“मुसलमान सूर्य की पूजा नहीं करते। वे कमल-पुष्प की भी पूजा नहीं करते। फिर भी ये चीज़ें इस्लामी वास्तुकला में सर्वत्र मौजूद हैं। लेकिन किसी (मुसलमान) ने उन पर इसलिए आपत्ति नहीं की, क्योंकि वे उनको हिंदू प्रतीकों के रूप में नहीं मानते हैं, बल्कि उन्हें भारतीय या यूं कहें कि दक्षिण एशियाई आकृतियों के रूप में देखते, समझते और सराहते हैं।”
ये विचार इतिहासकार सोहेल हाशमी की अंग्रेजी किताब ‘दी म्यूजिक ऑफ स्टोन्स: द मिथ ऑफ इस्लामिक आर्कीटेक्चर’ से लिए गए हैं, जो 2025 में सीगुल बुक्स, कोलकाता से प्रकाशित हुई थी। यह किताब उन्होंने मुझे 24 सितंबर, 2025 को भिजवाई थी, पर जैसा कि हर काम का एक निश्चित वक़्त होता है, इसलिए नियति ने हिंदी पाठकों के समक्ष इसका परिचय कराने के लिए, देर से ही सही, समय दे ही दिया।
यह किताब ‘हिस्ट्री फॉर पीस’ शृंखला में दिया गया एक व्याख्यान है, जो अगस्त, 2018 में सोहेल हाशमी ने कोलकाता में दिया था। इससे पूर्व इस शृंखला में इतिहास के अनेक कोणों से आठ व्याख्यान अलग-अलग इतिहासकारों द्वारा दिए जा चुके हैं। सोहेल हाशमी ने अपने व्याख्यान के बारे में लिखा है– “मैं केवल इतिहासकार नहीं, बल्कि भूगोलवेत्ता भी हूं। शायद मार्क ट्वेन के कनेक्टिकट यांकी की भी यही स्थिति थी, जब वह राजा आर्थर के दरबार में पहुंचा था, क्योंकि वह द्वीपों से नहीं था, बल्कि एक अमेरिकी था! इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मैं इतिहास की दृष्टि से वास्तुकला जैसे विषय पर विचार रखते हुए कुछ संकोच भी अनुभव कर रहा हूं।”
इस पुस्तक में सोहेल हाशमी ने मध्यकालीन दक्षिण एशियाई वास्तुकला या निर्माण-शिल्प के कुछ उन ख़ास तत्वों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है, जिन्हें हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि उस निर्माण-कला की बारीकियों में ईश्वर है, लेकिन सोहेल हाशमी कहते हैं कि वह उनमें शैतान को खोजते हैं।
सोहेल साहेब अपनी किताब की शुरुआत मिट्टी के घड़े से करते हैं। वह कहते हैं, “सभ्यता के विकास में घड़े का योगदान अहम है। कई हज़ार साल पहले जब आदमी ने घुमंतू जीवन छोड़कर एक जगह बसकर खेती करना सीखा होगा, तो उसे दो समस्याओं से गुज़रना पड़ा होगा। पहली पानी की समस्या और दूसरी बीजों के भंडारण की। पानी के लिए आदमी ने नदियों के किनारे बसना आरंभ किया। वहां उसने सबसे पहले मिट्टी के बर्तनों का निर्माण किया।” सोहेल साहेब लिखते हैं कि “इसके बाद ही आदमी ने पहली बार अपनी झोपड़ियों तक पानी पहुंचाने की क्षमता प्राप्त की। लेकिन मीलों दूर से पानी लाने का काम महिलाओं को सौंपा गया था; पुरुष केवल पानी पीता था, उसे लेकर नहीं आता था। इस कार्य को आज भी आधिकारिक स्वीकृति प्राप्त है।”
वह आगे लिखते हैं, “वास्तुकला के साक्ष्य बताते हैं कि आरंभिक हड़प्पा काल में खाना पकाने के लिए बढ़िया टेराकोटा के बर्तनों का उपयोग किया जाता था। हड़प्पावासियों ने अनाज का भंडारण करने के लिए बड़े बर्तन भी बनाए थे। हड़प्पा की कब्रों में भी मिट्टी के कई छोटे बर्तनों के टुकड़े मिले हैं, जो संभवतः यह बताते हैं कि वे परलोक में विश्वास करते थे, ठीक वैसे ही जैसे अन्य प्राचीन सभ्यताओं में भी ऐसे ही विश्वासों के चिह्न मिले हैं। प्रत्येक सभ्यता की पहचान उसके द्वारा बनाए गए मिट्टी के बर्तनों से होती थी, जैसे रोमन और ग्रीक के एम्फोरा और कलश, और हमारे अपने टेराकोटा और धूसर मिट्टी के बर्तन।”

लेखक के अनुसार, “ये घड़े ही कलश कहलाए। कलशों में जीवन था, पानी के रूप में, अनाज के रूप में तथा कुछ अन्य सामग्री के रूप में, इसलिए वे गर्भ से जुड़े और ‘गर्भ कलश’ कहे जाने लगे। कुछ समय बाद जन्म और विवाह के अनुष्ठानों के साथ-साथ अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में भी कलश का महत्व बढ़ गया, जो आज भी है। इस तरह वास्तुकला में भी कलश महत्वपूर्ण हो गया।” वह कहते हैं, “यदि आप महरौली में कुतबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाई गई जामी मस्जिद को ध्यान से देखेंगे तो आपको मस्जिद के स्तंभों के मध्य में कलश बने हुए दिखाई देंगे। इन कलशों के आधार पर कुछ पुरातत्ववेत्ताओं ने इन कलशों की पहचान इस रूप में की कि यह मस्जिद जैन मंदिरों को तोड़कर उनके अवशेषों से बनाई गई है।”

सोहेल हाशमी लिखते हैं कि “पराजित राजा के धर्म-स्थलों को तोड़ने का काम प्रत्येक विजेता करता था। यह विध्वंस वह यह साबित करने के लिए करता था कि वह और उसका ईश्वर ज्यादा ताक़तवर है। यह सामंती व्यवस्था को जीवित रखने और भूमि-राजस्व के निर्बाध प्रवाह को बनाए रखने का यही एकमात्र तरीक़ा था। मस्जिद के स्तंभों पर कलशों के अलावा नाग, रस्सियों के सहारे लटकी हुई घंटियां और राक्षसी चेहरे भी हैं। मस्जिद बनाने वालों ने देवी-देवताओं की आकृतियों को तो बिगाड़ दिया, लेकिन मुखौटे जैसे दिखने वाले राक्षसी चेहरों को वैसा ही रहने दिया। शायद उन्हें यह अहसास नहीं था कि ये क्या हैं? यह कलश उन सबसे दिलचस्प चीजों में से एक है, जो 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के सल्तनत काल की इमारतों में देखने को मिलती हैं। एक कलश पर कांटे लगे हुए हैं, ऐबक के समय का एक कलश है, जिसके गले पर कांटे जैसी आकृतियां बनी हुई हैं, और एक और कलश है, जिसे अलमाश ने मस्जिद के विस्तार में शामिल किया था, जो शायद आम के पत्ते का प्रतीक है। कलश के ऊपरी आधे हिस्से पर खुदी हुई बड़ी पंखुड़ियां कमल की पंखुड़ियां हैं। मस्जिद के पश्चिमी भाग में बने तीन मेहराबों के आधार में इस्तेमाल किए गए प्रत्येक पत्थर पर एक कलश बना हुआ है और उसके ऊपर आम के पत्ते जैसी आकृतियां हैं। कलश के बगल में हमें अरबी में कुछ लिखा हुआ दिखाई देता है। पत्थर की शिलाओं पर क़ुरान की आयतें उकेरी गई थीं, ताकि पत्थर तराशने वाले उन्हें उभरी हुई नक्काशी में उकेर सकें। इस प्रकार, कलश और ‘बिस्मिल्लाह’ (अल्लाह के नाम से आरंभ करें) लिखा हुआ एक साथ दिखाई देता है, जो भारतीयों की श्रद्धा का प्रतीक है और साथ ही नए आए तुर्कों और मध्य एशियाई लोगों का पूजनीय ग्रंथ भी है।”

सोहेल हाशमी आगे लिखते हैं, “उन्नीसवीं सदी तक कलश वास्तुशिल्प में आम प्रचलन में रहा। अलाउद्दीन खिलजी ने 1311 में ऐबक की जामी मस्जिद के लिए एक बड़ा दरवाज़ा, ‘अलाई दरवाज़ा’ बनवाया था, जिसमें बहुत सारे कलश बने हैं। अकबर के जनरल आदम खान (मृत्यु 1562) के मक़बरे में भी कलश हैं; और शाहजहानाबाद (अब पुरानी दिल्ली) में उन्नीसवीं सदी में बनी ‘खज़ानची की हवेली’ के कलश भी कमल की पंखुड़ियों से ढंके हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे जामी मस्जिद के मेहराब वाले कलश थे।”
कमल धार्मिक अनुष्ठानों और पवित्रता का प्रतीक कब और कैसे बना? इसका कोई प्रामाणिक इतिहास नहीं है। सोहेल हाशमी के अनुसार, “कमल को पवित्रता के प्रतीक के रूप में पूजने की परंपरा शायद उस समय से चली आ रही है, जब हम जीववादी प्रथाओं का पालन करते थे। मेरा अनुमान है कि वह कोई महिला रही होगी, जो किसी खुले स्थान से गुजर रही होगी। उसे एक ठहरा हुआ पानी का तालाब दिखाई दिया होगा, जिसमें उसने सड़ती हुई वनस्पतियों, मेंढकों, घोंघों और कीचड़ के बीच एक कमल खिलता देखा होगा और शायद तब उसने मन ही मन कहा होगा, ‘तुम इस सारी गंदगी से ऊपर उठकर पवित्र हो जाओ।’ और मुझे लगता है कि यही वह दिन था, जब कमल पवित्रता का प्रतीक बन गया। लेकिन कमल अब सभी धार्मिक इमारतों में मौजूद है।” वह अलाई दरवाज़े के बारे में लिखते हैं कि “उसमें हर तरफ कमल के फूल नज़र आते हैं। इसकी बाहरी दीवारें चारों ओर अनगिनत कमल की कलियों से ढकी हुई हैं। संयोगवश, अलाई दरवाज़ा दिल्ली का सबसे पुराना बचा हुआ गुंबद है। इससे भी पुराने गुंबद थे, लेकिन वे ढह चुके हैं।” वह आगे बताते हैं, “गुंबद और मेहराब, यानी वास्तविक मेहराब, दोनों ही तुर्कों द्वारा भारत में लाए गए थे। तुर्कों ने ही भारत में बड़े, सटीक रूप से तराशे गए पत्थरों के बजाय मलबे की चिनाई से निर्माण करने की तकनीक शुरू की थी, जो आज भी एक प्रचलित निर्माण तकनीक है।”
भारतीय राजमिस्त्रियों को गुंबद का अर्धगोला एक ऐसी चीज़ के रूप में दिखाई दिया, जो इस तरह समाप्त होता था कि उसके ऊपर कुछ भी नहीं था। इसलिए वह उन्हें अधूरा लगता था। यहीं से एक ऐसा प्रयास शुरू हुआ, जो 300 वर्षों तक चला। राजमिस्त्री तरह-तरह के प्रयोग करके यह तय करने की कोशिश करते रहे कि गुंबद के ऊपर क्या रखा जाए, ताकि वह पूर्ण दिखाई दे। उन्होंने जो प्रयोग किए, उनमें से एक था गुंबद को कमल की पंखुड़ियों से ढंकना, जिसे आप मेहरौली के पुरातत्व पार्क में देख सकते हैं। राजों की बावली कॉम्प्लेक्स में दौलत खान लोदी का मक़बरा और उसके सामने बिना नाम वाले मक़बरे का गुंबद इसके दो अन्य उदाहरण भी हैं।”
सोहेल साहब लिखते हैं, “ऐसा शायद इसलिए किया गया होगा, क्योंकि मध्य-एशियाई सोच में गुंबद स्वर्ग का प्रतीक था और गुंबद का सबसे ऊपरी हिस्सा ईश्वर के सिंहासन का प्रतीक माना जाता था। भारतीय कल्पना में देवी-देवता कमल पर विराजमान होते हैं; इसी आधार पर, जब गुंबद को कमल से ढंका गया, तो वह एक ऐसा प्रतीक बन गया, जिसने दोनों ही तरह की भावनाओं को संतुष्ट कर दिया। एक और प्रयोग गुंबद के ऊपर मुकुट के रूप में कमल उल्टा करके लगाना था। उदाहरण के लिए, दक्षिणी दिल्ली में स्थित मस्जिद मोठ (1505) में बनावट की दो खास बातें हैं– एक, इसके गुंबद को ढकती हुई कमल की पंखुड़ियां और दो, उल्टे कमल के आकार का शिखर।”
इसके बाद सोहेल हाशमी तीन इमारतों की बात करते हैं, जिनमें दो दिल्ली के लाल किले की और तीसरी लाहौर की है। उनके अनुसार, “लाल किले में शीश महल की छत पर कमल के आकार में जड़े हुए कांच और रंग महल के अंदर कमल के आकार का फव्वारा शाहजहां के आदेश पर बनवाया गया था, जबकि लाहौर की मस्जिद औरंगजेब के शासनकाल में बनी थी। इनमें प्रत्येक छोटी मीनार के ऊपर एक गुंबद है, जो कमल से निकलता हुआ प्रतीत होता है। मंदिर के शिखर पर आमतौर पर अमलका (दांतेदार किनारे वाला एक चक्र) लगा हुआ है। कहा जाता है कि अमलका देवताओं के आसन, सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है; और, क्योंकि यह देवताओं का आसन है, इसलिए यह एक कमल भी है। अमलका की ये तस्वीरें मध्य प्रदेश में आशापुरी और बटेश्वर (मुरैना) के मंदिरों के साथ-साथ खजुराहो, कोणार्क और पुरी के पुराने मंदिरों में भी देखी जा सकती हैं।”

सोहेल हाशमी दिल्ली के एक और सबसे पुराने गुंबद, तुग़लकाबाद स्थित ज़फर खान के मक़बरे का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि “उसमें आप गुंबद के ऊपर अमलका देख सकते हैं। अमलका के ऊपर शायद एक कलश रखा गया था, जिसका ऊपरी भाग अब टूटा हुआ है, लेकिन कलश और अमलका दोनों को आप पिछले कुछ वर्षों के भीतर ज़फर खान के मक़बरे के ही पास बने ग़यासुद्दीन तुग़लक के मक़बरे के ऊपर देख सकते हैं।” उनके अनुसार, “दिल्ली में कमल और अमलका के कई उदाहरण मिलते हैं। नीला गुंबद (लगभग 1530, हुमायूं के मक़बरे के ठीक पीछे) के गुंबद पर लगे अमलका को देखने से पता चलता है कि कैसे राजमिस्त्रियों ने कमल के रूपांकन को रचनात्मक रूप देने का प्रयोग करना शुरू कर दिया था; उसमें कमल के आकार का मुकुट है, जिसके ऊपर एक सीधा कमल स्थापित है; उसके ऊपर एक उल्टा कमल है और अंत में एक और उल्टा कमल है। इन सबके बीच में चार कमल हैं और एक अमलका स्थापित है। यही चीज़ लगभग 1548 में बने ईसा खान नियाज़ी के मक़बरे में भी देखी जा सकती है।”
अकबर के दौर (1556-1605) में, हुमायूं के मक़बरे (1572) को छोड़कर – जिसे ईरानी आर्किटेक्ट मीरक मिर्ज़ा ग़यास और उनके बेटे सैयद मुहम्मद ने डिज़ाइन और निर्माण किया था – दिल्ली की बाकी सभी इमारतों में सल्तनत काल की प्रचलित शैली ही अपनाई गई। यह शैली अफ़ग़ान-निर्माण की तकनीकों और स्थानीय तत्वों का मिला-जुला रूप थी। इनमें न केवल इन ढांचों के खंभे बनाने वाले पत्थर के विशाल ब्लॉक शामिल हैं, बल्कि उन पर उकेरी गई सदियों पुरानी नक्काशी भी शामिल है। इनमें से पहली अकबर को पालने वाली माता महाम अंगा द्वारा निर्मित खैर-उल-मनाज़िल मस्जिद (1561) है, दूसरी उनके पुत्र आदम खान (मृत्यु 1562) का मक़बरा है। पहले में कमल को मुकुट के रूप में देखा जा सकता है और दोनों में अमलका दिखाई देता है। आदम खान के मक़बरे में अमलका के ऊपर, संभवतः दो कलश और एक शंकु का सबसे प्रारंभिक चित्रण देखा जा सकता है, जिसका उपयोग शिखर के रूप में किया गया है। 1569 में पूर्ण हुए हुमायूं के मक़बरे में शिखर के लिए इसी डिजाइन का उपयोग किया गया है, लेकिन यह बलुआ पत्थर का नहीं, बल्कि सोने की पन्नी से ढके तांबे का है। बाद में यह शैली न केवल सभी मक़बरों और मस्जिदों में, बल्कि मंदिरों और गुरुद्वारों में भी मानक बन गई। हम इसे अकबर के शासनकाल में निज़ामुद्दीन औलिया (मृत्यु 1325) के मक़बरे में किए गए विस्तार में भी देख सकते हैं।”
कुछ मंदिरों में कलश के साथ शंकु भी दिखाई देता है। सोहेल हाशमी शंकु को नारियल का प्रतीक मानते हैं। हिंदुओं में लड़की की गोद भराई में नारियल अनिवार्य रूप से होता है। सोहेल साहब के अनुसार, “नारियल में जीवन होता है, इसलिए यह प्रजनन का भी प्रतीक है।” वह कहते हैं कि “सबसे शुरुआती मंदिरों में से कुछ प्रजनन वाले देवताओं के मंदिर रहे होंगे। जीवन एक ऐसी चीज थी, जिसे हम नहीं समझते थे, ठीक वैसे ही, जैसे हम मृत्यु को नहीं समझते। इसलिए सभी प्राचीन पौराणिक कथाओं ने जन्म और मृत्यु के देवताओं की रचना की है। इस प्रकार हमारे कुछ शुरुआती मंदिर मातृ देवियों, प्रजनन देवियों को समर्पित रहे होंगे और कलश, जिसे गर्भ का प्रतीक माना जाता था, धीरे-धीरे इन मंदिरों का एक स्थायी हिस्सा बन गया और अंततः एक ऐसा प्रतीक बन गया, जो सभी मंदिरों में आम हो गया।”
सोहेल हाशमी की दृष्टि में, “गुंबद पर कलश और शंकु का सबसे प्रारंभिक उपयोग हुमायूं के मकबरे में मिलता है। बाद में यह व्यवस्था एक स्थायी विचार बन गई, जिसे आप हर जगह देख सकते हैं, शाहजहां द्वारा निर्मित जामा मस्जिद में, लाल किले के अंदर औरंगजेब द्वारा निर्मित मोती मस्जिद में, औरंगजेब की बेटी ज़ीनत-उन-निसा बेगम द्वारा निर्मित ज़ीनत-उल-मस्जिद में, औरंगजेब के एक सेनापति की विधवा फखर-उन-निसा बेगम द्वारा कश्मीरी गेट पर निर्मित फखर-उल-मस्जिद में, और सैकड़ों अन्य मस्जिदों में भी।”
कलश, शंकु के बाद तीसरा ध्यान सोहेल साहब ने ‘स्वस्तिक’ के बारे में आकर्षित किया है। वह लिखते हैं कि “अक्सर यह माना जाता है कि स्वस्तिक का मूल उद्गम भारत में हुआ, किंतु सच यह है कि यह सभी प्राचीन सभ्यताओं – बाली, मिस्र, ग्रीस, माल्टा, तिब्बत, जापान, उज्बेकिस्तान, ताजीकिस्तान, किर्गिज़स्तान, ईरान और लैपलैंड – में मिलता है। यहां तक कि ‘नई दुनिया’ के समुदाय, जैसे एज़्टेक और होपी भी, जिनका ब्राह्मणवादी या सेमिटिक परंपराओं से कोई संपर्क नहीं था, इससे परिचित थे। वह आगे कहते हैं, “मुगल वास्तुकला में भी स्वस्तिक का चिह्न दिखाई देता है। इसे महरौली के पुरातत्व पार्क में आदम खान के भाई कुली खान के मकबरे में देखा जा सकता है। इसमें चार मेहराबदार द्वार हैं, जिनके अंदरूनी भाग में सुंदर प्लास्टर का काम किया गया है, और प्रत्येक मेहराब स्वस्तिकों से घिरी हुई है। यही स्वस्तिक शम्स उद-दीन अतागा खान (मृत्यु 1562) के मकबरे में मिलता है। यही स्वस्तिक फतेहपुर सीकरी में अकबर की रानियों – रुकैया सुल्तान और सलीमा सुल्तान के दो मंजिला महलों में मिलता है। यही स्वस्तिक सिकंदरा स्थित अकबर के मकबरे (1613) की शोभा बढ़ाता है। भव्य द्वार पर, मेहराब के बीचोंबीच और द्वार के दोनों सिरों पर स्वस्तिक को प्रमुखता से अंकित किया गया है – चार स्वस्तिक द्वार के बाहरी हिस्से पर और चार ही भीतरी हिस्से पर अंकित हैं। स्वस्तिक की यह पड़ताल लाहौर किले के एक द्वार पर बने स्वस्तिक पर समाप्त होती है। 1,500 फीट लंबी और लगभग 55 फीट ऊंची एक मोज़ेक भित्ति चित्र शाहजहां द्वारा हाथी द्वार के लिए बनवाया गया था, जिसका निर्माण शाही परिवार के विशेष उपयोग के लिए किया गया था। भित्ति चित्र के चारों ओर चमकदार टाइलों से बने स्वस्तिकों की एक पट्टी है, जिन्हें विशेष रूप से देवदूतों, मनुष्यों, जानवरों, पक्षियों और फूलों के रंगीन टाइल मोज़ेक भित्ति चित्रों के साथ लगाने के लिए डिज़ाइन किया गया था।”
इन कलश, कमल, नारियल, शंकु और ख़ास तौर से स्वस्तिक के चित्रों के संबंध में सोहेल हाशमी लिखते हैं कि “इन्हें हिंदू प्रतीकों के रूप में देखने का नज़रिया अभी हाल की घटना है। मानव नौकायन के इतिहास पर शोध कर रहे लोगों का स्वस्तिक चिह्न की उत्पत्ति के बारे में एक सिद्धांत है। उनका मानना है कि यह ध्रुव तारे और ध्रुव तारे के चारों ओर वृत्ताकार तारामंडल की चार दिशाओं से जुड़ा है। जब मनुष्यों ने समुद्रों में यात्रा करना या रेगिस्तान पार करना शुरू किया, तो उन्होंने देखा कि वृत्ताकार तारामंडल ध्रुव तारे के चारों ओर घूमता हुआ प्रतीत होता है। और हम जानते हैं कि नौकायन की शुरुआत बहुत पहले हुई थी। इसी तरह मूल अफ़्रीकी लोगों ने यात्रा की और 50,000 वर्ष पूर्व ऑस्ट्रेलिया पहुंचे। रास्ते में, उन्होंने 60,000 वर्ष पूर्व भारत के कुछ हिस्सों में भी बस्तियां बसाईं और एक अन्य शाखा लगभग 30,000 वर्ष पूर्व यूरोप और एक भूमि पुल के पार अमेरिका पहुंची। अमेरिका की खोज इन्हीं लोगों ने की थी, न कि स्पेन के इसाबेला और फर्डिनेंड द्वारा वित्त पोषित किसी नाविक ने। संभवत: इन्हीं अग्रदूतों की यात्राओं के माध्यम से स्वस्तिक चिह्न का विश्वव्यापी प्रसार हुआ होगा।”
सोहेल हाशमी आगे उस छह कोनों वाले तारे पर विचार करते हैं, जो आज इज़राइल के प्रतीक ‘स्टार ऑफ़ डेविड’ के रूप में जाना जाता है। वह कहते हैं, “हालांकि, प्राचीन यहूदी कथाओं में डेविड कोई बहुत प्रमुख व्यक्ति नहीं थे। हिब्रू बाइबिल में उनका ज़िक्र मिलता है और ईसा मसीह ने उन्हें अपने पूर्वज और एक न्यायप्रिय राजा बताया है – पैगंबर नहीं। बाद में इस्लाम ने ही डेविड को हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) का दर्जा दिया और उन्हें इब्राहिम व याकूब के साथ अपने सबसे सम्मानित पैगंबरों में से एक माना। वैसे, उन्नीसवीं सदी में ही यहूदी समुदायों ने छह कोनों वाले तारे को बड़े पैमाने पर अपनाना शुरू कर दिया था। लेकिन यह केवल यहूदियों का प्रतीक नहीं था; ईसाई और मुसलमान भी पंचकोण और षट्कोण दोनों तारे का स्वतंत्र रूप से उपयोग करते थे, इससे पहले इसे ज़ायोनी आंदोलन से भी जोड़ा जाने लगा था। अरबों और ईसाइयों के अलावा, मेसोपोटामिया, जापान और भारत की प्राचीन सभ्यताओं में भी छह कोनों वाले तारे का उपयोग किया गया था। यहां तक कि काला जादू करने वाले और शैतान के उपासक भी छह कोनों वाले तारे का उपयोग करते हैं; और अक्सर इसके अंदर बने षट्कोणीय स्थान में 666 लिखते हैं।”
इसका विश्लेषण करते हुए सोहेल लिखते हैं, “अब हम सबसे पुराने बचे हुए गुंबद – अलाई दरवाज़ा – पर वापस आते हैं, जिसमें छह कोनों वाला तारा बना हुआ है। दाऊद के तारे को आमतौर पर जिस तरह दर्शाया जाता है और यहां जिस तरह दिखाया गया है, उसमें अंतर है। यहां यह एक वृत्त के अंदर बना हुआ छह कोनों वाला तारा है। भारतीय परंपरा में, दो त्रिभुज दो अलग-अलग शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं – दक्षिण की ओर आधार वाला त्रिभुज पौरुष या पुरुष ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है और उत्तर की ओर आधार वाला त्रिभुज शक्ति या स्त्री ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है; दोनों को एक वृत्त के अंदर रखने से ब्रह्मांड में सामंजस्य का प्रतीक बनता है, यानी पुरुष ऊर्जा और स्त्री ऊर्जा का संतुलन। यही भारतीय यिन और यांग है।”

यहां वह प्रश्न उठाते हैं कि “क्या यह दाऊद का तारा है, जापानियों का कागोमे है या भारतीयों का आदि यंत्र या शक्ति चक्र है?” वह इसे स्पष्ट करते हुए आगे कहते हैं, “आदम खान के मक़बरे पर, एक षट्भुज या दाऊद के छह कोनों वाले तारे के भीतर एक कमल दिखाई देता है। यदि यह वास्तव में दाऊद का तारा है, आदि यंत्र, तो ये दोनों हुमायूं के मक़बरे पर भी दिखाई देते हैं। इसमें रोचक बात यह है कि छह कोनों वाला तारा सबसे पहले अलाई दरवाज़े के पूर्व, दक्षिण और पश्चिम की ओर मुख वाले मेहराबों में दिखाई देता है, फिर कुछ समय तक दिखाई नहीं देता। यह लोदी गार्डन में बड़ा गुंबद के पास एक मस्जिद में, केंद्रीय मेहराब के ऊपर फिर से दिखाई देता है, लेकिन यह फूलों से ढका हुआ है और अपनी धुरी पर 45 डिग्री स्थानांतरित है। इसकी अगली उपस्थिति हुमायूं और अकबर के समय में निर्मित इमारतों पर दिखाई देती है। यह पुराना किला, हुमायूं के मक़बरे और जमाली कमाली की मस्जिद में भी दिखाई देता है। लेकिन बाद की इमारतों में षट्भुज शायद ही कहीं दिखाई देता है।”
वह आगे मेहराब के बारे में कहते हैं कि “वह पुराने मेहराबों में से एक (एफ़िसस के मेहराबों को छोड़कर), इस्तांबुल के हिप्पोड्रोम की नींव में देखा है। कॉन्स्टेंटाइन ने इस हिप्पोड्रोम का निर्माण तब करवाया था, जब उन्होंने रोमन राजधानी को यहां स्थानांतरित किया था और शहर का नाम कॉन्स्टेंटिनोपल रखा था। ईंटों से बने इस मेहराब में आप कीस्टोन को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। इसके निर्माण के समय को लेकर कुछ विवाद हैं – यह तीसरी शताब्दी के आरंभ में या चौथी शताब्दी के पहले तिमाही में बना हो सकता है।” उनके अनुसार, “वास्तविक मेहराब का पहला प्रयोग मध्यकाल में दिल्ली में 1287 में हुआ था। तुर्क ही मध्यकाल में वास्तविक मेहराब को भारत लाए थे। यह स्पष्ट है कि दास वंश के बाद के काल में मेहराब का प्रयोग शुरू हुआ, क्योंकि वास्तविक मेहराब का सर्वप्रथम प्रयोग 1287 में दिवंगत ग्यासुद्दीन बलबन के मकबरे पर किया गया था। इस प्रकार, वास्तविक मेहराब, जिसका ज्ञान तुर्कों को कम-से-कम चौथी शताब्दी से था, भारत पहुंचने में लगभग नौ सौ वर्ष लगे।”
सोहेल हाशमी लिखते हैं, “अजंता में मेहराब का आकार मिलता है, लेकिन वह मेहराब नहीं है। सभी चैत्य गृहों की छतें भी गुंबद जैसी हैं। लेकिन ये सब मेहराब की संरचनाएं नहीं हैं, क्योंकि इनमें आधारशिला का अभाव है।” वह मानते हैं कि “चैत्य गृह बनाने की प्रेरणा संभवत: उलटी नाव से मिली होगी। शायद किसी मिस्त्री ने तूफान में फंसने पर एक रात उल्टी नाव के नीचे बिताई होगी और उसे तभी यह विचार आया होगा कि इस तरह की छत बनाई जा सकती है।” उनके अनुसार, “मेहराब के अस्तित्व में आने से पहले, स्थान को पाटने के अन्य तरीके प्रचलित थे। इनमें से एक सबसे पहला तरीका था, तिरछी मेहराबदार द्वार। पांच मंजिला गंधक की बावली में हर स्तर पर कुएं की ओर तिरछी मेहराबदार द्वार बने हुए थे। गंधक की बावली का निर्माण शम्सुद्दीन अल्तमश ने दिल्ली के पहले चिश्ती सूफी संत, कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के आश्रम में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए करवाया था।”
वह आगे कहते हैं, “जब तक वास्तविक मेहराब का आगमन हुआ, तब तक भारत में हम कई शताब्दियों से कोरबेल बना रहे थे। वास्तविक मेहराब के आगमन के साथ ही एक अत्यंत रोचक परिवर्तन शुरू हुआ। भारतीय राजमिस्त्री, जो विशाल पत्थरों से और कम से कम जोड़ने वाली सामग्री का उपयोग करके निर्माण करने के आदी थे, तुर्कों और मध्य एशियाई लोगों द्वारा शुरू की गई मलबे और गारे पर आधारित निर्माण तकनीकों से परिचित नहीं थे, और कील के आकार के पत्थर के टुकड़ों से बना वास्तविक मेहराब उन्हें समझ में नहीं आया।”

उनके अनुसार, “ईसा के जन्म से भी पूर्व के समय में, पहला गुंबद बनाया गया था। इस्लाम ईसा के भी कई सदियों बाद आया। पूजा के लिए गुंबद का पहला उपयोग यहूदियों ने अपने आराधना स्थलों में किया, क्योंकि वे सामूहिक प्रार्थना करने वाले धर्म हैं। इसका आकार ऐसा है कि उन्होंने इसे इसी उद्देश्य से इस्तेमाल किया। फिर ईसाइयों ने इसका उपयोग शुरू किया और अंत में मुसलमानों ने इसे अपनी सामूहिक प्रार्थनाओं के लिए उपयोग करना शुरू किया। मुसलमान इसका उपयोग करने वाले अंतिम लोग हैं, लेकिन गुंबद को इस्लामी माना जाता है, जो गलत मान्यता है।”
इस संबंध में सोहेल हाशमी एक महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं कि “क्या कोई इस्लामिक नाम की वास्तुकला है?” वह कहते हैं, “हममें से अधिकांश ने कभी यह सवाल नहीं पूछा कि अगर इस्लामी वास्तुकला है, तो ईसाई वास्तुकला भी होनी चाहिए। लेकिन नहीं, जहां से हमारे उपनिवेशवादी आए थे, वहां पुनर्जागरण, बारोक, शास्त्रीय, नवशास्त्रीय, गोथिक, प्रशियाई, स्लाविक, इतालवी, स्पेनिश और पुर्तगाली वास्तुकलाएं हैं; यहां तक कि वेल्श, स्कॉटिश, आयरिश और अंग्रेजी वास्तुकला भी है। लेकिन क्या कोई ईसाई वास्तुकला है? यह शब्द ही मौजूद नहीं है, तो इस्लामी वास्तुकला कैसे हो सकती है? ‘हिंदू वास्तुकला’ शब्द का प्रयोग बहुत कम होता है। हम परिहार, होयसला, बंगाल, गुजरात और राजस्थान की वास्तुकलाओं की बात करते हैं। लेकिन इस बात पर अड़े रहते हैं कि इस्लामी वास्तुकला नाम की एक चिड़िया भी है।”
वह कहते हैं, “मीनार को इस्लामी वास्तुकला का एक हिस्सा मानना औपनिवेशिक सोच का नतीजा है, जिसे ज़बरदस्त ‘शैक्षणिक’ (अकादमिक) कोशिशों का समर्थन हासिल था। इसकी शुरुआत इस्लामी वास्तुकला के विचार से होती है, फिर यह इस्लामी पोशाक, इस्लामी खाना और इस्लामी संगीत तक फैल जाती है –और देखते-ही-देखते, मुसलमानों को ‘दूसरों से अलग’ समझने या ‘अलग-थलग’ करने की प्रक्रिया ज़ोर पकड़ लेती है। उदाहरण के लिए, आम तौर पर यह माना जाता है कि मुअज़्ज़िन मीनार पर चढ़कर दिन में पांच बार लोगों को नमाज़ के लिए बुलाता है। लेकिन सच यह है कि दिल्ली में शाहजहां की मस्जिद (1656) से पहले बनी किसी भी मस्जिद में मीनारें नहीं थीं। एक में भी नहीं।”
सोहेल साहब पूछते हैं, “तो फिर, असल में मीनारें किसलिए होती हैं? हो सकता है कि इसका संबंध इस पुरानी मान्यता से हो कि देवता बहुत ऊंचाई पर रहते हैं। शायद इसीलिए पूजा-स्थल पहाड़ियों पर बनाए जाते थे। लेकिन जब हम पहाड़ियों पर चढ़े, तो स्वर्ग और दूर होता हुआ लगा, इसलिए हमने अपनी उपासना की इमारतें और भी ऊंची बनाईं। चूंकि पूरी इमारत को इतना ऊंचा नहीं बनाया जा सकता था, इसलिए उसका सिर्फ़ एक हिस्सा ऊंचा उठाया गया; जैसे चर्च में बुर्ज, मंदिर में शिखर, और मस्जिद में मीनार।” वह कहते हैं, “मेरी दृष्टि में मीनार मुअज़्ज़िन की आवाज़ लोगों तक पहुंचाने के लिए नहीं बनाई गई थी, बल्कि इसे लोगों को ईश्वर के क़रीब लाने के लिए बनाया गया था।”
सोहेल हाशमी अंत में लिखते हैं, “कलश से शुरू होकर गुंबद पर खत्म होने वाली यह छोटी-सी यात्रा कई चीज़ों को समेटे हुए है – जैसे मिट्टी के बर्तन जैसी कलाकृतियां, कमल जैसी प्राकृतिक चीज़ें, और ब्रह्मांड को समझने की हमारी कोशिशों को दिखाने वाले प्रतीक, जैसे कुछ संस्कृतियों में ‘स्टार ऑफ़ डेविड’ और दूसरी संस्कृतियों में स्त्री और पुरुष के बीच का तालमेल। इंसानियत की विशाल दुनिया की यह छोटी-सी झलक बस इस बात को सामने लाने की कोशिश है कि हमें जोड़ने वाली चीज़ें, हमें विभाजित करने वाली कुछ छोटी-मोटी चीज़ों से कहीं ज़्यादा हैं, जो उन सभी चीज़ों को कमज़ोर करने की कोशिश करती हैं, जिनकी असल में अहमियत है।”
(संपादन : नवल/अनिल)
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