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पिछड़े मुसलमानों के सच्चे हितैषी थे शब्बीर अंसारी

मैंने गया जिले में एक कार्यक्रम रखा था, उसमें शब्बीर साहब शिरकत करने पहुंचे थे। वहां उनके साथ एक महिला नसीम महत्त भी आई थीं। मैंने उनसे ‘महत्त’ के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि यह वह जाति है, जिसका पारंपरिक पेशा हाथियों की देखभाल करना रहा। सामान्य तौर पर इस जाति को महावत कहा जाता है। तो महावत से महत्त हुआ। शब्बीर साहब ने जिन जातियों को महाराष्ट्र राज्य की ओबीसी सूची में शामिल कराया, उनमें से एक यह महत्त जाति भी थी। श्रद्धांजलि दे रहे हैं पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर

शब्बीर अंसारी लंबे-चौड़े और तंदरूस्त इंसान थे। न ज्यादा मोटे न ज्यादा पतले। लाल रंग की बोलेरो गाड़ी थी उनके पास। वे उसी से महाराष्ट्र के उन गांवों में जाते थे जहां पिछड़े मुसलमान रहते थे। वे उनके हक की बात करते और उन्हें गोलबंद करते थे। बीते 22 मार्च, 2026 को जब उनके इंतकाल की खबर मिली तो मैंने उनके ही नंबर पर फोन किया। फोन उनके बेटे ने उठाया। उसी ने जानकारी दी कि वे कैंसर से पीड़ित थे। साथ ही, मुझे यह भी जानकारी मिली कि वे मुंबई महानगर के वासी नहीं थे, बल्कि एक गांव-देहात के रहने वाले थे। उनके तीन बेटे हैं। छोटा बेटा उनके साथ रहता था।

शब्बीर अंसारी साहब से मेरा परिचय तब हुआ जब मेरी किताब ‘मसावात की जंग’ प्रकाशित हुई। यह वर्ष 2001 की बात होगी। उन दिनों जेएनयू में एक प्रोफेसर थे इम्तियाज अहमद साहब। उन्हें मेरी किताब अच्छी लगी थी। उन्होंने ही एक बार मुझे कहा कि आपको मुंबई विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में आमंत्रित करने की योजना है। मैंने डरते हुए कहा कि मैं कभी मुंबई नहीं गया हूं। कैसे जाऊंगा और चला भी गया तो वहां रहूंगा कहां। तब इम्तियाज साहब ने कहा कि सारा इंतजाम विश्वविद्यालय के लोग कर देंगे। तो हुआ यह कि आयोजकों की तरफ से ही हवाई जहाज का टिकट भेजा गया और रहने-सहने की व्यवस्था की गई। उसी कार्यक्रम में पहली दफा मेरी मुलाकात शब्बीर अंसारी से हुई। वह कार्यक्रम पसमांदा मुसलमानों के विषय पर केंद्रित थी। शब्बीर अंसारी साहब कार्यक्रम के आयोजकों में से एक थे।

लेकिन शब्बीर साहब के कार्यों की जानकारी मुझे महाराष्ट्र के जाने-माने वामपंथी नेता विलास सोनवणे से मिली। उन्होंने ही मुझे विस्तार से उनके इस प्रयास के बारे में बताया कि कैसे उन्होंने अनेक मुस्लिम जातियों को ओबीसी की सूची में शामिल कराया, जो कालेलकर आयोग से लेकर मंडल आयोग तक की सूची में छूट गए थे। उन्हें महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार का समर्थन प्राप्त था। हालांकि यह भी कहा जा सकता है कि राजनीतिक कारणों से शब्बीर अंसारी साहब उनके लिए उपयोगी थे। लेकिन राजनीति में यह सब होता ही है। यदि कोई किसी के काम आता है तो वह उसके लिए उपयोगी सिद्ध होता है। शरद पवार के अलावा उन्हें हिंदी फिल्मों के बेमिसाल अभिनेता दिलीप कुमार साहब का खुला सहयोग मिला था। यानी यह कि दिलीप कुमार साहब ने उन्हें तन, मन और धन से सहयोग दिया था।

स्मृतियां शेष – शब्बीर अंसारी को सम्मानित फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार व रामविलास पासवान

बाद के दिनों में तो मैं जब भी मुंबई जाता, शब्बीर साहब मुझसे मिलने जरूर आते थे। एक बार की बात कहूं कि मैंने गया जिले में एक कार्यक्रम रखा था, उसमें शब्बीर साहब शिरकत करने पहुंचे थे। वहां उनके साथ एक महिला नसीम महत्त भी आई थीं। मैंने उनसे ‘महत्त’ के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि यह वह जाति है, जिसका पारंपरिक पेशा हाथियों की देखभाल करना रहा। सामान्य तौर पर इस जाति को महावत कहा जाता है। तो महावत से महत्त हुआ। शब्बीर साहब ने जिन जातियों को महाराष्ट्र राज्य की ओबीसी सूची में शामिल कराया, उनमें से एक यह महत्त जाति भी थी।

असल में जातियों का निर्धारण उनके पेशे के आधार पर हुआ है। आप इसे ऐसे समझें कि हमारे यहां गदभेड़ा और गदभेड़ी जातियां हैं। खच्चरों और गधों के सहयोग से आजीविका कमाने वाले वे लोग जो स्वयं को हिंदू कहते हैं, गदहेड़ा कहलाते हैं। वहीं मुसलमानों में यह जाति गदहेड़ी कहलाती है। इस जाति के लोग गधे और खच्चर आदि जानवरों को रखते हैं तथा इनके माध्यम से ईंट और अन्य निर्माण सामग्रियों को लाते और ले जाते हैं। मैं जब बिहार सरकार द्वारा गठित अल्पसंख्य आयोग का सदस्य बना तब मैंने इन जातियों की थाह ली। और फिर मैंने पहल करके इस जाति को अति पिछड़ा यानी अनेक्जर-1 में शामिल कराया।

शब्बीर साहब ने अपना पूरा जीवन पिछड़ा मुसलानों के हितों के लिए जिया। आज उनके कारण अनेक मुसलमानों को हक मिला। यह कोई छोटा काम नहीं है। यह एक बड़ा काम होता है, जिसके लिए पूरी तैयारी की आवश्यकता होती है। शब्बीर साहब अपना एक सूत्रीय कार्यक्रम चलाते रहे।

उन्हें श्रद्धांजलि।

(नवल किशोर कुमार के साथ बातचीत पर आधारित, संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

अली अनवर

लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद तथा ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के संस्थापक अध्यक्ष हैं

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