जब भी त्योहारों की बात होती है तो अक्सर हमारी नजर में धार्मिक अनुष्ठानों, देवी-देवताओं और उनसे जुड़ी मान्यताओं तक सीमित रह जाती है। लेकिन आदिवासी समाज के पर्वों को केवल धार्मिक उत्सव के रूप में देखना उनके मूल अर्थ को सीमित कर देना है। इनके पर्वों में जंगल है, खेत है, मौसम है, पशु-पक्षी हैं, रिश्ते हैं और सबसे बढ़कर मनुष्य और प्रकृति के बीच का वह संबंध है, जिसे आदिवासी समाज ने सदियों से अपने जीवन का हिस्सा बनाते हुए आया है।
झारखंड में मनाया जाने वाला करमा या करम परब इसी जीवन-दृष्टि का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। हालांकि यह उत्सव बिहार, बंगाल और ओडिशा में भी धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन झारखंड में इसका विशेष महत्व है। यहां की मिट्टी और संस्कृति की आत्मा अगर किसी परब में सजीव होती है तो वह है करम परब, जिसे करमा पूजा भी कहा जाता है। भादो महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाने वाला यह परब करम देवता और करम वृक्ष से जुड़ा है। यहां करम का संबंध ‘कर्म’ से भी माना जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं, अगर प्रकृति सुरक्षित है तो जीवन सुरक्षित है। इस परब की महत्ता का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि इसे आदिवासी समुदायों के साथ-साथ झारखंड के कई सदान समुदायों द्वारा भी अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। सदान उन्हें कहते हैं जो आदिवासियों के साथ रहते-बसते हैं। इनमें कृषक व शिल्पकार जातियों के लोग शामिल होते हैं।
करम पर्व की विशेषता यह है कि इसमें न तो किसी मूर्ति की आवश्यकता होती है और न ही किसी भव्य मंदिर की। सीधे तौर पर यह प्रकृति की पूजा है। करम पेड़ की पत्ता से युक्त डाली यानी टहनी, मिट्टी, बीज, पानी और सूरज की किरणें ही इसके देवता हैं।
आदिवासी परंपरा में करम की शुरुआत तब से मानी जाती है जब इंसान ने खेती को अपना जीवन-कर्म बनाया। यही कारण है कि करम परब को कृषि और बीजों के संरक्षण से जोड़कर देखा जाता है।
लेकिन करम परब को केवल करम वृक्ष की पूजा या एक रात के नाच-गाने तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता है। यह उस समाज की सामूहिक स्मृति है, जिसकी खेती जंगल से शुरू होती है और जिसकी समृद्धि खेत में उगने वाले अनाज से जुड़ी होती है। यह परब जंगल से खेत तक और खेत से परिवार तक जीवन के पूरे चक्र को एक सूत्र में पिरोता है।
यही कारण है कि करम परब को केवल प्रकृति पूजा का पर्व कहना भी पर्याप्त नहीं होगा। यह कृषि, उर्वरता, सामुदायिक जीवन, युवा ऊर्जा और सामाजिक रिश्तों का उत्सव भी है।
‘करम’ शब्द में छिपा एक भाषाई सुराग
करम पर्व को समझने की कोशिश अगर उसके नाम से ही शुरू की जाए तो एक दिलचस्प भाषाई सुराग सामने आता है। ‘करम’ उस वृक्ष का नाम है जिसकी टहनी इस परब का केंद्र बनती है, लेकिन संथाली भाषा में इस शब्द का अर्थ केवल एक पेड़ तक सीमित दिखाई नहीं देता।
संथाली भाषा के प्रसिद्ध विद्वान और मिशनरी-शोधकर्ता पी.ओ. बोडिंग ने ‘ए संथाल डिक्शनरी’ नामक संथाली भाषा का एक महत्वपूर्ण और विस्तृत शब्दकोश तैयार किया था। आधुनिक मानवशास्त्रीय शोध में बोडिंग के इसी शब्दकोश का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि ‘करम’ का संबंध वनस्पति के साथ-साथ पर्व और अनुष्ठान से भी है। यानी संथाली सांस्कृतिक शब्दावली में ‘करम’ केवल एक पेड़ का नाम नहीं, बल्कि उससे जुड़े अनुष्ठानिक और उत्सवी संसार की ओर भी संकेत करता है।
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे करम परब को केवल ‘करम के पेड़ की पूजा’ के रूप में देखने की सीमा टूटती है। यहां वृक्ष और अनुष्ठान एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक ओर करम एक जीवित वृक्ष है, दूसरी ओर उसी नाम से जुड़ी हुई एक सांस्कृतिक परंपरा है। शायद यही वह भाषाई सुराग है, जो हमें इस पर्व के प्रकृति, कृषि और सामुदायिक जीवन से बने व्यापक संबंध को समझने में मदद करता है।
कृषि-चक्र और भादो एकादशी का संदर्भ
जिस तरह सरहुल का सीधा संबंध नवपाषाण कालीन कृषि-क्रांति के प्रारंभिक दौर और बीज-संरक्षण से है, उसी प्रकार करम का समय कृषि-चक्र के सबसे नाजुक और निर्णायक मोड़ पर आता है।
सांस्कृतिक और कृषि-पारिस्थितिकी की दृष्टि से यह वह समय होता है जब खेतों में धान की रोपाई पूरी हो चुकी होती है। किसान आषाढ़ और सावन के महीने में जी-तोड़ मेहनत कर चुके होते हैं। यानी खेतों की जुताई, मेड़ों की मरम्मत, धान के बीहन उखाड़ कर बारिश व कीचड़ के बीच धान रोपाई। भादो के आते-आते रोपे गए धान के पौधे मिट्टी में अपनी जड़ें जमा चुके होते हैं और समूची धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है।
इस समय किसान का सबसे कठिन शारीरिक श्रम का दिन समाप्त हो चुका होता है, लेकिन फसल अभी पकी नहीं होती। यह विश्राम, प्रतीक्षा और आगामी उत्पादन के लिए प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का समय होता है। खेत में खड़ी फसल किसी भी समय कीटों, बीमारियों या सूखे-अतिवृष्टि की चपेट में आ सकती है। अतः करम का यह उत्सव श्रम के बाद के विश्राम का उल्लास भी है और आने वाली अच्छी पैदावार के लिए प्रकृति-शक्तियों से संवाद व संरक्षण की प्रार्थना भी।
करम देवता और करम-धरम की लोककथा
करम पर्व से जुड़ी अनेक लोककथाएं अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में सुनाई जाती हैं। इनमें सबसे लोकप्रिय कथाओं में करम और धरम भाइयों की कथा है, जो छोटानागपुर के विभिन्न इलाकों में अलग-अलग रूपों में सुनाई जाती है।
लोक मान्यता के अनुसार, बहुत समय पहले छोटानागपुर के एक गांव में ननका और ननकी नाम के एक गरीब आदिवासी दंपत्ति रहते थे। दोनों सीधे-सरल और श्रमशील थे। वे दोनों दिनभर खेतों में पसीना बहाते और सावन-भादो में लहलहाती फसल को देखकर उसका मन तृप्त हो जाता । लेकिन शाम ढलते ही जब दोनों घर लौटते, तो सूने आंगन को देखकर उदास हो जाते थे, क्योंकि विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी उनकी कोई संतान नहीं थी।
कहा जाता है कि भादो के महीने में एक दिन खेतों में जी-तोड़ मेहनत के बाद थककर ननकी बाड़ी के किनारे खड़े विशाल करम वृक्ष की घनी छांव में सुस्ताने बैठी, जहां उसे गहरी नींद आ गई। सपने में करम राजा (करम देव) प्रकट हुए और बोले कि भादो शुक्ल एकादशी को जंगल से करम वृक्ष की डालियां लाकर आंगन या अखड़ा में गाड़ो और विधि-विधान से उसका आदर करो, सूना आंगन भर जाएगा। ननका और ननकी ने पूरी निष्ठा से करम की डाल स्थापित कर पूजा की। मान्यता है कि इसी के बाद करम देव की कृपा से उनके घर सात बेटों का जन्म हुआ। उनके नाम थे– करमा, धरमा, धनवा, रीझा, मंगरा, भंवरा और लीटा। आगे चलकर इन सातों भाइयों का विवाह एक ही परिवार की सात बहनों से हुआ और सातों बहनें गोतनी बन गईं।
लोकगीतों में यह प्रसंग आज भी जीवंत है– “सातो भैया सातो करम गाड़य, सातो गोतिनी सेवा करय…”
इसी बीच गांव में भीषण अकाल आ जाता है, तो धरमा को छोड़कर उसके सभी छह भाई धनोपार्जन के लिए परदेस चले जाते हैं। सात वर्षों तक कठिन परिश्रम के बाद जब वे धन कमाकर लौटे, तो गांव की सीमा पर रुक गए। बड़े भाई करमा ने सबसे पहले अपने छोटे भाई लीटा को गांव भेजा ताकि वह परिजनों और गांववालों को उनके सकुशल लौटने की सूचना दे सके और उनका स्वागत हो सके। लेकिन गांव पहुंचते ही लीटा ने देखा कि अखड़ा में करम पर्व का उल्लास छाया हुआ है। मांदर की थाप पर वह ऐसा मगन हुआ कि सूचना देना ही भूल गया। करमा ने एक-एक कर अपने अन्य भाइयों को भेजा, पर जो भी गांव जाता, वह करम के रंग में रंगकर वहीं रम जाता।
अंत में गुस्साकर करमा खुद गांव पहुंचा। उसने देखा कि उसकी प्रतीक्षा करने के बजाय पूरा परिवार और गांव करम डाली के इर्द-गिर्द नाचने-गाने में मस्त है। धन के अहंकार और क्रोध में आकर करमा ने करम डाली को उखाड़कर नदी में फेंक दिया। प्रकृति और सामूहिक आस्था के इस अनादर से क्षुब्ध होकर भाइयों ने करमा से नाता तोड़ लिया। इसके बाद करमा के दिन बिगड़ गए, उसकी संपत्ति नष्ट हो गई, घर में दरिद्रता छा गई और वह दाने-दाने का मोहताज हो गया। जबकि करम देव की शरण में रहे बाकी भाई सुखी और संपन्न रहे। हताश होकर एक दिन करमा नदी के किनारे रो रहा था, तब एक वृद्ध महिला ने उसे चेताया कि यह सब करम देव के अपमान का परिणाम है। अपनी भूल समझकर करमा, करम राजा की खोज में निकल जाता है। अथाह जल और तमाम प्राकृतिक कठिनाइयों से जूझते हुए उसने करम की डाली को पुनः खोज निकाला और गांव के अखड़ा में सम्मान के साथ स्थापित किया। सातों भाइयों ने फिर मिलकर उत्सव मनाया, परिवार में एकता बहाल हुई और करमा का जीवन फिर से खुशहाल हुआ। यह कथा हमें यही सिखाती है कि कर्म और धर्म अलग नहीं हो सकते। धर्म बिना कर्म अधूरा है और कर्म बिना धर्म का कोई मूल्य नहीं। यही करम पर्व का सबसे बड़ा संदेश है।
जावा : बीज परीक्षण की लोक वैज्ञानिक प्रयोगशाला
करम पर्व की सबसे विशिष्ट और वैज्ञानिक परंपरा है ‘जावा जगाना’। इस पर्व में मुख्य पूजा से सात या नौ दिन पहले करमइतिन (करमा परब करने वाली महिलाएं) नहा-धोकर गांव से दूर नदी-नाला या प्राकृतिक जलस्रोत से बांस के डाला (टोकरी) में बालू उठाकर लाती हैं। उस डाला में गेहूं, जौ, चना, उरद, धान, कुरथी, मूंग आदि बीज बोए जाते हैं। अब इस डाला को प्रतिदिन पानी से सींचने और रख-रखाव की जिम्मेदारी कुछ मुख्य करमइतिनों को दी जाती है, जिन्हें डलइतिन कहा जाता है। यह जावा डाला को गांव के पाहन (पुजारी) या मुख्य डलइतिन के घर के अंधेरे कोने में रखा जाता है। जावा डाली को रोज शाम को अखरा में लाकर सभी करमइतिन एकत्र होकर जावा डाली के चारों ओर गोल घेरा बनाकर गीत गाते हुए उसे जगाती हैं, जिसे ‘जावा जागा’ गीत कहते हैं। दो-चार दिनों में जब बीज अंकुरित हो जाते हैं, तब उसपर दिन में दो बार हल्दी पानी का छिड़काव किया जाता है ताकि पौधा पीला और सुंदर दिखे। यही ‘जावा फूल’ कहलाता है।
यहां बालू का माध्यम, नियंत्रित नमी, हल्दी के प्राकृतिक एंटी-फंगल गुण और अंधेरे कक्ष का उपयोग शुद्ध रूप से वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जावा के अंकुरों का रंग और उनकी लंबाई आने वाली रबी और खरीफ फसलों के स्वास्थ्य का पूर्व-संकेत देती है। मसलन, यदि जावा का रंग हल्का पीला या सुनहरा निकलता है, तो इसे सर्वोत्तम बीज और खूब पैदावार का संकेत माना जाता है। और यदि अंकुर कमजोर, मुड़े हुए या काले पड़ जाते हैं, तो किसान समझ जाते हैं कि बीजों की गुणवत्ता में खोट है और उन्हें बुवाई के लिए नए बीजों का प्रबंध करना होगा।
इस प्रकार, जावा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की स्त्रियों के हाथों में संरक्षित वह कृषि-विज्ञान है, जहां स्त्रियां बीजों की प्रथम वैज्ञानिक और संरक्षक बनकर उभरती हैं।
करम डाली की स्थापना और अखड़ा में अनुष्ठान
करम पूजा के दिन गांव के करमइतिनों के भाई या ग्राम के पाहन सुबह-सुबह नहा-धोकर जंगल जाते हैं और वहां से करम के एक ही वृक्ष की दो या तीन डालियां काटकर लाते हैं और ढोल-मांदर बजाते हुए, गीत-नृत्य करते हुए अखरा में गाड़ देते हैं, जिसे ‘करम गोसाईं’ कहा जाता है। फिर उन करम डालियों को फूलों और जगमगाती रोशनी से सजाया जाता है। महिलाएं घर पर लकड़ी की पारंपरिक यंत्र ‘ढेकी’ में चावल कूटकर उसका आटा तैयार करती हैं। इसी आटे से करमा के अवसर पर स्थानीय व्यंजन बनाए जाते हैं। कई उरांव परिवारों में इस दिन चावल और दाल से बनने वाली पारंपरिक ‘छिलका रोटी’ भी तैयार की जाती है। साथ ही घर की वरिष्ठ महिलाएं छिलका रोटी और हड़िया का अंश अपने दिवंगत पुरखों को भी अर्पित करती हैं। वहीं कुछ इलाकों में करम पूजा के अवसर पर रंगुवा (जो सफेद न हो) मुर्गे की बलि देने की परंपरा भी मिलती है।

रात को सभी उपवास की हुई करमइतिन लाल पाड़ वाली साड़ी (सफेद साड़ी, जिसके किनारे पर चौड़ी लाल पट्टी होती है) पहनकर पूजा की थाली में सभी सामग्री सजाती हैं और घी का दीया जलाकर प्रार्थना करती हैं। इसके बाद गांव के पाहन द्वारा सभी करमईतीन और ग्रामीणों को करम-धरम की पारंपरिक लोककथा सुनाई जाती है। फिर करमइतिनें अपने भाई के कान में जावा फूल खोंसती हैं और हाथ में धागा बांधती है।
तब भाई से बुलवाया जाता है– “केकर करम, केकर धरम?” (किसका कर्म, किसका धर्म)
और बहन गर्व से जवाब देती है– “आपन करम, भैयाक धरम।” (अपना कर्म, भाई का धर्म)
यह संवाद करम परब की आत्मा है, जो कर्म और धर्म को अविभाज्य बताता है। जिसके बदले में भाई अपनी बहनों को उपहार और आजीवन साथ निभाने का वचन देते हैं। इसलिए करम परब को भाई-बहन का त्योहार भी कहा जाता है। अगले दिन सूर्य उगने से पहले करम डाली को नदी या तालाब में बहा दिया जाता है।
करम परब में स्त्रियां केवल अपने भाई की ही नहीं, बल्कि पिता की लंबी उम्र और घर की सुख-शांति की भी प्रार्थना करती हैं। यह लोकभावना इन खोरठा गीतों में झलकती है–
“दिहो दिहो करम गोसाईं दिहो आशीष हो,
भइया बप्पा जिये हमर लाखों बरीस हो।”
(हे करम गोसाईं, आशीर्वाद दें, मेरे भाई और पिता लाखों वर्ष जियें)
और तब करम राजा मानो आशीर्वाद देते हैं–
“देलियो गे करमइतीन, देलियो आशीष गे,
भइया बप्पा जियतो लाखों बरीस गे।”
(हे करमइतिन, तुम्हें आशीर्वाद देता हूं, तुम्हारे भाई और पिता लाखों साल तक जियेंगे)
लियावन की बाट जोहती आंखें और मायके की पुकार
करम परब का माहौल बनते ही कुंवारी लड़कियां तो घर पर रहकर इस परब को बड़े आनंद के साथ मनाती हैं, लेकिन इस बीच नई ब्याही गई बेटियों (नवविवाहिताओं) का मन अपने मायके की मिट्टी और स्मृतियों के लिए मचलने लगता है। इस दौरान उन्हें आस होती है कि अब उनके भाई लियावन (ससुराल से विदा कराकर मायके ले जाने की रस्म) कराने अवश्य आएंगे। भाई भी पूरे सम्मान के साथ अपनी बहनों को ससुराल से मायके लाते हैं।
भादो का मौसम इस प्रतीक्षा को और गहरा कर देता है। उमड़ते बादल, भरते नदी-नाले और खेतों की मेड़ों पर खिलता सफेद कास (नदी के किनारों पर एक झाड़ी, जिसमें सफेद फूल का खिलना बरसात के समापन का संकेत देता है) जैसे लड़की को मायके जाने के दिन के करीब आने का एहसास कराते हैं। खोरठा लोक-स्मृति में यह भाव एक करमगीत में बेहद मार्मिक ढंग से उभरता है–
“गोमतीक धारी-धारी फुटलइ कांसी गे,
नुनीक मन नइहर चली गेल।
कांसी फूल फूटी गेल,
नदी-नाला भोरी गेल,
आस देखी अंखिया टटाय,
रे भादर कुहकल आय।”
(गोमती के तीर पर कास के फूल खिले हैं
नवविवाहिता का मन मायके में बस गया है
कास के फूल खिल गए हैं
मायके जाने की आस में आंखें थक गई हैं
तब कोयल के माफिक कुहुकते हुए भादो आया)
यहां कास का फूल, भरे नदी-नाले और भादो की घटाएं केवल मौसम के संकेत नहीं रह जाते, बल्कि वे उस नवविवाहिता की मायके लौटने की बेचैनी और भाई की प्रतीक्षा के प्रतीक बन जाते हैं।
भादो के इन प्राकृतिक संकेतों के बीच भाई की राह देखती बहन की बेचैनी करमा के दूसरे लोकगीत में और अधिक मुखर होकर सामने आती है। वह अपने भाइयों को पुकारते हुए गाती है–
“बड़का हो भइया मति लेगे अइहा, कहां पावब पाकल पान हो …
मइझला हो भइया मति लेंगे अइहा, कहां पावब बांधल खसिया …
छोटका हो भइया तोहें चइल अईहा , कांदि-कांदि मांगभे विदाइ हो …
दीदी के कर दे विदाई हो, अरे हो …”
गीत का भाव बड़ा मार्मिक है। बहन अपने बड़े और मंझले भाई को आने से इसलिए संकोचवश मना करती है क्योंकि उनके आने पर ससुराल वालों को मान-मर्यादा के बड़े प्रबंध जैसे पान-सुपारी और खस्सी (बकरा) का भोज का भार उठाना पड़ेगा। लेकिन छोटे भाई के आने पर वह आश्वस्त होती है कि वह तो छोटा है, वह रो-धोकर भी अपनी बहन की विदाई करा लेगा, फिर वो मायके जाकर करम पूजा कर सकेगी।

भाई का अपनी बहन को ससुराल से सम्मानपूर्वक मायके लाना केवल एक पारिवारिक रस्म नहीं, बल्कि यह सामाजिक आश्वासन है कि विवाह के बाद भी स्त्री का अपने मायके, खेत और सामुदायिक जीवन से संबंध बना रहता है। हालांकि, यदि किसी विषम परिस्थिति में बहन मायके न भी पहुंच सके, तो वह ससुराल में ही करम गोसाईं की प्रतिष्ठा कर पूजा संपन्न करती है।
मनौती और स्त्री-संवेदना का पर्व
करमा को एक ‘मनौती पर्व’ के रूप में भी देखा जाता है। इस पर्व में वैसी विवाहिताएं जिनकी शादी हो चुकी है लेकिन संतान नहीं हुआ है, जिन्हें स्थानीय बोली में ‘डंगुवा बेटी-छऊवा’ कहा जाता है। वे करमा पूजा के दिन अपनी थाली में एक पुष्ट, सुडौल खीरा रखती हैं। लोक-प्रतीक में यह खीरा नवजात शिशु का रूप माना जाता है। वे करम राजा से मनौती मांगती हैं कि उनकी गोद भी इसी तरह स्वस्थ और सुडौल संतान से भरे। वहीं अविवाहित युवतियां जिनका कोई सगा भाई नहीं होता है, वे करम राजा से सुंदर और स्नेही भाई की मनौती करती हैं, ताकि आने वाले समय में वे भी अपने भाई के कानों में जावा खोंसकर उसकी दीर्घायु की कामना कर सकें।
लोकगीतों में विदाई का कारुणिक सौंदर्य
करमा परब बिना गीत-संगीत के अधूरा है। करमा गीतों में प्रकृति की सुंदरता, उसकी रचनात्मकता और मानव जीवन के उतार-चढ़ाव का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। जावा उठाने से लेकर करम डाली के प्रवाह करने तक, हर चरण पर गीत गाए जाते हैं। जावा जगाने के गीत, करम काटने के गीत, फूल तोड़ने के गीत, विदाई गीत से लेकर विसर्जन गीत तक शामिल है।
विदाई के समय गाए जाने वाले खोरठा गीत अत्यंत मार्मिक होते हैं, जैसे–
“आज रे करम गोसाईं घरे दुआरे रे,
काल रे करम गोसाईं कांस नदी पारे रे।”
“जाहो जाहो करम गोसाईं जाहो ससुराल हो,
आवते भादर मास आनबो घुराय हो।”
(आज करम गोसाईं हमारे घर और दरवाजे पर हैं, कल वे कास के फूलों के पार नदी में रहेंगे। जाओ-जाओ करम गोसाईं अपने सुसराल जाओ, अगले साल जब भादो आएगा तब फिर से अपने घर में बुलाएंगे)
इन दोनों गीतों में पूजा का भाव, विदाई की पीड़ा और पुनर्मिलन की आशा सब कुछ झलकती है। जबकि आज डीजे और आधुनिक साधन करम पूजा का हिस्सा बनते जा रहे हैं, पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे ढोल, मांदर, बांसुरी, तीरियो और टुहीला धीरे-धीरे गुम होते जा रहे हैं। सामूहिक अखड़ा संस्कृति, जहां मालिक से लेकर मजदूर सब साथ नाचते-गाते थे, अब मंच और दर्शक की रेखा में बंटने लगी है। करम हमें यही सिखाता है कि अगर अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और अपने वाद्य को नहीं बचाया तो हमारी पहचान खो जाएगी।
संकट में अखड़ा और विस्थापन का कड़वा सच
अंत में, करम परब की इस सांस्कृतिक और दार्शनिक चमक के साथ-साथ हमें उस कड़वी जमीनी सच्चाई पर भी बात करनी होगी, जो आज झारखंड के कई आदिवासी इलाकों के सामने खड़ी है। जिस जंगल से करम की डाल आती है और जिस अखड़ा में पूरा समाज एक साथ नाचता-गाता है, वह जंगल और अखड़ा आदिवासी जीवन से अलग कोई चीज नहीं हैं।
लेकिन आज जंगलों पर खनन, औद्योगिक परियोजनाओं और विकास के दूसरे दबाव लगातार बढ़ रहे हैं। जंगलों की कटाई के कारण आज कई इलाकों में पूजा के लिए करम की एक हरी डाली ढूंढ़ने के लिए मीलों दूर जाना पड़ता है।
सारंडा जैसे इलाकों में लंबे समय से चल रहे लौह-अयस्क खनन और वनों की कटाई ने पर्यावरण के साथ-साथ वहां रहने वाले समुदायों के जीवन को भी प्रभावित किया है। जब कोई गांव उजड़ता है तो केवल कुछ घर और जमीन ही नहीं छूटते, उसके साथ वह पूरा सांस्कृतिक भूगोल भी बिखरने लगता है, जिसमें अखड़ा, सरना स्थल, खेत, जंगल और नदी पीढ़ियों से एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं।
करम परब कोई बंद कमरे का अनुष्ठान नहीं है। यह जंगल, खेत, पानी और सामुदायिक जीवन से जुड़ा हुआ पर्व है। यही कारण है कि करम को बचाने का अर्थ केवल साल में एक दिन करम की डाल लाकर उसकी पूजा करना नहीं है। इसका अर्थ उन जंगलों, खेतों, अखड़ों, भाषाओं और परंपराओं को भी बचाए रखना है, जिनसे इस परब को उसका अर्थ मिलता है।
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संकट और बढ़ते उपभोग के सवालों से जूझ रही है, तब करम का जीवन-दर्शन हमें प्रकृति के साथ अपने रिश्ते पर फिर से सोचने का अवसर देता है। यह याद दिलाता है कि मनुष्य प्रकृति का मालिक नहीं, बल्कि उसी प्रकृति का एक हिस्सा है। जब तक जंगल जीवित हैं, खेतों में अन्न उग रहा है और अखड़ा में मांदर की आवाज के साथ समुदाय एक साथ खड़ा है, तब तक करम केवल एक परब नहीं, बल्कि एक जीवित संस्कृति के रूप में बना रहेगा।
(संपादन : नवल/अनिल)
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