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दलित उत्पीड़न से जुड़े मामलों में दम तोड़ती न्याय की आस

अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) के तहत दर्ज मामलों में हर दस में से औसतन सात आरोपी साफ बच निकलते हैं। यह चिंताजनक इसलिए है क्योंकि इस क़ानून के तहत दर्ज होने वाले मामलों में प्रारंभिक जांच और विवेचना का फ्रेमवर्क काफी मज़बूत माना जाता है। बता रहे हैं सैयद ज़ैग़म मुर्तजा

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में हत्या और दलित उत्पीड़न के तीन आरोपियों को हाल ही में अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। यह घटना कोई अपवाद नहीं है। कमज़ोर विवेचना और पुलिस की ढिलाई के चलते दलित उत्पीड़न मामलों में न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होने का मानो एक पैटर्न-सा बन गया है। आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश समेत अधिकांश हिंदी भाषी राज्यों में दलित उत्पीड़न के मुक़दमों में दोषसिद्धि की दर बेहद कम है।

गोंड़ा ज़िले की घटना में दर्ज एफआईआर के मुताबिक़ 1 मार्च, 2021 को ग्राम बेनी ख़ैरा निवासी श्रीदेवी को रात के समय जला कर मार दिया गया था। हत्या के आरोप में संतोष कुमार, छोटू उर्फ रंजीत और रुपेश कुमार उर्फ छोटू बाबू को गिरफ्तार किया गया, लेकिन पुलिस आरोपियों के ख़िलाफ पर्य़ाप्त सबूत नहीं जुटा पाई। आख़िरकार विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) सूर्य प्रकाश सिंह ने तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया।

इसी तरह आगरा में हत्या और दलित उत्पीड़न के एक और मामले में अदालत ने आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। घटना 23 मई 2007 की है। आगरा के ट्रांसपोर्ट नगर इलाक़े में 25 वर्षीय बंटी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। तक़रीबन 18 साल चले मुक़दमे में पुलिस आरोपी के ख़िलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं जुटा पाई। अदालत ने चश्मदीद गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास पाया और आख़िर में विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) ने आरोपी को बरी कर दिया।

पिछले साल अक्टूबर में रायबरेली की एक अदालत ने एक दलित युवक की हत्या के आरोपियों को बा-इज़्ज़त बरी कर दिया था। पीड़ित युवक हरिओम वाल्मीकि मानसिक रुप के अक्षम था। पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को आरोपी बनाया मगर एक के विरुद्ध भी दोष सिद्ध नहीं करा पाई। इस मामले में भी अदालत ने गवाहों के बयानों के असंगत पाया और सबूत के अभाव में आरोपियों को बरी कर दिया।

दलित उत्पीड़न से जुड़े मामलों में दोषसिद्धि 44 फीसद की राष्ट्रीय दर से काफी कम है

उत्तर प्रदेश से इतर, गुजरात की एक अदालत ने 2016 के बहुचर्चित ऊना मामले के 42 आरोपियों में से 37 बरी कर दिया। यहां गोकशी के आरोप में दलितों पर हुए हमले के बाद व्यापक आंदोलन हुआ था। पुलिस कुल 42 आरोपियों में से महज़ 5 को ही सज़ा दिलवा पाई। अदालत ने इन पांच आरोपियों को 5-5 साल कारावास की सज़ा सुनाई है। इन बरी हुए आरोपियों में कुछ पुलिसवाले भी थे। साथ ही दो आरोपियों का सुनवाई के दौरान देहांत हो गया था।

यह घटनाएं बानगी भर हैं। दलित उत्पीड़न से जुड़े तमाम मामलों पर नज़र डाली जाए तो साफ पता चलता है कि पुलिस की दिलचस्पी आरोपियों को सज़ा दिलाने में नहीं होती। सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद नूर आलम के मुताबिक़ पुलिस जनदबाव में और कभी-कभी क़ानून के डर से मामला दर्ज तो कर लेती है लेकिन दलित उत्पीड़न के आरोपियों को सज़ा दिलाने के मामले में पूरा सिस्टम ढिलाई बरतता है। नूर आलम इसकी वजह न्यायपालिका और अभियोजन में दलितों की कमज़ोर नुमाइंदगी मानते हैं। उनके मुताबिक़ अक्सर पुलिस से लेकर अदालत तक की हमदर्दी पीड़ित के बदले आरोपियों के साथ होती है।

बहरहाल, दलित उत्पीड़न के आरोपी अक्सर बिना सज़ा पाए ही क़ानून के चंगुल से आज़ाद हो जाते हैं। वर्ष 2022 के एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक़ देश भर में अनुसूचित जाति के विरुद्ध हिंसा के लगभग पचास हज़ार मामले दर्ज हुए लेकिन इनमें 80 फीसद से ज़्यादा आरोपी बरी हो गए। इसी तरह अनुसूचित जनजाति उत्पीड़न से जुड़े लगभग दस हज़ार मामलों में दोष सिद्धि की दर 26-28 फीसद के बीच रही और इस तरह अधिकांश आरोपी कमज़ोर विवेचना के चलते बरी हो गए। हालांकि भारत में आपराधिक मामलों में दोषसिद्धी की दर ऐसे भी कम रहती है लेकिन दलित उत्पीड़न से जुड़े मामलों में यह 44 फीसद की राष्ट्रीय दर से काफी कम है।

अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) के तहत दर्ज मामलों में हर दस में से औसतन सात आरोपी साफ बच निकलते हैं। यह चिंताजनक इसलिए है क्योंकि इस क़ानून के तहत दर्ज होने वाले मामलों में प्रारंभिक जांच और विवेचना का फ्रेमवर्क काफी मज़बूत माना जाता है। लेकिन इस तरह के 70-80 फीसद मुक़दमे अदालतों में लंबे अरसे तक अटके रहते हैं। बरसों बाद जब फैसला आता है तब तक या तो गवाह मर चुके होते हैं या गवाही से मुकर जाते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जहां सवर्ण दबंगई बाक़ी राज्यों से अधिक है, वहां सज़ा की दर कम है और गवाहों के मुकर जाने मामले बेहद ज़्यादा।

उत्तर प्रदेश निवासी संदीप वर्मा का मानना है कि दलितों को लेकर पूरे सिस्टम में एक अलग तरह का पूर्वाग्रह है। अधिकांश मामलों में विवेचक मामले को फर्ज़ी मानकर विवेचना शुरू करता है। अक्सर पीड़ित पर मामला वापस लेने और गवाहों पर मुकर जाने का दबाव रहता है। ज़ाहिर है दलित उत्पीड़न रोकने के लिए क़ानून तो है, लेकिन उसे लागू करने के लिए सक्षम तंत्र का अभाव है। इस संदर्भ में मोहम्मद नूर आलम कहते हैं कि जबतक जांच ऐजेंसियों और अदालतों को कमज़ोरों का पक्ष सुनने और उनके प्रति सहानुभूति रखते हुए जांच करने की मानसिकता का विकास नहीं होगा, दलित और दूसरे कमज़ोर तबक़ों के लिए न्याय की आस बेमानी ही रहेगी। दोष सिद्धि की दर बेहतर तभी होगी जब गवाहों को सुरक्षा मिलेगी और ट्रायल की रफ्तार तेज़ की जाएगी। फिलहाल तो ये सब होता नज़र नहीं आ रहा।

(संपादन : नवल/अनिल)

 

 

लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

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