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फुले, पेरियार और आंबेडकर की राह पर सहजीवन का प्रारंभोत्सव

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के सुदूर सिडियास गांव में हुए इस आयोजन में न तो धन का प्रदर्शन किया गया और न ही धन के किसी भी रूप का लेन-देन। आयोजन के केंद्र में न्याय, समता, बंधुता और सम्मान निहित था। पढ़ें, यह आंखों-देखी रपट

बीते 17 मार्च, 2024 की रात एक बैठक चल रही थी। वह भी राजस्थान की राजधानी जयपुर से करीब 268 किलोमीटर दूर भीलवाड़ा जिले के सिडियास गांव में। बैठक का एजेंडा था फुले, पेरियार और आंबेडकर के बताए मार्ग पर चलते हुए सहजीवन के आरंभ के उत्सव का आयोजन कैसे किया जाय। जब मैं दिल्ली से करीब 600 किलोमीटर की दूरी बस से तय कर पहुंचा था तब रात के करीब 11 बज रहे थे। बैठक स्थल का नाम था– आंबेडकर भवन। इसका निर्माण प्रसिद्ध बहुजन सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने अपनी जमीन पर कराया है।

दरअसल, मैं भंवर मेघवंशी की बेटी ममता मेघवंशी और कृष्ण कुमार के सहजीवन के प्रारंभोत्सव में शामिल होने पहुंचा था। बैठक में स्वयं ममता मेघवंशी भी मौजूद थीं। अन्य सहभागियों में पीयूसीएल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव के अलावा पारस बंजारा, राकेश शर्मा, प्रज्ञा जोशी, ममता जेतली, डॉ. नवीन नारायण, कामायनी स्वामी, विद्याभूषण रावत और भंवर मेघवंशी शामिल थे। बैठक में एक सवाल पाणिग्रहण संस्कार को लेकर उठा। इसका सभी ने एक सिरे से यह कहते हुए विरोध किया कि यह पितृसत्तावादी संस्कार है, जिसे ब्राह्मण वर्ग देश के दलित-बहुजनों के ऊपर थोपता रहा है। बैठक में यह तय किया गया कि सहजीवन का प्रारंभोत्सव का आगाज बेहद सामान्य ढंग से होगा। बुद्ध के मंगल सुत्त का पाठ भंते डॉ. सिद्धाथ वर्द्धन करेंगे, यह भी बैठक में मुकर्रर किया गया। बैठक में लिये जा रहे हर फैसले में ममता मेघवंशी की सहमति ली जा रही थी।

अगले दिन यानी 18 मार्च को सब लगभग वैसा ही हुआ, जिसके बारे में बीती रात हुए बैठक में फैसला लिया गया था। राजस्थान के सीकर जिले से पहुंची बारात का स्वागत गुलाब के फूल की पंखुड़ियों से किया गया। खास बात यह रही कि बारात में न तो घोड़ी का इस्तेमाल किया गया और न ही बैंड-बाजा बजाया गया। स्थानीय लोक-संस्कृति का वाद्य ड्रम अवश्य बजाया गया, लेकिन उससे निकल रही ध्वनियां भी कर्कश नहीं थीं। 

इस अलबेले उत्सव में एक खास नजारा यह भी दिखा कि आगंतुकाें के विभिन्न व्यंजनों को पकाने में पुरुष और स्त्रियों की सहभागिता थी। उत्तर भारत में महिलाएं सामान्य तौर पर इससे दूर रहती हैं। पूछने पर पूड़ियां बेल रही एक वृद्ध महिला ने कहा कि उन्हें इस काम के लिए रोज के हिसाब 300 रुपए से 500 रुपए तक मिल जाते हैं।

आगंतुकों के लिए रसोई तैयार करने में महिलाओं की भी रही सहभागिता

खैर, बारात के आने के बाद सहजीवन के प्रारंभोत्सव का आगाज हुआ। आयोजन स्थल लोगों से खचाखच भरा था। स्थानीय निवासी अपने पारंपरिक पोशाकों में आए थे। बड़ी संख्या में देश के अलग-अलग राज्यों से आए लोग भी उपस्थित थे। जैसे ही कृष्ण कुमार का आगमन हुआ, स्थानीय महिलाओं ने कहना शुरू किया– “क्या यही दुल्हा है? यह तो देखने में कहीं से भी दुल्हा नहीं लगता है।” एक महिला ने कहा– “काश, भीलवाड़ा में हो रही यह शुरुआत अब पूरे देश में फैले”। आप कहां से हैं, यह पूछा तो जवाब मिला– मध्य प्रदेश के सागर जिले से।

स्थानीय लोगों में यह भी चर्चा का विषय रहा कि एक तरह से शादी के इस समारोह में न तो धन का प्रदर्शन किया गया है और न ही किसी प्रकार का लेन-देन। थोड़ी ही देर में आयोजन स्थल पर ममता मेघवंशी का आगमन हुआ। उनकी सफेद साड़ी को देखकर भी महिलाओं ने टीका-टिप्पणी की। एक स्थानीय महिला ने अपनी बोली में जो कहा, उसका मतलब यह था कि सफेद रंग को बदनाम किया गया है। यह वैधव्य नहीं, जीवन से जुड़ा रंग है।

सहजीवन के प्रारंभोत्स्व के मौके पर ममता मेघवंशी व कृष्ण कुमार के साथ भंवर मेघवंशी और उनकी जीवनसंगिनी प्रेम मेघवंशी तथा राजस्थान सरकार के पूर्व राजस्व मंत्री रामलाल जाट

ममता-कृष्ण कुमार का सहजीवनोत्सव उस समय यादगार बन गया जब दोनों ने जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख, पेरियार और डॉ. आंबेडकर को याद करते हुए निम्नांकित संकल्प लिये।

  1. हम संकल्प लेते हैं कि हमारी यह सभागिता आपसी विश्वास और बराबरी पर आधारित होगी और हम एक-दूसरे के व्यक्तित्व का मैत्री भाव से सम्मान करते हुए जीवन-विकास की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे।
  2. हम संकल्प लेते हैं कि अपने सहजीवन के समस्त दायित्वों का निर्वाह पूर्ण निष्ठा से करेंगे और हमारा सहभागी जीवन देश, दुनिया और समाज की बेहतरी के लिए समर्पित रहेगा।
  3. हम संकल्प लेते हैं कि हमारा आचरण भारत के संविधान के सर्वभौमिक मूल्यों – न्याय, समानता, स्वतंत्रता व बंधुता – के अनुरूप होगा, हम एक-दूसरे को पूरा मान-सम्मान, प्रतिष्ठा व गरिमा देंगे।
  4. हम संकल्प लेते हैं कि हम स्नेह, सद्भाव, मैत्री व सहयोग के भाव से धरती के सभी प्राणियों, प्रकृति, पर्यावरण व पारिस्थितिकी का संरक्षण व संवर्द्धन व सम्मान करेंगे तथा समस्त जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों, नदी, तालाबों, पर्वतों, समुंद्रों के प्रति मैत्री भाव रखेंगे।
  5. हम संकल्प लेते हैं कि जीवन में कठिन परिस्थितियों – नकारात्मकता, निराशा, व संघर्षों के क्षणों का – हम पूर्ण धैर्य, करुणा, उदारता व समझदारी से सामना करेंगे और एक-दूसरे का संबल बनेंगे।
  6. हम संकल्प लेते हैं कि समय के साथ अगर हमारे रिश्ते में कोई बदलाव आया तब भी हम एक-दूसरे का सम्मान करेंगे और एक साथ बिताये समय को मैत्री, सद्भाव व संतुष्टि से देखेंगे, किसी भी परिस्थिति से निकलने में एक-दूसरे की मदद करेंगे।
  7. हम तथागत गौतम बुद्ध, संत कबीर, रामसा पीर, जोतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख, बाबासाहेब आंबेडकर, भगत सिंह और महात्मा गांधी जैसे हमारे पुरखों और पुरखिनों की प्ररेणा, अपने पूर्वजों व प्रकृति के संबल से, आप सबकी उपस्थिति में यह संकल्प लेते हैं।

ममता और कृष्ण कुमार को उपरोक्त संकल्प करानेवालों में कांग्रेस की पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन, राजीव गांधी फाउंडेशन से जुड़े प्रसिद्ध समाजवादी विजय प्रताप, राजस्थान सरकार के पूर्व राजस्व मंत्री रामलाल जाट, पीयूसीएल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव, जन-जागरण शक्ति संगठन (अररिया, बिहार) की सह-संस्थापक कामायनी स्वामी, दलित महिला अधिकार मंच से जुड़ी सुमन देवठिया, महिला अधिकार कार्यकर्ता भंवरी देवी, सेवानिवृत्त आईजी सत्यवीर सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीणा, सिस्टर गीता कैरोल, तारा आहलुवालिया और विद्याभूषण रावत शामिल थे। इस आयोजन के दौरान पारस बंजारा ने राजस्थानी बाेली में कबीर के पदों पर आधारित एक गीत भी सुनाया।

(संपादन : राजन/अनिल)

लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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