भारतीय सिनेमा के सौ साल और बॉम्बे टाकीज

सिनेमा से ही बालों-कपड़ों को पहनने का ढब हमलोगों ने सीखा था और बोलने का सलीका भी। पर इस स्कूल ने सबसे ज्यादा प्रेम के ढाई आखर का पाठ पढ़ाया था। हिन्दुस्तानी समाज में यदि प्रेम आज कुछ हद तक स्वीकार्य है तो इसके लिए हमें सिनेमा का ऋणी होना चाहिए। वह सिनेमा ही था जिसने हमें किस्से-कहानी में हंसते-हंसते यह सिखा दिया था कि अमीर आदमी बुरा होता है और खुद्दार गरीब बेहतर

तीन मई, 2013 को भारतीय सिनेमा ने अपने शानदार सौ साल पूरे कर लिए। इस दरम्यान सिनेमा ने हमारे समाज में बदलाव के दूसरे बड़े माध्यम या कारकों से ज्यादा अहम् योगदान दिया। फिल्में देखना भारत में पहले बहुत अच्छा नहीं माना जाता था और इसके लिए पिटाई से लेकर पॉकेटमनी में कटौती तक आम सजा थी और इसलिए हममें से अधिकांश ने यह काम शुरुआत में चोरी-छिपे, घर-स्कूल से भागकर किया। उन दिनों जब हम स्कूल फीस की रकम सिनेमा हॉलों के काउंटर पर न्योछावर कर दिया करते थे, तब हमें मालूम नहीं था कि असल में एक स्कूल की फीस हम दूसरे स्कूल में दे रहे हैं। इस तरह हमारे समाज के एक बड़े हिस्से ने वर्जनाओं को तोडऩे की शुरुआत सिनेमा से ही की।

सिनेमा से ही बालों-कपड़ों को पहनने का ढब हमलोगों ने सीखा था और बोलने का सलीका भी। पर इस स्कूल ने सबसे ज्यादा प्रेम के ढाई आखर का पाठ पढ़ाया था। हिन्दुस्तानी समाज में यदि प्रेम आज कुछ हद तक स्वीकार्य है तो इसके लिए हमें सिनेमा का ऋणी होना चाहिए। वह सिनेमा ही था जिसने हमें किस्से-कहानी में हंसते-हंसते यह सिखा दिया था कि अमीर आदमी बुरा होता है और खुद्दार गरीब बेहतर। यह भी कि अमीर बनने के लिए तस्करी या ऐसे ही दबे-छुपे दूसरे गलत काम करने पड़ते हैं। बहरहाल, सिनेमा की सीखों को छोड़ते हुए हम आते हैं इसकी सौंवीं सालगिरह पर।

इतिहास का यह एक ऐसा मौका है, जिसे हर व्यक्ति, संस्था या प्रोडक्शन हाउस इसे अपने तरीके से मना सकता है और भारतीय सिनेमा को सम्मान दे सकता है। इस तरह देखें तो नेटवर्क 18 और आशी दुआ की ‘बॉम्बे टाकीज’ अच्छा प्रयास लग सकती है। लेकिन दिक्कत तब शुरू हाती है जब फिल्म का प्रचार-प्रसार हमारे दौर के चार ‘प्रतिनिधि’ फिल्मकारों की चार लघु फिल्मों के संकलन के रूप में हिंदी फिल्म उद्योग की आधिकारिक आदरांजलि की तरह किया जाए। बॉम्बे टाकीज के चारों निर्देशक करण जौहर, जोया अख्तर, दिबाकर बनर्जी और अनुराग कश्यप हमारे वक्त के महत्वपूर्ण फिल्मकार हैं और चारों अपनी-अपनी खास शैली के लिए भी जाने जाते हैं। लेकिन चारों न तो हमारे दौर के प्रतिनिधि फिल्मकार हैं और ना ही बॉलीवुड के स्तंभ। अगर कोई इन चारों, करण, अनुराग, दिबाकर, जोया को महान या महानतम फिल्म निर्माता माने तो इसमें कोई एतराज नहीं हो सकता। समस्या तब होती है जब कोई उन्हें हमारे समय के प्रतिनिधि फिल्म निर्माता बतौर हम पर लादना चाहता है। यह निश्चित रूप से आपत्तिजनक है। क्या इन चारों निर्देशकों का चयन निर्माता ने फिल्म निर्देशकों, फिल्म लेखकों या फिल्म के अन्य विभाग से जुड़े लोगों या फिर दर्शकों के बीच सर्वेक्षण कर किया था? या फिर चुनाव का आधार व्यक्तिगत पसंद या निर्देशकों की उपलब्धता थी और अगर दूसरा विकल्प सही है तो यह फिल्म निर्माता की भारतीय सिनेमा को व्यतिगत ट्रिब्यूट है ना कि फिल्म उद्योग की। अगर बॉम्बे टाकीज की चारों लघु फिल्मों को देखें तो ये फिल्म कंटेट और फार्म दोनों स्तरों पर भारतीय सिनेमा के मिजाज, प्रभाव, उपलब्धियों और मैकनिज्म-मैनिरिज्म को प्रस्तुत करने में बुरी तरह विफल रहती हैं और ना ही यह कोई नया प्रयोग है। इस तरह के प्रयोग हिंदी सिनेमा में पिछले एक दशक से हो रहे हैं।

बॉम्बे टाकीज की पहली लघु फिल्म करण जौहर की ‘अजीब दास्तां है ये’  है जो पुरुष समलैंगिकता पर आधारित है। करण जौहर की तमाम फिल्मों में समलैंगिकता होती है। लेकिन वह पुरुषों की समलैंगिकता ही होती है स्त्रियों की नहीं। पुरुषों और स्त्रियों दोनों को अपनी निजी पसंद और रूझान के हिसाब से जीने की आजादी होनी चाहिए लेकिन पुरुषों की समलैंगिकता बहुधा भोग के विस्तार के रूप में सामने आती है। वहीं स्त्री-समलैंगिकता जेंडर हेगिमनी के खिलाफ प्रतिरोध की इबारत लिखती है। दीपा मेहता की ‘फायर’ कलात्मक उत्कर्ष के साथ इसे दिखाती है। यह अनायास नहीं है कि समलैंगिकता पर बनी दीपा मेहता के ‘फायर’ का तो भारतीय समाज विरोध करता है लेकिन करण जौहर की समलैंगिकता पर बनी फिल्मों से उसका कोई विरोध नहीं है। पुरुष-स्त्री समलैंगिकों की अपनी मर्जी से जीवन जीने के अधिकार के पक्ष में खड़े होने के बावजूद हमें यह सोचना चाहिए कि हम जिस समाज में रह रहे हैं उसमें उभयलिंगी प्रेमी जोड़ों तक को हम बचा नहीं पा रहे हैं। ऐसे में कुछ फिल्मकारों के पुरुष समलैंगिकता पर अतिरिक्त जोर के मायने समझ सकते हैं। जोया की लघु फिल्म करण की फिल्म का प्रीक्वल लगती है लेकिन वह आती तीसरे नंबर पर है। फिल्मों से जुड़ा हर व्यक्ति जानता है कि स्टारडम ने भारतीय सिनेमा का कुछ भला नहीं किया है। नायकों के स्टार बन जाने ने फिल्म को निर्देशक का माध्यम नहीं रहने दिया है। अनुराग की फिल्म अमिताभ बच्चन के स्टारडम और लोगों में उनके क्रेज की कहानी है। यह अस्वाभाविक तो लगती ही है काफी लंबी खिंची हुई भी है। इसमें अमिताभ बच्चन के क्रेज को बयां करने वाला गाना तो अमिताभ बच्चन का ऐसा महिमामंडन है कि खुद वे भी झेंप जाएं। यह गाना अपने बोल ‘भरे पड़े हैं तमाम हीरो, रिश्ते में तो यह सबका बाप है’ तक पहुंचते-पहुंचते अश्लील हो जाती है। दिबाकर बनर्जी की लघु फिल्म बॉम्बे टाकीज की उपलब्धि कही जा सकती है। इसमें एक निम्न मध्यवर्गीय अभिनेता अपनी बीमार बच्ची को फिल्मों के किस्से सुनाकर उसका मनोरंजन करता है। पर उसके किस्से बासी हो गए हैं और अब उसकी बेटी को उसमें स्वाद नहीं आता। ऐसे में उसके जीवन के साथ एक वाकया होता है जो अभिनय के द्वंद्व और अभिनेता के संघर्ष को उजागर करता हुआ हमारे सिनेमा को आत्मीय, विनम्र और सच्ची आदरांजलि देता है। इस फिल्म के अंत में अपनी बच्ची को वह आज का किस्सा सुनाकर ऐसी ही खुशी दे रहा है जो सिनेमा हमें सौ सालों से दे रहा है।

(फारवर्ड प्रेस के जून 2013 अंक में प्रकाशित)

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