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‘चपिया’ : मगही में स्त्री-विमर्श का बहुजन आख्यान (पहला भाग)

कवि गोपाल प्रसाद मतिया के हवाले से कहते हैं कि इंद्र और तमाम हिंदू देवी-देवता सामंतों के तलवार हैं, जिनसे ऊंची जातियों के लोग शूद्रों का सिर काटते हैं और शूद्र स्त्रियों को गुड़िया (एक तरह का खिलौना) समझते हैं। पढ़ें, इस समीक्षा का पहला भाग

पुस्तक समीक्षा

हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श अब अपरिचित विमर्श नहीं रह गया है। द्विज वर्ग का साहित्य भी अब इसे खुले तौर पर स्वीकार करता है। यही कारण है कि पिछले तीन-चार दशकों में स्त्री-विमर्शकार मुखर होकर सामने आए। हालांकि प्रधानता स्त्रियों की रहीं, बाजदफा उनके ऊपर सवाल भी उठाए गए कि वे समाज के एक खास तबके का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके अलावा कई पुरुष साहित्यकारोंने भी स्त्रियों के सवालों को लेकर लेखन किया। गोपाल प्रसाद इन्हीं साहित्यकारों में से हैं, जिन्होंने स्त्रियों के सवालों को अपने लेखन के केंद्र में रखा। वे मूलत: कवि हैं और खंडकाव्य के माध्यम से विमर्श को साकार करते हैं।

‘चपिया’ से पहले गोपाल प्रसाद का एक काव्यखंड ‘सूर्पणखा’ प्रकाशित हुआ। शिल्प के आधार पर उनका यह काव्यखंड तो उम्दा था ही, विषय भी अलहदा था। ‘रामायण’ की पात्र सूर्पणखा को केंद्र में रखकर लिखा गया उनका यह काव्यखंड राम के इशारे पर लक्ष्मण द्वारा बलात्कार किए जाने का उल्लेख तो करती ही है, रावण-राम के बीच हुए युद्ध के फलाफल की गहन समीक्षा भी करती है।

हाल में गोपाल प्रसाद की प्रकाशित कृति ‘चपिया’ (परिकल्पना प्रकाशन,दिल्ली) को इसी कड़ी में उनके द्वारा किया गया अनुपम प्रयास कहा जा सकता है। अंतर यह है कि ‘सूर्पणखा’ हिंदी में रचित थी तो ‘चपिया’ मगही में। मगही बिहार की एक लोकप्रिय बोली है। इसके बारे में कवि ने भाषाविद् ग्रियर्सन के हवाले से बताया है कि मगही झारखंड के चतरा, हजारीबाग, मानभूम, रांची और खरसांवा, ओड़िशा के मयूरभंज और बामड़ा, पश्चिम बंगाल के मालदा के पश्चिमी हिस्से के अलावा बिहार के पटना, नालंदा, गया, मुंगेर, भागलपुर, बेगुसराय, औरंगाबाद, नवादा, जहानाबाद, अरवल आदि जिलों में बोली जाती है। कवि यह भी बताते हैं कि मगही आज भी करीब दो करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जानेवाली बोली है।

‘चपिया’ काव्यखंड आठ सर्गों में रचित है। खास बात यह कि गोपाल प्रसाद मगही में राग आधारित काव्य-लेखन की लंबी परंपरा के अग्रवाहक हैं। इस काव्यखंड में उन्होंने एक और अनुपम प्रयास किया है कि मगही को मगही के शिल्प और शैली के रूप में लिखा है। कई बार ऐसा होता है कि लोग मगही में लिखते वक्त मगही की लय और उसके वास्तविक शिल्प को नजरअंदाज कर जाते हैं और नतीजे में जो सामने आता है, वह न तो हिंदी का होता है और न ही मगही का। लेकिन इस दोष से यह काव्यखंड मुक्त है। कवि काव्यखंड के प्रारंभ में ही लिखते हैं–

मां-बाबूजी के चरण् धूरि चढ़ाके माथ
चलली चपिया के लिखे कलम उठैली हाथ।
देवनागरी वर्ण, लिपि, उच्चारण आधार
मगही बोली होयतन भाषा के सिंगार।
आगे जाये के कबल् समझूं गीत विधान
क, ख, मगही व्याकरण एकर करत बखान।[1]

कवि गोपाल प्रसाद व उनके द्वारा रचित काव्यखंड ‘चपिया’ का मुखपृष्ठ

अपने काव्यखंड को अपने माता-पिता को समर्पित करते हुए कवि गोपाल प्रसाद मगही भाषा के संदर्भ में इसके महत्व के बारे में बताते हैं। यह उनकी कविताओं में आगे नजर भी आता है। मसलन, इसके पहले सर्ग के बारे में कवि ने स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया है कि इसकी शैली छंद-मांत्रिक है और इसकी तर्ज लोकगीत पचरा है। दरअसल, यह तर्ज बिहार के मगही और भोजपुरी के इलाके में देवी की स्तुति के लिए किया जाता है। लेकिन ‘चपिया’ में कवि ने इसका इस्तेमाल एकदम इसके उलट किया है। कवि ने चपिया नामक एक नवयौवना की कल्पना की है, जो एक खेतिहर मजदूर परिवार में जन्मी है और शूद्र है। एक दिन वह अपनी मां मतिया को उदास देखती है। कवि ने चपिया के हवाले से लिखा है–

कीया तोरा बाबूजी गे
देलन् मैया गऽरिऽया
किऽ कहलन् बऽतिऽया
पूछे हाली-हाली चऽपिऽया
किऽ कहलन् बऽतिऽया।[2]

जो मगही नहीं समझते, वे भी इस गद्य को आसानी से समझ सकते हैं। हालांकि इसके उच्चारण में उन्हें समस्या हो सकती है और शायद यही वजह है कि कवि ने सुर की मात्रा को भी अपनी कविता में शामिल किया है। उपरोक्त पद्यांश में चपिया अपनी मां से पूछती है कि वह उदास क्यों है, क्या उसके पिता ने उसे गाली दी है या कोई दुखभरी बात कही है। जवाब में उसकी मां कहती है–

नऽ ही तोहर् बाबूजी गे
देलन् बेटी गऽरिऽया
नऽ कहलन् बऽतिऽया
सुनगे, सुनगे बेटी चऽपिऽया
न कहलन् बऽतिऽया।[3]

मां और बेटी के बीच इस संवाद को कवि ने अत्यंत ही खूबसूरत पंक्तियों में बयां किया है। कवि बताते हैं कि मतिया अपनी बेटी से कहती है कि उसके पिता ने न तो उसे कोई गाली दी है और न ही कोई दुख वाली बात कही है। “फिर वह उदास क्यों है”, चपिया उससे दुबारा पूछती है। उसकी मां मतिया कहती है–

अगहन् दिन नऽ उपजे बेटी
हमनी के ओहऽरिऽया
ठाकुऽरे कोठिऽया
तीसी फूले बनके मोतिऽया
ठाकुऽरे कोठिऽया।[4]

मतिया कह रही है कि अगहन के दिनों का उसे कोई लाभ नहीं मिलता, क्योंकि उसके पास अपना खेत नहीं है। वहीं ठाकुर, जिसके पास खेत है, उसकी कोठी में तीसी के फूल मोती के समान चमक रहे हैं। बताते चलें कि तीसी से तेल की प्राप्ति होती है, जिसे पूर्व में गरीब भूमिहीन खाने के तेल के रूप में इस्तेमाल करते थे और संपन्न भू-स्वामियों के यहां तीसी के तेल से रोशनी होती थी। मतिया यहीं नहीं रूकती। वह आगे कहती है–

पूजा करते विनती करते
बीतल मोर् उमऽरिऽया
नऽ तन् पर सऽड़िऽया
भूखे सूखल् मोर अंतऽड़िऽया
नऽ तन् पर सऽड़िऽया।[5]

भूमिहीन खेतिहर मजदूर और शूद्र परिवार की एक महिला सदस्य की यह व्यथा गाथा है, जिसे कवि गोपाल प्रसाद ने गीत के लहजे में लिखा है और इसे सस्वर गाया जा सकता है। इस अंश में मतिया कह रही है कि देवी-देवताओं की पूजा करते-करते और सामंतों से विनती करते-करते उसकी उम्र बीत चुकी है, लेकिन इसके बावजूद उसके शरीर पर साड़ी नहीं है और भूख के कारण अब उसकी अंतड़ियां सूख गई हैं। इसके बाद कवि मतिया की विद्रोही चेतना को प्रकट करते हैं–

इन्दर, फिन्दर, देवी, फेवी
ढलवा हे तरुअऽरिऽया
काटेला मुऽड़िऽया
हमनी के समझी के गुऽड़िऽया
काटेला मुऽड़िऽया।[6]

कवि मतिया के हवाले से कहते हैं कि इंद्र और तमाम हिंदू देवी-देवता सामंतों के तलवार हैं, जिनसे ऊंची जातियों के लोग शूद्रों का सिर काटते हैं और शूद्र स्त्रियों को गुड़िया (एक तरह का खिलौना) समझते हैं। पहले सर्ग में एक शूद्र परिवार की महिला की पीड़ा और आक्रोश की अभिव्यक्ति तो लाजवाब है ही, इसके आगे के सर्ग भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। दूसरे सर्ग का राग पूरबी है। इस सर्ग में चपिया साग खोटने (चना आदि के) जाने को तैयार है। उसकी मां मतिया उसे समझाती है कि सामंत अपने खेत में साग नहीं खोटने देते हैं और बदमाशी करते हैं। साग खोटते समय चपिया यह विचार करती है कि बधार (चौर) में वह अकेली है, अगर खेत का मालिक (कवि ने उसे दुर्जन की संज्ञा दी है) आ गया और उसने कोई बदमाशी की तो वह कैसे बचेगी। उसकी जेहन में देवी-देवता भी आते हैं, लेकिन तभी उसे अपनी मां की बात याद आती है–

राम, गॉड, अल्ला सबके
अलगे मकनवां हे
दुकनवां अलगे
अलगे व्यपार्।[7]

यहां कवि चपिया से कहलवाते हैं कि ईश्वर चाहे वह किसी धर्म से जुड़े हों, सभी के अपने मकान (मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर) हैं और यही मकान उन्हें माननेवाले लोगों की दुकान है तथा वे धर्म के नाम पर व्यापार करते हैं।

फिर वह हौसला करती है–

दुरजन के देखब हमहूं
देबई जवबवा हम कि
मांगत हमसे
जिनगी उधार्।[8]

साग खोटती हुए एक शूद्र परिवार में जन्मी एक नवयौवना केवल साग नहीं खोट रही है। कवि गोपाल प्रसाद ने उसे केंद्र में रखकर स्त्री-विमर्श काे नई ऊंचाई दी है।

बोले टिकधारी पंडित्
जतिया बनैलन हे
पितामह ब्रह्मा
करऽतबऽ विचार्।

और यह भी–

गैर पार्थिव प्रोटीन से
जीव लैब में सृजे-
वैज्ञानिक। गेल
हिली संसार।[9]

निस्संदेह कवि की कल्पना चपिया आधुनिक समय की है, जिसने शिक्षा हासिल की है। वह आत्मा-परमात्मा, जन्म-पुनर्जन्म काे ब्राह्मण वर्ग का खेल समझती है–

परमात्मा आत्मा पर जब
उठतै सवालिया तब
सिरिस्टी हो जा-
यत/ तार-तार।[10]

वह कहती है कि जब शूद्र समाज के लोग पढ़ने-लिखने लगे हैं तब ब्राह्मणों को डर लगने लगा है कि आत्मा और परमात्मा पर सवाल उठने लगेंगे तब सृष्टि तार-तार हो जाएगी। चपिया ब्राह्मण वर्ग के इस डर को इस तरह अभिव्यक्त करती है–

डर काहे गेलन पंडित्
फादर व मुल्ला सब्
कहां छिप गेलन्
बनके सियार्।[11]

कवि कबीर की माफिक पाखंड को खारिज करते हैं। कथानक के लिहाज से तीसरा सर्ग महत्वपूर्ण है, जिसकी शैली छंद वर्णिक है और राग चौहट् है। वर्णिक छंद का उपयोग हिंदी काव्य में भी हुआ है और सामान्य तौर पर इसका उपयोग सवाल-जवाब के रूप में किया जाता है। बिहार का प्रसिद्ध जट-जटिन लोकगीत इसी शैली में रचित है और इसका राग भी चौहट् जैसा ही है। इस सर्ग में कवि बताते हैं कि चपिया साग खोंट रही है और सामंत दुर्जन आ जाता है। वह चपिया से पूछता है–

केकरी तू बेटी पूतोहिया ऐ गे गोरी
केकरी तू पतरी तिऽरिऽयवा ऐ गोरी।[12]

दुर्जन उससे पूछ रहा है कि तुम किसकी बेटी या किसकी पतोहू हो या किसकी पत्नी हो। यहां ‘पतरी’ शब्द का उपयोग छरहरी बदन के अर्थ में किया गया है। दुर्जन चपिया पर बुरी नजर डालता है और प्रशंसा के शब्दों में कहता है कि उसे (चपिया) देखकर सूरज भी लजा गया है और बादलों में अपना मुंह छिपा लिया है।

देख तोरा सूरजऽ लऽजैलनऽ ऐ गे गोरी
बदऽरा में मुंहवां छिऽपैलनऽ ऐ गे गोरी।[13]

लेकिन चपिया भांप जाती है कि ऊंची जाति के भूस्वामी के मन में क्या है–

अंचरा झऽटऽक बोले चऽपिऽया दुऽरऽजऽन!
बूझ ना तू निऽरबऽल जऽतिया दुऽरऽजऽन![14]

इसका मतलब यह है कि आंचल झटक कर चपिया दुर्जन से कहती है कि वह उसे निर्बल जाति का नहीं समझे। यहां यह उल्लेखनीय है कि साग खोंटते समय महिलाएं साग को अपने आंचल में रखती जाती हैं। यहां कवि बता रहे हैं कि जैसे ही चपिया ने सामंत को देखा, उसने खतरे को भांपा और साग को फेंक दिया। हालांकि इसके आगे के छंद में कवि विषयांतर हो जाते हैं और बेवजह ही भैंसासुर को बुराई का प्रतीक बता देते हैं। जबकि मूलनिवासियों की संस्कृति में अब भी भैंसासुर (महिषासुर) को रक्षक माना गया है। मुमकिन है कि कवि सांस्कृतिक प्रतिरोध के इस प्रतीक को महत्व नहीं देना चाहते हों या फिर उनके ऊपर ब्राह्मणवाद का असर अब भी हो। वे लिखते हैं–

हे तू भैंसासुर, दुरगा हऽमहूं दुऽरऽजऽन
सत्य एही, आजमा ले कऽबहूं दुऽरऽजऽन।[15]

इस पद में चपिया दुर्जन से कह रही है कि वह स्वयं दुर्गा है और दुर्जन भैंसासुर। अगर उसे यकीन न हो तो मुकाबला करे। कवि की कल्पना यहां कमजोर पड़ने लगती है जब इतना कहने के बाद वह दुर्जन को कहती है–

मऽतिया के बेटिया ही चऽपिया दुऽरऽजऽन
तोर दुनो बऽहिनी हे सऽखिया दुऽरऽजऽन।[16]

इस छंद में चपिया अपना परिचय मतिया की बेटी के रूप में देती है। यह भी कम दिलचस्प नहीं है। वजह यह कि आम तौर पर महिलाएं या तो अपने पिता, भाई या पति का नाम लेती हैं, लेकिन चपिया अपनी मां का नाम लेती है। लेकिन यह समझ में नहीं आता है कि कवि ने किस भाव से उसे ऐसे दिखाया है, जैसे वह दुर्जन के सामने निर्बल है और दुहाई दे रही है कि उसकी (दुर्जन की) दोनों बहनें उसकी सखिया हैं। कवि उसके मुंह से यह भी कहलवाते हैं कि दुर्जन, तुम गांव के रिश्ते के हिसाब से बड़े भाई लगते हो, मुझे घर जाने दो, मां मेरा इंतजार कर रही होगी।

लऽगबे तू गांव जेठऽ भऽइऽया दुऽरऽजऽन
रऽहिया देखत होई मऽइया दुऽरऽजऽन।[17]

क्रमश: जारी

संदर्भ –

[1] गोपाल प्रसाद, चपिया, परिकल्पना प्रकाशन, दिल्ली, 2023, आरंभिक पृष्ठ
[2] वही, पृष्ठ 24
[3] वही
[4] वही, पृष्ठ 25
[5] वही, पृष्ठ 26
[6] वही, पृष्ठ 27
[7] वही, पृष्ठ 30
[8] वही, पृष्ठ 32
[9] वही, पृष्ठ 33
[10] वही
[11] वही, पृष्ठ 34
[12] वही, पृष्ठ 37
[13] वही, पृष्ठ 37
[14] वही
[15] वही, पृष्ठ 38
[16] वही
[17] वही

(संपादन : राजन/अनिल)


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लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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