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विपक्ष का अयोध्या नहीं जाना संविधान और लोकतंत्र बचाने का कदम है

यह ब्राह्मणवादी जश्न है, जिसे सत्ता का वरदहस्त और बाज़ार की निर्बाध प्रवाहमान पूंजी का साथ मिला हुआ है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए यह परिघटना फासीवाद से भी अधिक भयावह है। बता रहे हैं भंवर मेघवंशी

आगामी 22 जनवरी, 2024 को अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद (विहिप), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तथा भाजपा की त्रयी द्वारा स्थापित रामजन्म भूमि न्यास द्वारा निर्मित राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का बहुत प्रचारित बहुचर्चित कार्यक्रम होने जा रहा है। जिस तरह से यह कार्यक्रम हो रहा है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि यह धार्मिक से ज़्यादा राजनीतिक कार्यक्रम है और इसे कुछ संगठन आयोजित कर रहे हैं, जिनके अपने स्वार्थ अंतर्निहित हैं।

इस प्राण प्रतिष्ठा समारोह में देश की विशाल हिंदू आबादी से महज़ कुछ हज़ार लोगों को आमंत्रित किया गया है। शेष हिंदू इस दिन अपनी-अपनी जगहों पर कार्यक्रम कर सकते हैं। वे मीडिया पर इस इवेंट को लाइव देख सकते हैं, परंतु अयोध्या में प्रवेश के पात्र नहीं हैं, क्योंकि वे अनामंत्रित हैं।

इस आयोजन का निमंत्रण विभिन्न राजनीतिक दलों, संगठनों और धार्मिक साधु-संतों सहित प्रवासी भारतीयों को भी भेजा गया है। आमंत्रित लोगों की सूची बनाने का मापदंड क्या रहा है, यह तो राम जन्मभूमि तीर्थ न्यास के चंपत राय अथवा उनके कोई अधिकृत प्रवक्ता ही बता सकते हैं, लेकिन जहां तक बात समझ में आती है, उससे यह क़यास लगाया जा सकता है कि या तो आप हिंदूवादी संगठनों के मुख्य कर्ता-धर्ता हों या आप धार्मिक पीठों के मुखिया हों अथवा आपने राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद के संघर्ष में प्रमुख भूमिका निभाई हो तभी आपको आमंत्रित किया जाएगा या फिर शायद राम मंदिर में सर्वाधिक दान देने वालों को भी बुलाया गया हो। लेकिन जिन्होंने पांच-दस लाख रुपए दान में दिया है, उनको तो याद भी नहीं किया गया है। शायद करोड़ या इससे अधिक दानदाता सूची में स्थान पाए हों या दान का कोई मामला ही न हो। इतना ज़रूर पता लगता है कि जो कारसेवक इस आंदोलन के दौरान मारे गये, उनके परिजन भी रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में बुलाए गए हैं।

यह बात समझ के परे हैं कि रामजन्म तीर्थ न्यास ने उन राजनीतिक दलों को क्यों आमंत्रण भेजा है, जिनका राम मंदिर के निर्माण में कोई योगदान नहीं रहा है या जो बाबरी मस्जिद को बचाने में अग्रणी रहे। यहां तक कि कारसेवा के दौरान जिनके शासन में क़ानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए गोलियां तक चलीं, जिनको हिंदुत्ववादी संगठन पानी पी-पी कर कोसते रहे, उनको निमंत्रण भेजना किस तरह की रणनीति है? यह आसानी से समझा जा सकता है कि जो प्रारंभ से ही विरोधी रहे हैं, वे क्यों अचानक साथ आ जाएंगे और भजन करने लगेंगे। दिनांक 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद के ध्वंस को जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र के लिए अशुभ माना, इसकी खुलकर आलोचना की, वे अब क्यों अयोध्या आएंगे और इस समारोह में शामिल होंगे? 

इंडिया गठबंधन के सभी नेताओं ने अयोध्या में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में जाने से इंकार किया है

यह एक समारोह का सवाल नहीं है। यह वैचारिकी का प्रश्न है। यह विचारधाराओं का खुला संघर्ष है, जिसमें आज भले ही हिंदुत्व की ताक़तें जीतती प्रतीत हो रही हों, लेकिन इसका आशय यह तो नहीं है कि दूसरी विचारधाराओं को हार मान लेनी चाहिए।

रामजन्म तीर्थ न्यास ने कांग्रेस, सपा, बसपा, बहुजन अघाड़ी, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टियों तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सहित विभिन्न राजनीतिक दलों को यह जानते हुए आमंत्रण भेजा है कि वे इस निमंत्रण को अस्वीकार करेंगे, क्योंकि स्वीकारने का तो सवाल ही नहीं उठता है, तो मना ही करेंगे। जब यह पता था फिर भी क्यों बुलावा भेजा? क्या यह कोई अंतरिक्ष विज्ञान है, जिसे समझना बेहद कठिन हो? सब समझते हैं कि जब विपक्षी राजनीतिक दल राम मंदिर में मूर्ति में तथाकथित प्राण-प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में नहीं जाएंगे तो भाजपा इसे मुद्दा बनाएगी और उनको हिंदू विरोधी प्रचारित करके हिंदू वोटों का जमकर दोहन करेगी। यह होने भी लगा है। जैसे ही कांग्रेस ने प्राण-प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकराया, भाजपा के भोंपू बज़ने लगे हैं कि कांग्रेस कितनी हिंदू विरोधी है और यहां तक कि राम विरोधी पार्टी बन चुकी है, जो उनके मंदिर के कार्यक्रम में नहीं जा रही है। प्रचार तो यहां तक किया जा रहा है कि मंदिर तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बन रहा है फिर उसके आदेश को ठुकराना क्या ठीक बात है? कोई इनसे यह पूछे कि सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी की तारीख़ तय करके इनको कहा था कि तमाम विपक्ष को ज़रूर बुलाया जाये?

वैसे जाने को तो चारों पीठों के शंकराचार्य भी नहीं जा रहे हैं। इनमें दो तो इतने नाराज़ हैं कि यहां तक कह रहे हैं कि यह पूरा आयोजन ही शास्त्र-सम्मत नहीं है। पहला तो मंदिर अभी निर्माणाधीन है और जब तक पूरा नहीं हो जाता, तब तक कैसी प्राण प्रतिष्ठा? कोई यह कह रहा है कि हिंदुओं की सर्वोच्च धार्मिक संस्था तो शंकराचार्य है, जब उनको ही नहीं पूछा तो फिर यह कैसा धार्मिक आयोजन है? किसी को इस बात पर आपत्ति है कि वैदिक ब्राह्मणों के अलावा कोई अन्य क्यों मूर्ति को स्पर्श करे। किसी ने कहा है जिन रामलला की मूर्तियों को लेकर यह पूरी लड़ाई लड़ी गई, उनके बजाय अन्य मूर्तियां क्यों स्थापित की जा रही हैं? 

मतलब यह है कि इस देश में केवल राजनीतिक प्रतिरोध ही नहीं है, बल्कि धार्मिक प्रतिरोध भी दर्ज हो रहा है, लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाय इसलिए मनुवादी मीडिया लगातार यह कह रही है कि विपक्ष ने अयोध्या नहीं जाकर आत्मघाती कदम उठाया है, अब हिंदू समाज इनको कभी माफ़ नहीं करेगा, रामद्रोही ख़त्म हो जाएंगे और अगला चुनाव ये बुरी तरह हारेंगे।

मैं इन दिनों राजस्थान के कुछ गांवों में घूम रहा हूं। जगह-जगह मंदिरों में विशेष पूजा-पाठ हो रहे हैं। शामियाने लगाए गए हैं और बहुत बड़े पैमाने पर राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित आयोजन आगामी 22 जनवरी के दिन होने हैं। आधे दिन का अवकाश और सूखा दिवस (शराब बिक्री पर रोक) पहले ही घोषित किए जा चुके हैं। सरकार के देव स्थान विभाग ने तमाम मंदिरों में रोशनी, सजावट और साफ़-सफ़ाई के लिए राज्याज्ञा जारी की हुई है। ऐसा लग रहा है कि राम वनवास से अब लौट रहे हैं। हर घर भगवा फहराया गया है जैसे यह भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की तिथि हो। इतना धर्ममयी वातावरण है कि अगर आप कुछ भी तर्क, विज्ञान, लोकतंत्र और सद्भाव की बात कर लें तो आप धर्मद्रोही, राष्ट्रद्रोही और रामद्रोही बताकर मॉब लिंचिंग के शिकार हो सकते हैं।

इस धार्मिक राजनीति के घटाटोप समय में विपक्षी दलों द्वारा राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में जाने का निमंत्रण अस्वीकार करना बहुत हिम्मत और दिलेरी भरा काम है। यह आत्मघात नहीं, बल्कि भारत के विचार को पुन: आत्मसात करने की दिशा में मज़बूती से उठाया गया कदम है। अगर कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल इस राजनीतिक धार्मिक आयोजन का हिस्सा बनने के लिए चले जाते तो यह भारत के विचार, संविधान और लोकतंत्र के साथ धोखा होता, क्योंकि यह आयोजन भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और संवैधानिक लोकतंत्र दोनों के लिए हितकर साबित नहीं होगा। इसके ज़रिए भारत को निर्णायक तौर पर हिंदू राष्ट्र की तरफ़ धकेला जा रहा है। यह ब्राह्मणवादी जश्न है, जिसे सत्ता का वरदहस्त और बाज़ार की निर्बाध प्रवाहमान पूंजी का साथ मिला हुआ है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए यह परिघटना फासीवाद से भी अधिक भयावह है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

भंवर मेघवंशी

भंवर मेघवंशी लेखक, पत्रकार और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में अपना सार्वजनिक जीवन शुरू किया था। आगे चलकर, उनकी आत्मकथा ‘मैं एक कारसेवक था’ सुर्ख़ियों में रही है। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद हाल में ‘आई कुड नॉट बी हिन्दू’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। संप्रति मेघवंशी ‘शून्यकाल डॉट कॉम’ के संपादक हैं।

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