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बिहार में सत्तापलट के बाद हाशिए पर उपेंद्र कुशवाहा

उपेंद्र कुशवाहा के कदम को इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा था कि बिहार में कुशवाहा जाति की आबादी 4.21 प्रतिशत है और उपेंद्र कुशवाहा की पहचान उनकी जाति के सर्वमान्य नेता के रूप में है। हालांकि भाजपा ने इसे जल्द ही भांप लिया और प्रदेश अध्यक्ष के पद पर सम्राट चौधरी को बिठा दिया

करीब 17 महीने बाद नीतीश कुमार ने एक बार फिर पाला बदलते हुए बीते 28 जनवरी, 2024 को नौवीं बार सरकार का गठन किया। इस बार उनका साझेदार भाजपानीत गठबंधन है। अब बदली हुई परिस्थिति में अनेक नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं। इनमें उपेंद्र कुशवाहा का नाम सबसे अहम है, जिन्होंने नीतीश कुमार से विद्रोह करते हुए जदयू को छोड़ा और फिर राष्ट्रीय लोक जनता दल के नाम से एक पृथक दल का गठन किया और एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए। 

उपेंद्र कुशवाहा के कदम को इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा था कि बिहार में कुशवाहा जाति की आबादी 4.21 प्रतिशत है और उपेंद्र कुशवाहा की पहचान उनकी जाति के सर्वमान्य नेता के रूप में है। हालांकि भाजपा ने इसे जल्द ही भांप लिया और प्रदेश अध्यक्ष के पद पर सम्राट चौधरी को बिठा दिया। दिलचस्प यह कि भाजपा ने अपने सांगठनिक ढांचे में फेरबदल तब किया जब उपेंद्र कुशवाहा उसकी शरण में जा चुके थे। 

जाहिर तौर पर इसके पीछे एक बड़ा कारण यह रहा कि उपेंद्र कुशवाहा आज भी अपनी राजनीति के केंद्र में दलित-बहुजनों को शामिल करते रहे हैं और इस कारण उनका झुकाव भाजपा की केंद्रीय विचारधारा से अलग रहा है।

हालांकि उपेंद्र कुशवाहा भाजपा के लिए वर्ष 2014 में तुरुप का पत्ता साबित हुए थे। उस साल हुए लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार अपने दम पर अकेले चुनाव लड़ रहे थे। उस चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा को भले ही केवल तीन सीटों पर जीत मिली थी, लेकिन उनके कारण पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में जो बिखराव हुआ, उसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा को कुल 22 सीटें मिली थीं। जबकि नीतीश कुमार की पार्टी को केवल दो सीटों पर जीत मिली थी। इस चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को भी करारी हार का सामना करना पड़ा था और उसके केवल 4 उम्मीदवार जीत सके थे।

उपेंद्र कुशवाहा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय लोक जनता दल

उपेंद्र कुशवाहा का राजनीतिक महत्व तब और चरम की ओर बढ़ा जब वे केंद्र सरकार में मंत्री शामिल किए गए। हालांकि उनका ओहदा राज्यमंत्री का था, लेकिन कुशवाहा बिहार की राजनीति में अपनी दखल बढ़ाते जा रहे थे। 

इसका कारण यह भी रहा कि वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने राजद के साथ मिलकर जीत हासिल की। इस विधानसभा चुनाव में रालोसपा जो कि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी थी, उसे केवल दो विधानसभा क्षेत्र में ही जीत मिल सकी और उसका फायदा भाजपा को भी नहीं मिल सका। उसे केवल 58 सीटों पर जीत मिली। लोकसभा चुनाव के एक साल के अंदर हुए विधानसभा चुनाव में राजद और जदयू ने वापसी करते हुए क्रमश: 80 और 71 सीटों पर जीत हासिल की। 

इस परिणाम के बाद भी उपेंद्र कुशवाहा केंद्र सरकार में बने रहे और नीतीश विरोधी अपनी राजनीति को धार देते रहे। लेकिन 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने नीतीश कुमार को ही महत्व दिया और उपेंद्र कुशवाहा विद्रोह करते हुए अपने दम पर चुनाव लड़े। इसका परिणाम यह हुआ कि स्वयं उपेंद्र कुशवाहा भी चुनाव हार गए और उनके दल को कहीं भी जीत नहीं मिली। हालांकि इस चुनाव में बेशक राजद को कोई सीट नहीं मिली लेकिन उसे 15.36 प्रतिशत मत मिले थे।

ये आंकड़े बताते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा भाजपा के लिए तभी महत्वपूर्ण होते हैं जब उनके साथ नीतीश कुमार नहीं होते। इसके अलावा भाजपा ने कुशवाहा मतदाताओं में अपनी पैठ बनाने के लिए सम्राट चौधरी को अपना नेता मान लिया है तो इसका मतलब साफ है कि उपेंद्र कुशवाहा अब उनके लिए पहले के जैसे महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं। यदि भाजपा चाहती तो उन्हें नई सरकार में शामिल कर उपमुख्यमंत्री बना सकती थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। भाजपा अपने कुशवाहा नेता सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाई। इसकी एक वजह नीतीश कुमार भी हो सकते हैं, जिनकी नजर में उपेंद्र कुशवाहा विश्वास के पात्र नहीं रहे हैं। 

बहरहाल, यह तो साफ है कि अब यदि भाजपा नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा दोनों को अपने साथ रखते हुए चुनाव में उतरेगी तो उसके समक्ष यह संकट अवश्य रहेगा कि वह उपेंद्र कुशवाहा को कितना महत्व दे। वहीं उपेंद्र कुशवाहा के लिए अपनी राजनीतिक साख को बचाने का संकट तो रहेगा ही।

(संपादन : राजन/अनिल)


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लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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