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सवर्ण सबसे बीमार सामाजिक समूह, लोकसभा चुनाव परिणाम ने भी किया साबित

यह वही समुदाय है, जो दिन-रात मुसलमानों के प्रति घृणा उगलने वाले योगी-मोदी को अपना नायक मानता है। यही उन जाटव, यादव, पासी, कुर्मी, कुशवाहा आदि दलित-पिछड़े नेताओं से घृणा करते हैं, जो भाजपा को मजबूत चुनौती देते हैं। बता रहे हैं डॉ. सिद्धार्थ

इस बार के लोकसभा चुनाव के परिणाम ने भी यह साबित कर दिया है कि सामूहिक तौर पर द्विज अथवा सवर्ण समुदाय अपनी – संवेदना, चेतना और व्यवहार – तीनों स्तरों पर सबसे अधिक बीमार समुदाय है। यही समुदाय संविधान और संविधान के बुनियादी मूल्यों – समता, स्वतंत्रता और भाईचारे – का सबसे अधिक विरोधी है। यही समुदाय लोकतंत्र के सबसे अधिक खिलाफ है। यही समुदाय संविधान प्रदत्त आरक्षण से सबसे अधिक घृणा करता है। यही समुदाय गोडसेवादी शक्तियों का सबसे बड़ा सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक आधार है। यह कहना भी अतिरेक नहीं कि यही समुदाय हिंदुत्व के बुखार से सबसे अधिक ग्रसित है। इस बुखार से पैदा होने वाली घृणाओं के सबसे बड़े वाहक इसी समुदाय के लोग हैं।

यह वही समुदाय है, जो दिन-रात मुसलमानों के प्रति घृणा उगलने वाले योगी-मोदी को अपना नायक मानता है। यही उन जाटव, यादव, पासी, कुर्मी, कुशवाहा आदि दलित-पिछड़े नेताओं से घृणा करते हैं, जो भाजपा को मजबूत चुनौती देते हैं। इसी समुदाय के लोग अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और चंद्रशेखर आजाद को खलनायक के रूप में देखते हैं।

ये यही लोग हैं, जो जातिगत जनगणना, सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण, आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी और आरक्षण के पक्ष में खड़े होने के चलते राहुल गांधी को नफरत भरी निगाह से देख रहे हैं। यही लोग ‘अरबन नक्सल’, ‘टुकटे-टुकड़े गैंग’ और ‘नक्सली-माओवादी’ जैसे शब्द घृणा के साथ अपनी जुबान पर बार-बार लाते हैं। ये वही लोग हैं, जो लालू यादव को ‘ललुआ’ कहते हैं और मुलायम सिंह यादव को ‘मुलयमवा’ कहते थे।

ऐसा नहीं है कि सवर्णों के अलावा अन्य वर्ण-जातियां हिंदुत्व के बुखार से ग्रसित नहीं हुईं या नहीं होती हैं। लेकिन इनका बुखार सामान्य बुखार होता है, जल्दी उतर जाता है। मसलन, 2024 का लोकसभा चुनाव परिणाम बता रहा है कि बहुतों का बुखार उतर भी रहा है। लेकिन सवर्णों का हिंदुत्व का बुखार जुड़ी (टाइफाइड) में बदल गया है। वे अकबका रहे हैं। यहां तक कि उत्तर प्रदेश को कुत्ता प्रदेश तक कह रहे हैं। अयोध्या (फैजाबाद) के उन मतदाताओं को तरह-तरह की गालियां दे रहे हैं, उन्हें गद्दार कह रहे हैं, उन्हें बाबरी मस्जिद वाला कह रहे हैं, जिन्होंने राम के नाम पर वोट मांगने वालों और खुद को राम का प्रतिनिधि कहने वालों को हरा दिया और वह भी शंबूक के एक वंशज के हाथों।

अब भी सामाजिक दुर्भावनाओं से ग्रस्त है सवर्ण समुदाय

कोई कह सकता है कि सवर्णों में कई लोग हैं, जो मोदी-योगी को कट्टर विरोधी हैं, उन्हें चुनौती देते हैं, उनके खिलाफ संघर्ष करते हैं, यहां तक कि जेल भी जाते हैं। लेकिन ऐसे कुछ व्यक्ति ही हैं। वे सवर्णों के मूल सामूहिक संवेदना या चेतना के प्रतिनिधि नहीं हैं। इन लोगों को सवर्णों के बीच, यहां तक उनके परिवारों में गद्दार की तरह देखा जाता है। जैसे आरएसएस-भाजपा वालों के साथ दलित-बहुजनों के बीच के कई सारे गद्दार हैं, उसी तरह सवर्णों के बीच कुछ ‘गद्दार’ (रेडिकल) हैं।

हालांकि इनके चिंतन की अपनी समस्याएं और सीमाएं हैं, जो उनके संस्कार और सामाजिक समूह की विरासत से जुड़ी हुई हैं।

क्या मैं सवर्णों के बारे में उपरोक्त बातें मनगढ़त आधार पर कह रहा हूं? क्या मेरा यह मनोगत आकलन है? नहीं, 2024 का लोकसभा चुनाव और उसका परिणाम इसकी पुष्टि करते हैं। सबसे पहले दो सवर्ण बहुल राज्यों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को लेते हैं। उत्तराखंड 19 प्रतिशत दलित हैं। जबकि ओबीसी 18.3 प्रतिशत (जिनमें मुस्लिम और सिख समुदाय भी शामिल हैं) और आदिवासी समुदाय की आबादी सिर्फ 3 प्रतिशत के आसपास है। बाकी अधिकांश उच्च जाति (लगभग 60 प्रतिशत) के हैं। यहां पिछले तीन लोकसभा चुनावों से भाजपा लगातार जीत रही है। इस बार भी उसे सभी पांचों सीटों पर जीत मिली है। महत्वपूर्ण यह कि यहां सिर्फ भाजपा जीती ही नहीं है, बल्कि उसे सभी सीटों पर बड़े अंतर से जीत मिली है। यहां भाजपा को कुल मिलाकर 56.18 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि कांग्रेस को 32.83 प्रतिशत वोट मिले हैं। कांग्रेस को मिले वोटाें का बहुलांश हिस्सा मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों और सिख समुदाय के लोगों का होगा। भाजपा को कांग्रेस से करीब 25 प्रतिशत अधिक वोट मिले हैं। यहां कहीं भी कोई प्रत्याशी भाजपा के नजदीकी मुकाबले में नहीं था। नैनीताल-उधम सिंह नगर सीट पर हार और जीत के बीच अंतर 3 लाख 34 हजार 548, टिहरी में यह अंतर 2 लाख 72 हजार 493, अल्मोड़ा में यह अंतर 2 लाख 34 हजार 97, गढ़वाल में यह अंतर 1 लाख 63 हजार 503 और हरिद्वार में यह अंतर 1 लाख 64 हजार 56 वोटों का था। कांग्रेस कहीं भी चुनौती देने की स्थिति में नहीं थी।

कमोबेश यही स्थिति सवर्ण वोटर बहुल हिमाचल प्रदेश की भी है। यही कारण है कि यहां आज तक कोई गैर-राजपूत या गैर-ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना है। यहां की चारों सीटें भी भाजपा ने जीत ली है। यहां किसी भी सीट पर कांग्रेस और भाजपा के बीच नजदीकी मुकाबला नहीं था। मसलन, कांगड़ा सीट को भाजपा ने 2 लाख 51 हजार 895 वोटों के अंतर से जीता। ऐसे ही हमीरपुर सीट उसने 1 लाख 82 हजार 357 वोटों के अंतर से, शिमला सीट 91 हजार 491 और मंडी सीट 74 हजार 755 वोटों के अंतर से जीता। पूरे प्रदेश के स्तर पर भाजपा को 56.44 प्रतिशत वोट मिले। जबकि कांग्रेस को 41.67 प्रतिशत वोट मिले। दोनों के बीच वोटों का अंतर करीब 15 प्रतिशत रहा। हिमाचल में मुस्लिम आबादी नहीं के बराबर है। यहां 25.22 फ़ीसदी अनुसूचित जाति, 5.71 फ़ीसदी अनुसूचित जनजाति, 17.1 फ़ीसदी ओबीसी और बाकी उच्च जाति (राजपूत और ब्राह्मण) के लोग हैं।

उत्तराखंड की तरह ही हिमाचल में भी संविधान, आरक्षण, जाति जनगणना, आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व और लोकतंत्र की रक्षा कोई मुद्दा नहीं बना। कांग्रेस ने भी राज्य के स्तर पर इन सवालों को मूल मुद्दा नहीं बनाया। भले ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्तर पर इन चीजों को सबसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की।

लोकसभा के विपरीत हिमाचल में 6 विधान सभा क्षेत्रों में उपचुनाव भी हुए, जिसमें 4 सीटें कांग्रेस ने जीतीं। दिल्ली की तरह हिमाचल के मतदाताओं ने भी कांग्रेस से साफ कहा कि आप प्रदेश में हमारे लिए जनकल्याणकारी कार्य करिए, शासन-प्रशासन ठीक से चलाइए। इसके लिए हम प्रदेश के स्तर पर आपके साथ हैं। ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली की जनता ने केजरीवाल से कहा कि प्रदेश स्तर पर हम आपके साथ है, लेकिन हम हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की परियोजना के नाम पर नरेंद्र मोदी के साथ हैं। हम संविधान बचाने और बहुजनों-अल्पसंख्यकों को समुचित हिस्सेदारी देने के आपके नारे के साथ नहीं हैं। दिल्ली की आम आदमी पार्टी की तरह कांग्रेस सत्ता में रहते या विपक्ष में रहते इन दोनों राज्यों में नरम हिंदुत्व की राजनीति यानी सवर्ण राजनीति ही करती रही है।

सवाल सिर्फ सवर्ण बहुल उत्तराखंड और हिमाचल का नहीं है। यही स्थिति सवर्ण राजनीति के केंद्र अन्य प्रदेशों का भी है, जहां बहुजन-दलित राजनीति कमजोर है या अनुपस्थित है। उन सभी प्रदेशों में भाजपा ने एकतरफा जीत दर्ज की है, जहां कांग्रेस भाजपा के बरक्स मुख्य विपक्षी पार्टी रही है या आम आदमी पार्टी मुख्य विपक्षी पार्टी रही है और नरम हिंदुत्व और सवर्णों को खुश करने वाली राजनीति करती रही है। असल में हिंदुत्व की राजनीति सारत: सवर्ण राजनीति ही है। जैसे मध्यप्रदेश (29), गुजरात (25), छत्तीसगढ़ (10), दिल्ली (7), उत्तराखंड (5) और हिमाचल प्रदेश (4) को जोड़ दिया जाए तो इन प्रदेशों की 72 सीटों में से 70 सीटें भाजपा ने जीती हैं। यहां भाजपा की सफलता का दर 97 प्रतिशत से अधिक है। इन प्रदेशों में भाजपा और गैर-भाजपा (कांग्रेस-आम आदमी पार्टी) दल हिंदुत्व और सवर्णों मानसिकता को तुष्ट करने वाली राजनीति करते रहे हैं।

सवर्ण वोटर बहुल राज्यों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय स्तर पर दलित-बहुजन हिस्सेदारी को मुद्दा बनानेवाली कांग्रेस को भारी अंतर से हराकर और सभी सीटें भाजपा को सौंप कर बता दिया है कि सवर्ण इस देश के सबसे बीमार लोग हैं। उन्हें भाजपा का हर पतनशील मूल्य, विचार, एजेंडा, राजनीति और नेता स्वीकार है। नरम हिंदुत्व और सवर्ण राजनीति के केंद्र मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और दिल्ली ने भी बता दिया है कि नरम हिंदुत्व और सवर्ण राजनीति कितनी पतनशील होती है। वह भाजपा को ही फायदा पहुंचा सकती है।

बहरहाल, सबसे बदतर तरीके से बीमार सवर्णों को केंद्र में रखकर संविधान और संवैधानिक मूल्यों को नहीं बचाया जा सकता है। समता, स्वतंत्रता और बंधुता आधारित भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता है। दलित-बहुजन और वाम आंदोलन की राजनीति ही संवैधानिक मूल्यों पर आधारित भारत का निर्माण कर सकती है। राहुल गांधी ने व्यक्तिगत तौर पर भले ही बहुजन एजेंडे को काफी हद तक अपना लिया लिया है, लेकिन उनकी पार्टी का सांगठनिक ढ़ांचा नरम हिंदुत्व और सवर्णों को खुश करने वाला ही है। विशेषकर हिंदी पट्टी में। हिंदी पट्टी में उन्हें वहीं सफलता मिली हैं, जहां दलित-बहुजन राजनीति और वामपंथ का उसे साथ मिला। जहां बहुजन या मंडलवादी पार्टियां या कहीं-कहीं वामपंथी पार्टियां मजबूत थीं, या दलित-बहुजन आंदोलन और चेतना मौजूद थी। इंडिया गठबंधन को सफलता द्रविड़स्तान (दक्षिण) में मिली है या हिंदी पट्टी के उन्हीं प्रदेशों में मिली है, जहां दलित-बहुजन राजनीति लंबे समय से मजबूत रही है, जो कमोबेश वामपंथी आंदोलन के भी केंद्र रहे हैं। और जहां हिंदुत्व और सवर्णों को चुनौती दी गई या दी जाती रही है। इन्हीं जगहों पर राहुल गांधी का संविधान का एजेंडा और उनके हाथों में आंबेडकर की फोटो भी कारगर साबित हुई।

मूल बात यह कि सबसे बीमार सामाजिक समूह सवर्णों को आधार बनाकर और उनके विचारों, मूल्यों और नेताओं को आगे कर भारतीय समाज को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर लोकतांत्रिक नहीं बनाया जा सकता है और न ही न्यायपूर्ण समाज की रचना की जा सकती है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सिद्धार्थ

डॉ. सिद्धार्थ लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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