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कांग्रेस के ‘आदिवासी न्याय गारंटी’ का मतलब

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि जातिगत जनगणना कराने के बाद उनका दूसरा काम देश के किसानों के लिए कानूनन एमएसपी की गारंटी को सुनिश्चित करना होगा। इसके तहत आदिवासी क्षेत्रों में वन उपज को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के तहत लाया जाएगा। बता रहे हैं रविन्द्र पटवाल

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपना घोषणापत्र 5 अप्रैल, 2024 को जारी कर दिया। हालांकि आदिवासियाें के बारे में घोषणाएं बीते 12 मार्च, 2024 को ही कांग्रेस के आधिकारिक ट्वीटर हैंडल से राहुल गांधी के एक संदेश के रूप में जारी किया गया। इसमें करीब एक मिनट का वीडियो और आदिवासियों के लिए छह प्रतिबद्धताएं थीं– सुशासन, सुधार, सुरक्षा, स्वशासन, स्वाभिमान और सब-प्लान योजना का पुनर्स्थापन। दरअसल, कांग्रेसी नेता राहुल गांधी ने अपनी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान महाराष्ट्र के नंदुरबार में ‘आदिवासी न्याय सम्मेलन’ के मौके पर कुछ बेहद अहम घोषणाएं की थीं। ठीक उसी दिन दिल्ली में भी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर कांग्रेस की ‘आदिवासी न्याय गारंटी’ के तहत अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों के संरक्षण के संदर्भ में विभिन्न पहलुओं के बारे में देश की मीडिया के साथ जानकारी साझा की। हालांकि 5 अप्रैल, 2024 को जब कांग्रेस की तरफ से घोषणापत्र आधिकारिक रूप से जारी किया गया तो इनमें दो वायदों को छोड़ सभी वायदे शामिल किए गए। 

इससे पहले कि हम कांग्रेस की उपरोक्त छह प्रतिबद्धताओं पर विचार करें, हमें आदिवासियों के हालात पर नजर डाल लेनी चाहिए। जाहिर तौर पर इसके लिए अलग से किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है कि आज आदिवासियों के पास सदियों से जल-जंगल-जमीन पर उनका जो प्राकृतिक अधिकार था, उसे उनसे जबरन छीना जा रहा है। जंगलों को काट-काटकर देशी-विदेशी पूंजी के लिए प्राकृतिक संसाधनों की लूट को ज्यादा से ज्यादा सुगम बनाने के लिए सड़कों का निर्माण किया जा रहा है। उन आदिवासियों को पलायन करने के लिए विवश किया जा रहा है, जो अभी तक तथाकथित सभ्यता की तरफ झांकना तक पसंद नहीं करते थे। जंगल के भीतर से अपनी आजीविका को आज तक अर्जित करने वाले आदिवासियों का शोषण किस पैमाने पर हो रहा है, इसके लिए हम महानगरों की उन अनेकानेक कहानियों से जानकारी हासिल कर सकते हैं, जिनमें घरेलू सहायिकाओं के साथ बर्बर व्यवहार, यौन शोषण, बेगारी, बंधुआ मजदूरी, ईंट भट्टे पर दिन-रात काम करने वाले आदिवासी परिवारों की दारुण कहानियां रोज-बरोज हमारे आंखों के सामने से गुजरती रहती हैं।

खैर, अब चूंकि देश में चुनाव है तो लगभग सभी राजनीतिक दल आदिवासियों के बारे में तमाम तरह के दावे कर रही हैं। इनमें कांग्रेस भी शामिल है। और यह भी बेवजह नहीं है।

दरअसल, पिछले 10 वर्षों से केंद्र की सत्ता से बेदखल होकर आज कांग्रेस के सामने भी अपने अस्तित्व की लड़ाई का प्रश्न खड़ा हो गया है। दक्षिण में थोड़ा-बहुत आधार को यदि छोड़ दिया जाये तो कमोबेश समूचे उत्तर और पश्चिम भारत में हिंदुत्ववादी उभार के साथ-साथ सामजिक न्याय को आधार बनाकर पिछले कुछ दशकों में आई क्षेत्रीय शक्तियों ने कांग्रेस की समावेशी धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए कोई जगह नहीं छोड़ रखी है। ऐसे में कांग्रेस यह बखूबी जानती है कि दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की सटीक संख्या के लिए जनगणना कराने और उनकी आबादी के अनुपात में उनके लिए संसाधनों में हिस्सेदारी की मांग उठाकर ही वह मतदाताओं के बीच पैठ बना सकती है। 

भारत जोड़ो यात्रा के दौरान आदिवासी समुदाय के एक सदस्य से बातचीत करते राहुल गांधी व प्रियंका गांधी

वैसे यह उल्लेखनीय है कि देश में करीब 11 करोड़ आबादी वाले आदिवासी समुदायों के अधिकारों को संरक्षित करने के लिए पहली बार किसी राष्ट्रीय पार्टी की ओर से ठोस नीतियों को तैयार किये जाने के लिए गंभीरता से प्रयास किया जा रहा है। 

मसलन, मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस का आकलन पेश करते हुए स्पष्ट किया कि पिछले 10 वर्षों के दौरान भाजपा के शासनकाल में आदिवासियों का दमन और शोषण तेज हुआ है। उन्हें लगातार उनके प्राकृतिक आवास, जल-जंगल-जमीन से बेदखल किया जा रहा है। उनके खिलाफ आपराधिक मामले लगाए जा रहे हैं। आदिवासी महिलाओं और बच्चियों के साथ जबरन बलात्कार की घटनाओं पर कोई सुध लेने वाला नहीं है। खड़गे ने आदिवासियों को जंगल से परंपरागत रूप से उपलब्ध होने वाले कंद-मूल फल या वन उपज का उपयोग करने से प्रतिबंधित किये जाने का सवाल भी उठाया, क्योंकि इसके अभाव में जब आदिवासी रोजी-रोटी की तलाश में जंगल से बाहर निकलता है तो उसे बंधुआ मजदूर के बतौर औने-पौने दामों पर काम करने के लिए विवश होना पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में अनुसूचित जनजाति से जुड़े लोग प्रवासी मजदूर के तौर पर शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं, लेकिन उनका बड़े पैमाने पर आर्थिक और मानसिक शोषण जारी है। 

खैर, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और उसके नेता राहुल गांधी, दोनों ने छह प्रतिबद्धताओं – सुशासन, सुधार, सुरक्षा, स्व-शासन, स्वाभिमान के साथ-साथ सब-प्लान को पुनर्स्थापित करने – की बात कही है।  

मसलन, वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक राष्ट्रीय मिशन की स्थापना का प्रस्ताव भी कांग्रेस के दोनों बड़े नेताओं द्वारा पेश किया गया है, जिसके लिए अलग से बजट का प्रावधान करने की बात कही गई है।

दो अलग-अलग जगहों पर खड़गे और राहुल गांधी ने लगभग एक स्वर में कहा कि हम वनाधिकार कानून के तहत दावों को एक साल के भीतर निपटाने का प्रयास करेंगे और छह महीने के भीतर सभी खारिज किए गए दावों की समीक्षा करने की प्रक्रिया स्थापित करने की प्रतिज्ञा करते हैं। दोनों ने यह भी कहा कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है, तो वह मोदी सरकार द्वारा किए गए वन संरक्षण एवं भूमि अधिग्रहण अधिनियमों में सभी संशोधनों को रद्द करने की कसम खाती है, जिसने आदिवासियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

दोनों नेताओं ने यह भी विशेष तौर पर उल्लेख किया कि कांग्रेस सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उन सभी बस्तियों या समूहों को अनुसूचित क्षेत्रों के रूप में नामित करने के लिए प्रतिबद्ध है, जहां अनुसूचित जनजाति के सदस्य सबसे बड़े सामाजिक समूह का गठन करते हैं। ऐसे ही यह कि उनकी पार्टी ग्राम सरकारों और स्वायत्त जिला सरकारों की स्थापना के लिए पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम (पेसा) 1996 मूल कानून के अनुरूप राज्य कानून बनाएगी। इसके अलावा, दोनों नेताओं ने कहा कि देश के किसानों के लिए प्रस्तावित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के अधिकार की तर्ज पर आदिवासी क्षेत्रों के लिए लघु वन उपज (एमएफपी) को कानूनी सुरक्षा प्रदान करेगी।

कांग्रेस के दोनों नेताओं ने यह प्रतिबद्धता भी जाहिर की कि अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए समान बजटीय संसाधन सुनिश्चित करने के लिए 1970 के दशक के अंत में इंदिरा गांधी द्वारा अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए शुरू की गई विशेष घटक योजना अनुसूचित जाति उपयोजना (एससीएसपी) और जनजातीय उपयोजना (टीएसपी) में 2014 में मोदी सरकार द्वारा संशोधन कर उसके नाम और मूल भावना को बदलकर एससी-एसटी के काफी हद तक विपरीत कर दिया गया। सत्ता में आने पर कांग्रेस मूल योजना को फिर से लागू करेगी। उनका कहना है कि आदिवासियों के उपयोजना के तहत जो राशि निर्धारित की जाती है, अगर वह उस वित्तीय वर्ष खर्च नहीं हो पाती है तो वह राशि बेकार नहीं जाएगी या फिर दूसरे मद में उसका उपयोग नहीं किया जा सकेगा, बल्कि उसे अगले वर्ष की उपयोजना की राशि में जोड़ दिया जाएगा।

इसके पहले महाराष्ट्र में एक रैली में आदिवासी समुदाय को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने स्पष्ट किया था कि शासन में आने पर हमें सबसे पहले दो काम करने हैं। पहला, देश में सबकी गिनती करनी है। देश में कुल कितने आदिवासी, दलित, पिछड़े हैं; इन सबका पता लगाना है। उसके बाद आर्थिक एवं वित्तीय सर्वेक्षण के माध्यम से इस बात का पता लगाना होगा कि हिंदुस्तान की विभिन्न संस्थाओं, सरकारी नौकरियों सहित बड़ी कंपनियों और देश की नौकरशाही में आदिवासियों की कितनी भागीदारी है। क्या यह भागीदारी 8 प्रतिशत है या नहीं? अगर नहीं है तो उतने प्रतिनिधित्व के लिए काम करना होगा। 

राहुल गांधी ने कहा कि दूसरा काम देश के किसानों के लिए कानूनन एमएसपी की गारंटी को सुनिश्चित करना। इसके तहत आदिवासी क्षेत्रों में वन उपज को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के तहत लाया जाएगा। 

गौरतलब है कि यूपीए शासनकाल में आदिवासी समुदाय के हक में वनाधिकार कानून लाया गया था, लेकिन बकौल राहुल गांधी भाजपा ने उसे कमजोर कर दिया है। उनके मुताबिक, आज आदिवासियों को उनके वाजिब हक नहीं दिए जा रहे हैं, उनके दावों को ख़ारिज किया जा रहा है। जैसे ही कांग्रेस की सरकार केंद्र में आती है, तो एक साल के भीतर ही आदिवासियों के सभी दावों का निपटान कर उनकी जमीन उनके हवाले कर दी जाएगी। जिन दावों को ख़ारिज कर दिया गया है, उन सभी को छह माह के भीतर समीक्षा कर यथोचित कार्रवाई कर हकदारों को सुपुर्द कर दिया जाएगा। 

इसके अलावा मल्लिकार्जुन खड़गे व राहुल गांधी ने अपने एजेंडे में 50 प्रतिशत से अधिक आदिवासी आबादी वाले क्षेत्रों को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किए जाने पर भी अपनी वचनबद्धता दोहराई। राहुल गांधी के अनुसार, इसके तहत आदिवासी सभी स्थानीय फैसलों को स्वंय तय करने के लिए सक्षम हो जाएंगे।

निश्चित रूप से कांग्रेस पार्टी ने 2024 के आम चुनाव के मद्देनजर, पहले की तुलना में अपनी नीतियों को ज्यादा ठोस एवं जनोन्मुखी बनाने का प्रयास किया है। देखना है कि इस चुनाव में देश के आदिवासी कांग्रेस के वादों पर कितना यकीन करते हैं। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

रविन्द्र पटवाल

लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा-दीक्षा के साथ-साथ छात्र जीवन में सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में भागीदार रहे हैं। संप्रति विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक, आर्थिक एवं भू-राजनीतिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के अलावा अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद का काम करते हैं।

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