ओडिशा में कभी उस तरह के दलित-ओबीसी आंदोलन नहीं पनपे जिन्होंने कई अन्य राज्यों का राजनीतिक परिदृश्य बदल कर रख दिया है। नतीजा यह कि सूबे में जातिगत ऊंच-नीच और शोषण बदस्तूर जारी है और दलित व ओबीसी समुदायों को सत्ता में वाजिब हिस्सेदारी नहीं मिल सकी है।
मई, 2025 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली ओडिशा सरकार ने राजकीय और राज्य से अनुदान प्राप्त शैक्षणिक संस्थाओं में सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों (एसइबीसी या ओबीसी) के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू की। तब तक राज्य में एसइबीसी को केवल सरकारी नौकरियों में आरक्षण हासिल था। हाल में अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों को उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश हेतु आबादी के अनुरूप आरक्षण मिलना आरंभ हुआ है। वस्तुत: तकनीकी शिक्षण संस्थानों (इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों) में यह अकादमिक सत्र 2026-27 से प्रभावी होगा।
ऐसी स्थिति में क्या भाजपा सरकार का यह निर्णय सामाजिक न्याय की राजनीति और जातिगत पहचान की चेतना के विकास की दिशा में एक कदम है? क्या इससे भाजपा, जो पहली बार इस राज्य में सत्ता में आई है, को सामाजिक न्याय की राजनीति में पैठ बनाने में मदद मिलेगी? राज्य के राजनीतिक परिदृश्य के विश्लेषण से ऐसा नहीं लगता है।
ओडिशा में एससी और एसटी की आबादी कुल आबादी का क्रमशः 17.1 प्रतिशत और 22.5 प्रतिशत है और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) कुल आबादी का करीब 50 प्रतिशत हैं। इसके बावजूद भी ओडिशा में कभी उस तरह के दलित और ओबीसी आंदोलन नहीं पनपे जिन्होंने उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक एवं हरियाणा सहित कई राज्यों का राजनीतिक परिदृश्य बदल कर रख दिया है। राज्य में विभिन्न जातियों के संगठन, सामाजिक न्याय या जाति-आधारित भेदभाव और शोषण जैसे मुद्दे कभी नहीं उठाते जबकि इनके ज़रिए पहचान की राजनीति को मजबूती दी जा सकती है। नतीजा यह कि सूबे में जातिगत ऊंच-नीच और शोषण बदस्तूर जारी है और दलित व ओबीसी समुदायों को सत्ता में वाजिब हिस्सेदारी नहीं मिल सकी है। राजनीति के क्षेत्र में ऊंची जातियों का दबदबा है और जो भी थोड़े-बहुत ज़मीनी आंदोलन चल रहे हैं वे आदिवासियों और पर्यावरणविदों द्वारा खनन उद्योग की खिलाफत में हैं। (मोहंती, 2014)
अस्पष्ट पहचान
यदि ओडिशा में सामाजिक न्याय या जाति-आधारित राजनीति से जुड़ा कोई आंदोलन नहीं चल रहा है तो इसका एक बड़ा कारण है आबादी के लिहाज से प्रदेश की सबसे बड़ी जाति खंदायत की इन मुद्दों में अरूचि। और इसका कारण है आरक्षण के संदर्भ में इस प्रभावशाली जाति की अस्पष्ट स्थिति। खंदायत एक उन्नतिशील, कृषक जाति है जिसकी जनसंख्या प्रदेश की कुल आबादी के 35 फीसद से ज्यादा है। इस समुदाय को राज्य के भीतर एसइबीसी के रूप में मान्यता प्राप्त है, मगर केंद्रीय सूची में वह ओबीसी के रूप में दर्ज नहीं है। यह तो हुई कानूनी बात। सामाजिक क्षेत्र में तो इस समुदाय की स्थिति और भी अस्पष्ट है।

राज्य सरकार द्वारा प्रकाशित पाठ्य-पुस्तकें और बिना तथ्यों को जांचे-परखे लिखी गई इतिहास की कई पुस्तकें उन्हें एक कृषक लड़ाका जाति बताती हैं। इन पुस्तकों के अनुसार, उन्हें शासकों के सेवादार के रूप में ज़मीन मिली और उन्होंने आगे चलकर राजनीति को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित किया। उन्होंने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ विद्रोहों में हिस्सा लिया और विदेशी शासन की समाप्ति के बाद समाज का नेतृत्व किया। वे अपने श्रेणीकरण से जुड़ी असंगति के सुलझाव के लिए ओडिशा में विशेष दर्जा प्रदान करने, अपनी जाति को ओबीसी के केंद्रीय सूची में शामिल करने और उनके लिए सेना में एक अलग रेजिमेंट गठित करने की मांग करते आ रहे हैं। (नायक, 2017)
इस असंगति के चलते खंदायत समुदाय दलित व बहुजन राजनीति के समर्थन में खड़े होने से हिचकिचाता रहा है। सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर उनकी चुप्पी से वे करण (कायस्थ) और ब्राह्मण जैसी उच्च जातियों के साथ खड़े दिखते हैं। जाहिर है कि इससे जाति-आधारित लामबंदी की संभावनाएं और कमज़ोर हो गई हैं।
राज्य में जाति-आधारित चुनावी लामबंदी भी लगभग ना के बराबर है। हालांकि राज्य के पिछले विधानसभा चुनाव के लिए जारी भाजपा के घोषणापत्र में कुछ हद तक ओबीसी आरक्षण के संदर्भ में जातिगत पहचान की चर्चा की गई थी और उसमें यह भी कहा गया था कि अगर भाजपा राज्य में सरकार बनाएगी तो उसका मुख्यमंत्री आदिवासी होगा। यह एक प्रतीकात्मक परिवर्तन तो था मगर इस सब के बाद भी ओडिशा के राजनीतिक विमर्श में सामाजिक न्याय बहुत महत्वपूर्ण मसला नहीं बन सका है।
इस बात को कुछ विस्तार से समझना होगा। राज्य के कई ओबीसी समुदाय अपने आप को क्षत्रिय या बनिया मानते हैं और उनका सामाजिक आचरण इसी के अनुरूप होता है। वे मानते हैं कि वे आरक्षण के लिए पात्र हैं लेकिन वे जाति-विरोधी आंदोलनों और दलितों के लिए आरक्षण को एक कलंक के रूप में देखते हैं। इस दृष्टिकोण के राज्य पर हावी होने में राज्य के कद्दावर नेता बीजू पटनायक (जो 2000 से लेकर 2024 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे नवीन पटनायक के पिता थे) की अहम भूमिका थी। उनका कहना था कि “गरीबरा जाति नन्ही” (गरीबों की कोई जाति नहीं होती) और यह भी कि जाति को आरक्षण का आधार नहीं होना चाहिए। पटनायक सीनियर ने मंडल आयोग की रपट का विरोध करते हुए कहा था कि “अगर इतने सालों से उनके लिए आरक्षण के बावजूद पिछड़े वर्गों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है तो आने वाली पीढ़ियों में भी उनकी स्थिति सुधरने वाली नहीं है।”
धर्मांतरण का असर
धर्मांतरण ओडिशा में जाति-विरोधी आंदोलनों के न उभरने के पीछे एक कारक रहा है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य के 70 प्रतिशत आदिवासी, ईसाई हैं। अनुसूचित जातियों के कितने सदस्यों ने ईसाई धर्म का वरण किया (और अपना एससी दर्जा खो दिया), इस बारे में सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। मगर हम यह मान कर चल सकते हैं कि सामान्य श्रेणी में गिने जाने वाले ईसाइयों का एक बहुत बड़ा हिस्सा, ऐसे दलितों का होगा जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है।
चूंकि ईसाइयत क़ुबूल करने के बाद, दलित आरक्षण के पात्र नहीं रह जाते, इसलिए आरक्षण के मुद्दे पर उनके लामबंद होने की संभावना बहुत कम हो जाती है। इसके साथ ही, ईसाई मिशनरीज़ का जोर आध्यात्मिकता पर अधिक रहा है और वे जाति व्यवस्था या ब्राह्मणवाद के खिलाफ सीधी लड़ाई के पक्ष में नहीं रहे हैं। वे शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाकर दलितों की स्थिति में सुधार की पक्षधर रहे हैं। जो दलित ईसाई बन गए हैं, उन्हें भी जातिगत भेदभाव से मुक्ति नहीं मिली है। लेकिन वे भी कोई जाति-विरोधी आंदोलन खड़ा नहीं कर सके। वे स्वयं में मग्न हैं और ईसाई धर्म के अनुरूप अपने निजी सामाजिक और धार्मिक जीवन से संतुष्ट हैं। (वानखेड़े, 2009) इसके विपरीत, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में जिन दलितों ने ईसाई धर्म अपनाया है, उन्होंने धर्मपरिवर्तन के बावजूद राजनीति के क्षेत्र में अपनी दलित पहचान को बनाए रखा है।
इस सबके समानांतर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) सहित कई संगठन, आदिवासियों को हिंदू धर्म की छतरी तले लाने के लिए प्रयास करते रहे हैं। कोंध जैसे कई आदिवासी समुदाय अपने आपको क्षत्रिय और जंगलों के मूल राजा बताते हैं और इस तरह यह साबित करने का प्रयास करते हैं कि वे पनस जैसे दलित समुदायों से उच्च हैं। इससे भी एक समेकित दलित-बहुजन पहचान के निर्माण और सामाजिक न्याय का आंदोलन खड़ा करने के प्रयासों को धक्का पहुंचा है। राजनीति विज्ञानी प्रलय कानूनगो के अनुसार, “स्वतंत्रता के बाद यह धारणा और मज़बूत हुई कि चर्च और राज्य सत्ता के मदद से, पनस अपने अधिक शिक्षित और आर्थिक दृष्टि से बेहतर होने का लाभ उठाकर आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था का अधिकतम लाभ उठा रहे हैं। जबकि यह धारणा काफी हद तक गलत है क्योंकि अधिकांश पनस गरीब हैं और दलित ईसाई होने के कारण आरक्षण की सुविधा से महरूम हैं। मगर कोंध समुदाय के सदस्यों का आरोप है कि पनस अपनी ईसाई पहचान छुपाते हैं और जाली प्रमाणपत्रों के ज़रिए अपने आप को आदिवासी या हिंदू एससी साबित करते हैं। कोंधों को डर है कि पनस आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में उनके ऊपर अपना वर्चस्व स्थापित करने पर आमादा हैं।” (कानूनगो, 2008) इसी प्रतिस्पर्धा का नतीजा था सन् 2008 का कंधमाल दंगा, जो मूलतः इन दोनों समुदायों के बीच हिंसक टकराव था और जिसकी शुरुआत संघ परिवार के नेता लक्ष्मानंद सरस्वती की हत्या से हुई थी।
बड़े कदम की ज़रूरत
ओबीसी में जागरूकता के अभाव और दलितों व आदिवासियों के बीच धर्मांधता के चलते टकराव के कारण शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण से सामाजिक न्याय की राजनीति को बढ़ावा मिलने की कोई संभावना नहीं है। जब तक ओडिशा में ज़मीनी स्तर पर गहरे तक जड़ जमाए ब्राह्मणवाद के खिलाफ कोई प्रभावकारी वैकल्पिक आंदोलन नहीं खड़ा होता, तब तक राज्य में सामाजिक न्याय की राजनीति एक स्वप्न ही बनी रहेगी।
(यह आलेख पूर्व में मूल अंग्रेजी में इंडिया फोरम द्वारा प्रकाशित है। यहां लेखक की अनुमति से परिवर्द्धित रूप में हिंदी अनुवाद प्रकाशित। अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
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