बीते 6 सितंबर, 2026 की शाम नागपुर के इंटरनिटी मॉल स्थित मूवीमैक्स में प्रवेश करते हुए मुझे लगा था कि मैं सिर्फ एक फिल्म के प्रीमियर में शामिल होने जा रहा हूं। लेकिन कुछ ही देर में यह एहसास बदल गया। यह किसी सामान्य फिल्म का प्रीमियर नहीं था। लोग आ रहे थे और एक-दूसरे का अभिवादन ‘जय भीम-नमो बुद्धाय’ से कर रहे थे। हॉल लगभग हाउसफुल था। फिल्म की पूरी स्टार कास्ट इस मौके पर मौजूद थी। यूजीसी के पूर्व चेयरपर्सन डॉ. सुखदेव थोराट और विमल थोराट भी वहां थे।
दलित बहुजन सोशल मीडिया के इन्फ्लुएंसर्स, पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में आंबेडकरवादी साथी उपस्थित थे। मुझे भी इस प्रीमियर में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था। मैं राजस्थान से वहां पहुंचा था। संभवतः डॉ. नीरज बुनकर और मैं, दो ही हिंदी भाषी इस मराठी फिल्म के प्रीमियर शो को देखने के लिए वहां मौजूद रहे होंगे।
मैंने ‘जयंती’ का पहला भाग मराठी और हिंदी, दोनों भाषाओं में देखा था। इसलिए ‘जयंती-2’ को लेकर उत्सुकता पहले से थी। लेकिन फिल्म देखने के बाद अनुभव अपेक्षा से कहीं अधिक गहरा था। कई दृश्य भीतर तक उतर गए। आंखों में आंसू आए। यह केवल भावुकता के कारण नहीं था। पर्दे पर दिखाई जा रही सामाजिक वास्तविकता और हमारे अपने समय के बीच की निकटता ने फिल्म को अधिक बेचैन करने वाला बना दिया है।
फिल्म खत्म हुई, लेकिन दर्शक उठकर जाने को तैयार नहीं थे। उनको कहना पड़ा कि वे लॉबी में बात करने के लिए रुक सकते हैं। लोग अंदर ही एक-दूसरे के गले लग कर बधाइयां दे रहे थे। बाहर करीब दो घंटे तक थिएटर की लॉबी में लोग रुके रहे। लेखक-निर्देशक शैलेश नरवडे, निर्माता और कलाकारों से बातचीत होती रही। कोई किसी दृश्य पर चर्चा कर रहा था तो कोई अपना अनुभव बता रहा था। कोई सवाल पूछ रहा था। उस शाम महसूस हुआ कि कभी-कभी सिनेमा पर्दे पर समाप्त नहीं होता, वह दर्शकों के बीच संवाद के रूप में आगे बढ़ता है। ‘जयंती-2’ मेरे लिए ऐसी ही फिल्म है।
फिल्म की कहानी पुणे के एक कॉलेज की पृष्ठभूमि में है। चंद्रपुर की आदिवासी ग्रामीण पृष्ठभूमि से आई पायल मरकाम उच्च शिक्षा का सपना लेकर वहां पहुंचती है, लेकिन उसे सहपाठियों के भेदभाव और रैगिंग का सामना करना पड़ता है। शुरू में वह असहजता के साथ इसे सह लेती है, लेकिन जल्दी ही वह इसका विरोध शुरू कर देती है और विडंबना यह कि कार्रवाई उसी के खिलाफ होती है। उसे निलंबित कर दिया जाता है। इसके बाद प्रोफेसर गिरिजा देशपांडे को मामले की जांच की जिम्मेदारी मिलती है, लेकिन कहानी का असली सवाल तब उभरता है कि क्या हमारे कॉलेज और विश्वविद्यालय वास्तव में समानता के लोकतांत्रिक परिसर हैं?
हम अक्सर मान लेते हैं कि जाति गांवों में है और आधुनिक शहरों तथा विश्वविद्यालयों में उसका असर कम हो जाता है। ‘जयंती-2’ इस भ्रम को तोड़ती है। जाति कॉलेज के गेट पर नहीं रुकती। वह नाम, सामाजिक पृष्ठभूमि, भाषा, आर्थिक स्थिति, मित्रता, छात्र राजनीति और संस्थागत व्यवहार के रास्ते कैंपस में प्रवेश करती है। उच्च शिक्षा के दरवाजे उन समुदायों के लिए खुले हैं जिनकी पिछली पीढ़ियों को उनसे दूर रखा गया था, लेकिन प्रवेश और सम्मान के साथ जीने का अधिकार एक ही चीज नहीं है।
पहली नजर में यह रैगिंग की कहानी लग सकती है, लेकिन यहां रैगिंग केवल छात्रों की शरारत नहीं रह जाती। वह सत्ता और सामाजिक वर्चस्व के प्रदर्शन में बदल जाती है। सवाल यह है कि किसी विद्यार्थी को अपमानित करने और उसकी पहचान को उसके खिलाफ इस्तेमाल करने की सहजता कुछ लोगों को कहां से मिलती है?
पायल का संघर्ष इसी वजह से महत्वपूर्ण है। वह केवल अपने साथ हुए व्यवहार का विरोध नहीं करती; वह उस मानसिकता को चुनौती देती है, जो पीड़ित से चुप रहने की अपेक्षा करती है। अन्याय के बाद अक्सर कहा जाता है– “बात मत बढ़ाओ”, “कॉलेज की बदनामी होगी”, “समझौता कर लो”। इस तरह मूल सवाल बदल जाता है। “भेदभाव क्यों हुआ?” की जगह पूछा जाने लगता है कि “तुमने शिकायत क्यों की?”
यहीं संस्था की असली परीक्षा शुरू होती है। किसी कॉलेज की प्रतिष्ठा शिकायतों को दबाने से नहीं बनती, बल्कि इस बात से बनती है कि शिकायत सामने आने पर वह कितनी निष्पक्षता और साहस से उसका सामना करता है। यदि पीड़ित विद्यार्थी को ही अनुशासन, प्रतिष्ठा और व्यवस्था के नाम पर चुप कराया जाने लगे, तो संस्था केवल एक विद्यार्थी को नहीं, अपने लोकतांत्रिक चरित्र को भी कमजोर करती है।
विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाली जगह नहीं हैं। वे नागरिकता, असहमति और लोकतांत्रिक व्यवहार सीखने के स्थान भी हैं। इसलिए वहां जाति और सामाजिक पूर्वाग्रह के लिए जगह का बचे रहना केवल किसी एक विद्यार्थी की समस्या नहीं है। यह शिक्षा व्यवस्था के चरित्र का प्रश्न है।

पायल इसीलिए अकेली पात्र नहीं रह जाती। वह उन विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व करती है जो पहली पीढ़ी के रूप में उच्च शिक्षा तक पहुंचते हैं और वहां अपनी सामाजिक पहचान के कारण बार-बार खुद को साबित करने के लिए मजबूर होते हैं। विश्वविद्यालय में प्रवेश मिल जाना बराबरी की शुरुआत हो सकती है, लेकिन बराबरी तभी पूरी होगी जब वहां व्यक्ति की गरिमा भी सुरक्षित हो।
फिल्म देखते हुए मेरे मन में आज की आरक्षण-विरोधी बहस भी बार-बार आती रही। ‘मेरिट’ को अक्सर सामाजिक संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया जाता है और पूछा जाता है कि जब अवसर सबके लिए खुले हैं तो आरक्षण की जरूरत क्यों है? ‘जयंती-2’ इस सवाल का जवाब किसी आंकड़े से नहीं देती; वह असमानता को एक मानवीय अनुभव में बदल देती है।
किसी विद्यार्थी के सामने अवसर का दरवाजा खुला होना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि वह उस दरवाजे तक किस सामाजिक और आर्थिक जमीन से पहुंचा है। उसके परिवार की शैक्षणिक स्थिति क्या थी? उसे सामाजिक सम्मान कितना मिला? उसकी पहचान उसके लिए सहारा थी या बोझ? इन सवालों को हटाकर केवल परीक्षा के अंकों को ‘मेरिट’ मान लेना बराबरी की वास्तविकता को छिपाना है।
फिल्म यह अच्छे से स्थापित करती है कि आरक्षण किसी पर कृपा नहीं है। यह उस सामाजिक असमानता का संवैधानिक उत्तर है, जिसने समाज के बड़े हिस्से को शिक्षा, सत्ता और अवसर से लंबे समय तक दूर रखा। इसलिए पायल की कहानी आरक्षण पर सीधे बहस किए बिना भी उस बहस की बुनियाद पर सवाल रखती है। अवसर केवल दरवाजा खुलने का नाम नहीं; उस दरवाजे के भीतर सम्मानपूर्वक खड़े हो पाने का नाम भी है।
यहां ‘जयंती-2’ को पहली ‘जयंती’ से जोड़कर देखना जरूरी है। पहली फिल्म में सामाजिक चेतना और आंबेडकरवादी विचारों की ओर एक युवा की वैचारिक यात्रा थी। दूसरी फिल्म उस विचार की सामाजिक परीक्षा करती है। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को पढ़ना एक बात है, उनके विचारों के अनुरूप व्यवहार करना दूसरी। संविधान की प्रस्तावना पढ़ना आसान है और उसके मूल्यों को अपने संस्थागत और सामाजिक व्यवहार में उतारना कठिन।
‘समता’ की भाषा बोलना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि जब कोई कमजोर व्यक्ति बराबरी का दावा करता है, तब हम उसके साथ क्या करते हैं। ‘स्वतंत्रता’ का अर्थ केवल अपनी बात कहने का अधिकार नहीं, बल्कि दूसरे को अपनी बात कहने की जगह देना भी है और ‘बंधुता’ का अर्थ केवल भाईचारे की घोषणा नहीं, बल्कि दूसरे की गरिमा को अपनी गरिमा जितना ही महत्वपूर्ण मानना है।
इस फिल्म में पायल की ताकत इसी में है कि वह केवल सहानुभूति मांगने वाली पात्र नहीं है। वह अधिकार की भाषा बोलती है। आंबेडकरवादी दृष्टि के हिसाब से यही निर्णायक अंतर है। सामाजिक न्याय का सवाल किसी वंचित व्यक्ति पर दया करने का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने का है जिसमें उसे अपने मनुष्य होने का अधिकार बार-बार साबित न करना पड़े।

शायद इसीलिए फिल्म के कई दृश्य भावुक करते हैं। पर्दे पर एक चरित्र है, लेकिन उसके पीछे उन अनेक विद्यार्थियों के अनुभव दिखाई देते हैं जो उच्च शिक्षा तक पहुंचे और वहां शिक्षा से ज्यादा अपनी सामाजिक पहचान से लड़ने के लिए मजबूर हुए।
ऐसे विषय पर फिल्म बनाना आसान नहीं है। बाजार सुरक्षित कहानियों को प्राथमिकता देता है, जबकि जाति, भेदभाव और संस्थागत सत्ता जैसे विषय दर्शक को असहज करते हैं। लेखक-निर्देशक शैलेश नरवडे ने कहानी, पटकथा, संवाद और निर्देशन की जिम्मेदारी संभालते हुए इस विषय को केवल नारे में बदलने के बजाय पात्रों और उनके संघर्षों के माध्यम से सामने रखा है। यही इस प्रयास की महत्वपूर्ण विशेषता है।
फिल्म के कलाकारों ने भी कहानी को विश्वसनीय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऋतुराज वानखेडे, प्रियदर्शनी इंदलकर, पायल जाधव, रोहिणी हट्टंगडी, देविका दफ्तरदार, विजय निकम और पूरी टीम का काम प्रभावशाली है। पायल जाधव का अभिनय विशेष रूप से उल्लेखनीय लगा। फिल्म का संगीत भी कहानी के भावनात्मक प्रवाह के साथ चलता है। संगीतकार ओंकारस्वरूप और गीतकारों की टीम ने दृश्यों के भाव को गहरा किया है, बिना कहानी पर अनावश्यक रूप से हावी हुए, अभी तक मेरे कानों में फिल्म का गीत ‘भावा रे भावा …’ गूंज रहा है।
नागपुर के प्रीमियर की सबसे महत्वपूर्ण स्मृति मेरे लिए फिल्म के कईं दृश्य है और फिल्म के बाद का दृश्य भी है। करीब दो घंटे तक लोग लॉबी में रूके रहे। कलाकारों और फिल्मकारों से बातचीत हुई, अनुभव साझा हुए, सवाल उठे और बहस चली। यानी फिल्म का आख्यान पर्दे के साथ खत्म नहीं हुआ। वह दर्शकों के अपने जीवन और अनुभवों में प्रवेश कर गया।
यही सामाजिक सिनेमा की असली परीक्षा है। वह हमें केवल भावुक करे, यह पर्याप्त नहीं। वह हमें अपने समाज को नए ढंग से देखने के लिए मजबूर करे, तभी उसका असर स्थायी होता है। नागपुर में मुझे इसी असर की झलक दिखाई दी।
प्रीमियर में डॉ. सुखदेव थोराट की मौजूदगी भी अर्थपूर्ण थी। उच्च शिक्षा और सामाजिक न्याय के प्रश्नों से उनका लंबे समय का जुड़ाव फिल्म के केंद्रीय सवाल से स्वाभाविक रूप से मेल खाता था। क्योंकि ‘जयंती-2’ का प्रश्न आखिरकार यही है कि शिक्षा संस्थान केवल ज्ञान और डिग्री के केंद्र होंगे या सामाजिक बराबरी के भी?
यह भी उल्लेखनीय है कि लेखक-निर्देशक शैलेश नरवडे महाराष्ट्र के अलग-अलग जिलों में जाकर फिल्म को लेकर संवाद कर रहे हैं। नागपुर के अलावा मुंबई और पुणे में भी प्रीमियर हो गए हैं। इससे लगता है कि फिल्म केवल रिलीज होने के लिए नहीं, बल्कि अपने विषय पर बातचीत पैदा करने के लिए भी बनाई गई है।
आगामी 11 सितंबर, 2026 को फिल्म व्यापक रूप से दर्शकों के सामने पहुंचेगी। मैं बॉक्स ऑफिस को लेकर कोई भविष्यवाणी नहीं करना चाहता। लेकिन नागपुर की प्रतिक्रिया आश्वस्त करने वाली थी। दर्शकों में केवल फिल्म देखने की उत्सुकता नहीं थी, अपने अनुभव को पर्दे पर देखने की आकांक्षा भी थी। लंबे समय से वंचित समुदायों के दर्शक ऐसी कहानियों की तलाश में हैं जिनमें वे केवल पीड़ित के रूप में नहीं, बल्कि अधिकार और गरिमा के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई दें। ‘जयंती-2’ उस आकांक्षा को जगह देती है।
6 सितंबर की उस शाम मूवीमैक्स से बाहर निकलते हुए मेरे भीतर एक सवाल रह गया। अगर पायल हमारे कॉलेज में होती और उसके साथ ऐसा व्यवहार होता, तो हम क्या करते? क्या हम उसे चुप रहने की सलाह देते? क्या संस्था की प्रतिष्ठा के नाम पर उससे समझौता करने को कहते? या उसके साथ खड़े होते? यही सवाल फिल्म की असली ताकत है। यह दर्शक को केवल कहानी नहीं सुनाती, उसे उसकी अपनी सामाजिक भूमिका के सामने खड़ा करती है।
इसलिए ‘जयंती-2’ को केवल एक दलित-बहुजन विषयक फिल्म कहना उसके अर्थ को सीमित करना होगा। यह जाति, शिक्षा, अवसर, संस्थागत सत्ता और सामाजिक न्याय के उस रिश्ते को सामने लाती है, जिसे हम अक्सर अलग-अलग मुद्दों में बांटकर देखते हैं। फिल्म का महत्व इस बात में है कि वह इन सवालों को किसी अमूर्त बहस की तरह नहीं, एक विद्यार्थी के जीवन और उसकी गरिमा के सवाल के रूप में हमारे सामने रखती है।
फिल्म देखने के बाद मेरे लिए सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि ‘जयंती-2’ कितनी अच्छी फिल्म है। उससे बड़ा सवाल यह है कि उसने हमें अपने बारे में क्या सोचने के लिए मजबूर किया है? हम समानता में सचमुच विश्वास करते हैं या केवल समानता की भाषा में? हम ‘मेरिट’ की बात करते हुए सामाजिक असमानता की जमीन को देखने के लिए तैयार हैं? हम संविधान को केवल राज्य की व्यवस्था मानते हैं या अपने रोजमर्रा के व्यवहार की कसौटी भी? और जब किसी कमजोर विद्यार्थी के अधिकार और किसी शक्तिशाली संस्था की सुविधा आमने-सामने खड़ी हों, तब हम किसका पक्ष लेते हैं?
यहीं आकर ‘जयंती-2’ सिनेमा से आगे बढ़ती है। वह किसी तैयार निष्कर्ष के साथ दर्शक को घर नहीं भेजती, बल्कि एक असुविधाजनक जिम्मेदारी उसके साथ भेजती है। बराबरी का अर्थ यह नहीं कि सबको एक ही दरवाजे तक पहुंचने की अनुमति दे दी जाए। बराबरी का अर्थ यह भी है कि दरवाजे के भीतर किसी की गरिमा कम न हो। संविधान ने समानता को अधिकार बनाया है; समाज को उसे व्यवहार बनाना अभी बाकी है।
विश्वविद्यालयों में यह परीक्षा और भी कठोर है, क्योंकि वहां भविष्य का समाज तैयार होता है। अगर वही परिसर जाति, अपमान और वर्चस्व को दोहराएंगे, तो हम केवल कुछ विद्यार्थियों के साथ अन्याय नहीं करेंगे, हम उस लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करेंगे, जिसकी शिक्षा संस्थानों से सबसे अधिक उम्मीद है।
इसलिए ‘जयंती-2’ का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पायल के साथ हुए अन्याय का नहीं, उस अन्याय के सामने हमारी स्थिति का है। हम दर्शक बने रहेंगे या नागरिक की भूमिका निभाएंगे? हम पीड़ित को चुप कराने वाली व्यवस्था का हिस्सा बनेंगे या उस व्यवस्था से सवाल करेंगे? हम समानता को एक आदर्श की तरह दोहराएंगे या उसे अपने संस्थानों के व्यवहार में उतारेंगे?
फिल्म समाप्त होने के बाद यही फैसला हमारे सामने बचता है, क्योंकि जाति केवल तब तक शक्तिशाली है, जब तक उसे सामाजिक व्यवहार, संस्थागत चुप्पी और हमारी सुविधा का सहारा मिलता रहता है। जिस दिन पीड़ित की आवाज को ‘समस्या’ मानने के बजाय अन्याय को समस्या माना जाएगा, जिस दिन ‘प्रतिष्ठा’ से ऊपर न्याय और ‘मेरिट’ से पहले समान अवसर की सामाजिक शर्तें दिखाई देंगी और जिस दिन किसी पायल मरकाम को बराबरी के लिए अकेले संघर्ष नहीं करना पड़ेगा, उस दिन संविधान की समता कागज से निकलकर समाज में दिखाई देगी।
‘जयंती-2’ इसी अधूरे सफर की ओर हमारा ध्यान खींचती है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि फिल्म खत्म होने के बाद भी सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि वे पहली बार सही जगह पर पहुंचते हैं। यानी हमारे भीतर और हमारे बीच।
इस फिल्म का सभी भारतीय भाषाओं में आना बहुत जरूरी है। फिल्म के मध्यांतर के बाद आरक्षण संबंधी लंबी डिबेट उबाऊ नहीं लगती, बल्कि वह समाज में आज व्याप्त तनाव का भान कराती है और दर्शकों को बांधें रखती है। फिल्म का अंत दो तरह के मजबूत संदेशों से होता नजर आता है। पहला सबसे अनुकरणीय संदेश है जाति प्रमाण पत्र के बजाय ‘सर्टिफिकेट ऑफ़ सोशल जस्टिस’ देने की राष्ट्रव्यापी मांग। दूसरा, आरक्षण विरोधी नेता के बेटे का विदेश से आगमन और युवा परिषद् के प्रताप की उनसे अचानक हुई भिडंत के बाद नेता द्वारा प्रताप की पिटाई और फिल्म के मुख्य पुरुष नायक संत्या द्वारा उसे बचाना और यह समझाना कि नेताजी अपने बेटे को विदेश पढ़ाएंगे और तुमसे दंगे करवाएंगे, भले ही यह सब रूपक की तरह सामने आते हैं, लेकिन आज के समय की सच्चाई यही है। और ‘जयंती-2’ निरंतर इससे दो चार होती है।
यह फिल्म अभिनय, संगीत, संवाद और सिनेमेटोग्राफी, एक्शन हर दृष्टि से बेहतरीन लगी और उम्मीद है कि मराठी भाषी लोगों का तो इसे प्यार और समर्थन मिलेगा ही, अन्य प्रदेशों में भी इसे सराहा जाएगा। मैं निर्विवाद रूप से कह सकता हूं कि ‘जयंती-2’ आज चल रहे आरक्षण विरोधी आंदोलन और ‘यूजीसी रोल बैक’ जैसे प्रतिगामी अभियानों को एक करारा जवाब है। इसीलिए यह सिर्फ एक फिल्म नहीं है बल्कि सिनेमा का आंदोलन में तब्दील हो जाना भी है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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