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हमारे नायक

सामाजिक न्याय और डॉ. आंबेडकर
डॉ. आंबेडकर ने ब्रिटिश सरकार से मांग की कि दलित वर्ग को समान नागरिकता दी जाए। समान नागरिक के सभी अधिकार दलितों को दिये जाएं। उन्होंने विधानसभा में प्रतिनिधि भेजने के अधिकार की बात भी...
मानना और अवमानना के दौर में फुले
फुले उन्नीसवीं सदी के महानतम व्यक्तियों में से एक थे, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में तमाम बहसों और विमर्शों की नुमाइंदगी करते हुए ब्राह्मणवादी अवधारणा और उसकी निर्मितियों को चुनौती पेश की थी। भारतीय नवजागरण के...
गैर-हिंदुओं से नफरत के दौर में फुले का सार्वजनिक सत्य धर्म
हैरानी की बात यह है कि बराबरी का समाज बनाने का ख़्वाब देखने वालों के संघर्षों को जनता के बीच बेअसर करने में जिस तरह सांप्रदायिकता बल्कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का इस्तेमाल किया गया,...
‘तृतीय रत्न’ : जोतीराव फुले का नाटक जो 125 साल अंधेरे में रहा
जोतीराव के लिए ‘तृतीय रत्न’ या ‘तीसरी आंख’ का आशय मानवीय विवेक से था। शूद्रातिशूद्रों की दोनों आंखें तो ब्राह्मण-पुरोहित की छलना का शिकार हैं। वे वही देखने की अभ्यस्त हैं जो वे दिखाना चाहते...
जोतीराव फुले का साहित्य कर्म
जोतीराव फुले ने समाज में व्याप्त अंधश्रद्धा, रूढ़िवादिता के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए विपुल लेखन...
जोतीराव फुले, जिन्होंने उलट दी ब्राह्मणवादी मान्यताएं
फुले के सत्यशोधक समाज की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने सामाजिक सुधार को ‘ऊपर से नीचे’...
फुलेवाद के मूलभूत सिद्धांत एवं उनकी प्रासंगिकता (अंतिम भाग)
तात्यासाहेब ने अपने भाषण में और लेखन में हिंदू शब्द का ज्यादा इस्तेमाल नही किया। वे खुलकर जाति...
जोतीराव फुले की वैचारिकी और उनका साहित्य
फुले ने साहित्य की पारंपरिक अवधारणा को ही चुनौती दी। उनके लिए साहित्य केवल सौंदर्य या रस का...
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