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पीली रोशनी में ओबीसी एकता की चमक और मजबूत इरादे पर जोर

दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब सभागार में आयोजित ओबीसी महासभा की बैठक में अधिकांश हिंदी-भाषी प्रदेशों से विभिन्न जातियों और पसमांदा के प्रतिनिधियों के अलावा गुजरात और केरलम से आए प्रतिनिधियों ने भी हिस्सेदारी की। पढ़ें, यह खबर

गत 20 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब के डिप्टी स्पीकर हॉल में ओबीसी महासभा की बैठक आयोजित की गई। बैठक का आयोजन जनगणना 2027 के प्रपत्र में ओबीसी का कॉलम शामिल करने की मांग को लेकर किया गया था। पूरे हॉल में महासभा की पीली टोपियां और गमछे नज़र आ रहे थे। अधिकांश हिंदी-भाषी राज्यों से कुशवाह, यादव, प्रजापति, निषाद, साहू, पाल आदि जातियों, मंसूरी व अन्य पसमांदा समुदायों एवं विमुक्त जनजातियों के प्रतिनिधियों के अलावा, बैठक में गुजरात और केरल से आए प्रतिनिधि भी शामिल हुए। बैठक में पुरुष और महिलाएं दोनों मौजूद थे और अधिकांश सार्वजनिक आयोजनों की तरह, पुरुषों की संख्या महिलाओं से ज्यादा थी। मगर तीन घंटे तक चली बैठक में सभी पीले रंग में रंगे हुए थे।

बर्फ से ढंके इलाकों में जनगणना 2027 के लिए घर-घर गणना का काम शुरू होने के बाद से ही भारत सरकार की इस बात के लिए आलोचना की जा रही है कि जनगणना प्रपत्र में जाति के कॉलम ओपन-एंडेड है अर्थात उसमें कोई श्रेणीकरण नहीं है और न ही पहले से दिए गए विकल्पों में से किसी एक को चुनने की व्यवस्था है। सामाजिक न्याय के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और विपक्षी पार्टियों ने सरकार से मांग की है कि प्रपत्र में ओबीसी का अलग कॉलम हो जिसके ड्राप-डाउन मेन्यु में केंद्रीय और राज्य सूचियों में शामिल सभी ओबीसी जातियों के नाम हों। यह मांग वे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि सन् 2011 के सामाजिक-आर्थिक और जाति सर्वेक्षण में जातियों का जो विवरण इकट्ठा हुआ, वह इतना जटिल और इतना बड़ा था कि उसका विश्लेषण ही संभव नहीं था। आज यह माना जाता है कि ओबीसी कुल आबादी का करीब 52 फीसद हैं। लेकिन यह आंकड़ा सन् 1931 की जनगणना पर आधारित है। यानी करीब एक सदी पुराना है। ताज़ा गिनती से ही हमें यह पता चल सकता है कि शासन-प्रशासन, अर्थव्यवस्था और मीडिया में ओबीसी के हाशियाकरण का वर्तमान स्तर क्या है। अब तक दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) की कुल दो सिफारिशों पर अमल किया गया है – सरकारी नौकरियों में और उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में ओबीसी के लिए आरक्षण। और वह भी आधा-अधूरा। जनगणना के अद्यतन आंकड़े उपलब्ध होने से केंद्रीय और राज्य सरकारों को मजबूर होकर आयोग की सभी सिफारिशों को पूरी तरह लागू करना होगा, जिससे ओबीसी को उनके वाजिब हक मिल सकेंगे।

बैठक में महासभा की पीली टोपी पहने एक कार्यकर्ता

महासभा की छत्तीसगढ़ शाखा के अध्यक्ष राधेश्याम साहू के मुताबिक, “हम लोगों की जातियां भले ही अलग-अलग हों, लेकिन संविधान हमें एक साझी पहचान देता है। अगर ओबीसी की अलग से गणना नहीं की जाएगी तो हम लोग जनगणना का बहिष्कार करेंगे।”

दिल्ली शाखा के अध्यक्ष बीर सिंह बघेल ने कहा कि ओबीसी सम्मान और गरिमा के भूखे हैं। मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष सी.वी. कुशवाह ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ओबीसी की सही-सही गिनती करने से डर रही है।

यह बैठक पिछड़ों के नायक ई.वी. रामासामी पेरियार को समर्पित थी, जिनकी जयंती बैठक के कुछ दिन पूर्व (17 सितंबर) को मनाई गई थी। बैठक के पोस्टर में पेरियार की बड़ी तस्वीर के साथ-साथ जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले, शाहू महाराज, डॉ. आंबेडकर, फातिमा शेख, कांशीराम, जगदेव प्रसाद, बी.पी. मंडल, वी.पी. सिंह, शरद यादव आदि की तस्वीरें भी थीं। प्रतिनिधियों ने ‘जोतिबा फुले अमर रहें’, ‘पेरियार अमर रहें’ और ‘बी.पी. मंडल अमर रहे’ के नारे भी लगाए।

रज़िया बीबी, खिलेश्वरी साहू और विद्या यादव का स्वागत गुलदस्तों से किया गया। चित्र में धर्मेन्द्र कुशवाह भी दृष्टव्य हैं।

सबसे पहले मंच के बगल में रखीं फुले दंपत्ति, कांशीराम, पेरियार, आंबेडकर, फातिमा शेख और शरद यादव की तस्वीरों पर पुष्प अर्पित किए गए। बिहार के पूर्णिया से लोकसभा सांसद पप्पू यादव, जो बैठक शुरू होने के काफी समय बाद अपने लाव-लश्कर के साथ पहुंचे, ने कहा कि वी.पी. सिंह की तस्वीर भी मंच के बगल में रखी जानी चाहिए थी। उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि “वे एक ऊंची जाति से थे, मगर उन्होंने हम लोगों के लिए लड़ाई लड़ी।” बैठक में उपस्थित प्रतिनिधियों को चुनौती देते हुए उन्होंने कहा कि “ओबीसी अपने दम पर क्रांति लाने में सक्षम नहीं हैं। उन्हें दलितों और आदिवासियों की मदद लेनी होगी।” उन्होंने कहा कि केवल आंबेडकरवादी ही लड़ाका होते हैं।

वे शायद यह नहीं जानते थे कि ओबीसी महासभा इस मिथक को तोड़ना चाहती है। उनके पहले के वक्ताओं के भाषणों से यह जाहिर था। छत्तीसगढ़ शाखा के अध्यक्ष राधेश्याम साहू ने कहा कि महासभा अपने कार्यकर्ताओं के शिविर आयोजित कर रही है और उसका लक्ष्य है कि इस साल के अंत तक वह राज्य में 20,000 कार्यकर्ताओं की फ़ौज खड़ी कर ले। छत्तीसगढ़ में महासभा जिला और प्रखंड स्तर तक अपने कार्यकर्ताओं का नेटवर्क स्थापित करना चाहती है। उसने सामाजिक सरोकार कार्यक्रम की शुरुआत की है जिसके अंतर्गत 95 ओबीसी जातियों को एक झंडे तले लाने का प्रयास किया जाएगा।

मंसूरी फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के मेहदी हसन ने कहा कि भारत के 80 प्रतिशत मुसलमान ओबीसी हैं और केवल मंसूरी समुदाय, देश की कुल आबादी का चार फीसद है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के चारों स्तंभों – कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया – में ऊंची जातियों का बोलबाला 15 फीसद लोगों का 85 फीसद लोगों पर राज करने के मानिंद है।

महासभा की गुजरात शाखा के अध्यक्ष आलोकभाई यादव ने महासभा को अपनी अगली बैठक गुजरात में आयोजित करने का निमंत्रण दिया। यह इस तथ्य के बावजूद कि आरएसएस और भाजपा का गुजरात में जबरदस्त दबदबा है।

बैठक को संबोधित करते हुए पप्पू यादव

केरलम से आईं रज़िया बीबी ने ओबीसी एकता पर जोर देते हुए कहा कि सभी को अपने जीवन में आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए, न कि सिर्फ उन्हें जो पहले से ही आगे हैं।

महासभा की मध्य प्रदेश इकाई के महिला मोर्चा की अध्यक्ष विद्या यादव का कहना था कि मनुवादी मानसिकता ने ओबीसी को लूटा है और पीछे धकेला है। विशेषकर महिलाएं मनुवादी सोच के जाल में अधिक कैद रही हैं। हम महिलाएं अपने पर जबरन लाद दिए गए कर्मकांडों का पालन अपना कर्त्तव्य समझ कर करती हैं। हम उन पर अपना पैसा बर्बाद करतीं हैं और नतीजे में हमारे पास हमारे बच्चों की शिक्षा के लिए ज़रूरी धन का आभाव रहता है।

संगठन की मध्य प्रदेश इकाई के महिला मोर्चा की अध्यक्ष खिलेश्वरी साहू का मत था कि ओबीसी को एकजुट होकर अपने नायकों के दिखाए रास्ते पर चलना चाहिए। नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर प्रश्न खड़े करते हुए उन्होंने कहा कि विधानमंडलों में ओबीसी महिलाओं को अलग से आरक्षण मिलना चाहिए।

महासभा के राष्ट्रीय महासचिव बिजेंद्र यादव ने कहा कि “अगर हम जातियों में बंटे रहेंगे तो हम हमेशा आरक्षण के लिए भीख ही मांगते रहेंगे।”

उन्हें भेंट की गई ‘गुलामगिरी’ पुस्तक की प्रति को पलटते पप्पू यादव। उनके बगल में धर्मेंद्र कुशवाह नज़र आ रहे हैं।

ओबीसी महासभा की राष्ट्रीय कोर समिति के सदस्य एडवोकेट धर्मेंद्र कुशवाह का कहना था कि अगर जनगणना प्रपत्र में ओबीसी का कॉलम नहीं जोड़ा गया, तो संसद के अगले सत्र के पहले महासभा, दिल्ली के जंतर-मंतर में विरोध प्रदर्शन करेगी। शायद उस दिन पप्पू यादव गलत साबित होंगे।

अन्य वक्ताओं में सुनील सरदार (दिल्ली), शकील मंसूरी (महासचिव, ओबीसी महासभा, दिल्ली) सुनील निषाद (अध्यक्ष, ओबीसी महासभा, उत्तर प्रदेश), बृजेंद्र यादव (अध्यक्ष, ओबीसी महासभा, झारखंड), बंसीलाल चौधरी (अध्यक्ष, ओबीसी महासभा, जम्मू-कश्मीर), कल्याण सिंह (अध्यक्ष, ओबीसी महासभा, उत्तराखंड), मिथिलेश कुमार (कार्यकारी अध्यक्ष, ओबीसी महासभा, उत्तर प्रदेश), एडवोकेट विश्वजीत रतनिया (राष्ट्रीय प्रवक्ता, ओबीसी महासभा), शिवकुमार पाल, कृष्ण लोधी और भंवर सिंह धाकड़ (कृषक मोर्चा, ओबीसी महासभा), प्रकाश धाकड़ (संयोजक, ओबीसी महासभा, मध्यप्रदेश), डॉ. बी.एल. कुशवाह (राष्ट्रीय सचिव, ओबीसी महासभा), ममना बेगम (मीडिया इंचार्ज, ओबीसी महासभा), सुरेंद्र पाल, गंगा सिंह चौधरी, राहुल पाल, चंद्र प्रकाश प्रजापति, प्रोफेसर सूरज मंडल एवं प्रोफेसर सुधांशु शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन रंग बहादुर यादव (उपाध्यक्ष, ओबीसी महासभा, दिल्ली) ने किया।

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)


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लेखक के बारे में

अनिल वर्गीज

अनिल वर्गीज फारवर्ड प्रेस के प्रधान संपादक हैं

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