1980 के दशक के आख़िरी सालों में मुसलमानों में निगेटिव वोटर बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके तहत पूरा राजनीतिक विमर्श भाजपा को हराने पर केंद्रित होता गया। यह वही दौर था जब हिंदू बहुजनों में अपनी पहचान आधारित राजनीतिक दावेदारी भी मजबूत हो रही थी जिसका मुख्य स्वर ‘हिस्सेदारी’ था। इसका रास्ता संविधान में संशोधनों और नए क़ानूनों के निर्माण से ही खुल सकता था। इसलिए वे संविधान संशोधनों और क़ानूनी उपचारों की मांग को लेकर मुखर होते गए। वहीं मुसलमानों की बेचैनी डर और अनिश्चितता के इर्दगिर्द रही जिसकी अभिव्यक्ति का स्वर भावनात्मक रहा, जिसके कारण उनमें संवैधानिक उपचारों की मांग कभी मुख्य मांग नहीं बन पाई। इसका नतीजा यह हुआ कि जहां हिंदू बहुजन संविधान की ताक़त का इस्तेमाल करने की सलाहियत सीखते गए वहीं मुसलमानों के लिए संविधान सिर्फ़ मौलिक अधिकार बचाने का अंतिम ढाल बनता गया और उसमें भी कामयाबी नहीं मिल पाई।
इसका परिणाम यह हुआ कि मुसलमानों की राजनीतिक मांगों का मुख्य स्वर ‘बचाना’ होता गया, दावा करना नहीं हो पाया। मसलन, 1980 के अंत के समय से ही मुसलमानों की राजनीतिक मांगों में सेक्युलरिज्म बचाना, एएमयू बचाना, उर्दू बचाना, मस्जिद और मदरसे बचाना, कब्रिस्तान बचाना और यहां तक कि जान बचाना तक होता गया, दावेदारी और अधिकार का स्वर पीछे छूटता गया। इसलिए अब मुस्लिम समुदाय को अन्य बहुजनों के राजनीतिक अनुभवों से सीखते हुए संवैधानिक उपचारों की मांगों की तरफ बढ़ना होगा, जिसे निम्न बिंदुओं के इर्द-गिर्द विकसित किया जा सकता है।
(1) प्रतिनिधि सरकार का मतलब है वह सरकार जो जनता का प्रतिनिधित्व करे। इस लिहाज से हम कह सकते हैं कि मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। उल्टे मुस्लिम-विरोधी जनमत की नुमाइंदगी करती है। इसको इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि मोदी मंत्रिमंडल में देश की दूसरी सबसे बड़ी धार्मिक आबादी का कोई सदस्य नहीं है।
संविधान निर्माण के दौरान ऐसी संभावित स्थिति पर चिंता जताई गई थी। अल्पसंख्यकों के अधिकारों से संबंधित उपसमिति को डॉ. आंबेडकर ने सौंपे अपने ज्ञापन में कहा था कि “भारत में अल्पसंख्यकों के लिए दुर्भाग्य की बात यह है कि भारतीय राष्ट्रवाद ने एक नई विचारधारा विकसित कर ली है जिसे ‘बहुसंख्यकों का दैवीय अधिकार’ कहा जा सकता है। इसके अनुसार बहुसंख्यकों की इच्छा के अनुसार ही अल्पसंख्यकों पर शासन किया जाएगा। अल्पसंख्यकों द्वारा सत्ता में भागीदारी की किसी भी मांग को ‘सांप्रदायिकता’ कह दिया जाता है, जबकि बहुसंख्यकों द्वारा सत्ता पर एकाधिकार को ‘राष्ट्रवाद’ कहा जाता है। इस प्रकार की राजनीतिक सोच से प्रेरित होकर बहुसंख्यक अल्पसंख्यकों को राजनीतिक सत्ता में साझेदारी देने के लिए तैयार नहीं हैं।” (डॉ. आंबेडकर, स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज़, पृष्ठ 77)
डॉ. आंबेडकर बार-बार यह भी कह रहे थे कि भारत में बहुमत राजनीतिक नहीं, बल्कि सांप्रदायिक होगा और एक स्थायी सांप्रदायिक बहुमत हमेशा अल्पसंख्यकों के अधिकारों को दबा सकता है। इसे वे ‘बहुमत का अत्याचार’ कहते थे। उनकी इस चिंता के कारण ही संविधान सभा में यह प्रस्ताव लाया गया था कि मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यक वर्ग [धार्मिक अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति] की भागीदारी को संवैधानिक तौर पर सुनिश्चित कर दी जाए। लेकिन हिंदुत्ववादी नेता कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के कारण यह प्रस्ताव 8-7 से गिर गया था। (राजा शेखर वुंडरू, आंबेडकर, गांधी एंड पटेल: द मेकिंग ऑफ़ इंडियाज़ इलेक्टोरल सिस्टम, पृष्ठ 125)
अगर यह प्रस्ताव पास हो गया होता तो मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यक वर्गों की नुमाइंदगी अनिवार्य हो जाती। इसलिए समय की ज़रूरत है कि संविधान संशोधन कर मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यकों का कोटा सुनिश्चित करने की मांग को फिर से उठाया जाए।

(2) 2026 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को आए 20 साल हो रहे हैं। रिपोर्ट के कई अहम सुझावों में एक यह भी था कि जिन सीटों पर मुसलमानों की आबादी ज़्यादा हो, उन्हें परिसीमन में एससी या एसटी के लिए सुरक्षित न किया जाए। मसलन, नगीना लोकसभा सीट पर मुसलमानों की आबादी 52 प्रतिशत है और दलितों की 22 प्रतिशत है। लेकिन बावजूद इसके यह सीट सुरक्षित है। यानी मुसलमान अपने नेता तो नहीं बना सकते, उल्टे दलित नेता ज़रूर बना सकते हैं। पूरे देश में ऐसे कई उदाहरण हैं। यह कुछ ऐसा ही है, जैसे आपको अपनी पूरी पूंजी अपना घर बनाने पर खर्च करने से रोका जाए और उसे दूसरों का घर बनाने पर खर्च करवाया जाए। इसलिए सच्चर कमेटी रिपोर्ट की समर्थक पार्टियां परिसीमन में मुस्लिम बहुल सीटों के सुरक्षित किए जाने का विरोध करें, ताकि मुसलमान अपनी आबादी के अनुपात में जनप्रतिनिधि बना सकें।
(3) 1989 में राजीव गांधी सरकार ने दलित समाज के ख़िलाफ़ सामंती और जातिगत हिंसा रोकने के लिए दलित हिंसा निवारण क़ानून बनाया था, जिससे दलित विरोधी हिंसा में काफ़ी कमी आई। इसी तर्ज पर अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ होने वाली सांप्रदायिक हिंसा जिसमें भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा भी शामिल है, की रोकथाम के लिए एक कठोर ‘अल्पसंख्यक हिंसा निवारण क़ानून’ बनाए जाने की मांग की जानी चाहिए।
(4) राज्य सांप्रदायिक हिंसा रोक पाने में असफल साबित हुआ है इसलिए सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों और सांप्रदायिक हिंसा के कारण पलायन करने को मजबूर हुए लोगों के बच्चों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में समायोजित करने का क़ानून भी बनाया जाना चाहिए, जैसा कि कश्मीर में आतंकवाद से पीड़ित लोगों के लिए है।
ग़ौरतलब है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में कश्मीर के आतंकवाद से पीड़ित परिवारों के बच्चों के लिए विशेष रियायतें और आरक्षण का प्रावधान है। इसमें प्रत्येक पाठ्यक्रम में 5 प्रतिशत तक की अतिसंख्येय सीटें, कट-ऑफ मार्क्स में 10 प्रतिशत तक की छूट और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्राथमिकता शामिल है। सैद्धांतिक तौर पर राज्य की विफलता का ख़ामियाज़ा नागरिक नहीं भुगत सकते।
(5) अपनी पसंद का भोजन और व्यवसाय करना मौलिक अधिकार है। देश का कोई भी भूभाग इस मौलिक अधिकार से रहित नहीं हो सकता। हमारा संविधान किसी भी भूभाग का वर्गीकरण धार्मिक क्षेत्र के बतौर नहीं करता। इसलिए बहुसंख्यक धार्मिक मान्यताओं के आधार पर मांस के सेवन और विक्रय पर प्रशासन द्वारा रोक लगाना असंवैधानिक है। यह न्यायालयों की ज़िम्मेदारी है कि मौलिक अधिकारों के हनन के मामलों में स्वतः संज्ञान लें और उसकी रक्षा करें। संविधान सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को क्रमशः अनुच्छेद 32 और 226 के तहत यह करने का अधिकार देता है। लेकिन हम देखते हैं कि जिस अनुच्छेद 32 को डॉ. आंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा था, उसे सुप्रीम कोर्ट लगातार सरकार के दबाव में नज़रअंदाज़ कर रहा है। इस विषय पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज़ करने की ज़रूरत है।
(6) मुसलमानों के ख़िलाफ़ भेदभाव और हिंसा की एक बढ़ती वजह कथित हिंदू बहुल मुहल्लों और कॉलोनियों में मुसलमानों द्वारा ज़मीन और घर ख़रीदना और किराए पर लेना होता जा रहा है। जबकि संविधान का अनुच्छेद 19(1) हर व्यक्ति को किसी भी जगह रहने और बसने का अधिकार देता है। ऐसे में ज़रूरी है कि इस अनुच्छेद को कड़ाई से लागू करने के लिए अमरीका और अन्य विकसित देशों में लागू ‘फेयर हाउसिंग एक्ट’ की तर्ज पर क़ानून बनाने की मांग की जाए, जिसमें धर्म, जाति, नस्ल के आधार पर रिहाइश का विरोध करने पर कठोर सज़ा का प्रावधान हो।
(7) सेक्युलर राजनीतिक दल अपने पार्टी संविधानों में इस बात की गारंटी करें कि मुसलमानों को चुनावों में उनकी आबादी के अनुपात में टिकट वितरित करेंगे। भागीदारी और सामाजिक न्याय के सिद्धांत बाहरी तौर पर तभी सकारात्मक परिणाम दे सकते हैं जब वह आंतरिक तौर पर लागू हों।
(8) रोज़गार और शिक्षा के क्षेत्र में धर्म-जाति के आधार पर भेदभाव रोकने के लिए भारत में भी पश्चिमी विकसित देशों जैसे इंग्लैंड और नॉर्वे की तर्ज पर विशेष इक्वेलिटी एंड एंटी डिस्क्रिमेटरी एक्ट (समानता और भेदभाव विरोधी क़ानून) बनाने की मांग की जाए।
इस क़ानून की ज़रूरत को अब और इस आधार पर नहीं टाला जा सकता कि इन्हें मौलिक अधिकारों में पहले ही शामिल किया जा चुका है।
(9) पुलिस का रवैया लगातार सांप्रदायिक और मुस्लिम-विरोधी होता जा रहा है। अक्सर मुस्लिम-विरोधी पुलिसकर्मियों को प्रमोशन भी दिया जाता है, जिससे पुलिस सरकार की मुस्लिम-विरोधी निजी सेना में तब्दील होती जा रही है। यह पुलिस आचार संहिता में उल्लिखित बुनियादी कर्तव्यों, संविधान के प्रति निष्ठा और निष्पक्ष कानून प्रवर्तन के विरुद्ध है। इसलिए पुलिस आचार संहिता के विरुद्ध आचरण करने वाले पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ नागरिकों की तरफ से क़ानूनी कार्यवाही हेतु प्रावधान बनाते हुए विशेष क़ानून बनाया जाए जिसकी जांच केवल विभागीय दायरे तक सीमित न रहे और उसमें अनिवार्यतः न्यायिक अधिकारी भी शामिल किए जाएं।
(10) अप्रैल, 2023 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के.एम. जोसेफ और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि नफरत फैलाने वाले भाषणों पर बिना किसी शिकायत के स्वतः संज्ञान लेते हुए प्राथमिकी दर्ज की जाए। शीर्ष अदालत ने चेतावनी दी थी कि मामला दर्ज करने में देरी को अदालत की अवमानना माना जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि सरकारें इस आदेश की लगातार अवमानना कर रही हैं और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी अपनी अवमानना पर संज्ञान नहीं लेतीं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को अपने इक़बाल को बनाए रखने के लिए हेट स्पीच के ख़िलाफ़ सख़्ती दिखानी चाहिए, जिसके लिए मुसलमानों को जनता के अन्य प्रगतिशील हिस्सों के साथ न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाना चाहिए।
संविधान को केंद्र में रखकर ही मुस्लिम समुदाय मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बन सकता है। यही नज़रिया उसे सामूहिक निराशा से बाहर निकाल सकता है। जैसा कि दलितों और हिंदू पिछड़ों के उदाहरणों से रेखांकित होता है। मसलन, दलित हिंसा विरोधी क़ानून बनने से पहले और बाद के दलित समाज के आत्मविश्वास में आपको अंतर दिखेगा। ऐसे ही मंडल सिफारिशों के लागू होने से पहले और बाद के पिछड़े वर्गों के आत्मविश्वास में आपको अंतर दिखेगा। लेकिन आज़ादी के बाद से हर दशक में क्रमशः मुसलमानों का आत्मविश्वास पहले से गिरता ही गया है, जो मौजूदा वक़्त में एक सामूहिक निराशा में तब्दील हो गया है।
ज़ाहिर है हिंदू बहुजनों में उत्तरोत्तर आत्मविश्वास का विकास संवैधानिक उपचारों के कारण ही संभव हुआ है, यही रास्ता मुसलमानों को भी अख़्तियार करना होगा।
(संपादन : नवल/अनिल)
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