राजस्थान के पंजाब और हरियाणा की सीमा से सटे हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिले आज देश के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में गिने जाते हैं। गेहूं, कपास, सरसों, ग्वार, चना और विभिन्न फलों और सब्जियों के उत्पादन ने इन जिलों को खेती से आई खुशहाली का प्रतीक बना दिया है। कई दशक पहले जब नहरें नहीं आई थीं, तब यह क्षेत्र सीमित वर्षा, रेत के टीलों और कठिन कृषि परिस्थितियों के लिए जाना जाता था। लेकिन 1927 में गंग नहर और बाद में भाखड़ा, इंदिरा गांधी नहर और नोहर-सिद्धमुख सिंचाई परियोजना ने इस पूरे भूभाग की नियति बदल दी। नहरों के पानी और हरित क्रांति की तकनीकों ने कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की, जिससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव आया।
आम तौर पर इस परिवर्तन को विकास की सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह सच है कि नहरों ने रेगिस्तान को हरियाली में बदला और कृषि आय में भारी वृद्धि की। लेकिन विकास की किसी भी कहानी को केवल उत्पादन के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि उस विकास का लाभ किन लोगों तक पहुंचा और किन समुदायों की स्थिति अपेक्षाकृत कमोबेश पहले समान बनी रही।
नहरों के आगमन के बाद इस क्षेत्र की भूमि का महत्व बढ़ गया। जो जमीन कभी कम उपजाऊ मानी जाती थी, वह सिंचाई सुविधा मिलने के बाद अत्यंत मूल्यवान संपत्ति बन गई। भूमि की कीमतें बढ़ीं, उत्पादन बढ़ा और आय में भी वृद्धि हुई। लेकिन बड़ा सवाल है कि जब जमीन की कीमत बढ़ी तो उसका लाभ किसे मिला?
स्वाभाविक रूप से उस व्यक्ति को, जिसके नाम जमीन थी। यहीं से नहरी क्रांति और सामाजिक असमानता का प्रश्न शुरू होता है।
भूमि स्वामित्व का यह प्रश्न नहर क्षेत्र के शुरुआती इतिहास से भी जुड़ा हुआ है। श्रीगंगानगर जिले में सूरतगढ़ के 80 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार करणीदान सिंह राजपूत बताते हैं कि सन् 1969 में जब राज्य सरकार ने इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र की जमीनों को भूमिहीनों में बांटने के बजाय नीलाम करने का निर्णय लिया, तब पूरे इलाके में व्यापक आंदोलन खड़ा हो गया। आंदोलन इतना बड़ा था कि जेलें आंदोलनकारियों से भर गईं। अंतत: सरकार को अपना निर्णय बदलना पड़ा और भूमिहीन परिवारों को जमीनें आवंटित की गईं।
राजपूत के अनुसार जिन लोगों में जागरूकता थी और जिन्होंने समय पर आवेदन किए, वे जमीन पाने में सफल रहे। लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी थे जो विभिन्न कारणों से इस प्रक्रिया से बाहर रह गए। वे आगे भी खेत मजदूरों के रूप में ही काम करते रहे। राजपूत का कहना है कि बाद के वर्षों में दलितों को आवंटित जमीनों के हस्तांतरण और उपयोग को लेकर भी अनेक विवाद सामने आए। उनके अनुसार कई मामलों में दलितों के नाम पर जमीनें खरीदी गईं और बाद में उन पर आवासीय कॉलोनियां विकसित कर भारी आर्थिक लाभ कमाया गया जबकि मूल भूमि स्वामियों को उस मूल्यवृद्धि का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया।
गैर सरकारी संगठन उन्नति ने ‘दलित एंड लैंड’ नामक अध्ययन में राजस्थान के कई गांवों में दलितों की भूमि संबंधी समस्याओं का विश्लेषण किया है। हालांकि यह अध्ययन सीधे तौर पर हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर पर केंद्रित नहीं है, फिर भी यह एक महत्वपूर्ण वैचारिक ढांचा प्रदान करता है। इस अध्ययन में भूमि को केवल उत्पादन के साधन के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक सम्मान, सुरक्षा और शक्ति के स्रोत के रूप में देखा गया है।

इस अध्ययन के अनुसार दलितों के पास भूमि स्वामित्व बहुत कम है और जहां भूमि है भी, वहां अतिक्रमण, कानूनी विवाद और उपयोग संबंधी समस्याएं हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि भूमि केवल आर्थिक संसाधन नहीं बल्कि सामाजिक सम्मान, सुरक्षा और शक्ति का स्रोत है। प्रदेश में दलितों की बड़ी आबादी भूमिहीन या अत्यंत छोटी जोतों पर निर्भर है जिससे कृषि विकास के लाभों तक उनकी पहुंच सीमित रहती है।
हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर अनुसूचित जातियों की उल्लेखनीय आबादी वाले जिले हैं। इन जिलों के ज्यादातर हिस्से श्रीगंगानगर संसदीय क्षेत्र में आते हैं। श्रीगंगानगर की संसदीय सीट भले ही अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो लेकिन प्रश्न यह है कि क्या नहरों से आई समृद्धि और कृषि पूंजी में भी दलित समुदाय की हिस्सेदारी उतनी ही दिखाई देती है जितनी उसकी राजनीतिक उपस्थिति में? इस संसदीय इलाके में अनुसूचित जाति के लोगों के अनुमानत: करीब 35 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के करीब 0.8 फीसदी वोट हैं। नायक, मेघवाल, मजहबी सिख, तथा अन्य दलित समुदाय लंबे समय से यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहे हैं लेकिन ऐतिहासिक रूप से भूमि स्वामित्व का वितरण समान नहीं रहा। बड़ी संख्या में दलित परिवार खेत मजदूर, बटाईदार, पशुपालक या सीमांत किसान के रूप में कृषि व्यवस्था से जुड़े रहे। जाहिर है कि कृषि उत्पादन बढ़ने के बावजूद विकास का उनका अनुभव जमीनों के मालिक किसानों से अलग रहा।
राजस्थान आर्थिक परिषद के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष प्रो. संतोष राजपुरोहित कहते हैं कि इस इलाके में हरित क्रांति की सफलता केवल नहरों के पानी पर आधारित नहीं थी। इसके लिए उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, ट्रैक्टर, थ्रेशर, सिंचाई उपकरण और कृषि निवेश की आवश्यकता थी। इन सभी संसाधनों के लिए पूंजी अपरिहार्य थी। जिन किसानों के पास पर्याप्त भूमि, पूंजी और ऋण सुविधाओं तक पहुंच थी, उन्होंने इन तकनीकों को तेजी से अपनाया। परिणामस्वरूप उनकी आय और संपत्ति दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसके विपरीत छोटे और सीमांत किसानों के सामने कई चुनौतियां थीं। सीमित भूमि, निवेश की कमी आदि के कारण वे हरित क्रांति के लाभों का उतना उपयोग नहीं कर सके जितना बड़े किसानों ने किया।
राजपुरोहित बताते हैं कि ग्रामीण भारत के अनेक अध्ययनों की तरह इस क्षेत्र के अध्ययन में भी कृषि विकास के लाभों का बड़ा हिस्सा भूस्वामी वर्गों के पास केंद्रित होता नजर आता है। यहां की कृषि अर्थव्यवस्था में यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं था। इसने ग्रामीण समाज में शक्ति संतुलन को भी बदला। जिन परिवारों की कृषि आय बढ़ी, उन्होंने शिक्षा, व्यापार, राजनीति और सामाजिक प्रतिष्ठा के क्षेत्रों में भी अपनी स्थिति मजबूत की। धीरे-धीरे एक नया ग्रामीण अभिजात्य वर्ग सामने आया, जिसकी आर्थिक शक्ति का आधार कृषि से प्राप्त पूंजी थी। दूसरी ओर भूमिहीन और कम भूमि वाले परिवारों की स्थिति अपेक्षाकृत अलग रही। उनके लिए नहरी क्रांति का लाभ मुख्यत: मजदूरी और कृषि रोजगार के रूप में आया। शुरुआती वर्षों में बढ़े हुए कृषि उत्पादन के कारण श्रम की मांग भी बढ़ी। खेतों में अधिक काम मिलने लगा। खेती के विस्तार के दौर में खेत मजदूरी का बड़ा हिस्सा उन समुदायों ने संभाला जो ऐतिहासिक रूप से भूमिहीन या कम भूमि वाले रहे थे, इनमें दलित समुदाय प्रमुख थे।
लेकिन यह स्थिति स्थाई नहीं रही। समय के साथ खेती में मशीनीकरण तेजी से बढ़ा। पहले ट्रैक्टरों ने बैलों और ऊंटों की जगह ले ली, और बाद में कंबाइन मशीनों ने फसल कटाई के स्वरूप को ही बदल दिया। जिन कार्यों में पहले बड़ी संख्या में मजदूरों की जरूरत होती थी, वे अब कुछ घंटों में मशीनों से पूरे किए जाने लगे। इससे खेती में उत्पादन की लागत कम हुई और बड़े किसानों को लाभ मिला लेकिन खेत मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर सीमित होते गए।
इस परिवर्तन का असर विशेष रूप से उन समुदायों पर पड़ा जिनकी आजीविका मुख्यत: कृषि मजदूरी पर निर्भर थी। इस इलाके के ग्रामीण समाज में भी भूमिहीनता और जाति का गहरा संबंध रहा है। इसलिए रोजगार के अवसरों में कमी का प्रभाव भी असमान रूप से महसूस किया गया।
देश में कृषि विकास का सबसे बड़ा लाभ अंतत: भूमि के मालिक को मिलता है क्योंकि सिंचाई, उत्पादकता और भूमि मूल्य में वृद्धि सीधे उसकी संपत्ति को बढ़ाती है। इसके विपरीत भूमिहीन लोगों के पास उत्पादन बढ़ने से होने वाले लाभ में सीमित हिस्सेदारी होती है। वह मजदूरी के माध्यम से लाभ प्राप्त कर सकता है लेकिन कृषि संपत्ति के मूल्य में वृद्धि का सीधा लाभ उसे नहीं मिलता। शायद विशेषज्ञ इसीलिए कहते हैं कि विकास और सामाजिक न्याय के बीच संबंध को समझने के लिए केवल उत्पादन के आंकड़े पर्याप्त नहीं होते। यह भी देखना जरूरी है कि संसाधनों का स्वामित्व किसके पास है।
राजस्थान में अनुसूचित जातियों की कृषि भूमि के हस्तांतरण को लेकर विशेष कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इनके अनुसार दलितों की कृषि भूमि को सवर्ण नहीं खरीद सकते। इनका उद्देश्य कमजोर वर्गों की भूमि की रक्षा करना है। सरकार ने श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में सैकड़ों दलितों को पांच-छह दशक पहले जमीनें आवंटित की थीं लेकिन दलितों की जमीनें किस प्रकार दलितों के ही नाम पर खरीद कर छीनी जा चुकी हैं, यह कोई छिपी हुई बात नहीं है। प्राय: बातचीत में आम जन उन बड़े लोगों का जिक्र करते हैं जो हजारों बीघा जमीन के मालिक हो चुके हैं। इससे अनेक दलित परिवारों की हालत और भी कमजोर हुई है, जो छोटी जोतों, सीमित संसाधनों और आर्थिक दबावों के कारण पहले से ही खेती में अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में बने हुए हैं। कई गांवों में उनके पास उपलब्ध भूमि का आकार इतना छोटा है कि वह खेती आधारित समृद्धि का मजबूत आधार नहीं बन पाता।
दलित जाति से आने वाले हनुमानगढ़ पंचायत समिति के पूर्व प्रधान राजेंद्र प्रसाद नायक कहते हैं कि मुख्य रूप से नायक, मेघवाल और मजहबी सिख जातियां खेती में संलिप्त रही हैं, लेकिन अब इन जातियों के ज्यादातर लोग खेतों को छोड़ चुके हैं। आर्थिक दबावों, छोटे जोत आकार और सीमित संसाधनों के कारण अनेक दलित परिवारों की कृषि भूमि समय के साथ उनके हाथों से निकलती गई। इससे ये खेती से विमुख होते चले गए। जो थोड़े-बहुत भूमिहीन खेतिहर मजदूर खेती के काम में जुटे रहे, उन्हें अब कृषि यंत्रीकरण का चलन बढ़ने से काम ही नहीं मिलता। अब ये लोग छोटी-मोटी नौकरियों, निर्माण कार्यों में मजदूरी करके जीवन बिता रहे हैं।
इस संदर्भ में शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता के प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं। यहां पर दलित समुदाय में सामाजिक सुधार हो रहे हैं। शिक्षा और सरकारी नौकरियों में भागीदारी बढ़ने से कई परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। जिन्हें खेती से अतिरिक्त आय प्राप्त होती रही, उन परिवारों को अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने, निजी व्यवसाय शुरू करने और शहरी अवसरों तक पहुंचने का मौका मिला। लेकिन जिन परिवारों के पास भूमि या पूंजी का अभाव था, उनके लिए यह रास्ता अपेक्षाकृत कठिन बना रहा। इस प्रकार आर्थिक असमानता का प्रभाव अगली पीढ़ियों के अवसरों पर भी पड़ा है।
आज हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर को खेती के विकास के सफल मॉडल के रूप में देखा जाता है। यह उपलब्धि यकीनन महत्वपूर्ण है लेकिन सफलता की इस कहानी को पूरा समझना है तो यह देखना जरूरी है कि विकास का सामाजिक वितरण कैसा रहा? क्या नहरों का पानी केवल खेतों तक पहुंचा या उसने सामाजिक समानता के नए अवसर भी पैदा किए? क्या हरित क्रांति ने केवल उत्पादन बढ़ाया या उसने संसाधनों के वितरण को भी अधिक न्यायपूर्ण बनाया?
इन प्रश्नों के उत्तर सरल नहीं हैं लेकिन यहां साफ नजर आता है कि विकास का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ा है। जिनके पास भूमि, पूंजी और संसाधन थे, वे विकास के अवसरों का अधिक लाभ उठाने में सक्षम हुए हैं। और जिनके पास केवल श्रम शक्ति थी, उनके लिए विकास के लाभ अपेक्षाकृत सीमित ही रहे हैं।
नहरों ने पानी का वितरण किया लेकिन भूमि का नहीं। इसलिए नहरों से पैदा हुई समृद्धि का बड़ा हिस्सा उन लोगों तक पहुंचा जिनके पास पहले से जमीन थी। हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर की नहर क्रांति से पता चलता है कि विकास की वास्तविक सफलता को केवल खेतों की हरियाली से मापना संभव नहीं है। उसे इस कसौटी पर भी परखना पड़ेगा कि उसने समाज के सबसे कमजोर और वंचित वर्गों के जीवन में कितना परिवर्तन पैदा किया है। यदि विकास की हरियाली खेतों तक तो पहुंच जाए लेकिन समाज के अंतिम व्यक्ति तक न पहुंचे तो उसकी कहानी अधूरी ही कहलाएगी।
(संपादन : नवल/अनिल)
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