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व्याख्यान  : समतावाद है दलित साहित्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आधार 

जो भी दलित साहित्य का विद्यार्थी या अध्येता है, वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे बगैर नहीं रहेगा कि ये तीनों चीजें श्रम, स्वप्न और संघर्ष दलित संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा है। श्रम, स्वप्न और संघर्ष की बुनियाद समतावाद में है।पढ़ें, कंवल भारती का यह व्याख्यान

[दलित-आदिवासी अध्ययन एवं अनुवाद केंद्र और हिंदी विभाग मानविकी संकाय, हैदराबाद विश्वविद्यालय द्वारा 27-29 फरवरी, 2024 को आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन कंवल भारती द्वारा दिया गया व्याख्यान]

अध्यक्ष मंडल के विद्वान साथियों! और इस सभागार में उपस्थित श्रोतागण! 

आज का यह सेमिनार एक ऐसे विषय पर हो रहा है, जिसका मकसद हिंदी दलित-आदिवासी साहित्य में सामाजिक-सांस्कृतिक चित्रण किस तरह हुआ है, यह देखना है। इसमें संदेह नहीं कि दलित और आदिवासी समाज के लेखकों ने अपने साहित्य में, चाहे वह कविता विधा हो, कहानी विधा हो, नाटक हो या उपन्यास हो, अपनी अनुभूतियों की तूलिका से उस समाज के यथार्थ को चित्रित किया है, जो उन्होंने जिया है। अगर दलित और आदिवासी लेखकों ने स्वयं अपने साहित्य का सृजन न किया होता, तो दुनिया जान नहीं पाती कि उन्होंने किन परिस्थितियों में जीवन जिया, और उन्हें अपने विकास के लिए कितना संघर्ष करना पड़ा था। पहली बार उनके साहित्य के द्वारा ही दुनिया ने उस समाज का वास्तविक हाल जाना, जिसे मुख्यधारा के साहित्यकारों ने कभी देखने-जानने की कोशिश ही नहीं की थी। 

लेकिन दलित और आदिवासी साहित्य की समस्याएं समान नहीं हैं। वे अलग-अलग हैं। उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक चिंताएं भी काफ़ी हद तक एक-दूसरे से अलग हैं। जहां आदिवासी साहित्य अपनी संस्कृति, अपनी ज़मीन और अपने संसाधनों को बचाने की चिंताओं से युक्त है, वहां दलित साहित्य ऐसी किसी भी चिंता से मुक्त है, क्योंकि दलितों के पास बचाने लायक कुछ नहीं है। उनके पास खोने के लिए गुलामी की सिर्फ़ बेड़ियां हैं, और पाने के लिए अनंत आकाश। इसलिए जिस तरह आदिवासी संस्कृति अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोही रही, उस तरह दलित संस्कृति नहीं रही। दलित संस्कृति में ज़मींदार, साहूकार और ब्राह्मण सबसे बड़ा शोषक वर्ग है, और उनसे मुक्ति की लड़ाई ही दलित संस्कृति का एक बड़ा हिस्सा रहा है। यहां तक अस्मिता या पहचान की लड़ाई है, उसे दलितों और आदिवासियों ने ही नहीं, बल्कि उन जातियों ने भी लड़ा है, जिन्हें भारत में जरायमपेशा जातियों के रूप में मान्यता दी गई। इन तीनों समाजों ने अपने मानवीय और सामाजिक गौरव को प्राप्त करने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी है। इन तीनों समाजों ने अपने मौलिक इतिहास की खोज की, और यह पाया कि वे हिंदू नहीं हैं, प्रकृति और श्रमणधर्मी हैं। इन तीनों ही समाजों की संस्कृति में उत्सव-धर्मिता और समतावाद है, जिसके मूल में कला, गायन, वादन, नृत्य और सृजन की विद्याएं हैं। 

 

इस विशाल भारतीय समुदाय के पतन के लिए डॉ. आंबेडकर ने हिंदुत्व को दोषी ठहराया है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘फिलोसोफी ऑफ हिंदूइज्म’ में एक वाजिब सवाल उठाया है। उन्होंने लिखा है कि हिंदू अपनी सभ्यता को विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता बताते नहीं थकते। वे यहां तक कहते हैं कि दुनिया को ज्ञान ही हिंदुत्व ने दिया है। डॉ. आंबेडकर ने पूछा है कि यदि ऐसा है, तो हिंदूधर्म दलितों, आदिवासियों और तथाकथित जरायमपेशा जातियों की विशाल आबादी को ज्ञान और सभ्यता का प्रकाश देकर उसका उत्थान करने में विफल कैसे हो गया? वे पूरी दुनिया को तो सभ्यता का प्रकाश देने का ढिंढोरा पीटते हैं, पर ऐसा कैसे हुआ कि उन्होंने अपने ही देश की एक बड़ी आबादी को उस प्रकाश से वंचित रखा? डॉ. आंबेडकर ने कहा कि इसका एक ही उत्तर है, और वह है– अस्पृश्यता। यानी इन जातियों के संपर्क में आने से अपवित्र हो जाने का भय। इसी अपवित्रता के भय के कारण भारत के ब्राह्मणों ने, जो स्वयं को दुनिया का श्रेष्ठ दार्शनिक मानते हैं, इन जातियों से संपर्क नहीं बनाया। असल में वह अपने जिस ज्ञान पर अभिमान करते हैं, वह अपने चरित्र में ही मानवीय और नैतिक नहीं है, बल्कि अलगाववादी है। 

कंवल भारती को सम्मानित करते हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति बी. जे. राव

पिछले दिनों कांचा आइलैय्या शेपर्ड की हिंदी में अनूदित एक किताब आई है– ‘हिंदुत्व-मुक्त भारत की ओर’। यह दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग की संस्कृति को समझने के लिए बहुत ही महत्वपूर्व किताब है। उन्होंने बताया है कि आदिवासी, दलित और पिछड़ा वर्ग भारत का वैज्ञानिक वर्ग है। मिट्टी और लोहे के बर्तन तथा औजार बनाना, पशु पालना, उनके चारे की व्यवस्था करना, उनको स्वस्थ रखना, दूध निकालना, दूध से मक्खन, घी और छाछ बनाना, जमीन को उपजाऊ बनाकर खेती करना, बीज बनाना, पौध तैयार करना, लोगों के भरण-पोषण के लिए अनाज का उत्पादन करना, उसका भंडारण करके रखना, लोगों को सुंदर बनाने के लिए उनके दाढ़ी-बाल बनाना, पशुओं की खाल निकालना, उसे साफ़ करके उसे जूते और विभिन्न वस्तुएं बनाने के उपयोग में लाना, कपास से सूत बनाने के लिए करघा बनाना, कपड़ा बुनना, दरी-चादर, और रजाई बनाना, ईंटें पाथना, उन्हें पकाना, घरों का निर्माण करना, नालियां बनाना, लकड़ी काटना, उससे दरवाजे, पीढ़े, और खटिया बनाना, यह सारी विद्या उन्हें किसी यूनिवर्सिटी ने नहीं सिखाई थी। हिंदूधर्म ने तो कदाचित नहीं, जिसे संपर्क से ही छूत का रोग लग जाता है। यह इन समुदायों की सृजन की वह मौलिक संस्कृति है, जिसने संपूर्ण भारतीय समाज को जीवन का आधार दिया। जब आधुनिक चिकित्सा और स्वास्थ्य-सेवाएं भारत में नहीं आईं थी, तब ये ही वर्ग घरों में नवजात शिशुओं का जन्म कराते थे, और उनके पोषण तथा विकास के लिए औषधियां बनाते थे। ये स्वभावत: वैज्ञानिक समुदाय थे, जिनके शिल्प-विज्ञान के विकास में हिंदूधर्म का कोई योगदान नहीं है। लेकिन हिंदू संस्कृति ने अपने देश के इन शिल्पकारों को कोई महत्व देना तो दूर, उसने उनके पढ़ने-लिखने तक पर रोक लगा दी, जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत में विज्ञान और तकनीक का विकास रुक गया, और सारे आविष्कार, जो भारत में हो सकते थे, तकनीक और विज्ञान के विकास से दूसरे देशों में हुए। 

मैं आदिवासी साहित्य का मर्मज्ञ नहीं हूं। इस साहित्य के आधिकारिक विद्वान यहां मौजूद हैं, जो इस पर चर्चा करेंगे। यहां से अब मैं दलित साहित्य तक सीमित रहूंगा। हिंदी दलित साहित्य में श्रम, स्वप्न और संघर्ष का चित्रण है। जो भी दलित साहित्य का विद्यार्थी या अध्येता है, वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे बगैर नहीं रहेगा कि ये तीनों चीजें श्रम, स्वप्न और संघर्ष दलित संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा है। श्रम, स्वप्न और संघर्ष की बुनियाद समतावाद में है। सारा दलित साहित्य वर्णव्यवस्था और जातिभेद के विरोध में है। कभी सोचा कि इसका कारण क्या है? इसका कारण सिर्फ़ उत्पीड़न नहीं है, बल्कि समतावाद है, जिसे चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने भारत का मौलिक समाजवाद कहा है। निश्चित रूप से समाजवाद का सिद्धांत भारत में कम्युनिज्म के साथ ही आया। लेकिन भारत में समतावाद की अवधारणा थी, जो हमें लोकायत, बुद्ध, सिद्धों, नाथों, कबीर, रैदास और नानक देव की वाणियों में मूल रूप से मिलती है। यह समतावाद की लंबी परंपरा है, जो दलित जातियों से जुड़ी हुई है। अमरदेसवा और बेगमपुरा के रूप में क्रमश: कबीर और रैदास दोनों ने ही एक ऐसे राज्य का आदर्श दिया है, जहां सभी को अनाज उपलब्ध हो, जहां कोई भूखा न रहे, जहां कोई भी दूसरे-तीसरे दर्जे का नागरिक न हो, जहां किसी के कहीं भी आने-जाने पर पाबंदी न हो, जहां कोई दुःख न हो, कोई टैक्स न हो। यह जो बेगमपुरा देस है, जिसे हम एक काल्पनिक समाजवादी देश कह सकते हैं। पर वास्तव में यह उनकी समतावाद की अवधारणा है। यह श्रम पर आधारित संस्कृति का समतावाद है, जिसमें बिना श्रम किए, भीख मांगकर खाने को बुरा समझा गया है। यह वह संस्कृति है, जिसमें श्रम और योग्यता की कद्र है, जाति की नहीं। इस संस्कृति में एक योग्य चांडाल भी पूज्य है, और अयोग्य ब्राह्मण निंदनीय है। यहां जाति नीच नहीं है, बल्कि नीच कर्म ही व्यक्ति की नीचता है। रैदास कहते हैं– ‘रैदास जनम के कारने होत न कोई नीच/ नर को नीच करि डार है ओछे करम की कीच’। दलित संस्कृति शास्त्र-ज्ञान को नहीं, अनुभव के ज्ञान को महत्व देती है। जैसे कबीर कहते हैं– ‘मैं कहता आंखन की देखी, तू कहता कागद की लेखी’। यहां कबीर ने स्पष्ट विभाजन किया है दलित और ब्राह्मण-संस्कृति में। दलित संस्कृति में विवेक ही गुरू है, शास्त्र और परंपराएं नहीं– ‘कह कबीर मैं सो गुरू पाया, जाका नाम विवेक’। दलित संस्कृति बीसवीं सदी के दलित कवि हीरा डोम की कविता ‘अछूत की शिकायत’ में पूरी तरह उभर कर आई है। वह कहते हैं– ‘बभने के लेखे हम भिखिया न मांगब जा/ ठकुरे के लेखे नहीं लउरि चलाइबि/ सहुआ के लेखे हम डंडी न मारब जा। अपने पसीनबा के पइसा कमाइब जा/ घर-भर मिली-जुलि बांटि-चोटि खाइबि।’ कवि कहता है– हम श्रम करके खानेवाले लोग हैं। हम भीख नहीं मांगते, लाठी के जोर पर किसी पर जुल्म नहीं करते और न बेईमानी से अपनी जीविका चलाते हैं।

दलित-बहुजन विमर्श की पुस्तकें बेचते छत्तीसगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता संजीत बर्मन

इस संस्कृति के विरुद्ध एक जबर्दस्त प्रतिक्रांति हुई। और यह प्रतिक्रांति उस शासक वर्ग ने की, जो दलितों के श्रम का शोषक भी था। इसलिए दलित संस्कृति प्रतिक्रांति का आसानी से शिकार हो गई। लेकिन यह प्रतिक्रांति एक ही बार में नहीं हुई, और न यह अपने आप हुई, बल्कि यह पुष्यमित्र सुंग के काल में हुई, जब पहला ब्राह्मण राज्य कायम हुआ। यहां यह उल्लेखनीय है कि जिस भौतिकवादी अनीश्वरवादी दर्शन का उद्भव बुद्ध और चार्वाकों ने किया, उसका उन्मूलन सुंग काल में हुआ, और इस उन्मूलन के बाद, यह दर्शन सिद्धों और नाथों से होता हुआ, जब कबीर और रैदास के निर्गुणवाद में समाकर भारत की दलित जनता के बीच पहुंचा, तब तक यह ईश्वरवादी दर्शन में बदल चुका था। लेकिन ऐसा तत्कालीन परिस्थितियों के कारण हुआ था, क्योंकि अगर कबीर और रैदास ईश्वरवादी न होते, तो तत्कालीन ब्राह्मणी और इस्लामी सत्ता में वे अपना अस्तित्व नहीं बचा सकते थे। लेकिन यह ईश्वरवाद के रूप में भी एक क्रांति थी, और बड़ी क्रांति थी। यह एक ऐसा ईश्वरवादी दर्शन है, जिसमें ईश्वर का न कोई रूप है, न रंग, न वर्ण, न गोत्र, और न कोई जाति है, यानी एक ऐसा ईश्वर, जो कभी नहीं जन्मा, और जब जन्मा ही नहीं, तो उसका कोई लीला-धाम भी नहीं, इसलिए वह मरणधर्मी भी नहीं, और इसलिए उसका कोई ऐसा पवित्र स्थल भी नहीं, जैसा ब्राह्मणों ने अयोध्या और मथुरा को बनाया हुआ है। वह न किसी को पैदा करता है, न किसी को कष्ट देता है, और न किसी को मारता है। इसलिए निर्गुणवाद में परलोक, मोक्ष और जीव का आवागमन भी नहीं है। ऐसे निर्गुण ईश्वर का होना, न होना बराबर है। जिस ईश्वर में कोई गुण ही न हो, उसका उपयोग भी क्या? उसके लिए कोई मंदिर भी क्यों बनाएगा? इसलिए दलित बस्तियों में मंदिर नहीं थे, उनके अपने कुछ देवताओं और गुरुओं के थान (स्थान) थे। यहां उनकी स्मृति में एक चिराग जलाकर रख दिया जाता था। अगर बारीकी से देखेंगे तो यह निर्गुणवाद, अनीश्वरवाद का ही रूप था। लेकिन ब्राह्मणों ने इस एकेश्वरवाद के विरुद्ध दलितों में विष्णु के अवतार राम व कृष्ण के अलावा शिव आदि अन्य देवताओं को स्थापित करने का काम किया। जिन दलित बस्तियों में कोई मंदिर नहीं था, उनमें मंदिर खड़े कर दिए गए। उनमें सुबह-शाम भजन-कीर्तन और पूजा शुरू हो गई। धर्मोपदेशक ब्राह्मण महिमा की कहानियां सुनाने लगे। इस प्रतिक्रांति में दो हथियार इस्तेमाल किए गए– एक तलवार का वार और दूसरा अंधविश्वास का प्रचार। अंधविश्वास जनता के लिए और तलवार जनता के नायकों के लिए, जो ब्राह्मणों के अभियान के खिलाफ विद्रोह कर रहे थे। आज भी इन्हीं दो हथियारों से शूद्रों को हिंदुत्व का गुलाम बनाया जा रहा है, जनता में अंधविश्वास फैलाया जा रहा है और उनके बुद्धिजीवियों को जेल भेजा जा रहा है। 

इस प्रतिक्रांति के कारण दलित संस्कृति में एकेश्वरवाद के स्थान पर हिंदू देवताओं की पूजा आरंभ हुई। उनके अपने देवता, अपने गुरू, अपनी परंपराएं सब खत्म हो गईं, हालांकि उनके अवशेष दलित जातियों में अभी भी मौजूद हैं। दलित साहित्य में आत्मकथाओं, कहानियों, उपन्यासों और नाटकों के माध्यम से इस प्रतिक्रांति को बेहतर ढंग से न सिर्फ़ उभारा गया है, बल्कि उसका प्रतिरोध भी किया गया है। इस संदर्भ में स्वामी अछूतानंद का “माया बलिदान” नाटक, और “आदिखंड काव्य”, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की “ईश्वर और उसके गुड्डे”, सत्य प्रकाश का उपन्यास “जस तस भई सवेर”, बुद्ध शरण हंस का कथा-संग्रह “देव साक्षी है”, और ओम प्रकाश वाल्मीकि, श्यौराजसिंह बेचैन तथा अजय नावरिया के कथा-साहित्य को देखा जा सकता है। दलित संस्कृति के मूल अवशेष पर मेरी एक कविता है :

मेरे घर में सोहर में बनाए जाते हैं 

दीवालों पर सांतिये 

चिपकाई जाती है गोबर की लोई 

जिस पर गाड़ी जाती हैं चौदह सींकें 

शादी में छापे जाते हैं कपड़ों पर 

हल्दी सने हाथ के पंजे 

और कोई नहीं जानता 

ये सांतिये प्रतीक हैं बुद्ध के चार सत्यों के 

और लोई धर्मचक्र की।

दलित संस्कृति के समतावादी होने का एक प्रमाण देकर मैं अपनी बात समाप्त करूंगा। यह प्रमाण है, दलितों पर सवर्णों का जुल्म। आपको यह बात कुछ अजीब लग सकती है, लेकिन यह जुल्म ही दलितों के समतावादी होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। बाबासाहेब ने लिखा है कि दुनिया में अगर सबसे ज्यादा जुल्म किसी कौम पर हुए हैं, तो वह यहूदी कौम है, पर दलित जातियों पर होने वाले जुल्म भी कम भयानक नहीं हैं। यहूदियों पर इसलिए जुल्म हुए कि वे ईसाईयों के साथ मिश्रित होकर रहना नहीं चाहते थे। वे ईसाईयों से एक अलग राष्ट्र के रूप में अपना अलगाव चाहते थे। इसलिए उनके ऊपर भयानक जुल्म ढाए गए। लेकिन दुनिया में भारत की दलित जातियां एक मात्र ऐसी कौम है, जिसके ऊपर सवर्णों ने इसलिए जुल्म ढाए, क्योंकि वे सवर्णों के साथ मिश्रित होकर रहना चाहते थे, उनसे अलगाव नहीं चाहते थे, बल्कि उनके साथ बराबरी के स्तर पर उठना-बैठना और खड़े होना चाहते थे। लेकिन ब्राह्मणों ने दलितों के साथ अपने अलगाव को स्थाई रूप से बनाए रखने के लिए उन पर अस्पृश्यता थोप दी, और एक कोड बनाकर उनके साथ सामाजिक व्यवहार को अपवित्र और दंडनीय अपराध बना दिया। इस कोड के उल्लंघन पर उनके ऊपर भयानक जुल्म ढाए गए, जो इस इक्कीसवीं सदी में भी जारी हैं। लेकिन दलित साहित्य अपनी समतावादी संस्कृति और अपने सरोकारों के साथ अलगाववादी संस्कृति के विरुद्ध सदैव संघर्षरत रहेगा।

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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