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सिरपुर का इतिहास संरक्षित करे सरकार

यूनेस्को ने विश्व धरोहरों की अस्थायी सूची में सिरपुर को शामिल कर महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। लेकिन सिरपुर के इन पुरातात्विक धरोहरों के भ्रमण करने के दौरान यह जानकारी मिलती है कि कई पुरातात्विक स्थल में धार्मिक क्रियाएं की जा रही हैं, रंग-रोगन किया जा रहा है, सीमेंट के प्लास्टर किए जा रहे हैं, जो कि पुरातात्विक दृष्टिकोण से नुकसानदेह हैं। बता रहे हैं डॉ. संजीव खुदशाह

छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक और पुरातात्विक गौरव सिरपुर ने अंतरराष्ट्रीय पहचान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। प्राचीन नगरी सिरपुर को ‘सिरपुर कल्चरल एंड आर्कियोलॉजिल लैंडस्केप’ के नाम से यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल किया गया है। भारत की ओर से इसका प्रस्ताव 28 सितंबर, 2026 को यूनेस्को के समक्ष प्रस्तुत किया गया था।

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में महानदी के तट पर स्थित सिरपुर को यूनेस्को ने केवल मंदिरों के समूह के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक और पुरातात्विक परिदृश्य के रूप में देखा है। उसके अनुसार, इसका ऐतिहासिक विकास लगभग 5वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच हुआ और यह प्राचीन दक्षिण कोसल की राजनीतिक, धार्मिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। यूनेस्को यह भी बताता है कि 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र में बौद्ध मठों और धार्मिक गतिविधियों का उल्लेख किया था।

सिरपुर की एक खासियत यह है कि यहां हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं का सह-अस्तित्व है। यहां आनंदप्रभु कुटी विहार, स्वस्तिक विहार तथा हर्षगुप्त-तीवरदेव बौद्ध विहार जैसे महत्वपूर्ण बौद्ध अवशेष भी मौजूद हैं। यूनेस्को ने इसी बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक स्वरूप को सिरपुर के असाधारण महत्व का एक महत्वपूर्ण आधार माना है।

सिरपुर का महत्व केवल धार्मिक स्थापत्य तक सीमित नहीं है। पुरातात्विक उत्खननों से यहां बाजार परिसर, आवासीय संरचनाएं, जल-प्रबंधन व्यवस्था, कुएं, स्नानगृह, सड़कें, राजमहल और व्यापारिक गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं। इससे पता चलता है कि प्राचीन सिरपुर एक विकसित नगरीय और व्यापारिक केंद्र था। यूनेस्को ने इसे प्रारंभिक मध्यकालीन नदी-आधारित नगरीय केंद्र के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

यूनेस्को ने तय किए मानदंड

सिरपुर के इतिहास को समझने में यहां प्राप्त शिलालेख और ताम्रपत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। सरभपुरिया शासकों प्रवरा‍राज और महासुदेवराज से संबंधित ताम्रपत्र सिरपुर की प्राचीनता के महत्वपूर्ण प्रमाण माने जाते हैं। इसी प्रकार महासिवगुप्त बालार्जुन के समय के अभिलेख तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन की जानकारी देते हैं।

यूनेस्को ने सिरपुर के संबंध में दो मानदंड प्रस्तावित किए हैं। पहला मानदंड विभिन्न संस्कृतियों और धार्मिक-कलात्मक परंपराओं के बीच हुए आदान-प्रदान से संबंधित है, जबकि दूसरा किसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक काल को दर्शाने वाले स्थापत्य और नगरीय परिदृश्य से संबंधित है।

सिरपुर में बेतरतीब पड़े हैं ऐतिहासिक अवशेष

सिरपुर को महानदी के किनारे इसकी भौगोलिक स्थिति ने व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया। यूनेस्को ने अपने विवरण में सिरपुर को मध्य भारत, पूर्वी भारत, दक्कन और बंगाल की खाड़ी की ओर जाने वाले ऐतिहासिक संपर्कों से जुड़े केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

यहां की एक और विशिष्टता एक मंदिर की ईंट वास्तुकला है, जिसे लक्ष्मण मंदिर कहा जाता है। यूनेस्को इसे प्रारंभिक मध्यकालीन भारत के महत्वपूर्ण ईंट-निर्मित मंदिरों में गिनता है। सिरपुर की स्थापत्य परंपरा में स्थानीय स्ट्रोमैटोलाइट पत्थर के उपयोग का उल्लेख भी यूनेस्को के दस्तावेज में मिलता है।

जाहिर तौर पर सिरपुर का यूनेस्को की विश्व धरोहरों की अस्थायी सूची में शामिल किया जाना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इसे अभी यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज की सूची में स्थायी रूप से शामिल नहीं किया गया है। विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के लिए आगे मूल्यांकन और नामांकन की प्रक्रिया होगी। इसके बाद विस्तृत नामांकन दस्तावेज तैयार किया जाएगा और यूनेस्को की निर्धारित मूल्यांकन प्रक्रिया के बाद ही अंतिम निर्णय होगा। 

फिर भी यह छत्तीसगढ़ के लिए ऐतिहासिक अवसर है। सिरपुर के संरक्षण, वैज्ञानिक उत्खनन, अभिलेखों के अध्ययन और पुरातात्विक सामग्री के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण को नई गति मिल सकती है। यदि आगे चलकर सिरपुर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होता है, तो यह केवल छत्तीसगढ़ की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि भारत की बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक और प्राचीन नगरीय विरासत की वैश्विक पहचान को भी मजबूत करेगा।

पुरातात्विक धरोहरों में निजी लोगों का कब्जा 

लेकिन सिरपुर के इन पुरातात्विक धरोहरों के भ्रमण करने के दौरान यह जानकारी मिलती है कि कई पुरातात्विक स्थल में धार्मिक क्रियाएं की जा रही हैं, रंग-रोगन किया जा रहा है, सीमेंट के प्लास्टर किए जा रहे हैं, जो कि पुरातात्विक दृष्टिकोण से नुकसानदेह हैं। इस पर अविलंब रोक लगाई जानी चाहिए।

सिरपुर में रहने वाले कृष्णाजी नंदेश्वर बताते है कि दस दिन पहले शर्मनाक घटना घटी। प्राचीन शिलालेख के ऊपर सफेद पेंट और सीमेंट लगा दिया गया, जिसके कारण उसके ऊपर लिखे अक्षरों को पढ़ना मुश्किल हो गया है। 

शिलालेखों पर किया जा रहा प्लास्टर

समता सैनिक दल, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष संघ सेन दुपारे कहते हैं कि गत 15 अक्टूबर को वह अपनी टीम के साथ सिरपुर गए थे। उन्होंने पाया की कई पुरातात्विक अवशेष यहां-वहां बिखरे पड़े हैं, जिनका रख-रखाव सही ढंग से नहीं हो रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) भी इस मामले में मौन है। कई बौद्ध अवशेषों को हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। कुछ शिलालेख जो लापरवाही के कारण टूट गए उन्हें सीमेंट से जोड़ा गया है। इसके कारण इन शिलालेखों को नुकसान पहुंचा है। जबकि इसके लिए विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए थी।

दुपारे का कहना है कि सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाना विशेष तौर पर दलित बहुजन समाज के लिए एक खुशी का क्षण है। अब हमें प्रयास यह करना चाहिए कि शीघ्र ही सिरपुर को स्थाई रूप से सूची में शामिल किया जाए।

बहरहाल, सिरपुर इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहां इतिहास केवल खंडहरों में नहीं, बल्कि मंदिरों, बौद्ध विहारों, जैन अवशेषों, बाजारों, जल-व्यवस्था, शिलालेखों और महानदी के किनारे विकसित एक प्राचीन नगरीय संस्कृति में जीवित दिखाई देता है। क्या एएसआई की यह जिम्मेदारी नही बनती कि इन पुरातात्विक धरोहरों को निजी व्यक्तियों के कब्जा से छुड़ाकर अपने कब्जे में ले और इसे नुकसान पहुचाने वालों के ऊपर कानूनी कार्यवाही किया करे? यदि ऐसा नहीं हुआ तो जल्द ही सिरपुर कबाड़ में तब्दील हो जाएगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

संजीव खुदशाह

संजीव खुदशाह दलित लेखकों में शुमार किए जाते हैं। इनकी रचनाओं में "सफाई कामगार समुदाय", "आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग" एवं "दलित चेतना और कुछ जरुरी सवाल" चर्चित हैं

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