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यूं ही नहीं साकार हो रहे बापसा के इरादे

कहना न होगा कि बापसा एक्टिविस्टों के शुरुआती अनुभव निराशाजनक और विरोधात्मक रहे। नीले झंडे लिये, जय भीम कहने वाले चंद दलित-बहुजन छात्रों को नजर-अंदाज़ किया गया, उनके ऊपर हंसा गया और उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया। दशकों तक ‘लाल सलाम’ और ‘नक्सलबाड़ी एक ही रास्ता’ जपने वाले लाल गढ़ के लिए यह अजूबा था। पढ़ें, सुमीत समोस द्वारा लिखित बापसा का यह संक्षित इतिहास

बापसा का संक्षिप्त इतिहास : जेएनयू में जाति-विरोधी छात्र राजनीति (2014-2019)

वर्ष 1969 में स्थापना के बाद से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) वामपंथी छात्र राजनीति के लंबे इतिहास के चलते आम तौर पर छात्र ऐक्टिविज्म का लाल गढ़ कहा जाता है। प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, कविता कृष्णन और हाल ही में लोकप्रिय हुए कन्हैया कुमार जैसी शख्सियतों के निर्माण में इस विश्वविद्यालय की अहम भूमिका रही है। ये सभी क्रमशः सीपीआई(एम), सीपीआई(एमएल) और सीपीआई में राष्ट्रीय नेतृत्व और अहम पद हासिल कर पाए। कुछ महीनों पहले कन्हैया सीपीआई छोड़कर कांग्रेस में चले गए। कुछ और भी बड़े नाम हैं, मगर मेरे ज़ेहन में आने वाले ये सभी सबसे लोकप्रिय नाम हैं। छात्र राजनीति और वामपंथी संगठनों के समर्थक होने से लेकर प्राध्यापक समुदाय का हिस्सा बनने, सदस्यता कार्ड रखने और राष्ट्रीय वामपंथी संगठनों से जुड़ने तक जेएनयू ने एकदम प्रारंभ से ही लोगों का सुसंगठित नेटवर्क खड़ा करने में मदद की है। आपादस्थितियों में उदारवादियों और गांधीवादियों को भी इस नेटवर्क में जगह मिली है। 

जयति घोष, प्रभात पटनायक, निवेदिता मेनन, नीलाद्रि भट्टाचार्य, जानकी नायर और रोमिला थापर से लेकर मृदुला मुखर्जी और आदित्य मुखर्जी तक, अधिकतर दिग्गज इसी कैंपस की उपज हैं, जिनके ऊपर भारतीय अकादमिक जगत गर्व करता है। इस बात पर ध्यान देना भी ज़रूरी है कि उन्हीं में से कुछ लोग पाठ्यक्रम तैयार करते हैं, और वही शिक्षा छात्रों को क्लासरूम में देते हैं, जो कि ऐक्टिविज्म में और कक्षाओं से बाहर होने वाली चर्चाओं में परावर्तित होता है। उनकी अकादमिक साख और वाम-उदारवादी राजनीति के चौड़े स्पेक्ट्रम में उनकी वैचारिक अवस्थिति को ध्यान में रखते हुए इसमें कोई शक-शुबहा नहीं कि उनके अध्यापकीय कार्य ने छात्र ऐक्टिविज्म को कैसी राह और स्वरूप दिया। 

वामपंथी और समाजवादियों के अलावा दक्षिणपंथी भाजपा की ओर से भी कुछ बड़े नाम हैं जिन्हेंने जेएनयू में शिक्षा पाई है। इनमें मौजूदा केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और सांसद मेनका गांधी। एक बात जो इन सब लोगों में एक-सी है, वह है उनकी ऊंची जाति की पृष्ठभूमि। चार से अधिक दशकों से यह नेटवर्क दिल्ली की सिविल सोसाइटियों, उच्च शिक्षा की परिषदों, और राष्ट्रीय और राज्य सरकार की सलाहकार समितियों, एनजीओ, मीडिया पोर्टलों और प्रकाशन संस्थानों से वैश्विक अकादमिक जगत में प्रभावशाली स्थान हासिल करने तक पहुंच गया है। चार से भी ज़्यादा दशकों में अध्यापकों के बीच दलित पृष्ठभूमि से आने वाले मुझे बस दो बड़े नाम नज़र आए– एक विवेक कुमार और दूसरे गोपाल गुरु। इस बड़े कालखंड में चयन प्रक्रिया में आरक्षण की अवहेलना हुई और जातिप्रवर्ग-निहाय विभाजन पर सरसरी निगाह मारने भर से सारे आंकड़े मिल जाएंगे, जो इसको प्रमाणित कर देंगे।

15 नवंबर, 2014 को हुआ बापसा (बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन) का गठन (तस्वीर : बापसा के आधिकारिक फेसबुक पेज से साभार)

बहुत लंबा समय नहीं बीता जब 2007-08 के आसपास जेएनयू के बहुत से वाम-उदारवादी, ऊंची जाति के संकाय सदस्यों ने कुलपति को पत्र लिखकर स्टाफ़ में ओबीसी भर्ती को बढ़ावा दिए जाने का विरोध किया। इस पूरे दौर में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों में निचली जातियों से आने वाले बहुत कम लोग थे। मतलब वह समूह, जो भारत की आबादी का बहुलांश हिस्सा है, और जिसे मंडल आयोग की अनुशंसा के बाद आरक्षण दिया जाना था। 

सस्ती फीस संरचना और वंचना के मुद्दे जेएनयू के वाम राजनीतिक विमर्श द्वारा हमेशा लोकोपकारी चेष्टा के तौर पर गर्वपूर्वक दिखलाए जाते रहे हैं और आगे भी दिखाए जाएंगे, जो उनके दावे के अनुसार हाशिये के तबके के छात्रों के संस्थान में प्रवेश की राह बनाने के लिए किए गए उनके संघर्षों का नतीजा है। इसके उलट, ऐतिहासिक मंडल आयोग आंदोलन के पीछे दलित-बहुजन लामबंदियों की भूमिका को वे बड़े असहज होकर स्वीकृति देते हैं। यह मंडल आंदोलन ही था, जिसके कारण निचली जातियां और धर्म बदल चुके दलित, अर्थात ईसाई और मुसलमान दोनों ही, उन उच्च शिक्षा संस्थानों मे प्रवेश पा सके, जिनमें जेएनयू भी शामिल है। वे बड़ी आसानी से भूल जाते हैं उन दलित-बहुजन अभिभावकों की राहों को, जिन्होंने जातिग्रस्त समाज से भिड़ते हुए रोजी-रोटी का संघर्ष किया ताकि उनके बच्चे उच्च शिक्षा हासिल कर सकें। जनता के पैसे से चलने वाले बहुत सारे विश्वविद्यालयों की तरह जेएनयू में भी अच्छी-खासी तादाद में निचली जातियों के छात्रों का प्रवेश 2007 में उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण लागू होने के बाद हुआ। 

चारों ओर हरे-भरे पेड़ों और गाहे-बगाहे भेंट हो जाने वाली नीलगायों के साथ-साथ जेएनयू की वाल पेंटिंग्स और नारों मे एदुआरदो गालिआनो, कार्ल मार्क्स, लेनिन, चेयरमैन माओ और चे गेवारा के नाम और उक्तियां थीं। दशकों तक निचली जाति के, दलित और आदिवासी छात्रों की बेहद न्यूनतम संख्या के साथ भारत की राजधानी के हृदयस्थल में बसा यह प्रिस्टीन परिवेश एक अवास्तविक, अलग-थलग पड़े द्वीप की तरह था। ऐसे छोटे से, किसी भी तरह के खलल से दूर, हरे-भरे साम्राज्य में क्रांतिकारी ऊंची जाति का लाल झंडा फला-फूला। नक्सलबाड़ी से फ़लस्तीन तक के नारे गुंजायमान करता हुआ, धुएं, नशे के अड्डे और मार्क्सवादी विचारकों द्वारा प्रस्तावित भारी-भरकम सिद्धांतों का गाहे-बगाहे हवाला देता। भारतीय समाज की अभिव्यक्ति और एक्टिविज्म के आचरण (प्रैक्सिस) दोनों में ही यह दरअसल गांधीवादी, मार्क्सवादी और उदारवादी तत्वों का मिश्रण है। इसमें कुछ अहम अपवाद दर्ज करने ज़रूरी हैं। मसलन, छात्रों की खातिर किए गए कुछ महत्वपूर्ण विरोध प्रदर्शन। जेएनयू कैंपस के दिलचस्प अकादमिक जीवन, माहौल और जीवंत राजनीतिक संस्कृति के बारे में जानने के लिए बहुत सारा साहित्य उपलब्ध है। इसलिए मैं उस पक्ष की बात करूंगा, जिसके बारे में आमतौर पर बोला नहीं जाता। यहां छात्रावासों को साफ करने वाले सफाई कर्मचारी दलित हैं और प्रशासनिक पदों पर बैठे हुए लोग अमूमन ऊंची जातियों के। यहां का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाते हुए जो लोग टुटपुंजिया झोंपड़ों में रहे, वे ज्यादातर ओडिशा और झारखंड के प्रवासी दलित-बहुजन-आदिवासी मज़दूर थे और उन इमारतों में सेमिनार और कांफ्रेंस आयोजित करने वाले अधिकतर ऊंची जाति के प्राध्यापक। इस विषमता को युवा दलित-बहुजन छात्रों ने फिर-फिर चिह्नित किया है। 

बापसा ने बदल दिये जेएनयू के दर-ओ-दीवार के नारे (तस्वीर : बापसा के आधिकारिक फेसबुक पेज से साभार)

इस पृष्ठभूमि में साल 2014 में बिरसा मुंडा (15 नवंबर, 1857 – 9 जून, 1900) के जन्मदिन पर ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से आने वाले अधिकतर फर्स्ट-जनरेशन (अर्थात अपने परिवार में सर्वप्रथम उच्च शिक्षा हासिल करने वाले) दलित और बहुजन स्कॉलरों के बीच हुए लंबे विचारमंथन के बाद बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट एसोसिएशन (बापसा) का गठन हुआ। संगठन का उद्देश्य न केवल छात्र राजनीति में चुनावी तौर पर दखल देना था, बल्कि जेएनयू में आंबेडकरी विमर्श का प्रसार भी करना था। जो जेएनयू में छात्र एक्टिविस्ट आंदोलन से जुड़ा रहा है, वह छात्रों तक पहुंचने के तौर-तरीकों से भलीभांति परिचित होगा। मसलन पर्चे छपवाना, पोस्टर चिपकाना, छात्रों के बीच कैंपेन आयोजित करना और भोजनकक्षों (मेसों) में विभिन्न मुद्दों पर रात्रि चर्चा आयोजित करना। इन छात्रों के समक्ष अहम चुनौतियां थीं– सतत बौद्धिक क्रियाशीलता, आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता और सुदृढ़ सांगठनिक ढांचा। जेएनयू जैसे राजनीतिक तौर पर जीवंत कैंपस में ऐक्टिविज्म करने और छात्र संगठन चलाने के लिए बहुत वक़्त लगाना पड़ता है और यह तब बेहद मुश्किल हो जाता है जब संगठन के अधिकतर सदस्य फर्स्ट-जनरेशन छात्र हों जो पारिवारिक समस्याओं और व्यक्तिगत आर्थिक मजबूरियों से जूझते हुए अकादमिक दबाव और प्रोटोकालों के बीच अपनी राह बना रहे हों। कैंपस के अन्य छात्र संगठनों से बापसा को अलग करने वाला यह अहम बिंदु था। छात्र राजनीति के अपने विचार को स्थापित करने में उनकी मदद करने वाला कोई पूर्ववर्ती उदाहरण नहीं था। इसके पहले के दशक में ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फ़ोरम (एआइबीएसएफ़) और बहुजन स्टूडेंट्स फ्रंट (बीएसएफ़) जैसे संगठन बने तो थे, लेकिन चल नहीं पाए। जेएनयू में सबसे पहला दलित छात्र संगठन जो बना वह था नब्बे के दशक में यूनाइटेड दलित स्टूडेंट्स फ़ोरम (यूडीएसएफ़), जिसने अपने ग़ैर-चुनावी स्वरूप के बावजूद यदा-कदा अकादमिक चर्चा आयोजित करने और आंबेडकर जयंती मनाने के लिए एक मंच के बतौर भूमिका दो दशक से अधिक समय तक निभाई। 

इस प्रकार जेएनयू जैसे स्पेस में, जहां दलित-बहुजन छात्रों द्वारा चलाए जाने वाले स्वायत्त जाति-विरोधी विमर्श का कोई इतिहास नहीं रहा था, साल भर काम करने वाले अप-टू-डेट छात्र संगठन में सहभागिता एक पूर्णतः अभिनव प्रयोग था। उस समय तक हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) में आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एएसए) ही एकमात्र लोकप्रिय आंबेडकरी छात्र संगठन (जिससे रोहित वेमुला जुड़े थे) था, जिसका इतिहास पीछे नब्बे के दशक तक जाता था। तत्कालीन आंध्र प्रदेश में दलितों के हुए करमचेडु और सुंदुरु नरसंहारों के पश्चात उभरी जाति-विरोधी चेतना ने हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एएसए के गठन में अहम भूमिका निभाई। स्थानीय जाति-विरोधी ऐक्टिविज्म में एएसए ने सक्रियता दिखाई, इसमें पृथक तेलंगाना राज्य आंदोलन भी शामिल है। धीरे-धीरे दलितों के बीच की (माडिगा और माला समुदायों के बीच) जाति डाइनैमिक्स हैदराबाद विश्वविद्यालय कैंपस में मज़बूत हो गई थी, जिसके चलते दलित स्टूडेंट्स यूनियन का गठन हुआ और आगे जाकर अन्य निचली जाति के और दलित छात्रों की सहभागिता से बहुजन स्टूडेंट्स फ्रंट का निर्माण हुआ। 

ये संगठन कई मौकों पर एक साथ आए। जाति संरचनाओं को लेकर उनके बीच विचारधारात्मक भेद और प्रतिवाद हैं, परंतु वे परस्पर विरोधी नहीं। ऐसी स्थिति लेकिन जेएनयू में नहीं थी, जो बहुत दूर अपनी ही दुनिया में था, और जैसा कि बहुत लोग डींग हांका करते हैं कि “जेएनयू जो आज सोचता है, देश वही चीज दस साल बाद सोचता है।” मगर हाशिये के समूहों ने एचसीयू जैसे कैंपस में अपनी जाति-विरोधी परंपरा वाली राजनीति के साथ दस साल पहले जो सोचा था, वह जेएनयू ने तब तक नहीं सोचा जब तक कि 2014 में दलित-बहुजन छात्रों द्वारा स्वायत्त जाति-विरोधी अभिव्यक्तियों को पुरजोर ढंग से पेश नहीं किया गया। 

कहना न होगा कि बापसा एक्टिविस्टों के शुरुआती अनुभव निराशाजनक और विरोधात्मक रहे। नीले झंडे लिये, जय भीम कहने वाले चंद दलित-बहुजन छात्रों को नजर-अंदाज़ किया गया, उनके ऊपर हंसा गया और उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया। दशकों तक ‘लाल सलाम’ और ‘नक्सलबाड़ी एक ही रास्ता’ जपने वाले लाल गढ़ के लिए यह अजूबा था। ऊंची जाति वालों के वाम अथवा दक्षिणपंथी अभिव्यक्तियों से जूझते हुए स्वायत्त जाति-विरोधी विमर्श स्थापित करना और यह साबित करना कि बापसा की समझ औरों से किस तरह अलग है, यह सब बड़े मुश्किल काम थे। आइसा, एसएफ़आइ, एआइएसएफ़ और डीएसएफ़ जैसे सभी बड़े छात्र संगठनों के पास अपने संगठन अच्छे से चला सकने के लिए सरपरस्त और अकादमिक सहयोग उपलब्ध था। प्रोफ़ेसरान तक उनके विरोध प्रदर्शनों में हाज़िर होते, चुनावों के दौरान उनके साथ खड़े होते और चुनाव लड़ने वाले इन छात्र संगठनों की जीत पर उनके जश्न में भी शिरकत करते। इन वामपंथी संगठनों के कुछ ऊंची जाति वाले छात्र उन प्रोफ़ेसरान के साथ करीबी ताल्लुकात के चलते किस तरह एम.ए. के बाद एम.फ़िल के इंटरव्यू में बड़े आराम से पास कर जाते हैं, इसके कई अंदरूनी किस्से हैं। 

खैर, स्थानीय आरएसएस इकाई के तहत दक्षिणपंथी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को कैंपस में कुछ विवादास्पद रहे प्रोफ़ेसरान का मुखर समर्थन प्राप्त था। वर्ष 2015 के बाद कुलपति एम. जगदीश कुमार के तहत प्रशासन ने एबीवीपी सदस्यों को खुलेआम संरक्षण देना शुरू कर दिया और भाजपा और आरएसएस से जुड़े हुए सहायक प्रोफ़ेसरों को नियुक्त किया। एबीवीपी से जुड़े छात्रों ने इन नेटवर्कों का फ़ायदा उठाना शुरू किया और यह बात जेएनयू के एक्टिविस्ट हलकों में भलीभांति ज्ञात है। मुस्लिम छात्र नजीब अहमद को डराने और उनके साथ हिंसा करने वाले एबीवीपी छात्रों को कुलपति बचाने लगे। वर्ष 2016 में नजीब लापता हो गए और यह ज़बरदस्ती गायब कर दिए जाने का मामला है। अब तक उनके ठौर-ठिकाने का कोई सुराग नहीं मिल पाया है। और यह मुमकिन हुआ है जांच एजेंसियों और पुलिस के ढुल-मुल रवैये से जिनकी कार्रवाइयों से एकदम प्रारंभ से ही जगज़ाहिर था कि उनकी वफ़ादारी किसके प्रति है। एबीवीपी के वे छात्र कैंपस में खुलेआम विचरते हैं, अपनी भुजाएं फड़काते हुए और डर का माहौल पैदा करते हुए खासकर मुसलमान छात्रों के मन में। फ़रवरी 2020 में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के एबीवीपी काडर को न्यौता दिया और जेएनयू छात्रों पर सलाखों और लाठियों से हमला कर एक भयावह रात को अंजाम दिया और जेएनयू के तत्कालीन कुलपति ने कोई कार्रवाई नहीं की। 

शुरुआती सालों में खुले तौर पर बापसा से जुड़ने या कार्यक्रमों में शामिल होने को लेकर दलित-बहुजन प्राध्यापकों में भी एक झिझक थी। गौरतलब है कि इस दौरान झारखंड से आनेवाली एक आदिवासी ईसाई महिला प्रोफेसर सोनाझरिया मिंज जेएनयू में थीं, जिन्होंने 2014 में औपचारिक रूप से बापसा का उद्घाटन किया था और संगठन के समर्थन में उस वक़्त खड़ी रहीं, जब कोई नहीं रहा। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों से सामाजिक न्याय, विश्वविद्यालयों में हाशिये के समूहों को शामिल करने और आदिवासी अधिकारों के मुद्दे वे उससे पहले भी उठाती रही हैं। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा उन्हें सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दूमका, झारखंड का कुलपति नियुक्त किया गया था। 

खुले मैदान में बापसा द्वारा आयोजित पहले बड़े कार्यक्रम का नाम था– ‘एक दलित मुख्यमंत्री के अनुभव : जीतन राम मांझी के साथ’। बृंदा करात, कविता कृष्णन, शशि तरूर और कपिल सिब्बल जैसों को उनकी नफ़ीस अंग्रेज़ी में अपने अज़ीम रेटरिक बयां करते सुनने और ऊँची जाति वालों की बहुलता वाली संस्थाओं की बाअख्तियार मौजूदगी के आदी कैंपस में भारत के सबसे वलनेरबल समूह से आने वाले एक दलित मुख्यमंत्री को उस मंच से बोलने का न्यौता देना, उस कैंपस की राजनीतिक संस्कृति और सौंदर्यशास्त्र में आए बड़े बदलाव की भांति था। निरर्थक बकवाद से परिपूर्ण पारंपरिक राजनीतिक बोली से प्रस्थान और दलित-बहुजन पहचान और जय भीम के नारों के साथ स्वायत्त ढंग से सार्वजनिक स्थलों पर अधिकार जमाना, ये बातें जेएनयू की पारंपरिक छात्र राजनीति के लिए अनोखी थी। दलित-बहुजन समुदाय के फर्स्ट-जनरेशन के छात्रों को सार्वजनिक जगह पर आत्मविश्वास के साथ स्वयं की भाषा में अपनी दास्तानें अभिव्यक्त करते देख और अधिक छात्रों का आकर्षित होना और धीरे-धीरे साल-दर-साल संगठन का बढ़ना अवश्यंभावी था।

पहले दो वर्षों में बापसा के खिलाफ लगे आरोप थे कि वे विभाजनकारी जातिगत राजनीति फैलाते हैं, वर्ग को नहीं समझते और बीएसपी का अनधिकृत छात्र मोर्चा हैं, जिनका मंतव्य यह था कि बापसा मतलब ऊंची जातियों के खिलाफ नफ़रत फैलाने से ज़्यादा कुछ नहीं। उन्होंने बापसा को नजरअंदाज़ करने की कोशिश की। साल 2015 में तो दरअसल बापसा के पहले अध्यक्षीय प्रत्याशी चिन्मय महानंद से एक भी वामपंथी छात्र प्रत्याशी ने सवाल नहीं पूछा और सिर्फ इसलिए कि उन्हें हज़ारों छात्रों के सामने अप्रासंगिक दर्शाया जाए। महानंद का भाषण अपने ही ढंग का था, जिसमें हिंदू धर्म की दृढ़ आलोचना के साथ भारत के ऊंची जाति के वामपंथ की पोल खोली गई थी। वे जीत तो नहीं पाए, मगर लगभग 300 वोट हासिल किए और धीरे-धीरे सतत साल भर तक कार्यक्रमों, विरोध प्रदर्शनों और रात्रि चर्चाओं के आयोजनों के चलते बापसा एक ऐसी ताक़त के तौर देखी जाने लगी, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता था। साल 2015 के अंत तक जेएनयू के वाम पक्ष द्वारा ‘जय भीम’ पर शायद ही ध्यान दिया जाता था और न ही जाति-विरोधी संघर्षों के वृहद स्पेक्ट्रम को लेकर कोई स्वीकृति थी। मगर उसके बाद उन्होंने ‘लाल सलाम’ के साथ-साथ ‘जय भीम’ कहना भी शुरू कर दिया, जो फिर जेएनयू में जनवरी, 2016 के रोहित वेमुला आंदोलन के दौरान और बाद में आम हो गया। याद रहे कि अपनी रिहाई के बाद दिए गए भाषण में कन्हैया ने किस्सा सुनाया था कि जेल में उन्हें दो कटोरे दिए गए थे, जिनमें एक लाल था और दूसरा नीला। ‘नीले आसमान में लाल सूरज’ जैसे रोमांटिक जुमले लोकप्रिय हो रहे थे। गोया वामपंथी और आंबेडकरवादी आंदोलनों के प्रतीकों लाल और नीले का साथ आना बिना क्रिटिकल हुए टिकमार्क लगाने जैसा हुआ। वह भी एक ऐसे कैंपस में, जिसने लंबे समय तक देश के आंबेडकरवादी आंदोलनों को कोई अहमियत नहीं दी। 

फिर एकाएक हो क्या गया? नारों और आंदोलनों को मिलाने की क्या जल्दी पड़ गई थी या जेएनयू कैंपस में ‘जय भीम’, आंबेडकर और ‘दलित-बहुजन’ शब्द के सामान्यीकरण को लेकर आकुलता क्यों बढ़ गई थी? आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी और कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई तक को अपने पोस्टरों में आंबेडकर की तस्वीर लगाने लगे। वही आरएसएस, जो सनातन धर्म के विचार का प्रसार करती है और जाति श्रेष्ठता जिसके विचारों के मूल में है, और वही कांग्रेस, जिसने दशकों तक आंबेडकरी आंदोलन को दरकिनार किया। आंबेडकर अपनी सारी जिंदगी हिंदू जाति श्रेष्ठता के न केवल प्रखर विरोधी बने रहे बल्कि अपने कई खंडों में लेखन द्वारा वे जाति आधारित हिंदू समाज व्यवस्था की बुराइयों को लगातार उघाड़ते रहे तथा ज़ोर देते रहे कि दलित-बहुजन उससे दूर रहें। झोपड़पट्टियों, गांवों और दलित बस्तियों से चलकर विश्वविद्यालयों तक जाति-विरोधी आंदोलन ने दशकों तक आंबेडकर को अपने कंधों पर उठाए रखा है। आंबेडकर की मूर्तियां रखने के लिए दलितों का सामाजिक बहिष्कार किया गया और महज अपने फ़ोन पर आंबेडकर की रिंगटोन रखने के लिए जान से मार दिया गया। जाति-विरोधी आंदोलन की यह ताक़त मुख्यतः गरीब और निचले तबके के दलितों ने अपने खून और पसीने से सींची है।

स्वायत्त जाति-विरोधी दलित-बहुजन इतिहास को जेएनयू में दशकों तक मिटाए जाने के तीन कारण संभाव्य हैं। पहला, जेएनयू के वामपंथी या उदारवादी व्यापक दलित-बहुजन आंदोलनों से वाक़िफ़ नहीं थे और दशकों तक इनसे पृथक जीवन जी रहे थे और मुझे पूरा यक़ीन है कि यह सच नहीं हो सकता, क्योंकि ये महान मस्तिष्क तो किसी भी अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक घटना से अछूते नहीं रहते। दूसरा, शायद वे इतने दशकों तक मास हैल्युसिनेशन (मायाजाल) में रह रहे थे और अचानक हुए आविर्भाव से वे जागृत हो गए और मुझे बिलकुल नहीं लगता कि ऐसा हुआ होगा। तीसरा, जिस बात से इतने लंबे समय तक बचते आए हैं, उससे और बचे रहना असंभव हो गया होगा, क्योंकि अचानक वह एक बड़ी ताक़त के रूप में उनके सामने था। मेरे विचार में यह तीसरा कारण ही सच है – ऐसा सच, जिस पर अब और पर्दा नहीं डाला जा सकता। 

दिनांक 17 जनवरी, 2016 के तुरंत बाद यह बापसा ही थी, जिसने नई दिल्ली में जस्टिस फ़ॉर रोहित वेमुला आंदोलन शुरू किया। उसके सदस्य रोहित के बारे में बताने और स्थानीय दलित बाशिंदों को लामबंद करने के लिए जेएनयू के आस-पास के इलाकों में गए, और शुरुआती दिनों में कैंपस के वामपंथी छात्र संगठनों की ओर से उन्हें मिला प्रतिसाद ख़ासा उदासीन था। एचसीयू में हुए विरोध प्रदर्शनों की गंभीरता से धीरे-धीरे वाक़िफ़ होने पर इनलोगों ने आंदोलन में रूचि ली। लगभग उसी समय देश भर में चल रहे जाति-विरोधी उभारों ने उन्हें मजबूर किया कि वे अपने विमर्श में जाति-विरोधी संघर्षों को जगह दें। जेएनयू कैंपस में 9 फ़रवरी, 2016 को हुई घटना के कारण फ़ोकस जाति के सवाल से हटकर जेएनयू कैंपस में होने वाली ‘नेशनल बनाम एंटी-नेशनल’ की सनसनीखेज़ बहसों पर चला गया। भाजपा बैकफ़ुट पर थी, चूंकि स्मृति ईरानी और दत्तात्रेय जैसे मंत्रियों की मिलीभगत से पांच दलित शोध छात्रों का निलंबन किया गया था, जिसकी परिणति एचसीयू में रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के रूप में हुई। इस घटना ने भाजपा को विषयांतर करने का यानी अपने और जेएनयू के बीच का द्वैत खड़ा करने का मौका दे दिया, जिसकी उन्हें बेहद ज़रूरत थी और जाति का प्रश्न जो महत्त्व हासिल कर ही रहा था, वह पीछे दब गया। मीडिया से जितनी तवज्जो जेएनयू को मिली थी, उसे वे उच्च शिक्षा में व्याप्त जाति-भेद को रेखांकित कर बड़ी आसानी भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल कर सकते थे। मगर धीरे-धीरे वह राष्ट्रीय स्तर के फ़ासीवाद-विरोध के वैनगार्ड होने के स्वयं के महिमामंडन के उद्यम में तब्दील हो गया। 

अनेकानेक व्याख्यान शृंखलाओं और मीडिया के द्वारा राष्ट्रवाद के अपने संस्करण को लगातार साबित करने में जेएनयू भाजपा के हाथों खेला गया। आक्रामक होकर बहसों में भाजपा को किनारे करने की बजाय वे उसे जवाब देने में रक्षात्मक हो गए। इस हो-हल्ले में जातिगत भेदभाव का सवाल दब गया, जिसने सबका ध्यान भाजपा बनाम जेएनयू पर केंद्रित कर दिया। अगले कुछ महीनों तक हर दिन जेएनयू में लेक्चर होते। प्रशासकीय भवन के पास, जिसे आज़ादी चौक कहा जाता, सैकड़ों लोग आ बैठते और पार्थ चटर्जी, रोमिला थापर और प्रभात पटनायक जैसे वक्ताओं को सुनते। दिल्ली की सिविल सोसाइटियों और आर्ट सर्किल्स के लोग धीरे-धीरे आने लगे और एक मजमा-सा बन गया, यानी मौज मज़े की जगह। कन्हैया को भारतीय फ़ासीवाद-विरोधी आंदोलन का पोस्टर बॉय बना दिया गया और साथ-साथ भावी नेता के तौर पर शेहला रशीद को सराहा गया। रोहित वेमुला के मित्र, जिन्होंने रोहित वेमुला आंदोलन की अगुआई की थी और गिरफ़्तार होने वाले दीगर दलित छात्रों को नेता के तौर पर समुचित स्पेस न तो मीडिया ने दिया और न ही जेएनयू के नेटवर्क ने। 

उच्च जाति दक्षिणपंथ और वामपंथ, दोनों के लिए ही स्वायत्त दलित आवाज़ को हज़म कर पाना मुश्किल है। पश्चिम के दर्जनों विश्वविद्यालयों और विख्यात वैश्विक अकादमिशियनों की ओर से जेएनयू के प्रति एकजुटता और समर्थन आना शुरू हो गया, लेकिन एचसीयू के छात्रों को बेहद कम समर्थन मिला। बड़े-बड़े वाम-उदारवादी अकादमिशियनों द्वारा महीनों के विमर्श प्रसार और व्याख्यान शृंखला के बाद उम्मीद थी कि ऐसे अनुकूल माहौल के चलते 2016 के चुनावों में वामपंथी छात्र संगठन स्वतंत्र रूप से लड़ेंगे। मगर आइसा और एसएफ़आइ, जो कैंपस में एक-दूसरे के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी हैं, साथ आए तो हर किसी को धक्का-सा लगा। इसमें कोई शक़ नहीं कि ऐसा बापसा की बढ़ती हुई ताक़त के कारण हुआ। बावजूद इसके कि चोटी के अकादमिशियनों द्वारा महीनों चली व्याख्यान शृंखला वामपंथी संगठनों के काम आ सकती थी। जो आइसा अपने अध्यक्षीय मंच से हज़ारों के समक्ष एसएफ़आइ को नंदीग्राम और सिंगुर के हत्यारे करार देती, वह वाम एकता के नाम पर एसएफ़आइ के साथ गठबंधन कर रही थी। 

नागपुर की एक झोपड़पट्टी से आने वाले और समाज विज्ञान में दलित रिसर्च स्कॉलर राहुल सोनपिंपले ने उस साल बापसा की तरफ से अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा। रिक्शा चलाने वाले उनके पिता की मृत्यु बहुत जल्दी हो गई थी और ईंट के भट्टों पर दिहाड़ी काम करने वाली उनकी मां ने उन्हें अकेले पाला था। अपने शुरुआती सालों में उन्होंने पढ़ाई के साथ बाल मजदूरी की थी और अंततः मुंबई के टाटा समाज विज्ञान संस्थान (टीआईएसएस) पहुंचने में सफल हुए। बिहार और गुजरात में काम करने के बाद वे आखिरकार एम.फ़िल के लिए जेएनयू आए। उनकी अभिव्यक्तियां झोपड़पट्टियों के दलितों की रोज़मर्रा के अनुभवों में न केवल गहरे स्थापित थीं, बल्कि व्यापक अध्ययन और दलित-बहुजन आंदोलनों के जमीन से जुड़े विश्लेषणों से युक्त भी थीं। प्रतिनिधित्व के सवाल, जाति को समझने में दृष्टि को ऊंची जातियों की ओर किया जाना, बहुजन सांस्कृतिक इतिहासों के संदर्भ, उत्पीड़ित एकता की गुहार, स्वायत्तता और आत्म-प्रतिनिधित्व; यह उस वर्ष उनके घोषणापत्र में कुछ प्रमुख मुद्दे थे। अध्यक्षीय मंच से उनकी गर्जना कि – ‘इस बार गब्बर नहीं आएगा, इस बार आएगा कबाली’– ने धूम मचा दी। यह इशारा सबाल्टर्न हीरो के उभार को दर्शाने वाली पा रंजीत की फ़िल्म कबाली की ओर था। छात्रों के एक बड़े हिस्से द्वारा यह भाषण बेहद पसंद किया गया। उन्होंने अपने दम पर 1500 वोट हासिल किए और अध्यक्षीय पद की लड़ाई में मात्र 300 वोटों से पीछे रह कर दूसरा स्थान हासिल किया। अन्य तीन पदों के लिए हुए चुनाव में बापसा के प्रत्याशियों में प्रत्येक को 900 वोट प्राप्त हुए। जातिविरोधी छात्र राजनीति के इतिहास में यह बेहद महत्वपूर्ण क्षण था, जिसके बाद बापसा सोशल मीडिया और दलित-बहुजन मीडिया मंचों पर बेहद लोकप्रिय हो गई और आगे चलकर ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के विश्वविद्यालयों में उसकी स्वायत्त इकाइयों का गठन हुआ।

बापसा के दलित छात्रों ने जेएनयू के प्रतिरोध स्पेस में ओडिशा के एक पारंपरिक दलित सांगीतिक प्रदर्शन को प्रस्तुत किया, जिसे गाना बाजा कहा जाता है और जिसमें गाय के चमड़े से मढ़े ढोल इस्तेमाल होते हैं। इसके अलावा तमिलनाडु का पराई, जिसमें तेज़ लय का ज़ोरदार असर और सामूहिक नृत्य होता है, बापसा की मौजूदगी के प्रतीक बन गए। प्रतिरोध की जगहों का यह सौंदर्यशास्त्रीय रूपांतरण था और ब्राह्मणवाद और मनुवाद जैसे शब्द प्रचारित किए गए और जेएनयू कैंपस की राजनीतिक शब्दावली का अभिन्न अंग बनाए गए। पहले कन्वेंशन सेंटर में गांधी और आंबेडकर के बारे में एक छोटे से नाटक के साथ आंबेडकर जयंती मनाई जाती थी, मगर बापसा के आने के बाद इसे हफ़्ते भर चलने वाली संवाद शृंखला के साथ मनाया जाने लगा, जिसकी परिणति 14 अप्रैल की रात को होने वाले भव्य सांस्कृतिक आयोजन से होती है, जिसमें बहुजन नायकों की प्रदर्शनियां सारे मैदान में लगाई जाती हैं।

वर्ष 2017 में भूपाली मगरे नाम की फर्स्ट-जनरेशन दलित महिला, जो अफ़्रीकी अध्ययन में शोध छात्र और बापसा की संयोजक थीं, ने जेंडर सेंसिटाइजेशन कमिटी अगेंस्ट सेक्सुअल हरासमेंट (लैंगिक उत्पीड़न के विरुद्ध जेंडर संवेदीकरण समिति) का चुनाव लड़ा और सबसे अधिक वोटों के साथ जीत हासिल की। चुनावी आंकड़ों के मायने से यह भी एक अहम जीत थी। उन्होंने आगे चलकर जेंडर के सवाल को रोज-ब-रोज जीवन के यथार्थों के साथ गुंथे हुए उत्पीड़ित जाति की महिला के लेंस से बयां किया। ऐसी घटनाओं से कैंपस में बापसा के विमर्श को चर्चा के लायक मुद्दा बनाने में मदद मिली। रोहित वेमुला आंदोलन के ज़ोर पकड़ने के बाद हर तरह की विचारधारा उसमें हिस्सेदारी चाहती थी, सिवाय भाजपा, आरएसएस और एबीवीपी के, जो दरअसल रोहित वेमुला के उत्पीड़न और बहिष्कार के ज़िम्मेदार थे, जिससे अंततः उनकी जान चली गई। दुखद कि चार साल के बाद यह पूछना पड़ता है कि एएसए के वे चार दलित शोध छात्र आज कहां हैं? ये वही चार दलित शोध छात्र हैं, जिन्होंने रोहित वेमुला के साथ अपने सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ एचसीयू में वेलीवाड़ा (तेलुगुभाषी प्रदेशों में दलित बस्ती के लिए प्रयुक्त शब्द) बनाया था और अपने प्रतिरोध के द्वारा जाति-विरोधी आंदोलन को एक नई ऊर्जा प्रदान की थी। 

अकेले राजनीतिक संगठन के तौर पर बापसा के संख्याबल के मद्देनजर बाद के वर्षों में वाम संगठन गठबंधन के लिए अक्सर बापसा के पास आए। कोई सवाल न पूछने से लेकर गठबंधन की पेशकश करने तक – इस तरह कुछ बरसों में बापसा की बढ़ोतरी हुई। कैंपस के अंदर होने वाली दर्जनों प्रतिरोध सभाओं के अलावा नई दिल्ली के राज्य भवनों और मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इन वर्षों मे बापसा द्वारा आयोजित दर्जनों विरोध प्रदर्शन देखे हैं। चाहे सवाल जातिगत ऑनर किलिंग का हो, एससी-एसटी-ओबीसी छात्रों की टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस छात्रवृत्ति का मुद्दा हो या 200 पॉइंट रोस्टर सिस्टम का, बापसा ने देश में दलितों और बहुजनों से जुड़े मुद्दों को संज्ञान में लेने के लिए सरकारी प्रतिष्ठानों को अनेकानेक ज्ञापन सौंपे हैं। पसमांदा मुसलमान, अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी), उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं का आत्म-निर्धारण, जाति जनगणना, विस्थापन, विकलांगता, कॉर्पोरेट द्वारा जमीन हड़पा जाना आदि अहम सवाल संगठन के भीतर और बाहर बहस का मुद्दा बने हैं। जाने-माने वाम संगठन अब भी रामदास आठवले, उदित राज को लेकर अपने पूर्वाग्रह से ग्रस्त सवालों और दलित-बहुजनों के हिंदुत्व आंदोलन के प्यादे होने को लेकर कीचड़ उछालने में ही लगे हैं। समाज विज्ञान संकाय के प्राध्यापक कथित तौर पर खुलेआम कक्षाओं में बापसा के खिलाफ बोले हैं। राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक अजय गुड़ावर्ती तो सितंबर, 2017 में ‘दि डेक्कन हेराल्ड’ में बापसा के खिलाफ़ एक पूरा लेख लिख बैठे, जिसमें उन्होंने बापसा के दलित-बहुजन छात्रों को दक्षिणपंथी एबीवीपी की भांति ही एंटी-इंटेलेकच्युअल करार दिया, जिन्हें वामपंथी संगठनों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि उन्होंने आरक्षण के लिए लड़कर उन्हें संस्थान के भीतर आने का मौका दिया। एबीवीपी और हिंदू दक्षिणपंथी लगातार बापसा को अपने तईं ऊंची जाति वाले भारतीय वाम का हिस्सा करार देने में लगे रहते हैं, जबकि वाम संगठन बापसा को दक्षिणपंथी राजनीति का हिस्सा बताने की कोशिश करते हैं। इस संघर्ष और मतभेदों के बीच बापसा और वाम संगठनों ने बीते सालों में कैंपस के भीतर और बाहर बहुत से प्रतिरोध प्रदर्शनों और सभाओं में मिलकर शिरकत की है। बापसा के अंतर्गत भी विभिन्न मुद्दों, नारों और निरूपणों को लेकर मतभेद रहे हैं। यह इसलिए कि इसके सदस्य मुखतलिफ़ इलाकों, राजनीतिक झुकावों, भाषाओं और संस्कृतियों से आते हैं। ये बहसें जारी रहती हैं जबकि बापसा के मेम्बरान अपनी-अपनी जगहों पर दलित-बहुजन समुदायों के बीच व्याख्याताओं, शोधकर्ताओं, सामुदायिक संगठकों के तौर पर काम करने, मीडिया पोर्टल बनाने और आकांक्षी युवा छात्रों के लिए सपोर्ट सिस्टम बनाने के लिए चले गए हैं। हाल ही में उन्होंने कोविड-19 लॉकडाउन के चलते अनेक राज्यों में अपने घरों में फंसे सैकड़ों गरीब मेहनतकश परिवारों तक राशन पहुंचाया। बापसा के सफर से आम तौर पर भारत की छात्र राजनीति में और ख़ास तौर पर जाति-विरोधी छात्र राजनीति में एक नए चरण का आरंभ हुआ है। छात्रों के बीच जाति-विरोधी विमर्श की चिंगारी सुलगाने में इसके योगदान को भुलाया नहीं जाना चाहिए। 

यह आलेख सुमीत समोस की अंग्रेज़ी में लिखी हुई संस्मरणात्मक पुस्तक ‘अफेयर्स ऑफ़ कास्ट: अ यंग डायरी’ (पैंथर्स पॉ पब्लिकेशन, 2022) के आठवें अध्याय का अनुवाद है। इसे यहां हम लेखक की सहमति से प्रकाशित कर रहे हैं। 

(अनुवाद : भारतभूषण तिवारी, संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुमीत समोस

सुमीत समोस वर्तमान में पॉलिसी संबंधी शोधार्थी हैं। वे जाति, उच्च शिक्षा, ईसाईयत, छात्र राजनीति आदि विषयों पर लेखन करते हैं। वे मूलत: ओडिशा के हैं अैर उन्होंने 2012-17 के दौरान जेएनयू में अध्ययन किया था। बापसा के सदस्य के रूप में वे 2017 से लेकर 2019 तक जुड़े रहे।

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