मंच पर उतरा शिवाजी का भूमिगत इतिहास

‘शिवाजी अंडरग्राउंड…’ का कथानक बिल्कुल अलग है। इस नाटक का शिवाजी न तो ब्राह्मणों का रक्षक है, न गायों का और ना ही वह मुस्लिम-विरोधी नायक है। वह दलितों की अलग पहचान का पैरोकार है और ब्राह्मण, उसके निशाने पर हैं।

मुंबई में इन दिनों एक नाटक की धूम मची हुई है। नाटक का शीर्षक है ‘शिवाजी अंडरग्राउंड इन द भीमनगर मोहल्ला’ (भीमनगर मोहल्ले में भूमिगत शिवाजी)। इसी तरह, राजस्थान में विभिन्न स्थानों पर महाराणा प्रताप के बड़े-बड़े होर्डिंग और कटआउट उग आए हैं। ये होर्डिंग महाराणा प्रताप को देश का पहला स्वाधीनता संग्राम सेनानी घोषित करते हैं।

शिवाजी पर केन्द्रित यह नाटक बाबा साहब पुरंदरे के ‘जानता राजा’ के बाद शिवाजी की जीवन गाथा को नाट्य रूप में प्रस्तुत करने का दूसरा बड़ा प्रयास है। पुरंदरे के शिवाजी, मुस्लिम-विरोधी राजा हैं, उनका मिशन हिन्दू राष्ट्र की स्थापना है और वे ब्राह्मणों और गायों के रक्षक (गोब्राह्मण प्रतिपालक) हैं। वहां मुसलमानों का विरोध भी है, ब्राह्मण की पूजा भी है और गाय की रक्षा भी। और ये तीनों ही हिन्दू राष्ट्रवादियों की विचारधारा के स्तंभ हैं। ‘शिवाजी अंडरग्राउंड…’ का कथानक इससे बिल्कुल अलग है। इस नाटक का शिवाजी न तो ब्राह्मणों का रक्षक है, न गायों का और ना ही वह मुस्लिम-विरोधी नायक है। वह दलितों की अलग पहचान का पैरोकार है और ब्राह्मण, उसके निशाने पर हैं।

महाराष्ट्र में एक लंबे समय से एक ओर दलितों और दूसरी ओर उच्च जातियों की हिन्दुत्ववादी राजनीति के बीच संघर्ष चल रहा है। भंडारकर संग्रहालय पर हमला, शिवाजी के बारे में जेम्स लेन की किताब, जिसमें उनके पितृत्व पर प्रश्न उठाए गए हैं, पर प्रतिबंध, इस संघर्ष के प्रकटीकरण के दो उदाहरण हैं। शिवाजी के जीवन का पुरंदरे-ब्राह्मणवादी संस्करण, उनको महान राजा बनाने का पूरा श्रेय दादाजी कोंडादेव नामक एक ब्राह्मण को देता है। दूसरी ओर, शिवाजी के जीवनवृत्त का दलित संस्करण इसे स्वीकार नहीं करता और यही कारण है कि पिछले दिनों महाराष्ट्र में कई स्थानों पर दादाजी कोंडादेव की प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाया गया था। शिवाजी के जीवन का मूल्यांकन लंबे समय से होता रहा है। प्रसिद्ध दलित विचारक फुले उन्हें ‘गरीब किसानों का राजा’ बताते हैं। टैगोर उन्हें ‘राजाओं का राजा’ कहते हैं। तिलक ने सबसे पहले उन्हें राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में स्थापित किया और उनके नाम पर उत्सव का आयोजन शुरू किया।

पुरंदरे का नाटक अत्यंत लोकप्रिय हो गया है और उसकी लोकप्रियता, हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति की लोकप्रियता के समानांतर बढ़ती रही है। ‘शिवाजी अंडरग्राउंड…’ कहता है कि शिवाजी का हिन्दू राष्ट्र से कोई लेना-देना नहीं था। वे कतई मुस्लिम विरोधी नहीं थे। नाटक इस बात पर जोर देता है कि हिन्दू और मुसलमान, दोनों धर्मों के राजाओं के दरबार में ब्राह्मण काम करते थे। यह नाटक शिवाजी की जीवनगाथा को ब्राह्मण-विरोधी झुकाव देता है तथा शिवाजी को महान हिन्दू देशभक्त दर्शाने वाले आख्यान का पहला दमदार खंडन करता है।

आरएसएस, विचारधारा के स्तर पर यह मानता है कि जिन भी राजाओं ने मुस्लिम शासकों के खिलाफ  युद्ध किया वे सब हिन्दू राष्ट्रवादी थे। यही कारण है कि हिन्दुत्व-आरएसएस-हिन्दू महासभा के रंग में रंगे नाथूराम गोडसे, अपनी पुस्तक ‘मे इट प्लीज योर ऑनर’–जो कि अदालत में महात्मा गांधी की हत्या को औचित्यपूर्ण ठहराने वाले उसके बयान पर आधारित है–में लिखता है कि गांधीजी बौने राष्ट्रवादी थे व शिवाजी, राणा प्रताप और गुरु गोविन्द सिंह असली राष्ट्रवादी थे। यही, आरएसएस व हिन्दू राष्ट्रवादियों की सोच है।

बहरहाल, शिवाजी के मामले में एक और विभाजक रेखा खींच गई है, जिसके एक ओर हैं दलित-पिछड़े और दूसरी ओर ब्राह्मण। यह नाटक इन दोनों सामाजिक समूहों के बीच चल रहे संघर्ष का ही एक पहलू है। ‘शिवाजी अंडरग्राउंड…’ का कथानक दलित-पिछड़ों के शिविर से उपजा है, परंतु यह शिवाजी के जीवन और कृत्यों को साम्प्रदायिक रंग देने के प्रयासों का भी जोरदार खंडन करता है। दलित-बहुजन संस्करण और ब्राह्मणवादी संस्करण, परस्पर विरोधाभासी हैं। ब्राह्मणों ने शिवाजी का किस प्रकार विरोध किया था यह नाटक के कथानक का हिस्सा है। हम सब जानते हैं कि स्थानीय ब्राह्मणों ने शिवाजी का राजतिलक करने से इंकार कर दिया था क्योंकि वे शूद्र थे। अंतत: उनके राजतिलक के लिए काशी से गंगा भट्ट नामक ब्राह्मण को बुलवाया गया, जिसने अपने बाएं पैर की छोटी अंगुली से उनका राजतिलक किया। शरीर के अंगों के ब्राह्मणवादी पदानुक्रम में, बाएं पैर की छोटी अंगुली सबसे नीची मानी जाती है। शिवाजी और राणा प्रताप जैसे राजा निस्संदेह वीर और साहसी थे। परंतु उन्हें राष्ट्रवादी, स्वाधीनता संग्राम सेनानी, मुस्लिम विरोधी आदि बताना, साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से लिखे गए इतिहास के जाल में फंसना है, जिसका प्रतिकार दलित-पिछड़ों की ओर से हो रहा है। लेकिन हमें यह प्रयास भी करना चाहिए कि हमारा इतिहास केवल राजाओं का इतिहास बनकर न रह जाए बल्कि उसमें आम लोगों के दु:ख-सुख का समावेश भी हो।

(फारवर्ड प्रेस के मई 2013 अंक में प्रकाशित)

About The Author

Reply