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उत्तर प्रदेश में लड़ रही हैं मायावती, लेकिन सवाल शेष

कई चुनावों के बाद लग रहा है कि मायावती गंभीरता से चुनाव लड़ रही हैं। चुनाव विश्लेषक इसकी अलग-अलग वजह बता रहे हैं। पढ़ें, सैयद जै़ग़म मुर्तज़ा की रपट

अभी एक महीने पुरानी भी तो बात नहीं है जब हर तरफ भाजपा के ‘चार सौ पार’ नारे की चर्चा थी। तमाम लोग मान बैठे थे कि एकदम एकतरफा मुक़ाबला है और भाजपा उत्तर प्रदेश में सभी अस्सी सीटें जीत जाएगी। लेकिन पहले चरण की वोटिंग होते-होते यह चुनाव दिलचस्प हो गया। अब प्रदेश की कई सीटों पर दिलचस्प मुक़ाबला है। इससे भी दिलचस्प बात यह है कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इस मुक़ाबले को कई जगहों पर त्रिकोणीय बना रही है।

एक महीने पहले तक भाजपा के ‘चार सौ पार’ के दावों के दरमियान सियासी गलियारों में एक और बड़ा सवाल लोग पूछते थे। लोग जानना चाहते थे कि इस चुनाव में या चुनाव के बाद मायावती का आख़िर होगा क्या? यह जिज्ञासा बेवजह नहीं थी। वर्ष 2017 से ही मायावती पर लगातार भाजपा की मदद करने के आरोप लग रहे थे। बसपा इन आरोपों को मनुवादी मीडिया की साज़िश कहकर टाल जाया करती थी। मगर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के अलावा 2017 और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि बसपा ने भाजपा के समक्ष तक़रीबन आत्मसमर्पण ही कर दिया था।

अगर 2017 के बाद से उत्तर प्रदेश के वोटिंग पैटर्न पर निगाह डालें तो बसपा पर लगने वाले आरोप पूरी तरह निराधार भी नज़र नहीं आते। उत्तर प्रदेश की जिन सीटों पर नज़दीक़ी मुक़ाबला रहा करता था, वहां 2009 के बाद से जीत का फासला लगातार बढ़ता गया है। इसे लेकर आरोप लगे कि बसपा के कोर वोटर भाजपा की तरफ खिसक रहे हैं। हालांकि चुनावी विश्लेषक तब भी मानते रहे कि ग़ैर-जाटव वोटर भले ही इधर-उधर हुए हैं, लेकिन जाटवों की निष्ठा में कोई बदलाव नहीं आया है। लेकिन यह दावा भी पूरी तरह साबित नहीं किया जा सकता।

मायावती, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बहुजन समाज पार्टी

बसपा द्वारा भाजपा की मदद करने के आरोपों को उस वक़्त बल मिला जब 2009 के चुनाव के बाद एक तथाकथित वीडियो वायरल हुआ था। इसमें मायावती कहती नज़र आ रही हैं कि एक कट्टरपंथी उम्मीदवार को हराने के लिए उन्होंने भाजपा को अपना वोट ट्रांसफर करा दिया। इसी तरह एमएलसी चुनावों के बाद एक और वीडिया वायरल हुआ, जिसमें वह कहती नज़र आ रही हैं कि सपा उम्मीदवारों को हराने के लिए उन्होंने अपने विधायकों से कहा है कि अपना पूरा ज़ोर लगा दें और ज़रूरत पड़े तो भाजपा की मदद करें। हालांकि बसपा नेताओं ने इन्हें झूठा और भ्रामक प्रचार बताया। 

यह वीडियो छेड़छाड़ करके फर्ज़ी तरीक़े से बनाई गई भी हों, तब भी बसपा को इनसे बड़ा नुक़सान तो पहुंचा ही। इनकी वजह से अल्पसंख्यक वोटरों का बसपा पर भरोसा कम हुआ। इसका नतीजा 2022 के विधानसभा चुनाव में उसे भुगतना पड़ा। बावजूद इसके कि तमाम सीटों पर मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट दिए, लेकिन वे पार्टी को अपेक्षित सफलता दिला पाने में नाकाम रहे। इतना ज़रूर हुआ कि जहां-जहां मायावती ने समाजवादी पार्टी या कांग्रेस के मुसलमान उम्मीदवार के सामने मुसलमान और यादव के सामने यादव को टिकट दिया, वहां-वहां भाजपा को फायदा मिला। ऐसी 110 में से 67 सीटों पर भाजपा की सीधी जीत हुई। बसपा का पूरे प्रदेश में एक ही विधायक चुनकर आया। इसके बाद समाजवादी पार्टी ने अपनी हार का ठीकरा मायावती के सिर पर ही फोड़ा। 

लेकिन 2024 में तस्वीर थोड़ी बदली नज़र आ रही है। हालांकि मायावती ने अभी भी भाजपा विरोधी गठबंधन को नुक़सान पहुंचाने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी है, लेकिन बसपा के कई उम्मीदवार ऐसे हैं, जो वास्तव में गंभीर चुनौती देते नज़र आ रहे हैं। सहारनपुर में बसपा ने कांग्रेस के इमरान मसूद के सामने माजिद अली को टिकट दिया है। संभल में सपा के ज़ियाउर्रहमान बर्क़ के सामने सौलत अली बसपा के उम्मीदवार हैं। अमरोहा में बीएसपी उम्मीदवार मुजाहिद हुसैन कांग्रेस के दानिश अली को चुनौती दे रहे हैं। 

वहीं मैनपुरी में बसपा ने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी और पूर्व सांसद डिंपल यादव के सामने गुलशन देव शाक्य का टिकट काटकर अब शिव प्रसाद यादव को उम्मीदवार बनाया है। इसी तरह फिरोज़ाबाद में उसने सपा नेता रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय के सामने उम्मीदवार बदला है। यहां सतेंद्र जैन शौली के बदले अब चौधरी बशीर को उम्मीदवार बनाया गया है। बदायूं में शिवपाल सिंह यादव के बेटे आदित्य के सामने बसपा ने मुस्लिम ख़ां को उम्मीदवार बनाया है। ज़ाहिर है, ये अखिलेश यादव परिवार को बसपा की सीधी चुनौती है।

इधर बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सामने बसपा ने अथर जमाल लारी को टिकट देकर विपक्ष के वोटों में बंटवारा सुनिश्चित कर दिया है। ज़ाहिर है इन उम्मीदवारों के ऐलान से समाजवादी पार्टी की परेशानी और नाराज़गी दोनों ही बढ़ी हैं। समाजवादी पार्टी नेता खुलकर तो कुछ नहीं बोल रहे हैं, लेकिन दबी ज़बान में कह रहे हैं कि डिंपल, आदित्य, और अक्षय के सामने बसपा के उम्मीदवार भाजपा ने तय किए हैं। 

ज़ाहिर तौर पर राजनीति में इस तरह के आरोप लगते रहते हैं और मायावती को अब इनकी आदत हो चुकी है। लेकिन कम से कम 12 सीटों पर बसपा उम्मीदवार भाजपा के साथ डील के आरोपों को नकारते हैं। जौनपुर से बाहुबली नेता धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला रेड्डी, बिजनौर में जाट नेता चौधरी बिजेंन्द्र सिंह, मुज़फ्फरनगर में केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के सामने ओबीसी उम्मीदवार दारा सिंह प्रजापति, ग़ाज़ियाबाद में नंद किशोर पुंडीर, मेरठ से देवव्रत त्यागी, बाग़पत के प्रवीण बंसल, कैराना से श्रीपाल सिंह और अलीगढ़ से हितेंद्र सिंह बंटी को टिकट देकर बसपा ने भाजपा का गणित गड़बड़ा दिया है।  

कुल मिलाकर, कई चुनावों के बाद लग रहा है कि मायावती गंभीरता से चुनाव लड़ रही हैं। चुनाव विश्लेषक इसकी अलग-अलग वजह बता रहे हैं। पत्रकार मोहम्मद रज़ा के मुताबिक़ मायावती के सामने अस्तित्व का संकट है। उन्हें बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाना है और दिल्ली वाला बंगला भी। मुरादाबाद के सुरेंद्र सैनी कहते हैं कि मायावती का फोकस लोकसभा चुनाव नहीं है, बल्कि इसके ज़रिए वो अगले विधानसभा चुनाव में बने रहने की जुगत लगा रही हैं। 

बसपा उम्मीदवारों को लेकर मेरठ के सुरेश अग्रवाल के मुताबिक़ मायावती ने जिस तरह के उम्मीदवार दिए हैं उससे भाजपा के अस्सी सीट जीतने के लक्ष्य को झटका तो लगा है। बिजनौर के मूलचंद कहते हैं कि बसपा ने सपा और भाजपा दोनों का गणित ख़राब किया है क्योंकि इस चुनाव में उनका प्रदर्शन हल्का रह जाता है तो फिर उनकी पार्टी की प्रासंगिकता ख़त्म हो जाएगी। ग़ाज़ियाबाद के सुबोध जाटव के मुताबिक़ बसपा ने मज़बूत उम्मीदवार दिए हैं, क्योंकि बहनजी का लक्ष्य मज़बूत वापसी करना है। सुबोध दावा करते हैं कि बहनजी ने इसीलिए कांग्रेस या भाजपा से गठबंधन नहीं किया क्योंकि वो कम सीटों पर लड़कर अपना वोट प्रतिशत कम नहीं करना चाहती थीं।

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि देश की सियासत में मायावती की प्रासंगिकता अभी ख़त्म नहीं हुई है। लेकिन आम चुनाव 2024 के बनते-बिगड़ते समीकरणों के दरमियान एक बार फिर सबकी नज़र इस बात पर है कि बसपा का कोर वोटर किस दिशा में जा रहा है। यह बात यक़ीनी तौर पर कही जा सकती है कि अगर उसका कोर वोटर पार्टी के साथ रहा तो भाजपा को सबसे ज़्यादा नुक़सान होगा। मानकर चलिए, अगर मायावती 20 सीट पर भी मज़बूती से लड़ गईं तो भाजपा को यूपी से पचास सीट जीतने में पसीने आ जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो इंडिया गठबंधन बीस सीट के पार नहीं जा पाएगा।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

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