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ऐसे थे भिखारी ठाकुर और ऐसा था उनका प्रभाव

भोर होने से पहले भिखारी ठाकुर की नाच मंडली को गांव छोड़ना पड़ा। लेकिन नाच की आंच बहुत दिनों तक बनी रही। जवार की कई लड़कियां बूढ़े वर को देखकर मंडप से भाग गईं। कइयों ने जहर खा लिया। नौतनवां गांव के लोगों ने प्रौढ़ वर को देखते ही बारात लौटा दिया। बता रहे हैं रामेश्वर प्रसाद चौधरी

भिखारी ठाकुर (18 दिसंबर, 1887 – 10 जुलाई, 1971) पर विशेष

बीसवीं शताब्दी की बिहार-विभूतियों में लोक कलाकार भिखारी ठाकुर का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इन्हें ‘अनगढ़ हीरा’ कहा तो जगदीश चंद्र माथुर ने ‘भरत मुनि की परंपरा में रंगमंच का अनूठा अधिनायक’ और ‘भरत मुनि के मानस-वंशज’ के रूप में याद किया है।

निस्संदेह भिखारी ठाकुर भोजपुरी के समर्थ लोक कलाकार, नवजागरण के संदेशवाहक, आधुनिक नारी विमर्श एवं दलित विमर्श के प्रमुख उद्घोषक थे, जिन्होंने अपनी बहुआयामी प्रतिभा एवं लोकप्रियता से भोजपुरी भाषी क्षेत्र को चमत्कृत किया। यहां तक कि ब्रिटिश सरकार ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ‘वार फंड’ में पैसा इकट्ठा करने के लिए भिखारी ठाकुर का इस्तेमाल किया। बदले में शाहाबाद के तत्कालीन कलक्टर ने उन्हें ‘राय बहादुर’ की उपाधि दी थी। एक लंबे कालखंड में एक विस्तृत भोजपुरी क्षेत्र पर उनके गीतों और नाटकों का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि भिखारी ठाकुर अपने जीवनकाल में ही मिथ बन गए–

केहू जपत बा चाऊर तउलत केहू जपत मनिहारी में।

केहू जपत बा हम ना देखनी, ऊमर भइल बुढ़ारी में।।

केहू जपत बा सेम-साग में, भंटा तूरत कोड़ारी में।

केहू जपत बा मानुष ना हउवन, हउवन एक अवतारी में।।

भिखारी ठाकुर की चर्चा करने से पहले भोज, भोजपुर और भोजपुरी की संक्षिप्त चर्चा कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है। ये तीनों शब्द परस्पर संबंधित हैं और अति प्राचीन भी। प्राप्त सामग्रियों के आधार पर भोजपुरी साहित्य का आरंभ ‘सिद्ध साहित्य’ से होना प्रमाणित है। 1000 ईस्वी से योगी गोरखनाथ की रचनाओं के साथ-साथ ‘सोरठी-बृजभार’, ‘सोभानायक बनजारा’, ‘लोरिकायन’, ‘भरथरी चरित’, ‘कुंवर विजयमल’ और ‘आल्हा’ जैसे वीरगाथा काव्य मिलने लगते हैं। कबीर भोजपुरी रचनाकारों में सूर्य के समान हैं। यद्यपि अपनी भाषा को उन्होंने पूरबी कहा है–

बोली हमरी पुरब की, हमे लखे नहीं काये।

हमको तो सोई लखे, धुर पुरब का होय।।

इसी गौरवशाली भोजपुरी भाषा के यशस्वी गीतकार एवं नाटककार हुए भिखारी ठाकुर। उत्तरी बिहार के छपरा जिले के कुतुबपुर गांव में 18 दिसंबर, 1887 को नाई जाति में पैदा हुए भिखारी भी कबीर की तरह औपचारिक शिक्षा से वंचित रहे। अपनी जन्मजात प्रतिभा, स्वाध्याय, और लगन के बल पर वे भोजपुरी के समर्थ लोक कलाकार और लोक संगीत के अनन्य बने। सुरीला कंठ और जन्मजात अभिनय क्षमता वाले भिखारी ठाकुर स्वयं नाटकों की रचना करते, उपयुक्त पात्रों को खोजकर उन्हें अभिनय, गायन, वादन का प्रशिक्षण देते, साज-बाज की व्यवस्था करते और सबको साथ लेकर खुले रंगमंच पर उतरते थे। उनका नाच देखने के लिए पांच कोस की परिधि की ग्रामीण जनता 10-15 हजार की संख्या में जुटती थी। उस भीड़ को नियंत्रित रखने की क्षमता पुलिस या जमींदारों के लठैतों में नहीं होती थी। उसे भिखारी ठाकुर ही नियंत्रित कर सकते थे और वे करते भी थे।

भिखारी ठाकुर की रचनात्मक सक्रियता का काल 1917 से 1965 तक रहा। इस कालखंड में उनके द्वारा कुल 29 रचनाएं रची गईं, जो सस्ते कागज पर मोटे टाइप में छोटी-छोटी पुस्तिकाओं के रूप में प्रकाशित हुईं। उनके निधन के बहुत बाद उनकी रचनाओं को तीन खंडों में प्रकाशित करने की योजना बनी। लेकिन दो खंड ही प्रकाशित हो सके। वर्ष 2005 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा भिखारी ठाकुर रचनावली का प्रकाशन हुआ, जिसमें उनकी सभी रचनाएं संकलित हैं। उनकी रचनाओं को मुख्यत: दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला, लोक नाटक और दूसरा भजन-कीर्तन-गीत-कवित्त इत्यादि। उनके लोक नाटकों की संख्या 12 है, जिनमें ‘बिदेसिया’, ‘भाई विरोध’, ‘बेटी वियोग’ (बेटीबेचवा), ‘विधवा विलाप’, ‘पुत्रवध’, ‘कलयुग प्रेम’, ‘राधेश्याम बहार’, ‘गंगा-स्नान’, ‘गबरघिचोर’, ‘बिरहा बाजार’, ‘ननद-भौजाई’ आदि शामिल हैं।

भिखारी ठाकुर द्वारा रचित नाटक ‘भाई बिरोध’ का आवरण पृष्ठ। इस पृष्ठ पर भिखारी ठाकुर की तस्वीर छपी है।

‘भिखारी के नाच’ के प्रदर्शन के दौरान कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता था जो अकल्पनीय और अविस्मरणीय होता था, दर्शकों के लिए, गांव-जवार के लिए और स्वयं भिखारी ठाकुर की नाच-मंडली के लिए भी। एक बार बक्सर जिले के डुमरांव नगर के राजगोला में गर्मियों की रात में हो रहे नाच में नायिका विलाप कर रही थी। उसका करुण स्वर रात के सन्नाटे में पछिया हवा पर सवार होकर राजगढ़ में जग रहीं महारानी के कानों तक पहुंचा और वे द्रवित हो गईं। आधी रात में नगर की कौन औरत इतना करुण विलाप कर रही है? उसे क्या दुख है? यह जानने के लिए महारानी ने सिपाही को भेजा। कुछ देर बाद लौटकर सिपाही ने बतलाया कि कोई औरत नहीं रो रही है। गोला में भिखारी का नाच हो रहा है, उसी का ‘लौंडा’ (स्त्री पात्र का अभिनय करने वाला पुरुष) रो रहा है। दूसरे दिन दरबार में भिखारी ठाकुर की पेशी हुई और उनका नाच डुमरांव महाराज की इज्जत का सवाल हो गया। भिखारी ठाकुर को रंगून जाना था, लेकिन सामने डुमरांव महाराज की बेटी का विवाह था। इज्जत का सवाल था, भिखारी का नाच न हो तो क्या इज्जत रह जाएगी। भिखारी ठाकुर ने मान रखा और कहा कि डुमरांव में डंका पीटने के बाद ही रंगून को प्रस्थान करेंगे।

डिब्रूगढ़ (आसाम) में भिखारी ठाकुर की नाच मंडली गई। दो-तीन दिनों में ही रंग जम गया। वहां के सभी सिनेमा हॉल बंद होने के कगार पर आ गए। मालिकों ने जिला कलक्टर से फरियाद की और उन्होंने भिखारी ठाकुर की नाच-मंडली को जिलाबदर कर दिया।

ऐसे ही रजपुरा में ‘बेटी-बेचवा’ (बेटी वियोग) तमासा हुआ। बेटी के रूप में जगदेव के अभिनय से तमासा जीवंत हो गया। सारे दर्शक स्तब्ध। लोकलाज के भय से दूर अंधेरे में बैठी महिलाओं की सामूहिक सिसकी रूक नहीं रही थी। अधिकांश लोग उदास मन जाने लगे। मगर कुछ लोग मंच पर चढ़कर हंगामा करने लगे– “यह भी कोई नाच है? किसी की इज्जत से खिलवाड़ हो रहा है। एक पैसा नहीं देना है इन्हें। ढोलक, हरमुनिया छीनकर भगा दो सालों को” बात बढ़ गई। आयोजक भी लाचार हो गए। भोर होने से पहले भिखारी ठाकुर की नाच मंडली को गांव छोड़ना पड़ा। लेकिन नाच की आंच बहुत दिनों तक बनी रही। जवार की कई लड़कियां बूढ़े वर को देखकर मंडप से भाग गईं। कइयों ने जहर खा लिया। नौतनवां गांव के लोगों ने प्रौढ़ वर को देखते ही बारात लौटा दिया।

ऐसे थे भिखारी ठाकुर और ऐसा था उनका प्रभाव। आज नारी-विमर्श और दलित-विमर्श का बहुत चर्चा है। लेकिन यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि भिखारी ठाकुर के नाटकों का 70-75 प्रतिशत हिस्सा नारी विमर्श और दलित विमर्श को ही समर्पित है। उनके नाटकों का प्रधान विषय गांव की महिलाओं की समस्या है। उनकी रचनाओं में नारी हर रूप, यथा – मां, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेमिका, विधवा, वेश्या, ननद, भौजाई और सास – में उपस्थित है। तब नाई जाति की स्थिति भी दलितों जैसी ही थी। इसलिए बिहार के समाज की सामंती मानसिकता का दंश भिखारी ठाकुर को जीवन भर सहना पड़ा था। नाटकों की रचना करते समय उनके सामने समाज का गरीब, अशिक्षित, उपेक्षित दलित वर्ग ही था। उनके संपूर्ण नाट्यकर्म को समाज के इसी वर्ग के जीवन को बेहतर बनाने, उसके अंदर चेतना जगाने का प्रयास कहा जा सकता है। इस प्रयास में उन्हें सफलता भी मिली। उनके जीवनकाल में ही बेटी बेचने की प्रथा का अंत हो गया। बेमेल विवाह की भर्त्सना होने लगी, विधवा विवाह की प्रवृत्ति बढ़ी, बहुविवाह को अमर्यादित माना गया और बाल-विवाह के विरुद्ध तो कानून ही बन गया। भिखारी ठाकुर की मंडली के सदस्य दलित एवं पिछड़े वर्ग से ही आए क्योंकि शिक्षित-संभ्रांत परिवारों में नाच देखना ही प्रतिबंधित था, नाचना तो घृणित कर्म जैसा था।

खैर, कहा जा सकता है कि कबीर की तरह भिखारी ठाकुर भी भोजपुरी के उज्ज्वल नक्षत्र थे, जो लोक-कथा कहते-कहते, लोक-व्यथा सुनाते-सुनाते, लोक-मर्यादा निभाते-निभाते, विरोधियों और पाखंडियों से संघर्ष करते-करते 10 जुलाई, 1971 को अज्ञात क्षितिज में विलीन हो गए। मगर भोजपुरी साहित्य और संस्कृति को एक नई ऊंचाई और नई पहचान दे गए। लोकप्रियता की कसौटी पर वे अप्रतिम और अद्वितीय रहे। उनके जैसा दूसरा लोक-कलाकार अब तक सामने नहीं आया है।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

रामेश्वर प्रसाद चौधरी

लेखक बिहार विधानसभा के अवर सचिव रहे हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में ‘त्रिवेणी संघ का स्मरण’ व ‘टूटेगा चक्रव्यूह’ (काव्य संग्रह) शामिल हैं।

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