्पताल) गए, जहां आईसीयू में जीवन-मरण से जूझ रहे विकास कुशवाहा उर्फ पिंटू से मिले। घायल नितिन पाल अस्पताल से डिस्चार्ज हो चुके थे।

क्या है बुद्ध कथा का आयोजन?

बुद्ध कथा के आयोजन के दौरान बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के जीवन, संविधान और बुद्ध के बारे में बात होती है। बहुजन संतों, नायकों और नायिकाओं की चर्चा की जाती है। रैदास और कबीर जैसे संतों की बानियों को भी सुनाया जाता है। इसके अलावा सावित्रीबाई फुले और रमाबाई के बारे में भी बातें होती हैं। आयोजन के दौरान मूलनिवासियों-बहुजनों के ऊपर हुए अत्याचारों की भी चर्चा होती है। बीच-बीच में झांकी निकाली जाती है। इसके अलावा लोगों को ढोंग-पाखंड से मुक्त होने की शिक्षा भी दी जाती है। यह सारी बात हमें पहेवा गांव के नरेश चंद्र संखवार (दलित) और विक्रम पासवान ने बताई। इसकी पुष्टि गांव के अन्य लोगों ने भी की।

कानपुर के लाला लाजपत राय अस्पताल में जीवन और मौत से जुझ रहा है विकास कुशवाहा उर्फ पिंटू (तस्वीर साभार : अहद आजमी)

इस बार यह कथा अर्चना बौद्ध और उनकी टीम प्रस्तुत कर रही थी। इस टीम में 5-6 लोग थे। यह टीम गाते-बजाते हुए कथा कहती है। यह टीम अलग-अलग जगहों पर जाकर बुद्ध की कथा कहती है।

इस कथा के बारे में बताते हुए इस कथा के मुख्य संयोजक रामसागर पासवान बताते हैं कि पिछली बार यह कथा मई महीने में हुई थी। यह कथा तब 7 दिन चली थी। इस बार भी यह कथा मई महीने में ही होने वाली थी, लेकिन लोकसभा चुनाव और बच्चों की परीक्षा को देखते हुए पहले ही आयोजित कर दी गई। गांव वालों और आसपास से आने वाले लोगों का जोर था कि कथा जरूर होनी चाहिए। लोगों के कहने पर इस बार यह कथा 7 दिन से बढ़ाकर 9 दिन का कर दिया गया। इस कथा में पहेवा के गांव के दलित-बहुजनों के साथ-साथ आसपास के करीब 20 गांवों के दलित-बहुजन शामिल होते हैं। रामसागर पासवान बताते हैं कि पिछली बार भी अर्चना बौद्ध की टीम ने यह कथा प्रस्तुत की थी। लोगों ने उनकी प्रस्तुति को बहुत पसंद किया था।

पहेवा गांव की सामाजिक संरचना

पहेवा गांव सामाजिक तौर पर दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक तरफ ब्राह्मणों का टोला है। दूसरी ओर दलित-बहुजन हैं। इस गांव में ब्राह्मण करीब 75 से 80 घर हैं। दलितों में संखवार, पासी, सोनकर (खटिक) और वाल्मीकि हैं। इसके साथ ही धोबी जाति के लोगों के दो घर हैं। इनके अलवा अच्छी-खासी संख्या में कुम्हार जाति के लोग हैं। पिछड़ों में चार-पांच घर कुर्मी हैं, जो अपना सरनेम वर्मा लिखते हैं। वहीं 10-12 घर निषादों का है। जबकि दलितों के करीब 250 घर हैं। पहेवा गांव में एकमात्र सवर्ण जाति ब्राह्मण है।

ब्राह्मणों के आतंक के चलते नाई गांव छोड़कर चले गए

पहले इस गांव में 4 परिवार नाई लोगों का भी था। लेकिन वे गांव छोड़कर चले गए। नाई लोग क्यों गांव छोड़कर चले गए? इसका जवाब देते हुए फूलमती देवी (दलित) कहती हैं कि ब्राह्मण लोग उनकी बहु-बेटियों का छेड़ते थे, उनकी इज्जत पर हाथ डालते थे, जिसके चलते वे लोग अपना घर-खेत बेचकर चले गए। इन्हीं हालातों के चलते लोहारों ने भी गांव छोड़ दिया।

यह सवाल पूछने पर कि आखिर आप लोग तो इसी गांव में रहते हैं, वे लोग क्यों चले गए, का जवाब देते हुए फूलमती देवी कहती हैं कि वे लोग कम संख्या में थे, और उन्हीं सबों (ब्राह्मणों) के साथ सटकर (मिलकर) रहते थे। 

पहेवा गांव की आर्थिक सरंचना

पहेवा गांव के ब्राह्मण बड़ी जोत के मालिक हैं। गांव की दो-तिहाई से अधिक खेती की जमीन उनके पास है। ब्राह्मणों में सबसे कम जमीन के मालिक छोटे तिवारी हैं, जिनके पास करीब 3 बीघा जमीन है। अधिकांश ब्राह्मणों के पास करीब तीन एकड़ जमीन है। इसके अलावा 10 से 15 एकड़ तक की जमीन के मालिक ब्राह्मण भी पहेवा गांव में रहते हैं। अधिकांश ब्राह्मणों ने अपनी जमीन बटाईदारी पर दलितों को दे रखी है। यहां तीन तरह की बटाईदारी व्यवस्था है– अधिया, तिहाई और चौथाई। 

अधिया में भूस्वामी की जमीन होती है, साथ ही वह खेती की लागत में आधा हिस्सा देता है। और लागत का आधा हिस्सा बटाईदार देता है। खेत में जो पैदावार होती है, वह भूस्वामी और बटाईदार के बीच आधा-आधा हिस्सा बंट जाता है। चौथाई में खेत और लागत दोनों भूस्वामी के होते हैं। बटाईदार केवल श्रम लगाता है, खेती की देख-रेख करता है। इससे जो पैदावार होती है, उसका एक चौथाई भाग ही बटाईदार को मिलता है। 

तिहाई व्यवस्था में बीच-बीच की स्थिति होती है। इसके साथ ब्राह्मणों ने अपनी जमीन बलकट (इजारा) पर भी दे रखी है। इस व्यवस्था के तहत भूस्वामी ब्राह्मण एक निश्चित धनराशि के बदले में दो फसलों के लिए अपनी जमीन दलित-पिछड़ों को दे देते हैं।

यह एक दलित बहुल गांव है। अधिकांश दलितों के पास नहीं के बराबर जमीन है। यह स्थिति संखवार, पासी, सोनकर और वाल्मीकि सबकी है। निषादों के पास भी बहुत कम जमीन है। पिछड़ों में सिर्फ कुर्मी लोगों के पास जमीन है। इस गांव में कुर्मी सिर्फ 4-5 घर हैं। ये लोग खुद खेती करते हैं और मजदूर भी लगाते हैं। पासियों के तुलना में संखवारों और सोनकरों की स्थिति बेहतर है। कई परिवारों के लोग सरकारी नौकरियों में हैं। गांव में पढ़ाई-लिखाई का स्तर बेहतर है। हालांकि पासी समाज में सिर्फ दो या तीन लोग सरकारी नौकरी में हैं। यही स्थिति कमोबेश निषादों की भी है। वाल्मीकि सूअर पालन और सफाई का काम करते हैं। 

इस गांव में दलितों व अति पिछड़ों की आय एक बड़ा स्रोत बटाईदारी की खेती है। इसके लिए वे ब्राह्मणों के खेतों पर निर्भर हैं। हालांकि ब्राह्मण भी उनके बिना खेती नहीं कर सकते। बटाई की खेती के साथ दलित-पिछड़े गांव, गांव के आस-पास के शहरों और दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू आदि जगहों पर मजदूरी करने के लिए जाते हैं।

पहेवा गांव में सामाजिक संबंधों का स्वरूप 

इस गांव में दलितों-पिछड़ों और ब्राह्मणों के बीच शादी-ब्याह और मरनी-जियनी के अवसर पर खाने-पीने का संबंध नहीं है। यह संबंध दलितों-पिछड़ों के बीच पैदा हुई सामाजिक समता की चेतना के बाद खत्म हुआ है। ब्राह्मण जिस दोयम और अपमानित तरीकों से दलितों-बहुजनों को खिलाना चाहते हैं, उस तरह से दलित-बहुजन खाने-पीने के लिए तैयार नहीं। इसके साथ ब्राह्मण दलितों के यहां शादी-ब्याह या मरनी-जियनी के अन्य अवसरों पर खाने-पीने नहीं आते। इस गांव के दलित सामाजिक जीवन में बराबरी की चेतना से लैस हैं। ब्राह्मण किसी तरह उन्हें बराबर मानने को तैयार नहीं हैं।

पहेवा गांव में दलितों की अलग-अलग उपजातियों और पिछड़ों के बीच सामाजिक तौर करीब-करीब बराबरी का संबंध है। एक-दूसरे के यहां उठना-बैठना और खाना-पीना का खुला रिश्ता है। इसमें गांव के कुर्मी और वाल्मीकि भी शामिल हैं।

सामाजिक न्याय की वैचारिक चेतना 

गांववालों से बातचीत और उनके मनोभावों से लगा कि इस गांव के दलित-बहुजनों में सामाजिक न्याय की वैचारिक चेतना है। गांव के ब्राह्मणों के विचार, व्यवहार और आचरण के प्रति बहुजनों में तीखी घृणा है। बहुजन खुद को आंबेडकर-बुद्ध के विचारों से जोड़ते हैं। आज से करीब 25 साल पहले दलित-बहुजनों ने मिलकर गांव में आंबेडकर पार्क का निर्माण किया था। यहां कांशीराम और बामसेफ का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। कई सारे लोग खुद को मूलनिवासी के रूप में मानते हैं। 

राजनीतिक स्थिति 

किसी भी अन्य गांव की तरह इस गांव की राजनीति का केंद्र प्रधानी है, जो इस गांव में ब्राह्मणों और दलित-पिछड़ों के बीच संघर्ष और तनाव का एक बड़ी वजह है। जैसा कि अमूमन हिंदी पट्टी के अधिकांश गांवों में प्रधानी आरक्षण के प्रावधान से पहले सवर्ण जाति के पास रहती थी। यही स्थिति इस गांव की भी थी, लेकिन राजनीति जागरूकता के चलते इस गांव में दलित-बहुजनों ने बहुत पहले (करीब 20 वर्ष पहले) ही प्रधानी ब्राह्मणों से छीन ली। इस संघर्ष की अगुवाई इस गांव में रामऔतार वर्मा ने किया। वे दलितों और पिछड़ों को अपने साथ गोलबंद करके लगातार दो बार प्रधान बने। तब सामान्य सीट थी। हालांकि कुर्मी 4-5 घर ही हैं। लेकिन दलितों ने खुलकर उनका साथ दिया। उन्होंने भी दलितों से पूरी तरह एका कायम किया। न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर भी। गांव में कुर्मी ही आर्थिक-सामाजिक और शैक्षिक तौर पर इस स्थिति में थे कि ब्राह्मणों को चुनौती दे सकें। गांव में जो आंबेडकर समिति है, जिसने बुद्ध कथा का आयोजन किया, उसके अध्यक्ष पूर्व प्रधान रामऔतार वर्मा ही हैं।

लेकिन पिछले चुनाव में इस गांव की प्रधानी की सीट अनुसूचित जाति की महिला के लिए सुरक्षित हो गई थी। इस चुनाव में ब्राह्मणों ने एक कठपुतली प्रत्याशी (पासवान जाति की) को जिताने में सफलता प्राप्त की। ब्राह्मणों को चुनौती देने वाले प्रत्याशी (रामसागर पासवान) चुनाव हार गए। 

इस प्रकार इस गांव में कई अन्य गांवों की तरह दलित-पिछड़ों और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष और तनाव की एक बड़ी वजह प्रधानी का चुनाव भी रहा है। चूंकि दलित-बहुजनों ने मिलकर बहुत पहले (करीब 20 वर्ष पहले) ही ब्राह्मणों से प्रधानी छीन ली, जिसके चलते ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के बीच तनाव पैदा हुआ। 

पहेवा गांव की सांस्कृतिक स्थिति

पहेवा गांव में रामलीला, अखंड हरिकीर्तन, भागतवत कथा, यज्ञ और प्रवचन होते रहे हैं। इन सबकी अगुवाई ब्राह्मण करते थे। दलित-बहुजन इसमें चंदा देने और सेवा-टहल करने का काम करते थे। इसके अलावा वे मूक श्रोता के तौर पर शामिल होते थे। अभी भी कुछ लोग शामिल होते हैं।

लेकिन अब यह बीते समय की बात हो गई है। आंबेडकरवादी चेतना के फैलाव के चलते यह स्थिति बदल गई है। दलित-बहुजनों को लगने लगा कि रामलीला, हरिकीर्तन, भागवत कथा, यज्ञ और प्रवचन हमारे लिए नहीं है। हमारे लिए महत्वपूर्ण तो बुद्ध, कबीर, रैदास, आंबेडकर और संविधान आदि हैं। इसी चेतना के चलते करीब 25 वर्ष पहले गांव में आंबेडकर पार्क का निर्माण हुआ। इसके बाद 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती के अवसर गांव में बड़ा कार्यक्रम होने लगा। झांकियां निकाली जाने लगीं। आंबेडकर सदा से ब्राह्मणों-सवर्णों के लिए घृणा और नफरत के पात्र रहे हैं। आंबेडकरवादी चेतना, शिक्षा के प्रसार और आरक्षण ने गांव में दलितों को पहले से काफी मजबूत बनाया। वे गांव में ब्राह्मणों के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती देने लगे। उन्होंने खुद को ब्राह्मणों से दोयम दर्जे का मानने से इंकार कर दिया। सामाजिक-राजनीतिक समता के लिए दावेदारी करने लगे। हिंदी पट्टी के अन्य गांवों की तरह इस गांव के ब्राह्मण भी इसको मानने के लिए बिलकुल तैयार नहीं हैं।

बुद्ध कथा ब्राह्मणों को अपने धर्म-संस्कृति और वर्चस्व के लिए चुनौती लगी। जब पहली बार बुद्ध कथा हुई तो उन्होंने उसके बाद चेतावनी दिया था कि यदि फिर बुद्ध कथा हुई, तो गोलियां चलेंगीं और सचमुच में उन्होंने इस बार गोलियां चला दी। किसी सूरत में बुद्ध कथा न होने देने की अपनी जिद पूरी करने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने बुद्ध कथा आयोजन स्थल पर हमला बोल दिया।

पहेवा गांव में द्विज-सवर्ण के नाम पर सिर्फ ब्राह्मण हैं। गांव की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सत्ता (सभी सत्ताएं) उनके हाथ में रही हैं। बहुसंख्यक दलित-बहुजन आबादी उनकी हरवाहा-चरवाहा, सेवक और पऊनी-प्रजा रही है। दलित-बहुजन उनकी हरवाही-चरवाही छोड़ चुके हैं, पऊनी-प्रजा की मानसिकता से मुक्त होकर समता की दावेदारी करने वाले आंबेडकरवादी बन चुके हैं। हालांकि गांव की करीब दो-तिहाई जमीन पर मालिकाना के चलते उनकी आर्थिक सत्ता एक हद तक बनी हुई है, लेकिन सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और गांव की राजनीतिक सत्ता उनके हाथ से निकल रही है। अपनी खोती सत्ता को बनाए रखने के लिए वे तरह-तरह के जतन कर रहे हैं, बुद्ध कथा का आयोजन उनकी धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक सत्ता के लिए एक चुनौती बन रही थी। इस चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने पहले मौखिक तौर पर डराने-धमकाने का रास्ता चुना। जब इससे दलित-बहुजन नहीं डरे तो उन्होंने रायफल-बंदूक, बम और लोहे के रॉड का सहारा लिया। दो दलित-बहुजनों की जान लेने की कोशिश की। उनमें से एक अभी भी जीवन-मौत के बीच जूझ रहा है।

हिंदी पट्टी के अधिकांश गांवों की तरह पहेवा गांव में दलित-बहुजनों और सवर्णों (ब्राह्मणों) के बीच एक अघोषित युद्ध चल रहा है। सवर्ण अपने चौतरफा वर्चस्व को कायम रखने के लिए एड़ी-चोटी का दम लगा रहे हैं और दलित-बहुजन उन्हें चुनौती दे रहे हैं। दिल्ली और यूपी में आरएसएस-भाजपा की सत्ता ने सवर्णों को पहले से ज्यादा आक्रामक और मनबढ़ू बनाया है। पहेवा गांव की बुद्ध कथा पर हमला इस आक्रामकता और मनबढ़ू होने का एक और सबूत है। इसका सबसे पहला बड़ा सबूत (2017) में सहारनपुर के शब्बीरपुर का गांव में दिखा था। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद। वही सिलसिला आगे बढ़ कर पहेवा गांव तक आ पहुंचा है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सिद्धार्थ

डॉ. सिद्धार्थ लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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