h n

विश्व के निरंकुश देशों में शुमार हो रहा भारत

गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय, स्वीडन में वी-डेम संस्थान ने ‘लोकतंत्र रिपोर्ट-2024’ में बताया है कि भारत में निरंकुशता की प्रक्रिया 2008 से स्पष्ट रूप से शुरू होती है और धीमी गति से आगे बढ़ती है। ब्यौरा दे रहे हैं अच्छेलाल प्रजापति

अभी हाल में ही वैश्विक लोकतांत्रिक रिपोर्ट-2024 जारी हुई है। यह रिपोर्ट दुनिया की एक भयावह तस्वीर प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट को देखने से यह आभास होता है कि दुनिया उलटी दिशा में चल रही है। यह हमें सोचने पर विवश करती है कि दुनिया में जनता का शासन अर्थात लोकतंत्र निश्चित तौर पर ही खतरे में है। यह रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2023 में दुनिया में औसत व्यक्ति को प्राप्त लोकतांत्रिक अधिकारों का स्तर वर्ष 1985 के स्तर तक नीचे आ गया है। जबकि अपने देश में यह 1998 के स्तर पर आ गया है। रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2009 से वर्ष 2023 तक लगभग 15 वर्षों में निरंकुश देशों में रहने वाली दुनिया की आबादी का हिस्सा लोकतांत्रिक देशों में रहने वाले हिस्से से अधिक हो गया है। पूर्वी यूरोप, दक्षिण एवं मध्य एशिया में लोकतांत्रिक मूल्यों में  गिरावट बहुत अधिक है। लैटिन अमेरिका और कैरेबियन देशों में वैश्विक प्रवृत्ति के विपरीत प्रवृत्ति हैं। यहां लोकतंत्र का स्तर बढ़ा है। यहां के बड़े देश छोटे देशों की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक हो रहे हैं।

दो भागों में बंटती जा रही दुनिया

रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के लगभग आधे देशों में लोकतांत्रिक और आधे में निरंकुश शासन है। आंकड़ों में कहें तो दुनिया में 91 लोकतांत्रिक और 88 निरंकुश शासन है। वर्तमान में दुनिया की 71 प्रतिशत आबादी (5.7 अरब लोग) निरंकुश शासन में रहती है। जबकि दस साल पूर्व 48 प्रतिशत आबादी निरकुंश शासन के अंतर्गत थी। विशेष तौर पर उल्लेख करें तो रिपोर्ट यह भी बताती है कि पूरी दुनिया में सर्वाधिक लोग चुनाव अपनाने वाले निरंकुश शासन में रहते हैं। इन देशों में चुनाव तो संपन्न होता है, लेकिन वह केवल दुनिया को दिखाने के लिए होता है और उसके परिणाम सत्ता पक्ष के अनुकूल होते हैं। दुनिया की आबादी का 44 प्रतिशत (करीब 3.5 अरब लोग) इस तरह के चुनावी निरंकुश शासन के अधीन हैं। जबकि दुनिया की मात्र 29 प्रतिशत आबादी (करीब 2.3 अरब लोग) उदारवादी और चुनावी लोकतंत्र में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इज़राइल लगभग 50 वर्षों में पहली बार उदार लोकतंत्र की श्रेणी से बाहर हो गया है।

पैंतीस देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बढ़ा

लोकतंत्र के लगभग सभी घटक दस साल पूर्व की तुलना में अधिकांश देशों में बेहतर होने की तुलना में बदतर होते जा रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र का बुरी तरह से प्रभावित होनेवाला प्रमुख घटक बन गया है। वर्ष 2023 में 35 देशों में इसकी स्थिति खराब हो रही है। लोगों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छिनी जा रही है। निष्पक्ष चुनाव, प्रभावित होने वाले घटकों में दूसरा प्रमुख घटक है। कुल 23 देशों में इसकी स्थिति खराब हो रही है, जबकि 12 देशों में सुधार हो रहा है। लोकतंत्र की यह मुख्य संस्था अपेक्षाकृत अप्रभावित हुआ करती थी। लेकिन वर्तमान में इसके ऊपर सत्ता का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है। संगठन बनाने की स्वतंत्रता और नागरिक समाज, तीसरा सबसे प्रभावित घटक है। दुनिया के 20 देश इस अधिकार से जनता को रोक रहे हैं जबकि केवल तीन देश इस दिशा में बेहतर वृद्धि कर रहे हैं।

दुनिया भर में कुल 60 देश निरंकुश सत्ता या लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं। इसमें निरंकुशता की लहर विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। कुल 42 देशों में निरंकुशता जारी है, जहां 2.8 अरब (35 प्रतिशत) लोगों की आबादी रहती है। निरंकुश देशों में रहने वाली आबादी का लगभग आधा (18 प्रतिशत) हिस्सा भारत में है। 

ब्राजील एक अलहदा उदाहरण

हालांकि रिपोर्ट के आंकड़ों के आधार पर ऐसी व्याख्या की जा सकती है कि निरंकुशता घट रही है, लेकिन ऐसी व्याख्या से सचेत रहने की आवश्यकता है। रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के 18 देशों में लोकतंत्रीकरण हो रहा है, जिनमें केवल 40 करोड़ लोगों (5 प्रतिशत आबादी) निवास करती है। इनमें 21.6 करोड़ निवासियों के साथ ब्राज़ील के नागरिक आधे से अधिक है। 

दुनिया के 19 देशों में लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी

पूरी दुनिया में निरंकुशता कुछ देशों में या तो पूरी तरह से बढ़ चुकी है या बढ़ने की प्रक्रिया में है। यह स्थिति भविष्य की भयावहता की ओर संकेत कर रही है। कुल 42 देश वर्तमान में निरंकुशीकरण के दौर से गुजर रहे हैं। इन देशों में से 28 अपने निरंकुशीकरण के प्रारंभ में लोकतांत्रिक थे। अर्थात पहले वहां लोकतंत्र मौजूद था, लेकिन अब वहां लोकतंत्र समाप्त हो रहा है। इन 28 देशों में से केवल आधे (लगभग 15) ही वर्ष 2023 में लोकतांत्रिक बने रहेंगे। जबकि निरंकुशीकरण वाले 42 देशों में से 23 देश ‘स्टैंड-अलोन’ (लोकतंत्र से अलग होने) की प्रक्रिया में हैं जबकि 19 देश ‘बेल-टर्न’ (यानी लोकतंत्र अपनाने के कुछ समय बाद ही वापस तानाशाह युग में लौटने) की प्रक्रिया में हैं। ‘स्टैंड-अलोन’ निरंकुशीकरण में सापेक्ष स्थिरता की अवधि के बाद गिरावट की प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से शुरू होती है, और ‘बेल-टर्न’ में निरंकुशता लोकतंत्र के कुछ ही समय बाद होती है, और लोकतंत्रीकरण की अवधि से जुड़ी होती है। वहां लोकतंत्रीकरण के बाद निरंकुशीकरण होता है। निरंकुशता की शुरुआत से पहले इस समूह के दस में से आठ देश लोकतांत्रिक थे। इन आठ में से छह देशों में लोकतंत्र समाप्त हो रहा है, जिनमें कोमोरोस, हंगरी, भारत, मारीशस, निकारागुआ और सर्बिया सम्मिलित हैं। वहीं 2023 में केवल ग्रीस और पोलैंड ही लोकतंत्र बने रहेंगे। 

भारत में राष्ट्रवाद के निशाने पर लोकतंत्र

लोकतंत्र के खात्मे की यह आवृत्ति एक हालिया अध्ययन में देखी जा सकती है, जिसमें दिखाया गया है कि यदि कोई देश निरंकुश होना शुरू करता है तो लगभग 80 प्रतिशत उम्मीद होती है कि वह निरंकुश हो जाय। शीर्ष दस ‘बेल-टर्न’ निरंकुश देशों में से 8 देश लोकतंत्रीकरण के बाद किसी समय लोकतंत्र थे, जिनमें आर्मेनिया, बुर्किना फासो, अल सल्वाडोर, इंडोनेशिया, लीबिया, माली, नाइजर और दक्षिण कोरिया आदि सम्मिलित हैं। निरंकुशता शुरू होने के बाद केवल आर्मेनिया, इंडोनेशिया और दक्षिण कोरिया में ही लोकतंत्र बचा हैंयह दर्शाता है कि लोकतंत्रीकरण की प्रक्रियाएं नाजुक दौर में हैं। संभव है कि उसकी कुछ कमजोरियों की वजह से शासक उसे निरंकुशता की तरफ मोड़ सकता है, अर्थात लोकतंत्रीकरण की यह प्रक्रिया उल्टी पड़ जाती है। 

उम्मीद की धुंधली किरणें

दुनिया के कुछ देश लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया में है या पूरी तरह से लोकतांत्रिक हो गए हैं। गाम्बिया, सेशेल्स, होंडुरास, फिजी, डोमिनिकन गणराज्य, सोलोमन द्वीप, मोंटेनेग्रो, कोसोवो और तिमोर-लेस्ते में से 7 ‘स्टैंड अलोन’ लोकतंत्रवादी देश निरंकुशता से दूर हो गए हैं। ‘स्टैंड अलोन’ लोकतंत्रीकरण में सापेक्ष स्थिरता की अवधि के बाद उन्नयन की प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से शुरू होती है। यह उल्लेखनीय है कि 9 ‘स्टैंड-अलोन’ लोकतंत्रवादी देशों में मात्र 30 मिलियन लोग निवास करते हैं, इनमें से 5 द्वीपीय राज्य हैं। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि दुनिया में मौजूदा लोकतंत्रीकरण का प्रभाव सीमित क्षेत्र तक ही है। मालदीव, जाम्बिया, बेनिन, बोलीविया, ब्राज़ील, उत्तरी मैसेडोनिया, थाईलैंड और ट्यूनीशिया ‘यू-टर्न’ लोकतंत्रीकरण के अंतर्गत आते हैं, जिसका मतलब है कि वैसे देश जो प्रारंभ में लोकतांत्रिक थे, लेकिन बाद में वे निरंकुशता की ओर चले गए थे, लेकिन पुनः वे लोकतंत्रीकरण की ओर मुड़ गए। इनमें से लेसोथो, मालदीव और जाम्बिया ने 2023 तक लोकतंत्र के उस स्तर को बहाल कर दिया है, जो निरंकुशता की शुरुआत से पहले था। अन्य छह – बेनिन, बोलीविया, ब्राज़ील, उत्तरी मैसेडोनिया, थाईलैंड और ट्यूनीशिया – अभी भी निचले स्तर पर हैं। चूंकि ‘यू-टर्न’ लोकतंत्रीकरण का अंतिम परिणाम क्या होगा, यह कोई नहीं जानता है। अभी भी संभावना है कि उनका ग्राफ ऊपर की ओर जारी रहेगा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया सुधार लोकतंत्रीकरण के विशिष्ट क्षेत्र हैं। सभी लोकतांत्रिक देशों में से आधे से अधिक में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया सुधार में काफी वृद्धि हो रही है।

भारत में लोकतंत्र की बदहाली

गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय, स्वीडन में वी-डेम संस्थान ने ‘लोकतंत्र रिपोर्ट-2024’ में बताया है कि भारत में निरंकुशता की प्रक्रिया 2008 से स्पष्ट रूप से शुरू होती है और धीमी गति से आगे बढ़ती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत की निरंकुशीकरण प्रक्रिया को देखा और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में दर्ज किया गया है, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में क्रमिक लेकिन गुणोत्तर गिरावट, मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध, सोशल मीडिया पर कार्यवाही, सरकार के आलोचक पत्रकारों का उत्पीड़न, अल्पसंख्यक समुदायों पर हमला और विपक्ष को धमकी शामिल है। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ हिंदू-राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आलोचकों को चुप कराने के लिए राजद्रोह, मानहानि और आतंकवाद विरोधी कानूनों का व्यापक उपयोग किया है। भाजपा सरकार ने 2019 में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) में संशोधन करके संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता को कमजोर कर दिया। मोदी के नेतृत्व वाली सरकार धार्मिक अधिकारों की स्वतंत्रता को भी दबाने का कार्य किया है। राजनीतिक विरोधियों और सरकारी नीतियों का विरोध करने वाले लोगों को डराना-धमकाना, साथ ही शिक्षा जगत में असहमति के स्वर को चुप कराना सामान्य हो गया है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं का उपयोग भी विपक्षी नेताओं को डराने और सत्ता प्राप्त करने का आरोप बड़ी ही प्रमुखता से उठ रहा है, जिसके कारण भारत 2018 में चुनावी निरंकुशता में निचले पायदान पर चला गया और 2023 के अंत तक इस श्रेणी में शामिल हो जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है। 

बहरहाल, दुनिया भर में 25 देश निरंकुशता की ओर बढ़ रहे हैं, जिसका अर्थ है कि उनमें गिरावट के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। यदि इसमें वृद्धि जारी रही, तो निकट भविष्य में कई देश निरंकुश देशों की सूची में शामिल हो सकते हैं। वहीं 9 देश लोकतंत्रीकरण की ओर बढ़ रहे हैंयह एक अच्छा संकेत है और इस प्रकार संभावित रूप से इनका भविष्य उज्ज्वल है। इस वर्ष 60 देशों में राष्ट्रीय चुनाव हो रहे हैं। इनमें से 31 का लोकतंत्र स्तर खराब हो रहा है, जबकि केवल 3 देशों में सुधार हो रहा है। यह अच्छा संकेत नहीं है। चुनाव लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण घटना है, जो लोकतंत्रीकरण को गति प्रदान कर सकते हैं, निरंकुशता को सक्षम कर सकते हैं, या निरंकुश शासनों के स्थिरीकरण में सहायता कर सकते हैं। इसलिए चुनाव की निष्पक्षता लोकतंत्र का भविष्य तय करेगा।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

अच्छेलाल प्रजापति

लेखक झारखंड के पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड के राजकीयकृत +2 उच्च विद्यालय, हरिनामांड में भूगोल के शिक्षक हैं

संबंधित आलेख

मोदी दशक में मुसलमान
भाजपा की निगाह पसमांदा मुसलमानों के वोट पर है। गौरतलब है भाजपा एक विचारधारा आधारित पार्टी है, जिसका वैचारिक आधार आरएसएस के हिंदुत्व की...
छत्तीसगढ़ : सोनी सोरी-मनीष कुंजाम ने बीजापुर मुठभेड़ को बताया फर्जी, न्यायिक जांच की मांग
सोनी सोरी ने दूरभाष पर कहा कि पुलिस जिसे माओवादी नक्सलियों से मुठभेड़ बता रही है, वह फर्जी है। उन्होंने कहा कि मारे गए...
योगी आदित्यनाथ के आरक्षण विरोध के मायने
योगी आदित्यनाथ अपने आलेख में दलित-पिछड़ी जातियों के साथ जो असमानता और भेदभाव होता रहा है, उसे दूर करने का तो कोई उपाय नहीं...
चरण-दर-चरण मद्धिम हो रही ‘मोदी ब्रांड’ की चमक
भारतीय समाज और राजनीति के गंभीर अध्येताओं ने अब यह कयास लगाना आरंभ कर दिया है कि भाजपा 2019 के अपने प्रदर्शन को फिर...
लोकसभा चुनाव : आरएसएस की संविधान बदलने की नीयत के कारण बदल रहा नॅरेटिव
क्या यह चेतना अचानक दलित-बहुजनों के मन में घर कर गई? ऐसा कतई नहीं है। पिछले 5 साल से लगातार सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों और...