राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रानाडे, भंडारकर, आगरकर आदि के कार्य उतना सामाजिक परिवर्तन के लिए वांछित नहीं थे, जितना महात्मा फुले के कार्य। द्विजों का समाज सुधार केवल उनके वर्गों तक ही सीमित था।...
इस मामले के दो सिरे हैं। पहला सिरा सीपीआईएमएल से जुड़ा है। सीपीआईएमएल के इलाहाबाद क्षेत्र में रामजी राय और कमल उसरी का अपना-अपना धड़ा है। जैसा कि इतिहास बताता है जो धड़ा कमज़ोर होता...
1980 के दशक में हिंदू पिछड़ों की राजनीतिक उभार भी नई परिघटना थी, इसलिए उसके अधिकतर नेता भी नई पीढ़ी के थे। लेकिन हिंदुओं की यह नई पीढ़ी सकारात्मक ऊर्जा के साथ सत्ता पर दावेदारी...
सामाजिक न्याय के प्रतीकों पर धावा भाजपा की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। राजनीति की प्रक्रिया भी हो सकती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले लोग...