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आंबेडकर मिशन के नायक बुद्ध शरण हंस का साहित्य कर्म

हंस जी किस्सागो नहीं थे, वह कल्पना भी उनमें नहीं थी, जिससे कथा-शिल्प का निर्माण होता है। उनकी कहानियां उसी तरह की हैं, जिस तरह कोई खबरनबीस या पत्रकार किसी घटना की स्टोरी बनाता है। अर्थात घटना की फोटोग्राफी करता है। पढ़ें, कंवल भारती का यह आलेख

बुद्ध शरण हंस उस तरह के साहित्यकार नहीं थे, जैसे आज के लेखक, कवि, उपन्यासकार और कहानीकार हैं, जो विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाते हैं, जिन पर छात्र एमफिल-पीएचडी करते हैं, जिनकी रचनाएं हिंदी की बड़ी पत्रिकाओं में छपती हैं, जिन्हें सरकारी संस्थाओं के पुरस्कार मिलते हैं, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में बुलाए जाते हैं, और सम्मानित किये जाते हैं। सच कहूं, तो उनके पास एक अच्छी भाषा भी नहीं थी, जिसकी अपेक्षा एक साहित्यकार से की जाती है। लेकिन इन सबके बावजूद, वह आंबेडकर मिशन के एक लोकप्रिय लेखक थे।

बुद्ध शरण हंस ने अपने बारे में लिखा है कि उनका मूल नाम दलित पासवान था। सरकारी रिकार्ड में उनका यही नाम दर्ज है। इसी नाम से उनका बैंक खाता था, और इसी नाम से वह अपनी पत्रिका और अपने प्रकाशन का आर्थिक लेन-देन करते थे। वह बताते हैं कि यह नाम उनके भाई ने रखा था। बाद में जब वह डॉ. आंबेडकर के विचारों के संपर्क में आए, उनकी किताबें पढ़ीं, तो विचारों की एक नई दुनिया उनके सामने खुली। इस नई दुनिया ने उनका ऐसा विचारांतर और कायांतर किया कि जो धर्म, जो संस्कृति, जो संस्कार, जो मान्यताएं और जो विश्वास-पाखंड उन्हें अपने घर से विरासत में मिले थे, सब ध्वस्त हो गए। वे सारे देवी-देवता और अनुष्ठान, जो ब्राह्मणों ने उनके परिवार में स्थापित कर रखे थे, वे सब इस नई दुनिया में अपना अर्थ खो बैठे। वह आंबेडकर के दर्शन से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने तत्काल निर्णय ले लिया कि अब नाम भी बदलना चाहिए और धर्म भी। उन्होंने सपत्नी बौद्ध धर्म ग्रहण किया। धर्मांतरण हुआ, तो नामांतरण भी हुआ। नया नाम मिला बुद्ध शरण हंस, जो उस हंस की स्मृति से आया था, जो घायल अवस्था में बुद्ध की शरण में आया था और जिसका उपचार करके बुद्ध ने प्राण रक्षा की थी। जैसा अद्भुत नाम उन्हें मिला, उसी के अनुरूप उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ब्राह्मणवाद से घायल और पीड़ित समाज का उपचार करने और उन्हें नया जीवन देने में लगा दिया। फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बुद्ध और डॉ. आंबेडकर का प्रचार ही उनके जीवन का मिशन बन गया।

हंस जी संपादक थे, चितकोहरा, पटना से ‘आंबेडकर मिशन’ पत्रिका निकालते थे। भले ही वह 24-25 पेज की एक लघु पत्रिका थी, पर उसकी प्रकृति क्रांतिकारी थी। उसमें प्रकाशित संपादकीय और अन्य लेख ब्राह्मणवाद के विरुद्ध लोगों में जागरण पैदा करते थे। इस पत्रिका का एक बड़ा पाठक वर्ग था, जिसने ‘आंबेडकर मिशन’ को दूर-दूर तक फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। ‘आंबेडकर मिशन’ से लोगों को जोड़ने और ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ जागृति पैदा करने के उनके मिशन ने उनकी ख्याति एक क्रांतिकारी नायक की बना दी। उन्होंने आंबेडकर मिशन से संबंधित विषयों पर लेख लिखे, किताबें लिखीं, पम्फलेट लिखे और कहानियां लिखीं। इस सारे साहित्य को उन्होंने एक स्वयंसेवक की तरह ‘आंबेडकर मिशन’ प्रकाशन के माध्यम से प्रकाशित किया। वह अपनी किताबों के लिए आईएसबीएन नंबर के चक्कर में कभी नहीं पड़े, और न कभी उन्होंने कागज़ तथा छपाई की गुणवत्ता पर ध्यान दिया। उनकी किताबों में सस्ता कागज़, सस्ती छपाई और स्टिच की हुई उखड़ी सी बाइंडिंग होती थी, जो किसी भी तरह से आकर्षक नहीं होती थी। फिर भी उनके पाठकों में उन किताबों की मांग थी। असल में उनका मकसद सीधे जनता तक किताबें पहुंचाना था, सरकारी पुस्तकालयों में बेचना नहीं था। ब्राह्मणी अंविश्वास और धार्मिक पाखंड का पर्दाफाश करना उनके लेखन का मुख्य विषय था। और यही विषय उनका एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार करता था।

हंस जी के संस्मरण

शायद हंस जी ने कविताएं नहीं लिखी थीं, पर आत्मकथा और कहानियां लिखी थीं। लेकिन दलित साहित्य में न उनकी कहानियों का संज्ञान लिया गया, और न उनकी आत्मकथा का। इस पर विचार करना ज़रूरी है। उनकी आत्मकथा ‘टुकड़े-टुकड़े आईना’ के चार भाग हैं। उसके अंश वह ‘आंबेडकर मिशन पत्रिका’ में छापते रहते थे। आत्मकथा से लेखक के जिस जीवन-संघर्ष का बोध होता है, जैसे ‘जूठन’ से ओमप्रकाश वाल्मीकि के बारे में, ‘अक्करमाशी’ से शरणकुमार लिम्बाले के बारे में, ‘अपने-अपने पिंजरे’ से मोहनदास नैमिशराय के बारे में और ‘मेरा बचपन अपने कंधों पर’ से श्यौराज सिंह बेचैन के बारे में, वैसा कोई बोध बुद्ध शरण हंस के बारे में उनकी आत्मकथा से नहीं होता। हंस जी ने इसे अलग-अलग नाम दिया है। लेकिन वास्तव में ये संघर्ष उनके अनुभवों के संस्मरण हैं, जो उन्होंने अपने गांव-परिवार में ब्राह्मणवादी पाखंड के रूप में देखे और भोगे थे। उन्होंने खुद भी इसे आत्मकथा कहने का दावा नहीं किया, बल्कि संस्मरण ही कहा है। यहां तक कि वह उन्हें संस्मरणों की कहानियां भी मानते हैं। उन्होंने दूसरे भाग में ‘दो शब्द’ में लिखा है, “ब्राह्मणवाद में जीना जीवित संतान की शोकसभा करना है। बाबासाहेब के मिशन से दूर रहना अपनी शोकसभा करना है। बौद्ध धम्म को नकारना समाज की शोकसभा करना है। इन संस्मरणों की कहानियों में मिशनरी भाव व्यक्त किया गया है। इनमें आक्रोश और आक्रामकता पन्ने-पन्ने में है।”[1]

‘टुकड़े-टुकड़े आईना’ के दूसरे भाग से एक संस्मरण देखिए, जो सत्यनारायण की कथा से संबंधित है। यह वर्ष 1980 की कथा है–

“भूषण यादव के घर पर सत्यनारायण कथा हो रही थी। भिखारी पांडे कथा कह रहा था। निमंत्रण पाकर कमल कुशवाहा और चंदन रविदास भी जमे थे। दोनों अर्जक संघ के प्रचारक थे। कथा कहकर दान-दक्षिणा के लिए भिखारी पांडे अपनी चादर बिछाए हुए था। गृहस्थ से उसे चावल मिलना था।

‘भिखारी पांडे, एक बात पूछूं?’ कमल ने कहा।

‘एक क्या, दो बातें पूछो।’ भिखारी पांडे ने चिढ़कर कहा।

‘इस सत्यनारायण की कथा कहने से सुनने वाले को मोक्ष और स्वर्ग मिलता है, जैसा तुमने अभी कथा सुनाई। किंतु इस कथा के कहने वाले को क्या मिलता है?’ कमल ने पूछा।

‘यजमान जो कुछ देता है, पुरोहित को वही मिलता है। ब्राह्मण तो ईश्वर के दरबार में दिन-रात अरदास लगाता है। थोड़ा मिला, तो भी ठीक, ज्यादा मिला, तो भी ठीक।’ भिखारी पांडे ने कहा।

‘भिखारी पांडे, तुम्हारे अनुसार, यदि ईश्वर है, तो सबसे ज्यादा अन्याय ईश्वर ने तुम्हारे ही साथ किया है।’ कमल ने तीखे स्वर में कहा।

‘सो कैसे?’ भिखारी पांडे ने आश्चर्य से पूछा।

‘सो ऐसे कि तुम्हारा बाप रेल से कटकर दर्दनाक मौत मरा। तुम्हारी मां नि:संतान स्त्रियों को पकड़कर ओझा, मंत्री, भगत के यहां ले जाती थी और गैरमर्दों से संभोग कराकर गर्भिणी कराने का धंधा करती थी। इस गांव में पहली बार सिर्फ तुम्हारी मां ने यह धंधा किया था। इस गांव में पहली बार एक औरत वेश्या बन गई और वह है तुम्हारी बहन। वह अभी गया स्टेशन के प्लेटफार्म पर रहकर वेश्यावृत्ति से जीवन गुजारती है। भगवान का भजन कहने, सुनाने वालों की जब यह दुर्गति हो सकती है, तब सुनने वालों को क्या लाभ मिलेगा? ख़ाक। लोगों को ठगते-ठगते तुम स्वयं कितने ठगा गए, तुम्हें अंदाज़ नहीं है। अभी भी वक्त है। होश करो, और अच्छा काम करो। पतरा फाड़ दो, चोटी काट दो, जनेऊ तोड़ दो।’ कमल ने बड़ी निर्भयता से भिखारी पांडे के परिवार की दुर्गंधमय कथा कह सुनाई।

बात सच थी। सुनकर उपस्थित ग्रामीण अवाक रह गए। भिखारी पांडे का चेहरा स्याह पड़ गया। उसने अपनी गठरी उठाई और चलता बना। उसे पहली बार अनुभव हुआ कि उसकी पीठ पर दक्षिणा की गठरी नहीं, उसके परिवार की लूटी गई इज्ज़त की गठरी है।”[2]

हंस जी की कहानियां

बुद्ध शरण हंस के कई कहानी संग्रह हैं। दो संग्रह मेरे पास हैं– ‘देव साक्षी है’ और ‘तीन महाप्राणी’। ‘देव साक्षी है’ का प्रकाशन वर्ष 1978 है, जबकि ‘तीन महाप्राणी’ कहानी संग्रह 1996 में प्रकाशित हुआ था। उस समय तक ओमप्रकाश वाल्मीकि का भी कोई कहानी संग्रह छपकर नहीं आया था, हालांकि उनकी कहानियां हंस जी से भी पहले की हो सकती हैं। वाल्मीकि का पहला कहानी संग्रह ‘सलाम’ वर्ष 2000 में प्रकाशित हुआ था। यदि हंस जी की कहानियां पहले प्रकाशित हो गई थीं, तो इसका कारण यह था कि उनके पास प्रकाशन के अपने संसाधन थे, जो वाल्मीकि जी के पास नहीं थे।

यद्यपि यह कहना मुश्किल है कि हंस जी वाल्मीकि जी से पहले के कहानीकार हैं, लेकिन वह इस मामले में अलग ज़रूर हैं, क्योंकि उनकी कहानी-कला का संबंध कहानी के मानदंडों से नहीं है। हंस जी किस्सागो नहीं थे, वह कल्पना भी उनमें नहीं थी, जिससे कथा-शिल्प का निर्माण होता है। उनकी कहानियां उसी तरह की हैं, जिस तरह कोई खबरनबीस या पत्रकार किसी घटना की स्टोरी बनाता है। अर्थात घटना की फोटोग्राफी करता है। हंस जी की कहानियां इसी स्तर की हैं।

‘देव साक्षी है’ में उनकी पांच कहानियां संकलित हैं, और ‘तीन महाप्राणी’ में 13 कहानियां। लेकिन हंस जी की कहानियों पर साहित्य-जगत में कभी चर्चा नहीं हुई। मैं चाहता हूं कि उनकी कहानियों पर बात होनी चाहिए। हो सकता है कि इन कहानियों की भाषा और शिल्प आकर्षित न करे। और कहानी कहने की कला और कल्पना भी पूरी तरह भिन्न लगेगी। यह उन्होंने स्वीकार भी किया है, “मैं कहानीकार होने का दावा कभी नहीं करता, कहानी लिखना मेरा व्यसन भी नहीं। लेकिन देखी हुई घटनाओं, भोगे हुए क्षणों को जिस रूप में मैंने प्रकट किया है, यदि वह कहानी कही जा सकती है, तो मैं निश्चित ही कहानीकार हूं। … मेरी कहानियां ढोंगियों, पाखंडियों, शोषकों और शैतानों के लिए ज़हर-बाण हैं, यों मैं अपनी अनेक कहानियों का प्रत्यक्षदर्शी, भुक्तभोगी और स्वयं चेता भी हूं, लेकिन यह कोई विशेष बात नहीं है। मेरी कहानियों का उद्देश्य है– ढोंग, पाखंड, पुरोहितवाद, परलोकवाद, शोषण और शैतानियत का खंडन, जो आज देश और समाज को लील रहे हैं।”[3]

‘देव साक्षी’ संग्रह की पहली कहानी ‘देव कृपा’ है। यह कहानी 1975 की है, जिसे हम दलित साहित्य के मिशनरी युग की कहानी कह सकते हैं। इसमें एक पहलवान का छोटा बेटा चंदन जब बीमार पड़ता है, तो वह उसकी बीमारी दूर करने के लिए सत्यनारायण स्वामी की मनौती बोलता है। उसके ठीक होने पर वह घर में सत्यनारायण की कथा कराने का निश्चय करता है। टीकर पांडे से दिन-तारीख पूछकर वह बेटे बदन कुमार को, जो कालेज में पढ़ता है, टीकर पांडे को बुलाने के लिए उसके घर भेजता है। टीकर पांडे घर पर नहीं था। उसकी पत्नी जब बदन कुमार को देखती है, तो उसमें काम वासना पैदा हो जाती है। वह बदन कुमार को खाट पर बैठाकर उसके साथ यौन संबंध बनाती है। बदन पूछता है, ‘क्या पंडित जी तुम्हें खुश नहीं करते हैं?’ वह जवाब देती है, ‘उन्हें मुझसे ज्यादा अपने यजमान की चिंता रहती है।’ उसके तुरंत बाद टीकर पांडे आ जाता है, और तुरंत बदन कुमार के साथ उसके यहां कथा करने चला जाता है। यह कहानी ब्राह्मण कथा-वाचकों की स्त्रियों की चरित्रहीनता को उजागर करती है।[4]

‘तीन महाप्राणी’ संग्रह की भूमिका लिखते हुए अपने ‘दो शब्द’ में बुद्ध शरण हंस लिखते हैं, “ब्राह्मणवाद के विरुद्ध बेशुमार लेख लिखे गए हैं। लेकिन ब्राह्मणवाद के विरुद्ध कहानियों के सृजन का अभाव है। ब्राह्मणवाद के विरुद्ध इस पैने हथियार की आवश्यकता मैंने महसूस की। यह कहानी संग्रह इसी आवश्यकता का प्रतिफल है।” आगे उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह लिखी कि “ब्राह्मणवादी साहित्यकारों ने भूत और भगवान, आत्मा और परमात्मा, परिवार और समाज, दुःख और अभाव, सुख और शृंगार, बलात्कार और कुंठा, साम्यवाद और समाजवाद पर बेशुमार कहानियां लिखी हैं। लेकिन ब्राह्मणवाद के विरुद्ध किसी ब्राह्मणवादी साहित्यकार का लिखना वैसे ही असंभव है, जैसे किसी चोर-डकैत द्वारा अपनी चोरी-डकैती की रिपोर्ट थाने में लिखाना असंभव है।”[5]

बुद्ध शरण हंस द्वारा लिखित व प्रकाशित कुछ किताबें व उनकी पत्रिका

इससे यह तो स्पष्ट होता है कि बुद्ध शरण हंस ने ब्राह्मणवादी कहानीकारों के कथा-साहित्य का अध्ययन किया था। इस दृष्टिकोण से वह ब्राह्मणवाद के विरुद्ध लिखने वाले पहले दलित कहानीकार माने जाने चाहिए। ‘तीन महाप्राणी’ की पहली कहानी का नाम है– ‘बुध सरना कहानी लिखता है’। इस कहानी के माध्यम से उन्होंने बताया है कि ब्राह्मण समाज को दलित का शिक्षित और जागरूक होना अच्छा नहीं लगता। जेठू पंडित की पत्नी निस्संतान है, पर पढ़ी-लिखी है और इस बात को भी समझती है कि पंडित लोग दलितों के साथ गलत व्यवहार करते हैं। उसे कहानियां पढ़ने का शौक़ है। जब जजमानी से गठरी लेकर जेठू पांडे घर आया, तो उसकी पत्नी एक कहानी पढ़ रही थी। पंडिताइन किताब रखकर पति सेवा में लग जाती है। पंडित किताब को उठाकर देखता है तो दंग रह जाता है—‘अरे यह तो ‘देव साक्षी’ है। वह अपनी पत्नी से गुस्से में कहता है, ‘तुम इस किताब को पढ़कर अपना दिमाग़ गंदा कर रही हो। इ बुध सरना साला कहानी लिखता है। जी चाहता है, इसका मुंह नोच लें, या महानरक में जाने का श्राप दे दें।’ पंडिताइन चुटकी लेती है, ‘आप ही जैसा कोई भला पंडित इस लेखक का इतना सुंदर नाम रखा होगा– बुद्ध शरण हंस।’ पंडित क्रोध में कहता है कि किसी पंडित ने तो इसका नाम बुधुआ रखा होगा। यह जरूर कोई अछूत, नास्तिक, बौद्ध होगा। इ अभागा खुद ही अपना नाम रख लिया होगा बुद्ध शरण हंस।’ इसके बाद पंडिताइन पूछती है, ‘तो क्या किसी अछूत को आप अच्छा नाम नहीं रखते?’ पंडित उसे सनातन धर्म का रहस्य बताते हुए कहता है कि ‘अछूत का अच्छा नाम रखने का नियम ही नहीं है। मनु महाराज ने तो यहां तक कहा है कि इनका नाम ही नहीं, काम भी घृणाजनक होना चाहिए। इसीलिए हम चमार से मरे जानवर फेंकवाते हैं, मेहतर से पाखाना साफ़ कराते हैं और धोबी से कपड़े साफ़ कराते हैं।’ फिर पंडित उसे चमार टोली के जग्गू के बारे में बताता है कि उसका जब बेटा हुआ तो मैंने उसका नाम ‘लेंड़वा’ रखा था और दक्षिणा में उसकी गाय ली थी। उसी का दूध पीकर तुम स्वस्थ हुई थीं।’ ब्राह्मणी को इस नाम पर खीज हुई– ‘कोई अच्छा सा नाम रखते। यह भी कोई नाम हुआ ‘लेंड़वा’। कहते हुए लाज लगती है।’ वह लेंड़वा पढ़-लिखकर इंजीनियर बन गया है, पर नाम वही है। फिर पंडिताइन हंसकर पूछती है, ‘बुद्ध शरण हंस पर इतना क्यों बिगड़े हुए हैं? वह तो कहानी लिखते हैं और मजेदार।’ पंडित कहता है, ‘चुप रह लबड़ी कहीं की। हंस है कि कंस है? इसे हम अच्छी तरह से जानते हैं। जब से हमने इस बेहूदे लेखक की ‘देव कृपा’ कहानी पढ़ी है, मेरा मन अशांत हो गया है।’ पंडिताइन कहानी का मर्म समझाते हुए जेठू पांडे से कहती है, ‘कहानी तो कहानी है, इसमें इतना अकुलाने की क्या बात है?’ कहानी के अंत में जेठू पंडित अपने मन की आशंका को दबाकर पत्नी से कहता है, ‘रात में हम कहीं भी पूजा-पाठ करने जाएं, तब किबाड़ बंद करके मत रहना।’ इस पर पंडिताइन झल्लाकर कहती है, ‘पगला गए हो क्या? रात में किबाड़ खोलकर रहें, और कोई घर के अंदर हेलकर उत्पात मचाने लगे, तब हम क्या करेंगे?’ पंडित पर ‘देव कृपा’ कहानी का प्रभाव था। उसने पंडिताइन की चेतावनी को नकारते हुए कहा, ‘बड़ा चिक्कन बतियाती हो। जैसे हम न कुछ बूझते हैं, न समझते हैं। हम रात-भर पूजा-पाठ करते फिरते हैं। तुम यदि किसी को घर में बुलाकर किबाड़ बंद कर लोगी, तब हम क्या करेंगे?’ पंडित ने अपनी आशंका की सारी गांठें खोल दी थी।[6]

बुद्ध शरण हंस की अन्य कहानियों की चर्चा करने से यह लेख बहुत लंबा हो जाएगा, इसलिए उस पर फिर कभी।

हंस जी का व्याख्यान

मैं अब हंस जी की दो किताबों का ख़ास तौर से ज़िक्र करना चाहूंगा। एक, ‘दलितों की दुर्दशा’ और दूसरी ‘काश, हम हिंदू न होते’। ‘दलितों की दुर्दशा’ उनका एक व्याख्यान है, जो उन्होंने 1997 में ‘फुले-आंबेडकरवादी लेखक संघ’ द्वारा नागपुर में आयोजित दलित लेखक सम्मेलन में सभापति की हैसियत से दिया था। वह आज़ादी की स्वर्ण जयंती का समय था। यानी देश को आज़ादी मिले पचास साल बीत चुके थे। लेकिन क्या दलित वर्गों को भी आज़ादी मिली थी? यह एक बड़ा सवाल था, जो उन्होंने इस भाषण में उठाया था। इस भाषण में उन्होंने आज़ादी के बाद दलित जातियों पर बढ़ते अत्याचारों की घटनाओं के आंकड़ों का जो ब्यौरा दिया है, वह उस दौर का एक अहम दस्तावेज है। इस भाषण में उन्होंने उन दलित लेखकों और बुद्धिजीवियों की भी तीखी आलोचना की है, जो इन अत्याचारों की तरफ से आंखें मूंदे हुए थे। उन्होंने इस भाषण में, जो 1998 में पुस्तकाकार में प्रकाशित हुआ था, कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की है, जैसे ‘दलित बुद्धिजीवी’, ‘मीडिया और दलित’, ‘दलित और शिक्षा’, ‘बाल मजदूरों का शोषण’, ‘दलित और रोज़गार’, ‘आरक्षण और दलित’, ‘न्याय, न्यायपालिका और दलित’, ‘दलित महिला’, ‘दलितों पर अत्याचार’, ‘दलितों की पहचान मिटाने की कोशिश’, ‘दलित साहित्यकारों को सम्मान’, एवं ‘दलित साहित्य और दलित’। कुछ उदाहरण उल्लेखनीय हैं। ‘दलित और मीडिया’ पर हंस जी ने कहा था–

“अख़बार, पत्र-पत्रिकाएं, टी.वी., रेडियो, आदि प्रचार-प्रसार के संपूर्ण साधनों पर ब्राह्मणवादियों का एकाधिकार है। मीडिया के किसी भी क्षेत्र में दलितों की उपस्थिति शून्य है। मीडिया ब्राह्मणवाद के नग्न प्रचार का साधन बन गया है। नवंबर, 1997 में प्रसार भारती बोर्ड का गठन किया गया था, जिसका अध्यक्ष निखिल चक्रवर्ती, सचिव एस.एस. गिल, सदस्य बी.जी. बर्गीज, रोमिला थापर, आबिद हुसैन, यू.आर. राव, राजेंद्र यादव और पद्मनाभन को बनाया गया है। यहां भी दलित पत्रकार और साहित्यकार की उपस्थिति शून्य है। संयुक्त मोर्चा की सरकार होते हुए भी किसी भी दलित पत्रकार को प्रसार भारती बोर्ड में स्थान न देना दलित समाज की विद्वता और आवश्यकता को सीधा नकारना प्रमाणित होता है।”[7]

‘बाल मज़दूरों के शोषण’ पर उनका कहना था–

“भारत में बाल मज़दूर एक गंभीर समस्या है। यहां बाल मज़दूर का स्पष्ट अर्थ है दलित परिवारों के बाल मज़दूर। ठेकेदार इन मासूम बच्चों को कड़ी निगरानी में रखकर काम लेते हैं। अगर मां-बाप इस शोषण के ख़िलाफ़ बोलते हैं, तो उन्हें चोरी के इलज़ाम में फंसाकर, मार-पीटकर अधमरा कर दिया जाता है। आज की तारीख़ में बिहार में 11 लाख से अधिक बच्चे पढ़ने की उम्र में पेट पालने के लिए मेहनत-मज़दूरी करते हैं। बिहार में हर सौ बच्चों में तीन बाल श्रमिक हैं। कमोबेश यही स्थिति अन्य प्रांतों की है। समाज में बाल मज़दूरों का शोषण इस क़दर है कि पांच या दस रुपए प्रतिदिन पर उनसे दस से बारह घंटे काम लिया जाता है। बंधुआ मज़दूरी निवारण क़ानून 1976 में और समान वेतन क़ानून भी 1976 में बना था। लेकिन इनका पालन आज भी नहीं हो रहा।”[8]

‘न्याय, न्यायपालिका और दलित’ पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था–

“लोक कहाबत है कि न्याय मांगता निर्बल है, किंतु मिलता सबल को है। यह लोक कहाबत राजतंत्र काल की है। पर क्या आज भी दलित इस कहाबत से ऊपर उठ पाए हैं। आज न्याय विपरीतार्थक शब्द-सा बन गया है। जहां न्याय होगा, वहां दलित नहीं, और जहां दलित होगा, वहां न्याय नहीं। न्याय का सबसे घृणित शत्रु मैं मनु को मानता हूं, जिसने स्त्री और दलितों के विरुद्ध अन्याय करना न्यायसंगत माना है। वैदिक काल, ब्राह्मण काल, राजपूत काल से लेकर देश के पराधीनता काल तक पूरे भारत में मनु की कहीं प्रतिमा स्थापित नहीं की गई। किंतु देश की पचासवीं सालगिरह पर राजस्थान हाईकोर्ट में मनु की मूर्ति स्थापित की गई। राजस्थान उच्च न्यायालय ने भंवरी दलित महिला के बलात्कार कांड के मामले में यह निर्णय दिया कि सवर्ण जाति का व्यक्ति अछूत महिला के साथ बलात्कार करे, ऐसी कल्पना ही नहीं की जा सकती। मुक़दमे प्राय: सबल और निर्बलों के बीच होते हैं, जिसमें निर्बल पक्ष दलित होते हैं। समाज में उनका नाम-पद कुछ भी हो, मुक़दमे के रिकार्ड में फ़लां चमार, फ़लां दुसाध, फ़लां पासी, डोम, मेहतर आदि ही धड़ल्ले से लिखा जाता है, जबकि सरकार ने किसी के नाम के साथ जाति संबोधन लिखना निषिद्ध किया है। न्यायपालिका सरकार के आरक्षण नियम को नहीं मानती। तर्क यह है कि आरक्षण से न्यायालय में अयोग्य लोग न्यायाधीश हो जाएंगे। मेरी नज़र में न्यायिक सक्रियता ब्राह्मणवाद का अपरोक्ष षड्यंत्र है। अभी तक उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका और विधायिका को था। यह निर्णय पी.एन. भगवती ने दिया था। उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय को बदलकर यह निर्णय दिया कि उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के जजों की नियुक्ति का अधिकार केवल न्यायाधीशों को रहेगा। इस निर्णय का रहस्य यह था कि संसद में ब्राह्मणों की संख्या मात्र 56 है, जबकि प्रथम चुनाव में 330 सांसद ब्राह्मण थे। अब यदि विधायिका को जज नियुक्त करने का अधिकार रहा, तो बहुजन समाज के जज नियुक्त कर लिए जाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने 1997 में यह ब्राह्मणवादी फ़ैसला दिया कि हिंदुत्व धर्म नहीं, राष्ट्रीयता है। हिंदुत्व से 85 प्रतिशत भारतीय बर्बाद हुए और हो रहे हैं, जिसे राष्ट्रीयता की मुहर लगाकर अपना ब्राह्मणवादी मुखौटा स्पष्ट किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा क्रीमीलेयर का फ़ैसला समूची आरक्षण नीति को समाप्त करने का षड्यंत्र है, जिसकी बुनियाद के नीचे एक अंधे ब्राह्मण मधु लिमये का षड्यंत्र है।”[9]

काश! हम हिंदू होते

बुद्ध शरण हंस की दूसरी किताब, जो 1996 में छपी थी, वह है ‘काश, हम हिंदू न होते’। यह भगवानदास की किताब ‘मैं भंगी हूं’ की तर्ज पर लिखी गई प्रतीत होती है। इस किताब के संबंध में अपने ‘दो शब्द’ में हंस जी लिखते हैं– “इस पुस्तक में गरीबों की अंतकथा और अंतर्कथा दोनों है। जीवन के हर क्षेत्र में, हर स्थिति में इस देश के मूलनिवासियों को सताया गया है, बर्बाद किया गया है। दुख का कारण प्राचीन शत्रुता है। शत्रु संघर्षजीवी है, शांतिजीवी नहीं। वह मानवता का तत्वज्ञानी नहीं, मानवता को पीस-पीसकर पीने वाला महाकाल है, कारुणिक नहीं। गरीबों की अंतकथा कहने का अभिप्राय (यह है कि) अब उनके हाथ में अतीत का खोया हुआ अकाट्य अस्त्र पुनः प्राप्त हो गया है। यह अस्त्र है बौद्ध धम्म का। बौद्ध धम्म का पुनरुद्धार ही बहुजनों के दुख की अंतकथा है।”[10]

इस किताब का एक अंश इस प्रकार है–

“मैं ही अछूत हूं। मेरी संघर्षमयी यात्रा बहुत लंबी है। मैं किन दुखों से गुज़रा हूं, मुझे ख़ुद भी याद नहीं है। जब मैं दास था, तब भी मैं अछूत ही था। उस समय भी हिंदू मुझसे छुआते न थे। जब मैं शूद्र बना, तब भी मैं अछूत ही था। उस समय भी हिंदू न मुझे छूते थे, न छुआते थे। जब मैं अंत्यज हुआ, तब भी मैं अछूत ही था। हिंदू उस समय भी मुझे न छूते थे, न छुआते थे। जब मैं चांडाल बना दिया गया, तब भी मैं अछूत ही था। हिंदू न मुझे छूते, न मैं हिंदुओं को छू सकता था। यही हिंदू धर्म का आदेश था।

“जैसे ही हिंदू समाज में मेरे विरुद्ध अपमान, तिरस्कार के भाव कम पड़े, मेरा नया नामकरण कर दिया गया ‘अछूत’। पहले मैं सिर्फ काम से ही अछूत था। अब नाम और काम दोनों से अछूत बना दिया गया।

“मैं अछूत हूं। शोषण को सहना मेरा जीवन है। शोषण का विरोध करना मेरी मृत्यु है। मैंने जब-जब अन्याय का विरोध किया, मुझे मार डाला गया। कुत्ते-बिल्ली को मारने में हिंदू झिझकते हैं, किंतु अछूतों को मारने में हिंदुओं को तनिक भी झिझक नहीं होती। कुत्ते-बिल्ली अपने अधिकार से जीते थे, किंतु अछूत हिंदुओं की दया पर जीते थे।

“मुझे फिर हरिजन कहकर भद्दी गाली दी गई। हरिजन की गाली पर मैंने बहुत शोर मचाया। मैं इस गाली से बहुत तिलमिलाया। मुझे यह कहकर शांत किया गया कि हरिजन का मतलब तो भगवान की औलाद है। हमारे मार्गदाता डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर ने तुरंत जवाब दिया कि यदि अछूत भगवान की औलाद हैं, तब शेष लोग क्या शैतान की औलाद हैं? ब्राह्मणवादी चुप रहकर इस जवाब को टाल गए। मेरे लिए हरिजन नाम स्थाई हो गया।”[11]

इस लेख में हंस जी के संपूर्ण साहित्य पर चर्चा नहीं हुई है। वह एक लेख में हो भी नहीं सकती। किंतु उनके संपूर्ण लेखन-कर्म की रचनावली प्रकाशित होनी चाहिए, ताकि अकादमिक जगत में उनके साहित्य पर एक मुकम्मल शोध-कार्य हो सके।

संदर्भ :

[1] टुकड़े-टुकड़े आईना, भाग 2, आंबेडकर मिशन प्रकाशन, पटना, पृष्ठ 3
[2] वही, पृष्ठ 61
[3] देव साक्षी है, कहानी-संग्रह, आधार, पृष्ठ v-vi
[4] वही, पृष्ठ 1-11
[5] तीन महाप्राणी, कहानी-संग्रह, दो शब्द
[6] वही, पृष्ठ 1-4
[7] दलितों की दुर्दशा, बुद्ध शरण हंस, 1998, पृष्ठ 12
[8] वही, पृष्ठ 16-17
[9] वही, पृष्ठ 20-22
[10] काश, हम हिंदू न होते, बुद्ध शरण हंस, 1996, पृष्ठ 4
[11] वही, पृष्ठ 18-23

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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