जेएनयू में जब मैंने वर्षों पहले एम.ए. के ‘एंट्रेंस एग्जाम’ की तैयारी की, तो डॉ. आंबेडकर के संदर्भ में दो-तीन सवालों से सामना हुआ, जैसे– गांधी से ‘कास्ट’ के सवाल पर उनके क्या मतभेद थे? नेहरू से उनके क्या मतभेद थे? आंबेडकर ने ग्राम स्वराज के बारे में क्या कहा? इन सवालों के जवाब ढूंढ़ना मेरे लिए डॉ. आंबेडकर के विचार और आंदोलन को समझने का एक ‘एंट्री पॉइंट’ था। उनके बारे में मैंने तब गंभीरता से पढ़ना शुरू किया, जब मैं जेएनयू पहुंचा। वहां राजनीतिक तौर पर सक्रिय छात्रों और ‘इंटेलेक्चुअल-एक्टिविस्ट’ लोगों के माध्यम से भी डॉ. आंबेडकर को समझने और महसूस करने का अवसर मिला।
एक बार बाबासाहेब की तहरीरों को जब मैंने पढ़ना शुरू किया, तो मुझे लगा कि मेरे जीवन में वे एक बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए हैं, क्योंकि उन्होंने मुझे देखने का एक ‘चश्मा’ दिया। मैं हिंदुस्तानी समाज में किसी भी चीज़ को जब देखता हूं, तो डॉ. आंबेडकर का दृष्टिकोण काफी अहम हो जाता है।
उनकी लेखनी का सबसे आसान और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जो बात वे लिखते हैं, वह आपको बहुत आसानी से समझ में आती है। वहीं, अगर आप दूसरे विचारकों को पढ़ते हैं, तो उनकी बातें उतनी आसानी से आपके दिल पर नहीं उतरतीं। मसलन कि उन्होंने 25 नवंबर, 1949 को ‘कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली’ में ऐतिहासिक भाषण दिया था। वह ऐसा वक्त था, जब लगभग तीन वर्षों से कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली अर्थात् संविधान सभा में दस्तूर-ए-हिंद (भारतीय संविधान) की ड्राफ्टिंग का काम चल रहा था। जिस दिन डॉ. आंबेडकर ने अपनी तक़रीर की, उस दिन संविधान बनकर तैयार हो चुका था और फिर उसे ‘अडॉप्ट’ भी कर लिया गया। इस तरह संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर का जो ‘क्लोज़िंग स्पीच’ था, वह काफी महत्वपूर्ण है और उसकी प्रासंगिकता आज भी बरकरार है।
हालांकि उनकी यह स्पीच छोटी है, मगर इसके अर्थ बहुत बड़े हैं। इस स्पीच के दो-तीन पहलुओं को यहां रखता हूं। सबसे पहली बात जो उन्होंने कही और जो आज के दौर में भी बेहद प्रासंगिक है, वह यह कि अच्छा कानून होना, अच्छा संविधान होना, अपने आप में न्याय की गारंटी नहीं है।
अब आप पूछ सकते हैं कि क्या डॉ. आंबेडकर बुरा कानून चाहते थे? मेरा उत्तर होगा– ‘हरगिज़ नहीं’। दरअसल, उनका यह कहना कि अच्छा क़ानून अपने आप में इंसाफ़ की गारंटी नहीं है, एक बहुत गहरी बात है। इसे समझने के लिए हमें कानून को समाजशास्त्र के दृष्टिकोण से देखना होगा, जिसकी अहमियत ‘सोशियोलॉजी ऑफ़ लॉ’ के अध्ययन में रेखांकित की जाती है।
डॉ. आंबेडकर का कहना था कि अच्छा कानून अपने आप में वंचितों को अधिकार नहीं दिला सकता, क्योंकि अगर अच्छा क़ानून बुरे लोगों के हाथ में चला जाए, तो वर्चस्ववादी समूह और जातियां अच्छे क़ानून की भी व्याख्या और उसका ‘इम्प्लीमेंटेशन’ अपने व्यक्तिगत तथा अपनी जाति और वर्ग के स्वार्थों को पूरा करने के लिए करेंगी। इस तरह दबे-कुचलों को न्याय नहीं मिल पाएगा। लेकिन अगर कानून बुरा भी हो, और दबे-कुचलों को उसकी व्याख्या तथा उसे कार्यान्वित करने का मौक़ा दे दिया जाए, तो मुमकिन है कि वे कमज़ोरों के पक्ष में न्याय दिला पाएं। याद रहे कि आंबेडकर जो बात कह रहे थे, वह ‘सोशियोलॉजी ऑफ़ लॉ’ के क्षेत्र में उनका एक बहुत बड़ा योगदान है, जिसे जातिगत मानसिकता से ग्रसित स्कॉलर अक्सर नज़रअंदाज़ करते हैं।
आंबेडकर के इस विचार को मैं एक उदाहरण से समझाने की कोशिश करता हूं। मान लीजिए कि आप बाज़ार से एक नई कार खरीदकर लाते हैं। कार बिल्कुल नई है, उसमें किसी प्रकार की कोई गड़बड़ी नहीं है और उसमें ईंधन भी पर्याप्त है। लेकिन उसे चलाने वाला इंसान अगर लापरवाह है, तो इस बात की संभावनाएं काफ़ी बढ़ जाती हैं कि ‘एक्सीडेंट’ हो जाए। लेकिन अगर कार की हालत बहुत अच्छी न भी हो, मगर उसे चलाने वाला इंसान समझदार और ज़िम्मेदार हो, तो इस बात के ज़्यादा ‘चांस’ हैं कि वह कार को सही-सलामत मंज़िल तक पहुंचा दे।
यहीं से डॉ. आंबेडकर की आरक्षण संबंधी ‘फिलॉसफी’ निकलती है। उन्होंने कहा है कि भारतीय समाज को एक बहु-मंज़िला मकान की तरह देखो, जहां एक फ्लोर पर आग लगी है और दूसरे फ्लोर पर पानी बह रहा है, लेकिन उनके बीच कोई तालमेल नहीं है। नतीजा यह है कि कोई पानी में डूब रहा है और कोई आग में जल रहा है।
यानी भारतीय समाज में जाति, आर्थिक स्थिति और लिंग के आधार पर जो भेदभाव है, उसकी वजह से अफ़सर, पदाधिकारी और पॉलिसी-मेकर कई बार अपने स्वार्थ तथा अपनी जाति और वर्ग के हितों से ऊपर नहीं उठ पाते। अफ़सर और पदाधिकारी ‘रैशनल’ तरीक़े से व्यवस्था को चलाएंगे, ऐसी बातें सिद्धांतों में ज़्यादा और ज़मीन पर कम दिखाई देती हैं। जाति व्यवस्था वाले समाज में पैदा हुआ इंसान जब पदाधिकारी बनता है, तो वह अपने जातिगत पूर्वाग्रह को अपने कार्यालय तक लेकर जाता है और अपनी जाति तथा अपने वर्ग के स्वार्थ को पूरे समाज और देश का हित कहकर ‘जस्टिफाई’ करता है।
जाति की सच्चाई से इनकार करने वाले कुछ लोग कई बार यह तर्क देते हैं कि मैंने तो कभी जातिवाद नहीं किया, मैं तो बहुत निष्पक्ष हूं। यह मुमकिन है कि व्यक्तिगत स्तर पर कोई जातिवादी हो और कोई जातिवादी न हो; कोई बुरा हो, कोई अच्छा भी हो। लेकिन जब हम समाज-विज्ञान की बात करते हैं, तो हम समाज के स्तर पर बात करते हैं और एक बड़े ‘पैटर्न’ को देखते हैं।
संभव है कि कोई व्यक्ति बड़े पद पर बैठकर बिना भेदभाव किए नीतियां बनाए, लेकिन ऐसे लोग हमारे समाज में कम हैं। इसलिए न्याय सुनिश्चित करने का सबसे बेहतर तरीका यह है कि वंचित समाज के लोगों को ‘डिसीजन-मेकिंग’ की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। सत्ता में उनकी भागीदारी हो। उन्हें केवल अनुपाती प्रतिनिधित्व ही न मिले, बल्कि उनकी भागीदारी असरदार भी हो।
इसके लिए ज़रूरी है कि दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और समाज के हर दबे-कुचले तथा कमज़ोर तबके को कानून बनाने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए, कानून लागू करने में उन्हें ज़िम्मेदारी दी जाए, नौकरियों में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व मिले, संसद और विधानसभा में उनकी मज़बूत उपस्थिति सुनिश्चित की जाए। आसान शब्दों में कहें तो पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक, पुलिस थाने से लेकर आर्मी छावनी तक, कचहरी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, यूनिवर्सिटी से लेकर साहित्य और फ़िल्म इंडस्ट्री तक, खेती-बारी से लेकर व्यापार और उद्योग तक, हर जगह वंचित समाज के व्यक्ति को जगह मिले। जब यह सब होगा तो वह अपने समाज के हितों की अनदेखी नहीं होने देगा। वह उनकी आवाज़ उठाएगा और इस तरह वंचितों को न्याय मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

देश में जब मंडल कमीशन की कुछ सिफारिशों को लागू किया गया, तो जातिवादी लोग यह प्रोपेगंडा करने लगे कि “मंडल आया, जातिवाद लाया।” लेकिन अगर आप मंडल कमीशन की रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ेंगे, तो उसमें डॉ. आंबेडकर की ही बातों को दोहराया गया है। मंडल कमीशन की रिपोर्ट में आरक्षण को ‘जस्टिफ़ाई’ करते हुए कहा गया है कि समाज की ऐसी जातियों को, जिन्हें नीति-निर्माण में अब तक जगह नहीं मिली है, अगर उन्हें जगह दी जाए, तो वे क़ानून बनाते वक़्त और ‘पॉलिसी’ को इम्प्लीमेंट करते समय राष्ट्र-निर्माण में योगदान देंगी, क्योंकि उनके साथ उनके समाज का अनुभव भी होगा। यह दलील भी बाबासाहेब के विचारों पर आधारित नज़र आती है।
आसान शब्दों में कहें तो मंडल कमीशन की रिपोर्ट भी डॉ. आंबेडकर के विचारों पर आधारित है। मंडल रिपोर्ट ने कहा कि समाज में जितनी जातियां हैं, जितने समुदाय हैं, उनके अपने अनुभव हैं, उनके अपने दर्द हैं, उनके अपने मसाइल हैं। अगर वंचित समाज के लोगों को नीति-निर्माण में लाया जाएगा, अगर उन्हें व्यवस्था चलाने की ज़िम्मेदारी दी जाएगी, तो वंचित समाज समेत पूरे समाज और देश का भला होगा और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया तेज होगी, क्योंकि ताक़तवर तबका कमज़ोर तबकों के हक़ में सही ढंग से नहीं सोच सकता।
यही वजह है कि डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा के अपने भाषण में कहा कि अच्छा कानून बन जाने के बावजूद, अगर वंचित समाज का व्यक्ति उस क़ानून को कार्यान्वित करने के लिए मौजूद नहीं है, तो महकूम तबकों को न्याय नहीं मिलेगा। लेकिन अगर कानून बुरा भी हो, और उसे लागू करने वाला इंसान कमज़ोर वर्ग से हो, तो वह बुरे कानून से भी कुछ अच्छा निकाल सकता है। यहीं से ‘अफर्मेटिव एक्शन’ की पूरी पॉलिसी और रिज़र्वेशन की पूरी सोच निकलती है।
लेकिन रिज़र्वेशन के डिबेट को अक्सर सवर्ण मीडिया ग़लत तरीके से पेश करती है। वह दुष्प्रचार करती है कि रिज़र्वेशन का फ़ायदा कुछ ही लोगों को मिला और कुछ जातियां ही सबका हक़ खाए जा रही हैं। यह भी भ्रम फैलाया जाता है कि रिज़र्वेशन से ‘मेरिट’ खत्म हो रहा है। ज़रा सोचिए कि जो समाज हज़ारों सालों से अवसरों से वंचित रहा है, उसको अगर आगे बढ़ने का कुछ मौक़ा मिले, तो उसके ख़िलाफ़ इस तरह की अफ़वाह फैलाना कितना न्यायपूर्ण है?
संविधान सभा के अपने संबोधन में डॉ. आंबेडकर की एक अहम बात यह भी थी कि अच्छा कानून अपने आप में पर्याप्त नहीं है। हमें वंचित समाज के लोगों को भी साथ लाना होगा और उन्हें सत्ता में भागीदारी देनी होगी।
जाहिर तौर पर जो वंचित समाज से नहीं आते, उन्हें सामाजिक न्याय के विमर्श से घबराने की ज़रूरत नहीं है। सोशल जस्टिस की राजनीति किसी जाति या समूह विशेष के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि वह समता और बराबरी की पक्षधर है। वह सबके अधिकारों की रक्षा की बात करती है। वह वंचित समाज के अधिकारों के लिए ज़्यादा ज़ोर इसलिए देती है, क्योंकि आज भी उनका हक़ मारा जा रहा है।
आप आंकड़े उठाकर देखिए कि क्या यह सच्चाई नहीं है कि सरकारी से लेकर निजी संस्थानों तक दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक ‘अंडर-रिप्रेज़ेंटेड’ हैं, जबकि सवर्ण समाज के लोग अपनी आबादी से कहीं ज़्यादा पदों पर आसीन हैं?
यह बात बार-बार फ़रामोश कर दी जाती है कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं है। ग़रीबी एक बड़ी समस्या है और इसके लिए कई स्कीमें हैं, तथा बहुत सारे कार्यक्रम और बहुत सारी योजनाएं और आनी चाहिए। सवर्ण समाज के जो लोग आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं और जो गरीब हैं, उनकी समस्या वाजिब है और सोशल जस्टिस की राजनीति उनके दुख-दर्द के साथ हैं। लेकिन यह भी याद रहे कि सवर्णों की ग़रीबी वांछितों के रिज़र्वेशन को ख़त्म करने से समाप्त नहीं होगी और वंचित समाज के लोगों को आगे बढ़ने से रोकने से पूरा समाज और देश की प्रगति रूक जाएगी।
डॉ. आंबेडकर ने जहां वंचित तबके के लिए रिज़र्वेशन की बात कही है, वहीं उन्होंने देश के सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की भी बात की है। इस तरह आप देख सकते हैं कि आंबेडकर सिर्फ़ दलितों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के बारे में फ़िक्रमंद थे और यही चिंता उनके संविधान सभा की तक़रीर में भी खुलकर सामने आती है। अपने भाषण में डॉ. आंबेडकर ने राजनीतिक अधिकारों के अलावा सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की महत्ता पर ज़ोर दिया है।
आजकल डॉ. आंबेडकर को कई तरह से ‘मिसइंटरप्रेट’ किया जाता है। कोई कहता है कि वे ‘बाज़ारवाद’ के समर्थक थे, कोई कहता है कि वे समाजवाद के विरोधी थे। लेकिन बड़ी सच्चाई यह है कि डॉ. आंबेडकर एक बड़े ‘सोशल डेमोक्रेट’ थे। वे केवल राजनीतिक अधिकार मिल जाने को सफल लोकतंत्र नहीं मानते थे। उनके नज़दीक कामयाब जमहूरियत वही है, जहां सबको ‘सोशल’ और ‘इकोनॉमिक राइट्स’ मिलें। आज की पीढ़ी के मन में यह सवाल उठ सकता है कि डॉ. आंबेडकर ने सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना है?
इसे ऐसे समझिए कि मतदान के दिन एक अमीर व्यक्ति, एक अफ़सर, एक नौकर या कोई झुग्गी में रहने वाला इंसान, सभी वोट डालते हैं और सबके वोट की कीमत बराबर होती है। लेकिन ‘इलेक्शन बूथ’ से बाहर निकलते ही अमीर और ग़रीब का फ़र्क़ दिखने लगता है। अमीर को हर सुविधा हासिल होती है और गरीब को दो वक़्त की रोटी भी मयस्सर नहीं होती। जब गरीब व्यक्ति अस्पताल जाता है, तो उसे इलाज नहीं मिलता। जब वह रेल में यात्रा करता है, तो उसे सुविधाएं नहीं मिलतीं।
यही वजह है कि डॉ. आंबेडकर बार-बार कहते हैं कि राजनीतिक समानता अपने आप में पर्याप्त नहीं है। जब तक सामाजिक और आर्थिक समानता नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा। आंबेडकर पूंजीवादी व्यवस्था की कमियों को जानते थे और वे ‘स्टेट सोशलिज़्म’ की बात करते थे। वे पूंजीवादी नहीं, बल्कि ‘सोशल डेमोक्रेसी’ के पैरोकार थे। वे लोकतंत्र को इसलिए पसंद करते थे, क्योंकि यह ऐसी व्यवस्था है जहां सामाजिक और आर्थिक ग़ैरबराबरी को शांतिपूर्ण तरीक़े से हल किया जा सकता है।
अपने ज़माने में डॉ. आंबेडकर इस बात से चिंतित थे कि आज़ादी के बाद जो व्यवस्था आने वाली है, उसमें लोगों के सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को उस तरह सुनिश्चित नहीं किया गया है, जैसे राजनीतिक अधिकारों को। उनको इस बात का डर था कि बिना सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के राजनीतिक अधिकारों का बहुत अधिक मतलब नहीं रह जाएगा। यही बात डॉ. आंबेडकर की उस तारीखी तक़रीर का मरकज़ थी। डॉ. आंबेडकर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि “26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में समानता होगी, जबकि सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति एक मत और एक मत एक मूल्य के सिद्धांत को मान्यता देंगे। लेकिन अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में, अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण, हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को नकारते रहेंगे। हम कब तक इस विरोधाभासी जीवन को जीते रहेंगे? हम कब तक अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे? यदि हम इसे लंबे समय तक नकारते रहे, तो हम केवल अपने राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल देंगे। हमें इस विरोधाभास को जल्द से जल्द दूर करना होगा, अन्यथा असमानता से पीड़ित लोग राजनीतिक लोकतंत्र की उस संरचना को ध्वस्त कर देंगे जिसे विधानसभा ने बड़ी मेहनत से बनाया है।”
डॉ. आंबेडकर की मूल बात यह थी कि अगर राज्य और सत्तावर्ग ने वंचितों और गरीबों के आंसू नहीं पोंछे, अगर लोगों को सामाजिक अधिकार नहीं दिए, अगर उनको वाजिब मज़दूरी नहीं दी, अगर लोगों को मकान नहीं दिया, सबको बराबरी नहीं दी, नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता नहीं दी और जात-पात को ख़त्म नहीं किया, तो जिस लोकतांत्रिक ढांचे को बनाने के लिए इतनी कुर्बानियां दी गई हैं, वही ढांचा आने वाले दिनों में ख़तरे में पड़ जाएगा।
साल 1949 में डॉ. आंबेडकर ने यह चेतावनी दी थी और आज 70-80 साल बाद भी समानता की लड़ाई अधूरी है। जिस तरह हमारे सरकारों और राजनेताओं को सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए काम करना चाहिए था, कहीं न कहीं सत्तावर्ग उसमें नाकाम रहा है। अब तो देश की हवा ही बदल गई है। सरकार की नीतियां समाज में समानता लाने से अधिक अमीरों की तिजोरियां भरने की दिशा में अग्रसर दिखाई देती हैं।
अगर आप सरकारी डेटा देखें, या अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो एक सवाल उठता है कि भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन ‘ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स’ में 190 देशों की सूची में वह लुढ़ककर 130वें स्थान पर क्यों पहुंच गया है? क्या हमारा स्थान ‘ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स’ में पांचवें या दसवें स्थान पर नहीं होना चाहिए था?
स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार और मानव विकास के किसी भी डेटा को आप देख लीजिए, भारत की हालत चिंताजनक नज़र आती है। ‘चाइल्ड मॉर्टैलिटी’ की ही बात करें, तो भारत में हर 1000 बच्चों में लगभग 27 बच्चों की मृत्यु हो जाती है, जबकि श्रीलंका में यह संख्या करीब 6 है। यानी इस मामले में श्रीलंका हमसे बेहतर स्थिति में है।
भारत के भीतर भी संपत्ति का असमान वितरण है। वंचितों के पास संपत्ति नहीं है, जबकि सवर्ण अमीरों के पास संपत्ति का केंद्रीकरण बढ़ता जा रहा है। एक आंकड़े के अनुसार, भारत के शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के पास लगभग 40 प्रतिशत राष्ट्रीय संपत्ति है। उसी तरह बड़े-बड़े बिज़नेस घराने सवर्ण समाज से ही आते हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया के शीर्ष पदों से दलित, आदिवासी, पिछड़ा समाज के पत्रकारों के लिए दरवाज़े अघोषित रूप से बंद हैं।
बहरहाल, डॉ. आंबेडकर यह समझते थे कि भारतीय लोकतंत्र के सामने बहुत सारी चुनौतियां हैं। भारत की ‘डेमोक्रेसी’ कोई हिमालय पर्वत की तरह स्थिर संरचना नहीं है कि उसकी स्थिरता के बारे में निश्चिंत हो जाया जाए। अगर लोकतंत्र के ज़रिए वंचितों को अधिकार नहीं मिलेगा, ग़ैर-बराबरी दूर नहीं होगी, जात-पात के ख़िलाफ़ तहरीक नहीं होगी, तो ‘डेमोक्रेसी’ कमज़ोर हो जाएगी और वंचित समुदायों में नाराज़गी बढ़ती जाएगी। फिर यही वंचित लोग इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े हो जाएंगे।
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in