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आंकड़ों में बिहार के पसमांदा (पहला भाग, संदर्भ : नौकरी, शिक्षा, खेती और स्वरोजगार )

बीते दिनों दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज की एक रिपोर्ट ‘बिहार जाति गणना 2022-23 और पसमांदा एजेंडा’ पूर्व राज्यसभा सांसद व महाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष अली अनवर द्वारा जारी किया गया। पढ़ें, इस रिपोर्ट में उल्लिखित आंकड़ों पर आधारित आलेख शृंखला का पहला भाग

इस्लाम में जातिगत भेदभाव की बात नहीं कही जाती है। लेकिन भारत में स्थिति अलग है, इस्लाम धर्मावलंबियों में जातिगत भेदभाव पाया जाता है। सामान्य तौर पर इनमें तीन तरह के वर्गीकरण हैं– अशराफ, अजलाफ और अरजाल। हालांकि सरकार के स्तर पर यह वर्गीकरण आधिकारिक नहीं है। इसके बावजूद मुस्लिम समाज के विभिन्न तबकों के बीच सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्तर पर अंतर को देखा जा सकता है। यह संभव हो पाया है बिहार सरकार द्वारा कराए गए जाति आधारित गणना के कारण। इस रपट के आंकड़ों में पसमांदा समाज की स्थिति की तलाश ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता जावेद अनवर ने की है, जो कि ‘बिहार जाति गणना 2022-23 और पसमांदा एजेंडा’ का हिस्सा है। 

मुस्लिम जातियां एक नजर में

क्रमजातिआबादीमुस्लिम आबादी में हिस्सेदारीबिहार की कुल आबादी में हिस्सेदारी
पठान 986665 4.38%0.75%
शेख 4995897 22.18%3.82%
सैयद 297975 1.32%0.22%
अशराफ (कुल)628053727.47%4.80%

एनेक्सर -I (अत्यंत पिछड़ा वर्ग ) पसमांदा
इदरीसी या दर्जी 329661 10440.25
ईटफरोश / गदेहडी    9462 0.040.007
कसाब (कसाई )1338070.580.10
7कुल्हैया 12537815.480.95
8चीक 504040.220.03
9चुड़िहार 2079140.900.15
10ठकुराई 1474820.640.11
11 तेली   ---
12डफाली 732590.320.05
13धुनिया18681928.171.42
14धोबी 4097961.790.31
15नट 616290.270.04
16पमरिया 648900.280.04
17बक्खो 368300.160.02
18भठियारा272630.120.02
19भाट 890520.390.06
20 मदारी 116200.050.008
21 मुकेरी565220.250.04
22 मिरियासिन 154150.060.01
23 हलालखोर, भंगी, लालबेगी 699140.300.05
24 जुलाहा / अंसारी 463424520.273.54
25 मीरशिकार666070.290.05
26 राईन, कुंजरा 18285847.801.39
2 7 रंगरेज 433470.190.03
28 शेरशाहबादी 13026445.700.99
29 साई / फकीर 6631972.900.50
30 सैकलगर/ सिकलगर 189360.080.01
31 सेखड़ा 2489481.081.19

एनेक्सर -II (पिछड़ा वर्ग ) पसमांदा
32 गद्दी 576170.250.04
33 नालबंद) 119000.050.009
34 कलाल / एराकी ( मुस्लिम )---
35 जट )449490.190.03
36 मड़रिया 86658 0.370.06
37 सुरजापुरी244621210.701.87
38 मलिक 1116550.480.08
पसमांदा1648239272.5212.61
कुल मुस्लिम जातियों के आबादी का योग2276292910017.48

1 . तेली जाति की गणना के अंतर्गत हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मावलम्बियों की गिनती हुई है।

2 .कलाल / एराकी ( मुस्लिम ) की अलग से गिनती नहीं हुई है।उनकी गिनती बनिया जाति (हिंदू-मुस्लिम) के अंतर्गत हुई है। 

3 . कुछ पसमांदा जातियों की गिनती नहीं हुई है।   

4.  कलवार (कलाल /एराकी ) की बनिया जाति के अंतर्गत और   तेली जाति में हिंदू और मुस्लिम की एक साथ गणना हुई है। अतः अनुपलब्धता के चलते   कुल मुस्लिम जातियों के योग में इन दो जातियों की संख्या सम्मिलित नहीं है।   फलस्वरूप मुस्लिम जातियों के आबादी का योग कुल मुस्लिम आबादी से कम है।

स्रोत:  बिहार जाति आधारित गणना – 2022-23 , बिहार सरकार। 

अब पहले पेशागत स्थिति पर विचार करते हैं। जावेद अनवर अपने अध्ययन में यह पाते हैं कि बिहार सरकार की नौकरियों में हालांकि समेकित रूप से मुसलमानों की हिस्सेदारी हिंदुओं की तुलना में बहुत कम है। 

वर्गसरकारी नौकरीपेशा वालों की कुल संख्याकुल आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी
सामान्य वर्ग हिंदू5839384.22 प्रतिशत
सामान्य वर्ग मुस्लिम573430.91 प्रतिशत
पिछड़ा वर्ग मुस्लिम1161300.70 प्रतिशत

बिहार में पिछड़ा वर्ग को परिशिष्ट एक और परिशिष्ट दो में रखा गया है। पसमांदा समाज की जातियां इन दोनों परिशिष्टों में शामिल हैं। इस हिसाब से देखें–

वर्गसरकारी नौकरीपेशा वालों की कुल संख्याकुल आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी
परिशिष्ट एक (अति पिछड़ी मुस्लिम जातियां)975730.71 प्रतिशत
परिशिष्ट दो (पिछड़ी मुस्लिम जातियां)185570.61 प्रतिशत
80.3 फीसदी पसमांदा आबादी आठवीं या फिर इससे कम शिक्षित है

अब यदि हम पिछड़े मुसलमानों यानी अति पिछड़ा वर्ग व पिछड़ा वर्ग में शुमार जातियाें पर ही फोकस करें और यह देखें कि पिछड़े वर्ग में शामिल मुसलमानों की शैक्षणिक स्थिति कैसी है तो बदहाली की तस्वीर साफ हो जाती है, जो यह बताती है कि पसमांदा मुसलमानों की 80.3 प्रतिशत आबादी आठवीं कक्षा या इससे कम शिक्षित है। 

कक्षासंख्याप्रतिशत
प्राथमिक (1-5)453818527.53
मध्य (6-8)251310615.24
माध्यमिक (9-10)171605710.41
उच्च माध्यमिक (11-12)9639185.85
डिप्लोमा571880.34
स्नातक (इंजीनियरिंग)202720.132
स्नातक (चिकित्सा)59890.30
अन्य (स्नातक)4201122.55
स्नातकोत्तर569570.34
डॉक्टरेट/सीए49000.02
अन्य618570837.53

महत्वपूर्ण यह कि ‘अन्य’ से बिहार सरकार का तात्पर्य उनलोगों से है, जिन्होंने किसी तरह की शिक्षा ग्रहण नहीं की है और इस आधार पर देखें तो एक बड़ी आबादी निरक्षर कही जाएगी। 

शैक्षणिक पिछड़ापन अकारण नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि संसाधनों में हिस्सेदारी कितनी है। मसलन हम यदि खेती की ही बात करें तो हम पाते हैं कि बिहार में मुस्लिम आबादी (2 करोड़ 31 लाख 49 हजार 925) में करीब 72.5 फीसदी आबादी वाले पसमांदा समाज की केवल 3.64 प्रतिशत आबादी यानी 9 लाख 31 हजार 190 लोग ही या तो खेती करते हैं या फिर खेतिहर मजदूर हैं। यह सनद के काबिल इस कारण भी है कि मौजूदा दौर में मुस्लिमों के प्रति नफरत को हवा दी गई है। अधिकांश बड़े हिंदू जोतदार मुस्लिमों को न तो बटाई पर खेत देते हैं और न ही उनसे मजदूरी करवाते हैं। 

वर्गखेती करनेवालों की कुल संख्याकुल आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी
सामान्य वर्ग हिंदू1170236 8.46 प्रतिशत
सामान्य वर्ग मुस्लिम2552714.06 प्रतिशत
पिछड़ा वर्ग मुस्लिम931190 3.64 प्रतिशत

यह आंकड़ा हमें बताता है कि खेती के मामले में सामान्य हिंदुओं और सामान्य मुसलमानों के बीच जो अंतर है, वह पिछड़े वर्ग के मुसलमानों के मामले बेशक कम है, लेकिन यह सनद रहे कि बिहार सरकार की रपट में यह आंकड़ा जारी नहीं किया गया है कि किस वर्ग/समुदाय के पास कितनी खेती है। लिहाजा यह माना जा सकता है कि पिछड़े वर्ग के मुसलमानों में अधिकांश या तो खेतिहर मजदूर होंगे या फिर अत्यंत ही छोटे किसान। यह एक और आंकड़े में सामने आता है और यह आंकड़ा है स्वरोजगार और मजदूरी का।

वर्गमजदूरी करनेवालों की कुल संख्याकुल आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी
सामान्य वर्ग हिंदू11211418.10 प्रतिशत
सामान्य वर्ग मुस्लिम118022018.79 प्रतिशत
पिछड़ा वर्ग मुस्लिम334820320.31 प्रतिशत

और अब स्वराेजगार संबंधी आंकड़ा देखिए–

वर्गस्वरोजगार करनेवालों की कुल संख्याकुल आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी
सामान्य वर्ग हिंदू5259733.80 प्रतिशत
सामान्य वर्ग मुस्लिम2022333.21 प्रतिशत
पिछड़ा वर्ग मुस्लिम4844662.93 प्रतिशत

सनद रहे कि बिहार सरकार की रपट में स्वरोजगार की श्रेणियों का उल्लेख नहीं किया गया है। मतलब यह कि बड़े उद्यम करनेवालों से लेकर रेहड़ी लगाने और पंचर बनानेवाले सभी को एक श्रेणी में रखा गया है। यदि हम संसाधनों पर अधिकार के लिहाज से भी देखें तो भी हम यही पाएंगे कि पसमांदा समाज की एक बड़ी आबादी की हालत इस लायक भी नहीं है कि वे छोटा रोजगार भी कर सकें। बड़ा कारोबार करना तो दूर की बात है।

कुल मिलाकर 27.58 प्रतिशत पसमांदा आबादी के पास ही किसी तरह का रोजगार उपलब्ध है। यह बिहार सरकार का आंकड़ा ही बताता है। इसमें 20.31 प्रतिशत मजदूर, 3.6 प्रतिशत खेती/खेतिहर मजदूर और 2.93 प्रतिशत तथाकथित तौर पर स्वरोजगार करनेवाले हैं।

क्रमश: जारी

(संपादन : नवल/अनिल)

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एफपी डेस्‍क

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