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मध्य प्रदेश : बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए जाने के बावजूद पुनर्वास नहीं

संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 की सबसे स्पष्ट आवश्यकता है कि बंधुआ मजदूरों की पहचान की जाए और उन्हें रिहा कर उचित पुनर्वास दिया जाए। पुनर्वास के बिना बंधुआ मजदूर गरीबी, लाचारी और निराशा के कारण फिर से बंधुआ मजदूरी की ओर धकेल दिये जा सकते हैं। पढ़ें, सतीश भारतीय की यह रपट

“हमारे गांव कंजिया में निंदाई-कटाई ही मजदूरी का साधन है। इसके बाद रोजगार की चिंता मजदूरों‌ के सिर पर होती है। तब वे मजदूरी के लिए भोपाल, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में जाते हैं। ऐसे ही हम 23 मजदूरों को मजदूरी लिए कर्नाटक के बेनाकत्ति इलाका में ले जाया गया। जहां हमें बंधुआ बना लिया गया और हमसे करीब 20 दिन में रोज 16 घंटे मजदूरी करवाई गई। इस मजदूरी का कोई पैसा नहीं दिया गया।” यह आपबीती एक मजदूर पवन सहरिया की है, जिसकी उम्र करीब 18 वर्ष है। ऐसी ही आपबीती हरि सहरिया (35 वर्ष) की है। इन मजदूरों को बीते साल के नवंबर माह में ही मुक्त करा लिया गया, लेकिन इन मजदूरों के पुनर्वास को लेकर अभी तक कोई पहल नहीं की गई है। इसके कारण इन मजदूरों को फिर से पलायन करने की मजबूरी बनती जा रही है।

दरअसल, बीते नवंबर माह में मध्य प्रदेश के सागर जिले की बीना तहसील से एक मामला सामने आया था। तहसील के कंजिया गांव में मजदूरों का फोन आने से यह बात फैली कि गांव के सहरिया (आदिवासी) मजदूरों को कर्नाटक में बंधुआ बना लिया गया है। तब गांव के अधिवक्ता सैय्यद सज्जाद हुसैन ने कर्नाटक जाकर वहां के पुलिस प्रशासन की मदद से सभी मजदूरों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त करवाया।

अधिवक्ता सज्जाद हुसैन कहते हैं कि अभी तक आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज भी नहीं हुई। जब हम मजदूरों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त करवाने पहुंचे तब आरोपी भाग गये। आरोपी आर्थिक और राजनीतिक रूप से मजबूत है। अभी तक इस मामले में मजदूरों को प्रशासन ने कोई आर्थिक सहायता राशि नहीं दी है।

नेशनल कैम्पियन कमेटी फॉर इराडिकेशन ऑफ बॉन्डेड लेबर (एनसीसीईबीएल) के महासचिव निर्मल गोराना कहते हैं कि “बंधुआ मजदूरों के लिए कानून है पर लागू नहीं हो रहा। बंधुआ मजदूर को मुक्त तो किया जा रहा है लेकिन बंधुआ कानून 1976 के तहत बंधुआ मजदूरों का बयान प्रशासन के द्वारा रिकॉर्ड नहीं किया जा रहा है, जो कि कानूनी कार्रवाई के लिए अहम है। ऐसे ही मुक्त कराए गए मजदूरों के पुनर्वास के लिए कानून में प्रावधान है, लेकिन इस मामले में यह भी नहीं किया गया है। ऐसे में बंधुआ मजदूरी से मुक्त हुए मजदूरों को पुनः बंधुआ मजदूर बनाए जाने का संकट पैदा हो सकता है।”

सागर जिले के बीना तहसील के वे मजदूर, जिन्हें कर्नाटक में मुक्त कराया गया

ध्यातव्य है कि नीरजा चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था। इसके मुताबिक, यह संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 की सबसे स्पष्ट आवश्यकता है कि बंधुआ मजदूरों की पहचान की जाए और उन्हें रिहा कर उचित पुनर्वास दिया जाए। पुनर्वास के बिना बंधुआ मजदूर गरीबी, लाचारी और निराशा के कारण फिर से बंधुआ मजदूरी की ओर धकेल दिये जा सकते हैं।  

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार, बंधुआ मजदूर प्रणाली (उत्पादन) 1976 अधिनियम के प्रावधानों के क्रियान्वयन में राज्य सरकार की ओर से कार्यवाही की विफलता को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 का उल्लंघन माना जाएगा। अधिनियम के तहत पुनर्वास पैकेज के रूप में वयस्क लाभार्थी को 1 लाख रुपए प्रदान किया जाएगा। विशेष बंधुआ मजदूर के लिए पुनर्वास राशि 2 लाख रुपए की व्यवस्था है। जबकि, ज्यादा विशेष बंधुआ मजदूर के लिए 3 लाख रुपए के पुनर्वास की व्यवस्था है। वहीं, जिला स्तर पर जिलाधिकारी के पास 10 लाख रुपए की राशि की सुविधा है। इस राशि का उपयोग रिहा कराए गए बंधुआ मजदूरों की मदद के लिए तत्काल किया जा सकता है। इसके अलावा बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास पैकेज में भूमि अथवा आवास भी शामिल किया जा सकता है।

भारत में प्रवासी बंधुआ मजदूरी पर एनसीसीईबीएल की एक रिपोर्ट 28 नवंबर, 2025 को सार्वजनिक की गई थी। इस रिपोर्ट में डेटा के साथ कुछ केस स्टडी भी शामिल है, जिसमें मध्य प्रदेश के गुना और ग्वालियर जिले की केस स्टडी भी है। इन केस स्टडी में बताया गया कि वर्ष 2016 में गुना जिले में 450, 2021 में 3 व 2024 में 13 और ग्वालियर जिले में 2022 में  50 बंधुआ मजदूरों को मुक्त करवाया गया। मगर, पुनर्वास के तौर पर कोई आर्थिक सहायता नहीं दी गई। 

वहीं प्राप्त जानकारी के अनुसार, 31 मार्च, 2016 तक 2 लाख 82 हजार 429 बंधुआ मजदूर  मुक्त और पुनर्वासित किये गए। इन मजदूरों में तमिलनाडु के 65 हजार 573, कर्नाटक के 58 हजार 348, ओडिशा के 47 हजार 313, उत्तर प्रदेश के 37 हजार 788, आंध्र प्रदेश के 31 हजार 687, बिहार के 14 हजार 577 और मध्य प्रदेश के 12 हजार 392 बंधुआ मजदूर मुक्त और पुनर्वासित किये गए। 

मुक्त कराए गए बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास के लिए सरकारी दस्तावेजों में धन का कोई संकट नहीं है। प्रेस इनफॉरमेशन ब्यूरो के अनुसार, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने बंधुआ मजदूरों के लिए वार्षिक तौर पर कई करोड़ की राशि आवंटित की। यह राशि वर्ष 2018-19 में 10 करोड़,  2019-20 में 8 करोड़, 2020-21 में 10 करोड़, 2021-22 में 10 करोड़ और 2022-23 में 10 करोड़ थी। 

केंद्र सरकार का बंधुआ मजदूरी के निदान हेतु क्या प्लान है, इस तरफ गौर फरमाएं तब मालूम होता है कि सरकार ने वर्ष 2016 में बंधुआ मजदूरों को लेकर एक लक्ष्य रखा था। यह लक्ष्य था वर्ष 2030 तक अनुमानित 1.84 करोड़ बंधुआ मजदूरों की पहचान करना, उन्हें मुक्त करना और उनका पुनर्वास करना। साथ में सरकार ने कहा था कि, बंधुआ मजदूरों की संख्या को वर्तमान अनुमान के 50 प्रतिशत तक कम करना है। लेकिन, बंधुआ मजदूरों के लगातार आ रहे मामले कई सवाल खड़े कर‌ रहे हैं। खासकर जब जब बंधुआ मजदूरों को मुक्त किया जाता है और उन्हें सर्टिफिकेट और पुनर्वास नहीं दिया जाता, तब लगता है कि, सरकार 2030 तक अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएगी।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सतीश भारतीय

मध्य प्रदेश के सागर जिला के निवासी सतीश भारतीय स्वतंत्र युवा पत्रकार हैं

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