दूसरे भाग से आगे : आज भी मंडल कमीशन की रिपोर्ट राष्ट्र निर्माण के लिए मानक दस्तावेज है
भले ही 26 जनवरी, 1950 को लागू संविधान ने हर तरह के असमानता के खात्मे की सैद्धांतिक एवं औपचारिक घोषणा कर दी हो, लेकिन भारतीय समाज में आज भी वर्ण-जाति आधारित असमानता के श्रेणीक्रम का पूरी तरह पालन हो रहा है। पूंजीवादी विकास भी इसे तोड़ नहीं पाया है। इसके उलट उसने इस श्रेणीक्रम को और संस्थाबद्ध कर दिया है।
आइए, तथ्यों की रोशनी में वर्ण-जाति आधारित असमानता के श्रेणीक्रम और उसके संदर्भ में आरक्षण की भूमिका को देखते हैं। सबसे पहले देश की संसद है। संसद देश में जनप्रतिनिधियों की सर्वोच्च निकाय है, सबसे ताकतवर संस्था है, क्योंकि उसे ही संविधान में संशोधन करने एवं कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। इसी संसद में भारत की संप्रभुता निहित है। देखते हैं कि इसमें किसका कितना प्रतिनिधित्व है। वर्तमान लोकसभा में (यानी 2024 में चुने गए सदन) कुल 543 सांसदों में 138 ओबीसी, 88 अनुसूचित जाति और 51 अनुसूचित जनजाति के हैं और हिंदू सवर्ण जातियों के सांसदों की संख्या 140 है। आनुपातिक तौर देखें, तो लोकसभा में ओबीसी सांसद कुल सदस्यों की संख्या के 25.4 प्रतिशत हैं, जबकि मंडल कमीशन और अन्य आंकड़ों के अनुसार आबादी में इनका अनुपात करीब 52 प्रतिशत है। अकेले द्विज-सवर्ण सांसदों की संख्या 140 है। मतलब कुल सांसदों का 25.8 प्रतिशत। जहां एक ओर 52 प्रतिशत आबादी वाले ओबीसी के सिर्फ 25.4 प्रतिशत सांसद हैं, तो दूसरी ओर 15 प्रतिशत से भी कम द्विज-सवर्ण आबादी के सांसदों की संख्या 25.8 प्रतिशत है।
स्पष्ट है कि द्विज-सवर्ण अपनी आबादी से दो गुना प्रतिनिधित्व लोकसभा में हासिल किए हुए हैं, और ओबीसी को अपनी आबादी का आधा प्रतिनिधित्व भी नहीं प्राप्त है। अनुसूचित जातियों के 16.2 प्रतिशत सांसद लोकसभा में हैं, तो अनुसूचित जनजाति के 9.4 प्रतिशत सांसद लोकसभा में हैं। एससी-एसटी को अपनी आबादी के अनुपात में या कुछ एक अधिक सांसद इसलिए हैं, क्योंकि उन्हें लोकसभा में अपनी जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण प्राप्त है। करीब 74 सांसद अन्य (शूद्र) अगड़ी जातियों – जैसे जाट, मराठा, रेड्डी, लिंगायत आदि – के हैं। कुछ अन्य धार्मिक-सामाजिक समूहों के हैं।
सन् 1980 में इस स्थिति को मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में इन शब्दों में व्यक्त किया था– “देश की आबादी में बहुसंख्यक होने के बावजूद भी पिछड़े वर्ग उच्च जातियों के आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व के अधीन बने हुए हैं। देश में वयस्क मताधिकार के लागू हुए तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है। इसके बावजूद भी अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां और अन्य पिछड़े वर्ग राजनीतिक शक्ति का केवल सीमित हिस्सा ही प्राप्त कर सके हैं, जबकि इनकी आबादी देश की कुल आबादी का करीब तीन-चौथाई से अधिक है।”
इसका सीधा कारण है– भारतीय समाज में सवर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कुछ अन्य) का वर्ण-जाति आधारित वर्चस्व। एससी-एसटी को उनकी आबादी के अनुपात में लोकसभा में इसलिए प्रतिनिधित्व मिला हुआ है, क्योंकि उनके लिए आबादी के अनुपात में आरक्षण है। इस बात की पूरी संभावना है कि यदि एससी-एसटी के लिए आरक्षण नहीं होता तो उनका लोकसभा में प्रतिनिधित्व ओबीसी से भी बहुत कम होता। ओबीसी का उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं है क्योंकि उन्हें आबादी के अनुपात में विधायिका में आरक्षण प्राप्त नहीं है।
अब इसे केंद्र सरकार की सेवाओं/नौकरियों के संदर्भ में देखते हैं। वर्ष 2022 के आंकडों के अनुसार, केंद्र सरकार के अधीन ग्रुप ‘ए’ की नौकरियों में एससी, एसटी और ओबीसी की हिस्सेदारी क्रमश: 13.21 प्रतिशत, 6.01 प्रतिशत और 18.07 प्रतिशत है। यदि एससी, एसटी और ओबीसी, तीनों का मिला दिया जाए तो कुल मिलाकर इनकी हिस्सेदारी 37.29 प्रतिशत होती है। साफ है कि इस देश की कुल आबादी के दो-तिहाई से अधिक एससी, एसटी और ओबीसी को ग्रुप ‘ए’ की कुल नौकरियों में करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी ही है। दो-तिहाई नौकरियों पर द्विज-सवर्ण सहित उन अगड़ी जातियों का कब्जा है, जिनकी आबादी भारत की कुल आबादी का 21 प्रतिशत के आसपास है। ओबीसी के विशेष संदर्भ में देखा जाए तो 52 प्रतिशत की आबादी वाले इस समुदाय की हिस्सेदारी सिर्फ 18.7 प्रतिशत है। यह इसके बावजूद कि ओबीसी को इन नौकरियों/सेवाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। एससी-एसटी को भी उनकी जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी कम है, जबकि उन्हें जनसंख्या के अनुपात में इन नौकरियों में आरक्षण कानूनी तौर पर प्राप्त है।
सनद रहे कि ग्रुप ‘ए’ की नौकरियां करने वाले वे होते हैं जो नीतियों का निर्माण करते हैं और उन्हें लागू करने का निर्णय लेते हैं। इन्हें आम भाषा में शीर्ष स्तर की नौकरशाही कहते हैं।
इसी तरह केंद्र सरकार के अधीन ग्रुप ‘बी’ की नौकरियों में भी स्थिति कुछ खास बेहतर नहीं है। इस ग्रुप में एससी, एसटी और ओबीसी की हिस्सेदारी क्रमश: 15.36 प्रतिशत, 7.39 प्रतिशत और 17.46 प्रतिशत है। इनकी कुल हिस्सेदारी 40.21 प्रतिशत है। यहां दो-तिहाई से अधिक आबादी के हिस्से सिर्फ 40 प्रतिशत और एक-तिहाई से भी कम अगड़ी जातियों के कब्जे में 60 प्रतिशत नौकरियां हैं। यहां 52 प्रतिशत आबादी वाले ओबीसी को सिर्फ 17.46 प्रतिशत हिस्सेदारी प्राप्त है।
इसी तरह केंद्र सरकार के अधीन ग्रुप ‘सी’ (लिपिकीय संवर्ग/कुशल मजदूर) की नौकरियों में एससी, एसटी और ओबीसी की हिस्सेदारी क्रमश: 16.73 प्रतिशत, 7.39 प्रतिशत और 22.69 प्रतिशत है। कुल मिलाकर इन तीनों वर्गों की हिस्सेदारी 46.81 प्रतिशत है। कुशल मजदूर/कर्मी श्रेणी में भी एससी, एसटी और ओबीसी को कुल मिलाकर आधे से भी कम हिस्सेदारी प्राप्त हैं। यहां भी 52 प्रतिशत आबादी वाले ओबीसी को सिर्फ 22.6 प्रतिशत हिस्सेदारी प्राप्त है।

अब देखिए कि खेती-बाड़ी की जमीन पर किसका नियंत्रण है। यदि इससे संबंधित आंकड़ों को देखें तो पाते हैं कि ऊपर के शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में खेती योग्य जमीन का 53.8 प्रतिशत है, जबकि नीचे के 50 प्रतिशत आबादी के पास सिर्फ 3.5 प्रतिशत जमीन है। आंकड़ों और जमीनी सच्चाई को देखकर कोई भी सहज समझ सकता है कि ये ऊपर के शीर्ष 10 प्रतिशत लोग कौन हैं, जिनके पास कुल जमीन का 53.8 प्रतिशत हिस्सा है और नीचे के पायदान के 50 प्रतिशत वे लोग कौन हैं, जिनके पास सिर्फ कुल जमीन का 3.5 प्रतिशत है? करीब 53.8 प्रतिशत जमीनों के मालिक ऊपर के इन शीर्ष लोगों में द्विज-सवर्ण जातियों, अगड़ी जातियां (मराठा, जाट, रेड्डी आदि) और ओबीसी की कुछ अगड़ी जातियों का ऊपरी हिस्सा है। सिर्फ 3.5 प्रतिशत जमीनों के मालिक निचले पायदान के 50 प्रतिशत लोगों में बहुलांश एससी, एसटी और ओबीसी यानी परंपरागत तौर दस्तकार, सेवक कही जाने वाली जातियां और ओबीसी के अगड़ी जातियों का एक बड़ा निचला हिस्सा है। इसी भूमि संबंध (उत्पादन संबंध) को क्रांतिकारी प्रगतिशील भूमि सुधार के माध्यम से तोड़ने की पुरजोर पैरवी मंडल कमीशन ने की थी। इसे एकमात्र सबसे प्रभावशाली उपाय के रूप में प्रस्तुत किया था।
भारतीय पूंजीवाद-कार्पोरेट वर्ण-जातिवादी (ब्राह्मणवादी) पूंजीवाद-कार्पोरेट है। आंकडे़ इसकी गवाही दे रहे हैं। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (निफ्टी 50) की शीर्ष 50 कंपनियों के सभी सीईओ या एमडी द्विज-सवर्ण जातियों से हैं। दूसरी तरफ जीवनयापन के लिए मैला ढोने वाले लगभग 12,000 लोगों में से सभी दलित हैं। अरबों डॉलर के स्टार्ट-अप के 95 प्रतिशत संस्थापक द्विज-सवर्ण जातियों के हैं। करीब 95 प्रतिशत गिग वर्कर (मध्यवर्ग के घरों में खाना-समान आदि पहुंचाने वाले) ओबीसी, एससी और धार्मिक अल्पसंख्यक हैं। स्टार्ट-अप में निचले पायदान के 95 प्रतिशत गिग वर्कर पिछड़ी जातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों से हैं। (स्रोत : द इंडियन एक्सप्रेस, 3 मई 2025, हाऊ टू कंडक्ट ए कास्ट सेंसस : लेसंस फ्रॉम तेलंगाना फॉर सेंटर, दिल्ली संस्करण)
वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट-2026 के अनुसार, 10 प्रतिशत यानी करीब 14 करोड़ भारतीयों के पास देश की 65 प्रतिशत संपदा और 58 प्रतिशत आय पर कब्जा जमा है। ये 10 प्रतिशत भारतीय किस सामाजिक और वर्गीय समूह के हैं? दूसरी तरफ देश के 1 अरब 26 करोड़ लोग हैं, जिनके पास कुल मिला कर देश की कुल संपदा का सिर्फ 35 प्रतिशत ही जीने-मरने के लिए है (वर्तमान में देश की कुल आबादी – 1 अरब 40 करोड़ – के आधार पर देखा जाना चाहिए। सवाल यह है कि आखिर ये 14 करोड़ लोग किस सामाजिक समूह और वर्गीय समूह के हैं? कितने प्रतिशत आदिवासी हैं?
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल आबादी में 10.50 करोड़ आदिवासी (एसटी) थे। वर्तमान में कम-से-कम इनकी आबादी 12 करोड़ है। ऊपर के सबसे धनी 14 करोड़ लोगों में शायद ही कोई आदिवासी हो। सवाल है कि जिन 14 करोड़ लोगों के पास देश की 65 प्रतिशत संपदा और 58 प्रतिशत आय पर कब्जा है, क्या इनमें कोई दलित है?
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में दलितों की कुल आबादी देश की कुल आबादी का 16.6 प्रतिशत थी, यानि 20.13 करोड़। इस समय करीब 24 करोड़ अनुमानित है। ऊपर के सबसे धनी 10 प्रतिशत में मुश्किल से कुछ अंगुलियों पर गिनने लायक दलित होंगे, शायद न भी हों। तो इन 14 करोड़ लोगों में कितने अति पिछड़े हैं?
65 प्रतिशत संपदा के मालिक इन 14 करोड़ लोगों में मुश्किल से कोई अति पिछड़ा मिले, जो देश की कुल आबादी का करीब 30 से 35 प्रतिशत है। मतलब आज की तारीख में 40 करोड़ से अधिक।
अब सवाल यह कि इन 14 करोड़ लोगों में कितने अन्य पिछड़े वर्ग हैं?
हो सकता है कि देश की 65 प्रतिशत संपदा के मालिक ऊपर के 14 करोड़ लोगों में कुछ लोग या ज्यादा से ज्यादा 1 या 2 प्रतिशत लोग अन्य पिछड़े वर्ग हों। जबकि ये देश की कुल आबादी का आधे से अधिक हैं। मतलब आज की तारीख में 70 करोड़ के आसपास।
साफ है कि इस संपदा के मालिकों में बहुलांश इस देश के द्विज-सवर्ण जातियों या पिछड़े वर्ग की अगड़ी जातियों के कुछ लोग हैं। उसमें भी इन जातियों का एक बड़ा हिस्सा इससे बाहर होगा।
अब इस सवाल को देखा जाए कि इन 14 करोड़ लोगों में कितने मजदूर हैं? देश की 65 प्रतिशत संपदा के मालिक इन 14 करोड़ लोगों में दावे के साथ कहा जा सकता है कि कोई मजदूर तो नहीं ही होगा। भारत सरकार के 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार देश में कुल कार्यरत लोग 64.33 करोड़ थे। इनमें से कोई इन 14 करोड़ ऊपर के सबसे धनिक लोगों में शामिल होगा, मुश्किल ही है।
सनद यह भी रहे कि इन सभी कार्यरत कर्मचारियों-मजदूरों में 31.2 करोड़ असंगठित क्षेत्र में हैं। यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि इसमें से एक भी व्यक्ति इन 14 करोड़ लोगों में शामिल नहीं होगा। इसी तरह 15.9 करोड़ लोग कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं, इसमें से किसी के ऊपर के इन 14 करोड़ लोगों में शामिल होने की कोई दूर-दूर तक संभावना नहीं है। तो इन 14 करोड़ लोगों में कितने किसान हैं? पीपुल्स रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकोनॉमी (प्राइस) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 6.84 करोड़ परिवार पूरी तरह कृषि पर निर्भर हैं। एक परिवार का औसत आकार 4.9 मानने पर इनकी कुल संख्या 33.5 करोड़ होती है। इन 33.5 करोड़ लोगों में कोई उन 14 करोड़ लोगों में शामिल होगा, जो देश की संपदा के 65 प्रतिशत के मालिक बन गए हैं, नामुमकिन है।
स्पष्ट है कि इस देश की 65 प्रतिशत संपदा के मालिक इन 14 करोड़ लोगों में देश के बहुसंख्यक मेहनतकश हिस्से का कोई शामिल नहीं है। वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट-2026 के अनुसार, भारत के 1 प्रतिशत मतलब 1 करोड़ 40 लाख लोगों के हाथ में देश की कुल संपदा का 40 प्रतिशत केंद्रित हो गया है। इनमें कोई आदिवासी, दलित होगा, अति पिछड़ा या अन्य पिछड़ा होगा, यह करीब-करीब नामुमकिन-सा है। पिछड़ी जातियों की अगड़ी ऐतिहासिक तौर पर शासक जातियों (महाराष्ट्र के मराठा या गुजरात के पटेल और जाट आदि) में से हो सकता है कि कुछ लोग हों।
इस बात की पूरी संभावना है कि इन 1 करोड़ 40 लाख लोगों में द्विज-सवर्ण जातियों (अपरकॉस्ट) के लोग हैं। यह कहने की कोई जरूरत नहीं है कि इसमें मेहनतकश किसानों-मजदूरों में से किसी के होने की कोई संभावना नहीं है।
यह सामाजिक-वर्गीय असमानता सिर्फ संपदा के मालिकाने तक सीमित नहीं है। आय के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति है। देश के ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों की जेब में देश की कुल आय का 58 प्रतिशत जा रहा है, जबकि नीचे के 50 प्रतिशत लोगों की जेब में कुल आय का सिर्फ 15 प्रतिशत जा रहा है। यह सामाजिक-वर्गीय असमानता साल-दर-साल चौड़ी होती जा रही है। आज से करीब 3 साल पहले इन 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में सिर्फ देश की कुल संपदा का 58 प्रतिशत ही था, जो इस समय 65 प्रतिशत हो गया है। मतलब तीन सालों में 7 प्रतिशत की वृद्धि। साफ है कि यह दो तरह से हो रहा है। पहला, देश में जो संपदा साल-दर-साल सृजित हो रही है, उसका बड़ा हिस्सा ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में जा रहा है। दूसरा, नीचे के लोगों की संपदा का भी ऊपर के लोगों के हाथों में हस्तांतरण हो रहा है।
अकारण ही नहीं, संविधान सभा में संविधान का अंतिम प्रारूप प्रस्तुत करते हुए डॉ. आंबेडकर ने यह चेतावनी दी थी कि हम संविधान के माध्यम से जिस राजनीतिक लोकतंत्र को स्थापित कर रहे हैं, उसे सामाजिक और आर्थिक असमानता निगल जाएगी, यदि हम इसे खत्म करने में सफल नहीं हुए। सामाजिक असमानता खत्म तो नहीं हुई, लेकिन आर्थिक असमानता बढ़ती गई और अब तो छलांग लगाकर बढ़ रही है। यह आर्थिक असमानता वहां पहुंच गई है, जहां से वह देश, समाज और लोकतंत्र के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन चुकी है। उत्पादन के संसाधनों और आय के स्रोतों पर उच्च जातियों के इसी वर्चस्व को तोड़ने की सिफारिश मंडल आयोग ने इन शब्दों किया है– “उत्पादन के साधनों पर उच्च जातियों का करीब-करीब पूर्ण नियंत्रण है, जिसके चलते ये जातियां पिछड़े वर्गों (एससी, एसटी और ओबीसी) को अपने वर्चस्व में बनाए रखने और नियंत्रित करने में सक्षम रही हैं।” (पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट और सिफारिशें, 13.33)
एक नजर उच्च शिक्षा संस्थानों में पिछड़े वर्गों (एससी, एसटी और ओबीसी) के छात्रों की हिस्सेदारी पर डालते हैं। सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के विश्वविद्यालयों में एससी का अनुपात 14.6 प्रतिशत, एसटी 6 प्रतिशत और ओबीसी 31.2 प्रतिशत है। स्पष्ट है कि करीब 80 प्रतिशत आबादी वाले एससी, एसटी और ओबीसी की कुल हिस्सेदारी यहां भी 51.8 प्रतिशत है। यहां भी 21 प्रतिशत के आसपास की द्विज और अन्य अगड़ी जातियों की हिस्सेदारी आज भी करीब 50 प्रतिशत के आसपास है। प्राइवेट और डीम्ड विश्वविद्यालयों में एससी, एसटी और ओबीसी की कुल हिस्सेदारी 35.3 प्रतिशत है। एससी, एसटी और ओबीसी की हिस्सेदारी क्रमश: 6.8 प्रतिशत, 3.6 प्रतिशत और 24.9 प्रतिशत है। (द इंडियन एक्सप्रेस, 8 अप्रैल, 2025, दिल्ली संस्करण, योगेंद्र यादव का लेख – ऐन इनकम्प्लीट सोशल जस्टिस)
उच्च शिक्षा संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी के छात्रों की उपर्युक्त स्थिति का सही अंदाज तभी लगाया जा सकता है, जब यह तथ्य देख लिया जाए कि भारत में कितने प्रतिशत उच्च शिक्षा संस्थान सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त हैं और कितने प्राइवेट या डीम्ड उच्च शिक्षा संस्थान हैं। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुेशन (एआईएसएचई) ने 2022-23 में इसका सर्वे किया था। सरकार ने इस सर्वे को 2023-24 में जारी किया था। इसके अनुसार, देश में कुल 1 हजार 213 विश्वविद्यालय, 46,624 कॉलेज और 12,543 स्वतंत्र संस्थान पंजीकृत थे। इसमें 20 प्रतिशत सरकारी उच्च शिक्षा संस्थान हैं। 13.1 प्रतिशत सरकारी सहायता प्राप्त निजी संस्थान हैं। 66 प्रतिशत पूरी तरह निजी उच्च शिक्षा संस्थान हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो 79.1 प्रतिशत निजी उच्च शिक्षा संस्थान हैं।
प्राइवेट यूनिर्सिटीज और डीम्ड यूनिर्विसिटीज में आज भी एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण नहीं लागू किया गया है, जबकि शैक्षिक संस्थाओं में प्रवेश के मामले में संविधान संशोधन हो चुका है (93वां संविधान संशोधन, 2004, जिसके तहत ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था), जिसे सुप्रीम कोर्ट तक वैध ठहरा चुका है। (अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत सरकार, 2008)
बिना आरक्षण के निजी क्षेत्र द्वि-सवर्णों और कुछ अन्य शासक जातियों के लिए कमोबेश एकाधिकार की स्थिति है। आबादी में अल्पसंख्यक द्विज-सवर्ण यहां बहुसंख्यक हैं। राज्यों के प्राइवेट विश्वविद्यालयों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में आरक्षण लागू करने के मार्ग में कोई संवैधानिक और अदालती बाधा भी नहीं है। सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। देश के राजनीतिक दल इधर-उधर की बातें, भविष्य की बातें खूब कर रहें, लेकिन जो चीज ठोस रूप से लागू हो सकती है, जिससे एससी, एसटी और ओबीसी की स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन हो सकता है, उस पर कमोबेश चुप्पी है। संसद में थोड़ा जोर लगा कर विपक्ष द्वारा राज्यों के प्राइवेट विश्वविद्यालयों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में आरक्षण लागू कराया सकता था और है।
उपरोक्त सभी तथ्य दो बातें प्रमाणित करते हैं। पहली यह कि भारतीय समाज में धन-संपदा, नौकरी, शिक्षा एवं राजनीतिक प्रतिनिधित्व सभी मामलों में मनु द्वारा संहिताबद्ध वर्ण-जाति आधारित असमानता का श्रेणीक्रम आज पूरी तरह कायम है। यदि ओबीसी या दलितों की स्थिति 70 वर्षों में बेहतर हुई है तो उनकी तुलना में सवर्णों की स्थिति और बेहतर हुई है यानि जो धन-संपदा एवं नौकरियां सृजित हुई हैं, उसके बड़े हिस्से पर मुट्ठीभर द्विज-सवर्णों ने नियत्रंण कर लिया है, जिसके चलते वर्ण-जाति आधारित असमानता का श्रेणीक्रम टूटा नहीं, बल्कि कुछ क्षेत्रों में मजबूत हुआ है। जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण के चलते दलितों एवं आदिवासियों की आबादी के अनुपात में लोकसभा-विधानसभाओं एवं अन्य क्षेत्रों में कुछ प्रतिनिधित्व मिला है, लेकिन ओबीसी को किसी भी क्षेत्र में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हुआ है। दूसरा इन तथ्यों से यह प्रमाणित होता है कि सिर्फ उन्हीं क्षेत्रों में ही ओबीसी या दलितों के प्रतिनिधित्व में सापेक्षिक तौर पर वृद्धि हुई, जहां आरक्षण लागू है। इसका निहितार्थ यह है कि आरक्षण वर्ण-जाति आधारित असमानता के श्रेणीक्रम को तोड़ने का एक मात्र कारगर उपाय के रूप सामने आया है। लेकिन जैसा कि मंडल कमीशन ने अपनी सिफारिश में कहा है कि “जब तक पिछड़े वर्गों की मूल समस्या का समाधान नहीं होता है, तब तक सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और वित्तीय सहायता केवल आंशिक राहत ही दे पाएगा।” (पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट और सिफारिशें, 13.32)
फिर इस स्थिति को तोड़ने का मंडल कमीशन मुख्य और सबसे कारगर उपाय क्या मानता है। इसका जवाब इन शब्दों में दिया है– “इस बात पर आयोग (मंडल कमीशन) का दृढ़ विश्वास है कि मौजूदा उत्पादन संबंधों में आमूल-चूल बदलाव सभी पिछड़े वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) के कल्याण और उन्नति-प्रगति के लिए उठाया जा सकने वाला एकमात्र सबसे महत्वपूर्ण कदम है।” इस दिशा में पहले कदम के रूप में आयोग क्रांतिकारी भूमि सुधार का प्रस्ताव करता है– “जब तक वर्तमान उत्पादन संबंधों की जकड़बंदी को क्रांतिकारी भूमि सुधारों के माध्यम से नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक वंचित और विशेषाधिकार-विहीन वर्गों (एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों) की उच्च जातियों पर निर्भरता बनी रहेगी।” (पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट और सिफारिशें, 13.33)
(समाप्त)
(संपादन : नवल/अनिल)
