ईरान में चल रहे युद्ध ने वैश्विक तेल आपूर्ति शृंखलाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है, और एक बार फिर भारत के गरीबों और मजदूर वर्ग को इस संकट का सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। एलपीजी की कीमतें आसमान छू रही हैं और फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं, जिससे प्रवासी मजदूर शहरों से भारी संख्या में लौटकर अपने गांवों का रुख कर रहे हैं। लेकिन इस बार घर पर मनरेगा जैसी कोई सुरक्षा उनकी प्रतीक्षा नहीं कर रही।
इस आशय से संबंधित मनरेगा संघर्ष मोर्चा द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि गत 1 अप्रैल से देशभर में ग्रामीण रोजगार लगभग ठप्प हो चुके हैं। मनरेगा के काम प्रभावी रूप से बंद हो गए हैं और विकसित भारत – गांरटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबी-ग्रामग) के लागू होने की कोई जानकारी नहीं है। मजदूरों का कहना है कि कहीं भी काम नहीं मिल रहा। स्थानीय अधिकारी काम के आवेदनों को स्वीकार करने से यह कहते हुए इनकार कर रहे हैं कि वीबी-ग्रामग के रोलआउट पर कोई निर्देश नहीं हैं और मनरेगा के तहत नए काम शुरू नहीं कर सकते। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक के कुछ जिलों में मजदूर यूनियनों के दबाव से आवेदन स्वीकार किए गए हैं। लेकिन कोई नया वर्कसाइट नहीं खोला गया। गत फरवरी से पुराने वर्कसाइटों पर कुछ ही मजदूरों को जगह दी जा रही है, अधिकांश ग्रामीण मजदूर बेरोजगार हैं।
विज्ञप्ति के मुताबिक मनरेगा से जुड़े आंकड़े भी यही दिखाते हैं। मसलन, वर्ष 2025 के अप्रैल में 26 करोड़ व्यक्ति-दिन (दिहाड़ी) काम जेनरेट हुए थे। जबकि 2026 में 15 अप्रैल तक केवल 95 लाख व्यक्ति-दिन ही जेनरेट हुए हैं। वित्तीय वर्ष 25-26 के अंतिम तिमाही में – यानी वीबी-ग्रामग पारित होने के बाद – देश में केवल 21 करोड़ व्यक्ति-दिन काम जेनरेट हुए, जो वित्तीय वर्ष 24-25 की समान अवधि से 31 प्रतिशत कम है। यह तब है जब मनरेगा बजट पिछले साल से ज्यादा था। मनरेगा की स्थिति पर अस्पष्टता मजदूरी भुगतान में भी दिख रही है। बीते 21 जनवरी, 2026 से सभी राज्यों में लगभग कोई मजदूरी भुगतान नहीं हुआ, जिसमें करीब 10 हजार करोड़ रुपए की मजदूरी लंबित है।

कुछ अधिकारी केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के जुलाई, 2021 के सर्कुलर का हवाला दे रहे हैं, जिसमें ‘नरेगासॉफ्ट’ में प्रति पंचायत 20 कामों की सीमा लगाई गई थी। मजदूर संगठनों ने बार-बार कहा है कि यह गैरकानूनी है और मनरेगा अधिनियम का उल्लंघन करती है। फिर भी, इसे मजदूरों के अधिकार को नकारने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी बीच, ऑनलाइन उपस्थिति और लंबित मजदूरी की पुरानी समस्याएं हैं। उत्तर प्रदेश में मजदूर चेहरे की पहचान से उपस्थिति खोने की शिकायत कर रहे हैं, जबकि झारखंड में महीनों पुराने काम की मजदूरी नहीं मिल रही। ये सारी समस्याएं मिलकर मजदूरों पर भारी निराशा का असर डाल रही हैं, कई ने काम मांगना ही बंद कर दिया है, जिससे मोदी सरकार दुनिया के सबसे बड़े रोजगार गारंटी कार्यक्रम को खत्म करने के अपने लक्ष्य के करीब पहुंच गई है।
इस कारण दस साल में पहली बार संशोधित मनरेगा मजदूरी दरों को वित्तीय वर्ष शुरू होने से पहले अधिसूचित नहीं किया गया। वीबी-ग्रामग के तहत लागत साझेदारी अनुपात 60:40 हो गया है, जिसमें राज्य को सभी लागतों का 40 प्रतिशत (केवल सामग्री लागत नहीं) वहन करना होगा। चूंकि मजदूरी लागत का लगभग आधा हिस्सा अब राज्यों को वहन करना है, इसलिए अधिसूचित मजदूरी दर राज्य की अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी से कम होने का कोई कारण नहीं।
विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब देश भर में मज़दूरों के बीच नाराज़गी बढ़ रही है। हाल ही में गुरुग्राम और नोएडा में भी इसका असर देखा गया है। फैक्ट्री के मज़दूर हों या घरेलू कामगार, हर तरह के काम करने वाले लोग अब सड़क पर उतरकर न्यूनतम मज़दूरी और बेहतर काम करने की शर्तों की मांग कर रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में स्थिति खासतौर पर चिंताजनक है, जहां दिसंबर, 2021 से कोई मनरेगा काम नहीं हुआ। सितंबर, 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने काम फिर शुरू करने का निर्देश दिया, लेकिन मजदूरों को केंद्र से केवल मौखिक आश्वासन मिले कि वह मनरेगा काम बहाल करेगा। केंद्र ने अदालत को आश्वस्त किया था कि वीबी-ग्रामग अधिसूचित होने तक मनरेगा चालू रहेगा। लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। अदालत में दिए गए बड़े-बड़े दावों और बंद कमरों के खोखले वादों के बीच लाखों मजदूर गहरी तंगी में धकेल दिए जा रहे हैं।
(संपादन : नवल/अनिल)
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