साल 2010 के बाद बिहार के विधान सभा चुनाव में यह दूसरा मौका है जब एनडीए को इतनी बड़ी जीत मिली है। तब 2010 में 206 सीटें हासिल हुई थी और इस बार उसे 202 सीटें मिली हैं। विपक्षी इंडिया गठबंधन को केवल 35 सीटें मिली हैं। आखिर 2010 के बाद 2025 में एनडीए द्वारा हासिल निर्णायक जीत के साथ आया यह चुनाव परिणाम अपने भीतर क्या कुछ समेटे हुए है, बिहार के भविष्य के बारे में क्या बता रहा है, इन सवालों के जवाब तलाशते हैं।
सबसे पहले इस बार के विधान सभा की सामाजिक संरचना पर नजर डालते हैं। यह भी बिहार के सामाजिक और राजनीतिक जीवन और भविष्य के बारे बहुत कुछ बताएगा। इस विधान सभा में पहुंचे 243 विधायकों में 72 यानी 29.63 प्रतिशत ऊंची जाति के हिंदू हैं, जिनकी आबादी 10.57 प्रतिशत है। आबादी के अनुपात में ऊंची जाति हिंदू के लगभग 26 विधायक होने चाहिए, लेकिन वे तीन गुना से थोड़ा ही कम हैं। पिछड़े हिंदू विधायक 79 हैं, यानी 32.51 प्रतिशत हैं। अति पिछड़े हिंदू विधायक 41 यानी 16.87 प्रतिशत हैं। पिछड़े और अतिपिछड़े, दोनों हिंदू समूह की आबादी लगभग बराबर है और कुल आबादी लगभग 50.09 प्रतिशत है। इस आधार पर पिछड़े-अति पिछड़े हिंदुओं के कुल 121-122 विधायक होने चाहिए। लेकिन, दोनों मिलकर विधान सभा में आबादी के अनुपात से थोड़ा कम ही 49.38 प्रतिशत यानी 120 पहुंचे हैं।
पिछड़ों में खासतौर पर यादव, कुर्मी और कुशवाहा को सामाजिक-राजनीतिक जीवन में प्रभुत्वशाली माना जाता है। इस अठारहवीं विधान सभा में ये जातियां ऊंची जाति हिंदुओं की तुलना में कहां खड़े हैं, इसको भी देखते हैं। विधान सभा में इस बार 26 यादव, 14 कुर्मी और 24 कुशवाहा पहुंचे हैं। तीनों जातियों के विधायकों की कुल संख्या 64 है, जो ऊंची जाति हिंदुओं की तुलना में 8 कम है। जबकि इन तीनों जातियों की सम्मिलित आबादी हिंदुओं की चार ऊंची जातियों की सम्मिलित आबादी से लगभग दोगुनी यानी 21.34 प्रतिशत है। ध्यान दें कि पिछड़े हिंदू विधायकों की कुल संख्या भी ऊंची जाति हिंदू विधायकों से केवल 7 अधिक है, जबकि आबादी दोगुनी से अधिक है।
इस विधान सभा में राजपूत सबसे अधिक 32 हैं, जिनकी आबादी 3.45 प्रतिशत है। वहीं, यादव 26 हैं, जिनकी आबादी 14.26 प्रतिशत है। आबादी के अनुपात में राजपूतों के 8 और यादवों के 34-35 के लगभग विधायक होने चाहिए। यादवों से एक कम 25 भूमिहार विधान सभा पहुंचे हैं, जिनकी आबादी 2.86 प्रतिशत है। आबादी के अनुपात में उसके 7 विधायक होने चाहिए। कुर्मी, जिनकी आबादी भूमिहारों के लगभग बराबर 2.87 प्रतिशत है, उसके विधायकों की संख्या 14 है। कुशवाहा विधायकों की संख्या 24 है, जिनकी आबादी भूमिहारों और राजपूतों से अधिक 4.21 प्रतिशत है। लेकिन, वे भी राजपूतों से काफी पीछे और भूमिहारों से 2 कम हैं। विधान सभा में ऊंची जाति हिंदुओं में सबसे अधिक 3.65 प्रतिशत आबादी वाले 13 ब्राह्मण पहुंचे हैं। आबादी के अनुपात में उनके 9 विधायक होने चाहिए। कमोबेश आबादी के अनुपात में ही दो कायस्थ विधायक बने हैं।
अति पिछड़ी जाति में शामिल सशक्त मानी जाने वाली तेली की आबादी भूमिहारों के आसपास है, लेकिन विधान सभा में तेली की संख्या से तीन गुना से केवल 2 कम भूमिहार हैं।

अलग-अलग जाति की आबादी और उसके विधायकों की संख्या से यह सामने आता है कि विधान सभा में राजपूत आबादी के अनुपात से 4 गुना, भूमिहार 3.5 गुना, ब्राह्मण 1.5 गुना के लगभग और कायस्थ लगभग आबादी के अनुपात में पहुंचे हैं। वहीं, कुशवाहा आबादी के अनुपात से दो गुना से अधिक, कुर्मी दो गुना, बनिया दो गुना से थोड़ा कम तो धानुक और तेली आबादी के अनुपात से थोड़ा ज्यादा हैं। वहीं, आश्चर्यजनक तौर पर यादव इस बार आबादी के अनुपात से लगभग 9 कम हैं। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है कि किसी जाति-समुदाय की आबादी और विधान सभा में उसकी संख्या का अनुपात उसकी राजनीतिक हैसियत को बताता है।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जाए तो पिछड़े-अतिपिछड़े हिंदुओं के मुकाबले ऊंची जाति हिंदुओं की राजनीतिक हैसियत ऊंचाई पर है तो वहीं, राजपूतों और भूमिहारों की राजनीतिक हैसियत के मुकाबले में पिछड़ों और अतिपिछड़ों की कोई जाति खड़ी नहीं है।
सनद रहे कि 2020 विधान सभा में ऊंची जाति हिंदूओं की संख्या 64 यानी 26.33 प्रतिशत थी। 2020 की अपेक्षा इस बार ऊंची जाति हिंदुओं की संख्या में 8 यानी 3.30 प्रतिशत की वद्धि हुई है। ऊंची जातियों के हिंदू भाजपा से सबसे अधिक 42 और दूसरे नंबर पर जदयू से 18 विधान सभा पहुंचे हैं। तीसरे नंबर पर लोजपा(आर) से 7 हैं। जीतनराम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा से 1 और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लाेकतांत्रिक मोर्चा से 2 हैं। वहीं, इंडिया के घटक-राजद से केवल 2 भूमिहार विधान सभा में हैं। इस बार कुल 72 ऊंची जाति हिंदू विधायकों में 70 एनडीए के हैं। 2020 में 70.31 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदू एनडीए से विधान सभा पहुंचे थे तो इस बार यह बढ़ कर 97.22 प्रतिशत हो गया है। 2020 में कुल ऊंची जाति हिंदू विधायकों में 51.56 प्रतिशत भाजपा और 14.06 प्रतिशत जदयू से थे। इस बार 58.33 प्रतिशत भाजपा और जद-यू से 25 प्रतिशत हैं। 2020 में भाजपा के 74 में 33 यानी 44.52 तो इस बार 89 विधायकों में 42 यानी 47.19 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदू हैं। जदयू के 85 विधायकों में 18 यानी 21.17 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदू हैं। एनडीए के 35.64 प्रतिशत विधायक ऊंची जाति हिंदू हैं। साफ तौर पर दिखाई पड़ता है कि भाजपा ऊंची जाति हिंदुओं की राजनीतिक हैसियत की प्रतिनिधि पार्टी के बतौर है तो एनडीए के अन्य घटकों से भी उसका विधान सभा में प्रतिनिधित्व है।
साथ ही, ऊंची जाति हिंदुओं की राजनीतिक हैसियत बढ़ने के साथ एनडीए के साथ संकेंद्रित हुई है। अंतिम तौर पर यह तय हो गया है कि बिहार की सत्ता पर इस बार ऊंची जाति हिंदुओं का नियंत्रण पहले की अपेक्षा मजबूत होगा।
देखा जाए तो 2025 का चुनाव परिणाम कई लिहाज से ऐतिहासिक है। विधान सभा में यादवों की संख्या में ऐतिहासिक गिरावट आई है। 1990 से देखें तो यह पहली बार हुआ है कि हिंदुओं की कोई ऊंची जाति विधान सभा में नंबर एक पर है और हिंदुओं में सबसे बड़ी आबादी वाली यादव जाति विधान सभा में केवल 26 यानी 10.69 प्रतिशत है। इससे पहले जब 2010 में एनडीए को इस बार से बड़ी जीत मिली थी और ऊंची जाति के हिंदू विधायक बढ़कर 1990 की संख्या के लगभग बराबर 32.51 प्रतिशत हो गए थे, तब भी यादव विधान सभा में सबसे अधिक 39 यानी 16.4 प्रतिशत ही थे। हालांकि, 1990 से लेकर 2010 तक में यह सबसे कम संख्या थी। 2010 के विधान सभा में 39 यादवों में एनडीए से 27 थे, जिसमें जदयू से 19 और भाजपा से 8 और राजद से 10 थे। इस बार राजद से 11 हैं तो एनडीए से 13 हैं, जिसमें जदयू से 7, भाजपा से 4 और लोजपा से 2 हैं।
यादवों के साथ ही मुसलमान भी बिहार के राजनीतिक इतिहास में विधान सभा में इस बार सबसे कम 11 यानी 4.52 प्रतिशत हैं। मुसलमानों की आबादी 17.70 प्रतिशत है। आबादी के अनुपात में उसके 43 विधायक होने चाहिए। 2010 में भी कुल 19 मुस्लिम विधायक (7.80 प्रतिशत) थे, जिनमें जदयू से 7 और भाजपा से भी 1 विधायक थे। वहीं 2015 में कुल मुस्लिम विधायकों की संख्या 24 थी। जबकि 2020 में फिर उनकी संख्या 19 हो गई। इस बार 11 विधायकों में सबसे ज्यादा एआईएमआईएम के 5, राजद के 3, कांग्रेस के 2 और जदयू के 1 हैं। हम देखते हैं कि ऊंची जाति हिंदुओं का विधान सभा में कब्जा ऊंचाई की ओर है तो इसके विपरीत मुसलमान और यादव विधायकों की संख्या में ऐतिहासिक कमी है।
2010 की तुलना में देखें तो इस बार एनडीए से यादव 14 और मुसलमान 7 कम विधान सभा पहुंचे हैं। स्पष्ट तौर इन दोनों बड़ी आबादी के प्रतिनिधित्व के घटने का रिश्ता एनडीए के साथ दीखता है। इन दोनों की राजनीतिक हैसियत की कीमत पर ऊंची जाति हिंदुओं की राजनीतिक हैसियत को बढ़ाने में सीधे तौर पर एनडीए की भूमिका दीखती है। जरूर ही इस दो बड़ी आबादी के साथ सत्ता के संबंध भी पहले से बदलने जा रहे हैं।
भले ही 2025 का चुनाव परिणाम कमोबेश 2010 के समान दिखता है। लेकिन, 2010 से 2025 के बीच बहुत कुछ बदल चुका है। इस पर गौर करना बिहार के राजनीतिक भविष्य के बारे में निष्कर्ष पर पहुंचने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। 2010 में एनडीए को मिली 206 सीटों में 115 सीटों के साथ जदयू अधिकतम राजनीतिक ऊंचाई पर थी तो भाजपा 91 सीटों के साथ उससे पीछे थी। इस चुनाव में राजद 22 सीटों पर सिमट गई थी। 2015 में राजद और जदयू साथ चुनाव लड़कर पहले और दूसरे नंबर की पार्टी बनी थी। भाजपा 53 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर आ गई थी। लेकिन, राजद और जदयू का साथ लंबा नहीं चला और फिर से नीतीश कुमार की एनडीए के साथ वापसी हुई। इस बीच 2014 में राष्ट्रीय स्तर पर उभार के बाद भाजपा की राजनीतिक आक्रामकता बढ़ना स्वाभाविक था। 2020 में बिहार पर निर्णायक कब्जा के एजेंडा को पूरा करने की दिशा में भाजपा ने चिराग पासवान के जरिए नीतीश कुमार को ठिकाने लगाने की कोशिश भी की और जदयू 43 सीटों के साथ विधान सभा में तीसरे नंबर पर आ गयी तो भाजपा 74 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर थी।
जरूर ही नीतीश कुमार एनडीए की सरकार में मुख्यमंत्री बने, लेकिन पहली बार उनकी हैसियत भाजपा के जूनियर पार्टनर की हो गयी थी। वे पलट कर राजद के साथ भी गए और उसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले फिर से एनडीए के साथ वापसी की। लेकिन, अब भाजपा के जूनियर पार्टनर के बतौर अपेक्षाकृत काफी कमजोर राजनीतिक हैसियत के साथ नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने का मतलब साफ है कि वे कठपुतली की हैसियत में होंगे और भाजपा का एजेंडा लागू होगा। नीतीश कुमार ने ऐसे ही नहीं एनडीए में वापसी के बाद केंद्र सरकार से जातिगत सर्वेक्षण के आधार पर राज्य में बढ़े हुए आरक्षण को 9वीं अनुसूची में डालने की मांग पर चुप्पी साध ली। जबकि उनकी अगुआई में ही महागठबंधन सरकार में हुए जातिगत सर्वेक्षण के बाद एससी-एसटी और इबीसी-बीसी के लिए विधानसभा से 65 प्रतिशत आरक्षण पारित हुआ था। इसके साथ विधान सभा चुनाव के नजदीक लिया गया एक फैसला खासतौर पर गौरतलब है। वह यह है कि पूर्व में बिहार सरकार द्वारा एनटीपीसी का पॉवर प्लांट लगाने के लिए भागलपुर के पीरपैंती में अधिग्रहीत 1050 एकड़ जमीन को नरेंद्र मोदी के प्यारे अडानी को मात्र एक रुपए प्रति एकड़ प्रति वर्ष की दर पर दिया गया।
अब भाजपा ने 2010 से 2 कम 89 सीटें हासिल की है और वह विधान सभा में नंबर एक की पार्टी है। दूसरी तरफ, जदयू 2010 से 30 कम 85 की संख्या के साथ भाजपा के जूनियर पार्टनर की हैसियत में ही है। साथ ही, इस बार एनडीए के 202 सीटों में अन्य सहयोगियों की भी 29 सीटों की हिस्सेदारी है। केवल सीटों की संख्या के आधार पर देखें तो जदयू 2010 के बाद सबसे मजबूत स्थिति में दिख रही है, लेकिन 2010 में नीतीश कुमार निर्णायक राजनीतिक हैसियत में थे। अब भाजपा निर्णायक हैसियत में है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ कर कठपुतली बने रहना नीतीश कुमार की राजनीतिक नियति बन चुकी है। नई सरकार के कैबिनेट का गठन हो चुका है।
नीतीश कुमार के 27 सदस्यीय नए मंत्रिमंडल में ऊंची जाति हिंदू 8, अतिपिछड़े हिंदू 5, पिछड़े हिंदू 8, दलित 5 और एक मुसलमान हैं। विधान सभा से लेकर कैबिनेट की सामाजिक संरचना साफ कह रही है कि ऊंची जाति हिंदुओं की राजनीतिक हैसियत और सत्ता पर नियंत्रण मजबूत हुआ है। इससे आगे यह कि गृह विभाग पहली बार भाजपा की ओर से उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हवाले हो चुका है और वे योगी आदित्यनाथ की भाषा बोल रहे हैं। साफ दिखने लगा है कि बिहार सामाजिक न्याय की कब्रगाह और कॉरपोरेट लूट का अड्डा बनने की दिशा में बढ़ चला है।
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in