मध्य प्रदेश का पन्ना जिला हीरों के लिए मशहूर है। यहां गरीब लोग हीरा पाने के लिए जिंदगी खदानों में झोंक देते हैं, लेकिन हीरे के जैसे अपने जीवन को नहीं चमका पाते। हीरे के लिए चर्चित पन्ना आज भी पिछड़े जिलों में आता है। यहां के लोगों के जीवन में कई कहानियां बिखरी हुई हैं। हाल की एक नई कहानी है ‘स्केटबोर्डिंग’। यह एक रोमांचक खेल है जिसमें लकड़ी के एक बोर्ड का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें चक्के लगे होते हैं। इस पर सवार होकर खिलाड़ी चलते हैं और हैरतअंगेज करतबें दिखाते हैं। इस खेल को 2020 में ओलंपिक गेम्स में शामिल किया गया।
इसी पन्ना जिले से करीब 10 किलोमीटर दूर एक गांव है– जनवार। यहां आदिवासी समुदाय सहित अन्य समुदाय के लोग भी रहते हैं। इस गांव को देश-दुनिया में यहां के स्केटबोर्डिंग के खिलाड़ियों ने पहचान दिलाई है।
गांव में 50 से ज्यादा आदिवासी लड़के-लड़कियां हैं, जो स्केटबोर्डिंग के खेल में माहिर हैं। इनमें कई लड़के-लड़कियों ने तो गोल्ड मेडल भी जीता है, लेकिन, आज इन खिलाड़ियों के पास फंड, पंजीयन शुल्क, यात्रा खर्च, स्केटबोर्डिंग किट, स्केटबोर्डिंग पार्क का अभाव इत्यादि समस्याएं हैं। ऐसे में वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 4-5 सालों से खेलने नहीं जा पा रहे हैं।
इसी गांव की हैं स्केटबोर्डिंग की प्रसिद्ध खिलाड़ी आशा गोंड। आशा ने वर्ष 2018 में विश्व स्केटबोर्डिंग चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। वर्ष 2021 की नेटफ्लिक्स फ़िल्म ‘स्केटर गर्ल’ आशा के जीवन पर ही आधारित है। वर्तमान में वह गांव की लड़कियों को स्केटबोर्डिंग सिखाती हैं। साथ में वे इन लड़कियों का नेतृत्व भी करती हैं।

वे कहती हैं– “हमारे गांव जनवार में वर्ष 2014 में उलरिके रेनहार्ट नामक जर्मनी की एक समाजसेविका आई थीं। उलरिके ने हमें स्केटबोर्डिंग खेलना सिखाया। खेलने के लिए प्रेरित और मार्गदर्शित किया। वर्ष 2019 में उलरिके रेनहार्ट जर्मनी वापस लौट गईं। बारहवीं तक पढ़ने के बाद मैंने स्केटबोर्डिंग खेल वर्ष 2016 से शुरू किया था। इस खेल में कुछ दिन तो ठीक गुजरे, लेकिन फिर मुझे गांव में चुनौतियों का सामना करना पड़ा। स्केटबोर्डिंग तब अधिकतर लड़के खेलते थे। ऐसे में मेरी जैसी लड़कियों का स्केटबोर्डिंग खेलना गांव वालों को अखरता था। तब वे मेरे माता-पिता से शिकायत करते थे कि आपकी लड़की स्केटबोर्डिंग क्यों खेलती है। तब मुझ पर परिवार का दबाब रहता था। धीरे-धीरे मेरे परिवार ने समझा कि मैं यह खेल खेल सकती हूं और देश का नाम रौशन कर सकती हूं।”
आशा आगे कहती हैं कि “आज मैं 20 से 25 लड़के-लड़कियों को स्केटबोर्डिंग खेल सिखाती हूं। इनमें से कई लड़कियों ने खेल में गोल्ड मेडल और सम्मान हासिल किए हैं। मगर, राष्ट्रीय स्तर पर स्केटबोर्डिंग खेलने के लिए हमारे पास फंड नहीं है। ऐसे में हम 4-5 वर्षों से राष्ट्रीय स्तर पर खेलने नहीं जा पाए। इन 20-25 लड़के-लड़कियों के रहने-खाने, यात्रा, रजिस्ट्रेशन फीस का वहन हम खुद नहीं कर पा रहे। हमारी मेंटर उलरिके रेनहार्ट इस समय जर्मनी में हैं। जब वो भारत में थी तो हमें काफी मदद करती थीं और स्केटबोर्डिंग से जुड़े लोगों से फंड में हेल्प करवाती थीं। तब देश-विदेश खेलने हम जा पाते थे।”

कल्पना गोंड खेल में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। वह कहती हैं कि “मेरे माता-पिता मजदूरी करते हैं। वर्ष 2015 से स्केटबोर्डिंग का खेल शुरू करने के बाद मैंने विशाखापट्टनम, पांडिचेरी और चंडीगढ़ जैसे अन्य बड़े शहरों में स्केटबोर्डिंग खेला है। हमारे यहां जो स्केट पार्क और कम्युनिटी सेंटर है, वह लीज पर है। इन दोनों का सालाना किराया 60-65 हजार रुपए है जो हमें देना पड़ता है। इन चुनौतियों को देखकर कभी-कभी लगता है कि कहीं हमारे उज्ज्वल सफर का अंत न हो जाए।”
जनवार गांव की दशा व्यक्त करते हुए कल्पना गोंड कहती हैं कि “गांव में लोग कहते हैं कि ये लड़कियां स्केटबोर्डिंग करते हुए लड़कों के साथ घूमतीं हैं। इन लड़कियों की शादी क्यों नहीं कर देते। इस स्थिति में भी हम आंख, कान मूंद कर खेल पर ध्यान देते हैं। हमारे पास हौसला तो है लेकिन, फंड और जगह की समस्या हमारे सपनों की उड़ान में बांधा बन गई है।”
आगे हमारी चर्चा होती है प्रियंका गोंड से। वे हाई स्कूल की विद्यार्थी हैं। प्रियंका का परिवार खेती-बाड़ी करके अपनी रोजी-रोटी चलाता है। वे कहती हैं कि “गांव में जब बच्चे स्केटबोर्डिंग करते हुए गिरते थे तब मैं देखकर डर जाती थी। लगता था बहुत कठिन खेल है। लेकिन, खेलते-खेलते पता नहीं चला और इस खेल से लगाव हो गया। फिर जब मैंने गोल्ड मेडल जीता तब मेरे माता-पिता मुझे सपोर्ट करने लगे।”
आगे हम बात करते हैं आठवीं की छात्रा दुर्गा गोंड से। दुर्गा के पिता बीमार रहते हैं। इस स्थिति में आंगनबाड़ी सहायिका के रूप में काम कर उनकी मां ही घर की आजीविका चलाती हैं। अपने हालात रखते हुए दुर्गा गोंड बतलाती हैं कि “मैंने विशाखापट्टनम में स्केटबोर्डिंग खेलते हुए गोल्ड मेडल जीता है। पहले हमारे जीवन में कुछ निश्चित नहीं था। स्केटबोर्डिंग खेल से जीवन को एक दिशा और आधार मिला है। हमारी सरकार से मांग है कि हमारे खेल को जीवित बनाए रखने के लिए हमारी मदद करे।”
इसी गांव के 17 वर्षीय सचिन बताते हैं कि “स्केटबोर्डिंग खेलने के लिए जगह नहीं होने के कारण हमें गांव से 10 किलोमीटर दूर पन्ना के सार्वजनिक पार्कों तक आना पड़ता है। हम सोचते हैं कि कहीं कोई तो जगह हो जहां हम स्केटबोर्डिंग खेल सकें। हम अब पहले जैसा स्केटबोर्डिंग नहीं खेल पा रहे हैं। कोई भी खेल अभ्यास पर निर्भर करता है। यदि हमें खेल की विभिन्न सुविधाएं मिलेंगीं, तब हम निश्चित रूप से आगे बढ़ेंगे।”
करीब 18 साल के रामजी गोंड कहते हैं कि “मैं कोल्डड्रिंक्स बेचता हूं। मगर, दिल में स्केटबोर्डिंग खेल बसता है। इस खेल से दूर जाने की सोचता हूं तो लगता है कि जीवन में कुछ रह नहीं जाएगा। इसलिए खेल के प्रति अधिक लगाव है। लेकिन, आर्थिक परेशानी हमारे खेल की सबसे बड़ी रुकावट है।”

रामजी गोंड के ही हमउम्र केसूराम गोंड। वे कहते हैं कि “इस खेल की स्थिति यह है कि गांव में खेल का ऑफिस भी बंद हो गया है। ऑफिस के कंप्यूटर और अन्य समान गांव में यहां-वहां हो गया है। लीज पर जो हमारा स्केटपार्क है उसके रखरखाव के लिए कुछ समय पहले फंड आया तो उसमें से कुछ पैसा पार्क में लगाया गया। बाकी यहां-वहां कर दिया गया। ऐसी कई परिस्थितियां हैं, जिनके कारण इस खेल में कई चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं।”
पन्ना के सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश गोंड से इस मामले में बातचीत की। इस दौरान मुकेश कहते हैं कि “जनवार के आदिवासी खिलाड़ियों की प्रतिभा किसी से छिपी नहीं है। यह गौरवान्वित करने वाली हैं। लेकिन शासन-प्रशासन इन खिलड़ियों के सपनों को सच में बदलने के लिए विशेष ध्यान नहीं दे रहा है।”
मुकेश आगे कहते हैं कि “एक तरफ देश में क्रिकेट जैसे खेल के लिए करोड़ों रुपए हैं, दूसरी ओर जनवार जैसे ग्रामीण क्षेत्र में फल-फूल रही खेल प्रतिभा के लिए कोई फंड नहीं। यह उपेक्षा नहीं तो और क्या है? मेरी सरकार से मांग है कि वह इन खिलाड़ियों के सपनों को साकार करने के लिए समुचित सुविधाएं और पर्याप्त फंड की व्यवस्था करे।”
(संपादन : नवल/अनिल)
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