प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड ने भारतीय इतिहास और समाज की वैचारिक नींव को जिस निरंतरता और निर्ममता से चुनौती दी है, वैसा भारत में सार्वजनिक जीवन में सक्रिय बहुत कम बुद्धिजीवियों ने किया है। वे करीब तीन दशकों से इसी दिशा में काम करते आ रहे हैं। इसकी शुरुआत उनकी युगांतकारी पुस्तक ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिंदू’ से हुई थी। इसके बाद उन्होंने ‘बफेलो नेशनलिज्म’ व ‘पोस्ट-हिंदू इंडिया’ जैसी पुस्तकें लिखीं, जो प्रभावी साबित हुई हैं। प्रो. शेपर्ड शुरू से ही यह कहते आ रहे हैं कि देश के बौद्धिक और सभ्यतागत विकास की कहानी से देश के उत्पादक वर्गों – शूद्रों, दलितों एवं आदिवासियों – को बाहर धकेल कर दिया गया है।
हाल ही में प्रकाशित उनकी कृति ‘हड़प्पाः गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाईजेशन’ उनकी बौद्धिक प्रयास की अगली कड़ी है। मगर उन्होंने इस बार अपनी बात कहने के लिए एक अनपेक्षित विधा को चुना है। यह पुस्तक सभ्यता की विकास यात्रा को चित्रों के साथ कहानी के रूप में सुनाती है।

प्रो. शेपर्ड का लेखन वर्चस्ववादी नजरिए को चुनौती देने तक सीमित नहीं रहा है। उन्होंने इन नजरियों को सिर के बल खड़ा कर दिया है। ‘हड़प्पाः गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाईजेशन’ एक साहसपूर्ण साहित्यिक और बौद्धिक पहल है, जो वैदिक पुराकथाशास्त्र के बरक्स सिंधु घाटी सभ्यता को खड़ा करती है। प्रो. शेपर्ड कहते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता का निर्माण बलि और अनुष्ठानों से खुश होने वाले देवों, जो अपने भक्तों को दिव्य पुरस्कारों से नवाजते हैं, ने नहीं, बल्कि साधारण मनुष्यों ने किया था, जिनकी महानता यह थी कि उन्होंने जानवरों को पालतू बनाया, फसलें उगाईं, नई तकनीकों का आविष्कार किया, नगर बसाए और मनुष्य की प्रगति की भौतिक नींव तैयार की।
एकबारगी ऐसा लगता है कि यह किताब बच्चों के लिए लिखी गई है। इसकी शुरुआत में हमारा परिचय कथम्मा नामक एक पात्र से करवाया जाता है जो गांव का किस्सागो और वैद्य है। वह सिंधु घाटी की प्राचीन सभ्यता के अवशेषों के नज़दीक रहने वाले बच्चों के एक जिज्ञासु समूह को हड़प्पा के भुला दिए गए अतीत से परिचित करवाता है। इस आसान से तरीके से प्रो. शेपर्ड एक कठिन लक्ष्य हासिल कर लेते हैं। मिथकों, समाज की सामूहिक स्मृति और किस्सागोई के ज़रिए वे सभ्यता के विकास का एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करते हैं, जिसमें किसान, चरवाहे, शिकारी, महिलाएं, शिल्पकार और पशुपालक इतिहास के असली निर्माता हैं।
उनकी कृति का नायक न तो कई पराक्रमी राजा है और न ही कोई दिव्य साधु। वह हड़प्पा नाम का एक युवा पशुपालक है। दूसरे राज्यों पर सैन्य विजय या आध्यात्मिक रहस्योद्घाटन उसकी उपलब्धियां नहीं हैं। वह तो पशुओं के व्यवहार पर ध्यान देता है, वह प्रकृति से सीखता है, बिना हिचकिचाए प्रयोग करता है और भेड़ों, बकरियों, भैंसों और मुर्गियों को पालतू बनाकार अपने समुदाय की अर्थ-व्यवस्था को बदल कर रख देता है।
जंगल में अपनी भेड़ें चराने के दौरान उसे भैंस की एक पाड़ी नज़र आती है। वह उसे घर ले आता है और उसकी मदद से अपने गांव की अर्थ-व्यवस्था को और समृद्ध कर देता है। जब वह कुछ बड़ा होता है तो उसकी मुलाकात मैसम्मा से होती है – जो उसी की तरह जिज्ञासु प्रवृत्ति की लड़की है। वह पानी को संरक्षित करने के उपाय ढूंढ़ रही है, जिसमें उसे सफलता मिल जाती है। यह सभ्यता के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम है। पशुओं की खाल से चमड़ा तैयार करने और फिर उससे विभिन्न उत्पाद बनाने को भारत में आज तुच्छ काम माना जाता है। मगर प्रो. शेपर्ड की समझ में यह एक बहुत महत्वपूर्ण काम है। चाहे वह मानव सभ्यता का कांस्य युग में प्रवेश हो या मनुष्यों की आराधना से तौबा – ये सब क्यों हुआ, इसका ठोस कारण वे अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। लेकिन इसके साथ ही वे पाठक में और जानने-समझने की जिज्ञासा भी उत्पन्न करते हैं। यही एक अच्छी किताब की ताकत होती है।
प्रो. शेपर्ड के हड़प्पा में सभ्यता का विकास दिव्य ज्ञान से नहीं, बल्कि श्रम से होता है। पुरोहितों के अनुष्ठान नहीं, बल्कि आम श्रमजीवियों की खोजें सभ्यता के विकास का आधार बनतीं हैं। यह उलटबांसी इस पुस्तक का सबसे क्रांतिकारी पक्ष है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी पाठ्यपुस्तकें और लोक-संस्कृति राजाओं, साधु-संतों और विजेताओं को महिमामंडित और उत्पादक श्रमिक वर्ग को नज़रअंदाज़ करती आईं हैं। प्रो. शेपर्ड विद्वानों द्वारा निर्धारित इस पदक्रम को पलट देते हैं। पशुपालन विज्ञान बन जाता है और बकरी का दूध निकालना तकनीकी नवोन्मेष। महिलाएं दूध खौला कर तथा उसे फाड़कर दही, मक्खन और घी बनाने के तरीके खोजती हैं, ताकि दूध का इस्तेमाल अधिक से अधिक दिनों तक किया जा सके और भोजन पकाने और मिट्टी के बर्तन बनाने की प्रक्रिया के साथ प्रयोग करती हैं। हर व्यावहारिक सफलता, सभ्यता की इमारत में एक नई ईंट जोड़ती जाती है और इतिहास की परिभाषा बदलती चलती है।
जो पाठक प्रो. शेपर्ड की पुरानी कृतियों से वाकिफ हैं, उन्हें तुरंत यह अहसास हो जाएगा कि हालिया प्रकाशित इस पुस्तक से उनके तार जुड़ते हैं। ‘बफैलो नेशनलिज्म’ में वे भैंस को भारत के उत्पादक वर्ग का प्रतीक बताते हुए उसे पवित्र गाय से उच्च दर्जा देते हैं। उनकी इस पुस्तक में भी भैंस कथानक के केंद्र में है। लेकिन वह केवल अनुष्ठानिक प्रतीक नहीं है। वह आर्थिक और सामाजिक क्रांति की नींव है। भैंस को पालतू बनाने को केवल कृषि के क्षेत्र में बड़ी सफलता नहीं बताया गया है, बल्कि उसे मानवता की अहम् उपलब्धि के रूप में निरुपित किया गया है। प्रो. शेपर्ड की सोच को मुख्यधारा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जो अलग करता है, वह यह है कि वे श्रम, उत्पादकता और भौतिक जीवन को उच्च दर्जा देते हैं, उनका उत्सव मनाते हैं।
प्रो. शेपर्ड के दृष्टिकोण में महिलाएं भी बदलाव की अगुआ हैं। सिंध और मैसम्मा जैसे पात्र केवल पुरुषों की सहचरी नहीं हैं। वे भी अन्वेषक और अविष्कारक हैं। वे नए भोज्य पदार्थ खोजती हैं, दुग्ध उत्पादों के साथ प्रयोग करती हैं, पानी का प्रबंधन करती हैं और इस प्रकार समाज को ज़रूरी तकनीकी ज्ञान उपलब्ध करवाती हैं। प्रो. शेपर्ड की कहानी की महिला किरदार, सभ्यता के विकास की पारंपरिक कहानियों के पितृसत्तात्मक आधार को ध्वस्त करती हैं और उसकी जगह यह स्थापित करने का प्रयास करती हैं कि सभ्यता का निर्माण सामूहिक रचनात्मकता से हुआ।
कुछ पाठक निश्चित रूप से कह सकते हैं कि पुस्तक में जो बताया गया है वह इतिहास के तथ्यों से मेल नहीं खाता। इतिहासविदों की तरह पुरातत्वविद भी प्रमाण और अनुमान के बीच अंतर करते हैं और यह समझ में आने वाली बात है। लेकिन प्रो. शेपर्ड इतिहास की पुस्तक तो नहीं लिख रहे, बल्कि सभ्यता के विकास की कहानी के साथ अपनी कल्पना जोड़ रहे हैं। वे कथा-साहित्य लिख रहे हैं, पुरातात्विक रिपोर्ट नहीं। इस अंतर को हमें समझना होगा।
यह पुस्तक सिर्फ इसलिए अनूठी नहीं है, क्योंकि वह हड़प्पा की सभ्यता का उत्सव मनाती है। यह इसलिए लिए भी अनूठी है क्योंकि यह स्वीकार नहीं करती कि मिथक गढ़ने का हक केवल शक्तिशाली को है। प्रो. शेपर्ड जानते-बूझते एक प्रति-मिथक गढ़ते हैं। इसलिए नहीं कि उनके लिए इतिहास अप्रासंगिक है, बल्कि इसलिए कि लंबे समय से इतिहास पर उस वर्ग का कब्ज़ा रहा है जो यह दावा करता आया है कि भारत के अतीत का निर्माण उसने ही किया था। प्रभुत्वशाली परंपरा महाकाव्यों, पुराणों और तथाकथित पवित्र विमर्शों का इस्तेमाल सामाजिक ऊंच-नीच को सही ठहराने के लिए करती रही है। इसके जवाब में प्रो. शेपर्ड भी उतना ही मज़बूत प्रति-विमर्श प्रस्तुत करते हैं, जो श्रम की गरिमा और मनुष्यों के सामूहिक प्रयासों को सबसे आगे रखता है। पुस्तक का नायक हड़प्पा चीज़ें को ध्यान से देखता-समझता है और स्वभाव से जिज्ञासु है। वह किसी भी बात पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं करता और न ही किसी दैवीय ताकत के आगे सिर झुकाता है। वह तार्किकता में विश्वास रखता है।
प्रो. शेपर्ड की इस रणनीति पर तीखी प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। प्रशंसक कहेंगे कि यह बौद्धिक वि-औपनिवेशीकरण है, जिसका इंतज़ार लंबे समय से था। आलोचक उसे यह कर ख़ारिज करेंगे कि यह एक विशिष्ट विचारधारा की दृष्टि से लिखा गया इतिहास है, जिसमें अनेक तथ्यात्मक गलतियां हैं। लेकिन दोनों ही असली मुद्दे को समझ नहीं पा रहे होंगे। किताब का उद्देश्य किसी पुरातात्विक वाद-विवाद पर फैसला सुनाना नहीं है। पुस्तक का उद्देश्य कल्पना के उस कैनवास को विस्तार देना है, जिसके ज़रिए भारत स्वयं को समझता-पहचानता है।
प्रीती गुलाटी कॉक्स के बनाए चित्र, पुस्तक के कथानक को सजीवता प्रदान करते हैं। वे बहुत सहजता से उस दुनिया से हमारा परिचय करवाते हैं, जिसमें मनुष्य, पशु और प्रकृति एक-दूसरे के संगी-साथी हैं। वे केवल किताब के पृष्ठों को सजाते-संवारते नहीं हैं। वे पुस्तक के इस केंद्रीय संदेश को मजबूती देते हैं कि सभ्यता का विकास प्रकृति के साथ सहभागिता से होता है, उस पर वर्चस्व स्थापित कर नहीं।
पुस्तक का कथ्य आसान भाषा में लिखा गया है – मानो कोई आपसे बातचीत कर रहा हो। यह शैली किस्सागोई की ग्रामीण परंपरा से मेल खाती है। पुस्तक में गीत हैं, लोगों के बीच संवाद हैं और वह अपने केंद्रीय संदेश की हमें बार-बार याद दिलाती है। ऐसा लगता है कि वह सर्दियों के मौसम में अलाव के आसपास बैठकर हुई चर्चाओं का पाठ है, न कि किसी विश्वविद्यालय की कक्षा में दिया गया व्याख्यान। इससे यह पुस्तक बाल साहित्य भी कही जा सकती है और राजनीतिक रूपक भी। वह एक नए सामाजिक दर्शन का प्रतिपादन भी करती है और भारतीय के रूप में हमारी पहचान से जुड़े समकालीन विमर्श में एक सशक्त हस्तक्षेप भी है।
‘हड़प्पाः गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाईजेशन’ को पढ़ा जाना चाहिए। पुरातत्व पर एक पाठ्यपुस्तक के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक स्मृति, पहचान और इतिहास में एक साहसिक हस्तक्षेप के रूप में। यह प्रशंसा अर्जित कर सकती है, आपको असहज कर सकती है और तीखी बहस को जन्म दे सकती है। और ठीक यही उसकी उपलब्धि है। यह पुस्तक एक उद्घोषणा है कि दमितों को भी यह अधिकार है कि वे अपनी सभ्यतागत विरासत की पड़ताल कर सकें, उसका बयान कर सकें और उस पर अपना दावा कर सकें।
पुस्तक के बारे में
शीर्षक : हड़प्पाः गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाईजेशन
लेखक : प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड
रेखांकन : प्रीती गुलाटी कॉक्स
प्रकाशक : अनबाउंड स्क्रिप्ट
स्वरूप : सजिल्द
पृष्ठ : 80
मूल्य : 349 रुपए/ 18 अमरीकी डॉलर
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
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