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महाराष्ट्र को चाहिए ‘कर्पूरी ठाकुर’

आज महाराष्ट्र फुले-शाहू-आंबेडकर की भूमि नहीं रह गई है। मौजूदा एकनाथ शिंदे सरकार ओबीसी का आरक्षण लूटकर नष्ट करने के लिए निकली है। ऐसे समय में, महाराष्ट्र को एक नया कर्पूरी ठाकुर चाहिए। बता रहे हैं प्रो. श्रावण देवरे

उत्तर भारत में सामाजिक न्याय का आंदोलन मुखर रहा है। लेकिन एक शख्सियत जिन्होंने आगे बढ़कर इसे साकार किया, वे जननायक कर्पूरी ठाकुर थे। बहुत कम आबादी वाली नाई (नाभिक) जाति में जन्मे कर्पूरी ठाकुर सचमुच जननायक थे। वे उन दलित-ओबीसी लोगों के मसीहा थे, जिनका शोषण उत्पीड़न बिहार में चरम पर था। तब वहां ब्राह्मण-क्षत्रिय जमींदार जातियों के सशस्त्र डकैतों की हथियारबंद सेनाएं होती थीं। 

कर्पूरी ठाकुर आठ वर्षों तक विपक्षी दल के नेता, एक बार उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहे और अब उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ का सम्मान दिया गया है, इससे भी उनकी लोकप्रियता व उनके विचारों की प्रासंगिकता समझी जा सकती है।

आज की युवा पीढ़ी को जानना चाहिए कि कर्पूरी ठाकुर ने क्या किया। वैसे यह भी बताने की जरूरत है कि आज का महाराष्ट्र फुले-शाहू-आंबेडकर का महाराष्ट्र नहीं रह गया है, बल्कि सत्तर के दशक के बिहार की तरह हिंसक, विध्वंसक और हत्यारे जमींदारों-सामंतवादियों का महाराष्ट्र बन गया है। 

अगर हमें महाराष्ट्र को ब्राह्मणों-क्षत्रियों-मराठों के चंगुल से मुक्त कराना है तो हमें जननायक कर्पूरी ठाकुर के रास्ते पर ही जाना होगा! इसीलिए यह कहना अतिरेक नहीं है कि “महाराष्ट्र को आज एक नए कर्पूरी ठाकुर की जरूरत है।”

बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री जननायक भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर

कुछ अतीत पर निगाह डालते हैं। उत्तर भारत में त्यागमूर्ति आर.एल. चंदापुरी और महामना रामस्वरूप वर्मा और शहीद बाबू जगदेव प्रसाद आदि नेताओं ने 1960 के दशकों में दलित-ओबीसी आंदोलन खड़ा किया। इस आंदोलन से ललई सिंह यादव, कर्पूरी ठाकुर, रामनरेश यादव, अनुपलाल मंडल, बी.पी. मंडल, दारोगा प्रसाद राय, राम अवधेश सिंह, राम विलास पासवान, भोला पासवान शास्त्री जैसे अनेक सामाजिक-राजनीतिक नेता और विचारक दलित-ओबीसी जातियों से उभरे। उस समय ओबीसी आंदोलन बढ़ता ही जा रहा था। स्वाभाविक रूप से उसका असर कांग्रेस पार्टी पर होना ही था जो उस समय देश की प्रमुख सत्ताधारी पार्टी थी। 

उत्तर भारत के राज्यों में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार 1967 में बिहार में बनी, जिसमें कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री बने और मुख्यमंत्री थे महामाया प्रसाद सिन्हा। बाद में कर्पूरी ठाकुर 1970 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। 1968 के पहले तक कांग्रेस ब्राह्मण-भूमिहार और ठाकुर-राजपूत जाति से ही मुख्यमंत्री बना रही थी। लेकिन दलित-ओबीसी राजनीतिक उभार के करण उसे भोला पासवान शास्त्री को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। वे पहली बार 100 दिनों (22 मार्च, 1968 – 29 जून, 1968) और दूसरी बार 13 दिनों तक (22 जून, 1969 से लेकर 4 जुलाई, 1969) मुख्यमंत्री रहे।

महाराष्ट्र के चंद्रपुर में मराठाओं को ओबीसी आरक्षण देने संबंधी राज्य सरकार के फैसले के विरोध में रैली में शामिल जनसमूह

लेकिन 1970 में कांग्रेस ने पहली बार दारोगा प्रसाद राय के रूप में बिहार में एक ओबीसी मुख्यमंत्री दिया। यह ओबीसी आंदोलन के दबाव के कारण ही हुआ। 

यह मत समझिए कि कांग्रेस ने ओबीसी समुदाय का भला करने के लिए एक ओबीसी नेता को मुख्यमंत्री का पद दिया था। यह तुरंत साबित भी हो गया कि ओबीसी मुख्यमंत्री ओबीसी आंदोलन को दबाने और नष्ट करने के लिए बनाया गया था। मुख्यमंत्री बनने के बाद दारोगा प्रसाद राय ने दलित विधायक मुंगेरीलाल (पासवान) की अध्यक्षता में ओबीसी आयोग की नियुक्ति की। इस ओबीसी आयोग ने ओबीसी जातियों के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की। यह महसूस करते हुए कि दारोगा प्रसाद राय ओबीसी आंदोलन को नष्ट करने के बजाय ओबीसी आरक्षण लागू कर रहे हैं, यह ध्यान में आते ही कांग्रेस के ब्राह्मण-क्षत्रिय-जमींदार जाति के विधायकों ने दारोगा प्रसाद की सरकार को गिरा दिया। वे केवल 310 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे। 

निस्संदेह इस उच्च-जातीय पार्टी द्रोह को तत्कालीन कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी का समर्थन प्राप्त था। ऐसे मामले गुजरात और महाराष्ट्र में भी सामने आए। 

खैर बात करते हैं कर्पूरी ठाकुर और उनके योगदानों की। कहना अतिरेक नहीं कि ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ वाक्यांश ओबीसी आरक्षण को बदनाम और उपहास करने के लिए ही गढ़ा गया था। ऊंची जातियों के लेखकों ने इस पर कथा-कहानिहां लिखीं और फिर टीवी सीरियल भी बना दिया गया। आपातकाल के दौरान, इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन में तत्कालीन राज्य-स्तरीय ओबीसी नेता राष्ट्रीय नेता के रूप में सामने आए। आपातकाल विरोधी आंदोलन सफल होने का एकमात्र कारण यह था कि इन ओबीसी नेताओं ने जयप्रकाश के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ के नारे के साथ अंत तक लड़ाई लड़ी। 

आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय नेताओं में कर्पूरी ठाकुर का एक बड़ा नाम सामने आया। 1977 में लोकसभा सदस्य बनने के कुछ ही महीनों बाद कई अन्य राज्यों के साथ बिहार विधान सभा के चुनाव हुए। मुख्यमंत्री पद के लिए कर्पूरी ठाकुर के नाम पर जोर दिया जाने लगा। वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। उस समय विधायक देवेंद्र प्रसाद यादव ने अपनी सीट से इस्तीफा देकर कर्पूरी ठाकुर के लिए सीट खाली कर दी थी। इस उपचुनाव में कर्पूरी ठाकुर 65 हजार मतों के अंतर से निर्वाचित हुए।

दूसरी बार मुख्यमंत्री बनते ही जननायक कर्पूरी ठाकुर ने मुंगेरीलाल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू किया। जिसे ऊंची जातियों के लोग ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ कहकर मजाक उड़ाते थे, उसे कर्पूरी ठाकुर ने सच कर दिखाया। जिस पद्धति से यह आरक्षण लागू किया गया उसे ‘कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला’ के नाम से जाना जाता है। 

हालांकि जयप्रकाश नारायण समाजवादी थे, लेकिन वे आम तौर पर सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण के विरोधी थे। उनका स्पष्ट मत था कि आरक्षण केवल आर्थिक आधार पर ही दिया जाना चाहिए। लेकिन डॉ. राममनोहर लोहिया और त्यागमूर्ति चंदापुरी के गठबंधन और शहीद बाबू जगदेव प्रसाद के आक्रामक आंदोलन के माध्यम से जो ओबीसी आंदोलन तेजी से बढ़ता जा रहा था और उसकी धार अनुपलाल मंडल, राम अवधेश सिंह, कर्पूरी ठाकुर जैसे अनेक ओबीसी नेता लगातार तेज कर रहे थे। 

इन ओबीसी नेताओं के दबाव के कारण ओबीसी के हितों के खिलाफ बोलने की हिम्मत किसी की नहीं हुई। यह लोहिया के उस नारे का प्रभाव था, जिसमें उन्होंने कहा था कि “संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ!”। 1960 के दशक में उनके इस नारे ने भारी हलचल पैदा कर दी थी। यह उत्तर भारत में समाजवादी ओबीसी नेताओं के लिए एक बड़ी नैतिक ताकत थी।

इसी नैतिक बल पर 1977 में जननायक कर्पूरी ठाकुर ने दूसरी बार मुख्यमंत्री बनते ही मुंगेरीलाल आयोग की अनुशंसा के अनुरूप 26 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का साहस किया। लेकिन एक जमीनी नेता होने के नाते, कर्पूरी ठाकुर व्यावहारिक कठिनाइयों से अवगत थे। वे पूरी तरह से जानते थे कि दलित+आदिवासी आरक्षण को अनिच्छा से स्वीकार करने वाले ब्राह्मण-क्षत्रिय जमींदार ओबीसी के आरक्षण का पुरजोर विरोध करेंगे और उनकी सरकार को उखाड़ फेंकने से भी नहीं चूकेंगे। इसलिए उन्होंने इसमें से कोई बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की। इस मध्य मार्ग को ही “कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला” कहा जाता है।

दरअसल उन्होंने मुंगेरीलाल आयोग की सिफ़ारिशों में ओबीसी के 26 प्रतिशत आरक्षण में से छह प्रतिशत (3 प्रतिशत सभी वर्गों की महिलाओं और 3 प्रतिशत गरीब सवर्णों के लिए) आरक्षण निकालकर ब्राह्मण-क्षत्रिय जमींदार जातियों को दे दिया गया। ओबीसी को दो भागों – अति पिछड़ा वर्ग को 12 प्रतिशत और पिछड़ा वर्ग को 8 प्रतिशत – आरक्षण दिया गया। 

तीन प्रतिशत प्रत्यक्ष और तीन प्रतिशत परोक्ष आरक्षण के बावजूद उच्च जातियों के लोगों ने कर्पूरी ठाकुर के इस फार्मूले का न केवल विरोध किया, बल्कि उन्हें सार्वजनिक रूप से गालियां भी दी गईं। परिणाम यह हुआ कि कर्पूरी ठाकुर का विरोध उनके अपने ही मंत्रिमंडल के सहयोगियों और विधायकों ने किया। उनसे समर्थन वापस ले लिया गया और दलित समुदाय के रामसुंदर दास का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया गया। ओबीसी के हितों के लिहाज से उनकी प्रतिबद्धता अपेक्षित थी, लेकिन उन्होंने इस बहुसंख्यक समाज को निराश ही किया।

खैर, आरक्षण लागू होने के बाद ऊंची जाति ब्राह्मण-क्षत्रिय जमींदार जातियों की ओर से कर्पूरी ठाकुर को बेहद भद्दी-भद्दी गालियां दी गईं। मंडल कमीशन लागू करने के बाद वी.पी. सिंह को भी ऐसे ही अपशब्द सुनने पड़े थे। 

कर्पूरी ठाकुर का फॉर्मूला सिर्फ आरक्षण तक ही सीमित नहीं था। इसका दायरा बहुत बड़ा था। जब भी कोई जागृत ओबीसी सत्ता की कुर्सी पर बैठता है, तो वह समाज की सभी शोषित पीड़ित जातियों के उद्धार के लिए सत्ता का संचालन करता है। ऐसे क्रांतिकारी मुख्यमंत्री अगर देश के हर राज्य से मिले तो निस्संदेह बदलाव आएगा। आज महाराष्ट्र को ऐसे ही मुख्यमंत्री की जरूरत है, क्योंकि आज महाराष्ट्र फुले-शाहू-आंबेडकर की भूमि नहीं रह गई है। मौजूदा एकनाथ शिंदे सरकार ओबीसी का आरक्षण लूटकर नष्ट करने के लिए निकली है। ऐसे समय में, महाराष्ट्र को एक नया कर्पूरी ठाकुर चाहिए।

कल्याण राव दले, सामाजिक कार्यकर्ता, महाराष्ट्र

उदाहरण के लिए कल्याण राव दळे महाराष्ट्र में अति पिछड़ी जातियों को संगठित करने और उन्हें जागृत कर समाज की मुख्यधारा में लाने का काम कर रहे हैं। एक गरीब नाई परिवार में जन्मे कल्याण दले का सामाजिक 1982-83 में तब शुरू हुआ उन्होंने अपनी जाति ‘नाई’ का संगठन बनाया। इस संगठन को आगे विस्तार देते हुए उन्होंने बारा बलूतेदार महासंघ का निर्माण किया और अब यह संगठन पूरे राज्य में सक्रिय है, जो तमाम अत्यंत पिछड़ी जातियों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक अधिकारों के लिए प्रयत्न कर रही है। इसके अलावा इनका संगठन अत्यंत पिछड़ी जातियों के लोगों की राजनीति में हिस्सेदारी बढ़ाने का अभियान चला रही है और बड़ी संख्या में लोग जुड़ते जा रहे हैं। 

कहना अतिरेक नहीं कि यदि इन्हें मौका मिला तो ये भी कर्पूरी ठाकुर के माफिक ओबीसी के हितों को आगे बढ़ाएंगे। 

(मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रभान पाल, संपादन : राजन/नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

श्रावण देवरे

अपने कॉलेज के दिनों में 1978 से प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े श्रावण देवरे 1982 में मंडल कमीशन के आंदोलन में सक्रिय हुए। वे महाराष्ट्र ओबीसी संगठन उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए। उन्होंने 1999 में ओबीसी कर्मचारियों और अधिकारियों का ओबीसी सेवा संघ का गठन किया तथा इस संगठन के संस्थापक सदस्य और महासचिव रहे। ओबीसी के विविध मुद्दों पर अब तक 15 किताबें प्राकशित है।

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