कैसे ‘उदार’ हुआ भारत

कुल मिलाकर, भारत की आर्थिक प्रगति एक रैखिक विकासक्रम में थी। एक पिछड़े हुए, कृषि प्रधान देश को औद्योगिक दुनिया के बीच खड़ा करना था। बड़ी आबादी, निरक्षरता, सामंती-पुरोहिती सोच और सत्ता पर उच्च जातियों का दबदबा, ये सब ऐसी चीजें थी,जो विकास को मुश्किल काम बना रही थीं

भारत में आर्थिक क्षेत्र में उदारीकरण का युग 1991 से माना जाता है, जब पहली दफा डॉ. मनमोहन सिंह ने वित्तमंत्री के रुप में बजट पेश किया। हालांकि, इसकी पूर्वपीठिका राजीव गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में, विश्वनाथ प्रताप सिंह ने वित्तमंत्री के तौर पर तैयार कर दी थी।

उदारीकरण में यह सन्निहित है कि इसके पूर्व की व्यवस्था अनुदार थी। इसलिए उदारीकरण पर चर्चा के पूर्व, हमें उसके, अर्थात उदारीकरण के पूर्व की, व्यवस्था पर दृष्टिपात करना आवश्यक हो जाता है। अर्थशास्त्रियों ने जब भी इस विषय पर विमर्श किया है, उसकी समय-सीमा 1947 तय कर दी। मानो, 1947 के पूर्व भारत की कोई अर्थव्यवस्था थी ही नहीं। दरअसल, पूरा जोर उस नेहरु युग की अर्थव्यवस्था को दोषपूर्ण करार देने पर होता है, जिसमें विकास के समाजवादी ढांचे पर जोर दिया गया था। कांग्रेस के 1955 में हुए अधिवेशन में यह नीति तय की गयी थी।

नेहरू और औद्योगीकरण

इसके पूर्व, प्रथम पंचवर्षीय योजना 8 दिसंबर, 1951 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने संसद में पेश किया था, जिसमें सिंचाई व उर्जा (कुल बजट का 27.2 प्रतिशत), कृषि व सामुदायिक विकास (17.4 प्रतिशत) तथा ट्रांसपोर्ट व कम्युनिकेशन (24 प्रतिशत) पर जोर था। उद्योग पर कुल बजट का केवल 8.4 प्रतिशत खर्च होना था।

प्रथम पंचवर्षीय योजना, समाजवादी योजना नहीं कही जा सकती, लेकिन इसने अपने तय लक्ष्य – सकल घरेलु उत्पादन जी.डी.पी में 2.1 वार्षिक वृद्धि दर- के मुकाबले 3.6 की वृद्धि दर हासिल की। औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त हुए भारत की यह एक अंगड़ाई थी। प्रति व्यक्ति औसत आय में वृद्धि से विकास मापना भारत जैसे देश में न्यायोचित नहीं होगा क्योंकि यहां जनसंख्या का विस्तार नहीं, विस्फोट होता है। लेकिन फिर भी, प्रथम पंचवर्षीय योजना काल में इसमें 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। इस पंचवर्षीय योजना के आखिरी साल में पांच महत्वाकांक्षी ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी’ और ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ की स्थापना हुई।

नेहरु का यह मानना था कि आधारभूत संरचना का पहला अर्थ, ज्ञान के आधार को पुख्ता करना ही है। वर्गों और जातियों में बंटा हिन्दुस्तानी समाज, अज्ञानता के अंधकार में डूबा हुआ था। भारत, जो मोटे तौर पर ब्राह्मणवाद और इस्लाम के अंधानुयायियों की वासभूमि है, अपने प्रतिगामी सामाजिक ख्यालों के लिए दुनिया भर में बदनाम था। यहाँ के निवासियों की सोच में वैज्ञानिक चेतना का घोर अभाव था। यहाँ तक कि उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ा गया स्वतंत्रता का आंदोलन भी भारतमाता जैसे कल्पित मिथकीय और सांप्रदायिक सोच का अवलंब लिये हुए था। इसी सोच की परिणति, आजादी के साथ देश का बंटवारा या बंटवारे के साथ आजादी थी।

नेहरु ने ‘साइंटिफिक टेम्पर’ (वैज्ञानिक सोच) पर जोर दिया। प्रगति और विकास के लिए, उसके अनुरुप मानसिकता बनाना जरुरी था। उनकी इसी सोच पर आधरित थी दूसरी पंचवर्षीय योजना, जिसमें उनका उद्योगों पर सबसे ज्यादा जोर था। पहली पंचवर्षीय योजना के प्रतीक भाखरा और हीराकुंड जैसे विशाल बाँध थे तो दूसरी पंचवर्षीय योजना के प्रतीक थे भिलाई, दुर्गापुर और राउरकेला के इस्पात उद्योग।

कुल मिलाकर, भारत की आर्थिक प्रगति एक रैखिक विकासक्रम में थी। एक पिछड़े हुए, कृषि प्रधान देश को औद्योगिक दुनिया के बीच खड़ा करना था। बड़ी आबादी, निरक्षरता, सामंती-पुरोहिती सोच और सत्ता पर उच्च जातियों का दबदबा, ये सब ऐसी चीजें थी,जो विकास को मुश्किल काम बना रही थीं। सन् 60 के इर्द-गिर्द, नेहरु यह सोचने के लिए विवश हो गए थे कि दूसरी पंचवर्षीय योजना में, पहली पंचवर्षीय योजना के मुद्दों की कुछ ज्यादा ही अनदेखी हो गयी। फलत:, तीसरी पंचवर्षीय योजना (61-66) में एक बार फिर कृषि पर जोर दिया गया। और इस तरह देखें तो 1951 से 1961 तक जिन दो पंचवर्षीय योजनाओं का कार्यान्वयन और एक का प्रस्ताव हुआ, उनसे हमारे योजनाकारों की समझदारी झलकती है। कृषि क्षेत्र और भारी उद्योगों के लिए आधरभूत संरचना जुटाने के बाद, नेहरु कृषि क्षेत्र पर एक बार फिर लौटे थे तो इसलिए कि उन्हें भारत के औद्योगीकरण के लिए पूर्वपीठिका तैयार करनी थी। दरअसल, भारत के औद्योगीकरण के लिए कृषि क्षेत्र को पुख्ता करना बेहद जरुरी था। इसे नेहरु युग के अर्थशास्त्री जानते थे।

इस दौर में नेहरु के लिए सब कुछ प्रशस्त था, ऐसा नहीं है। गांधीवाद की रामनामी ओढ़े कुटिल सामाजिक प्रतिगामी शक्तियां चाहती थी कि नेहरु भारत का औद्योगीकरण न करें। यह इसलिए कि भारत का औद्योगीकरण काव्यमयी ग्रामीण इलाकों में पुराने ढंग की कृषि व्यवस्था को नष्ट करने जा रही थी। कम-से-कम इसका अंदेशा तो था ही। इस पुराने ढंग की कृषि व्यवस्था पर ही सामंती-पुरोहिती ताकतें टिकी थीं।

रूढ़ गांधीवादी अपने अंध अंग्रेज विरोध पर जमे थे। वे समझते थे कि अंग्रेजों के आने के पूर्व भारत महान था। वे उन स्थितियों को भी नहीं समझना चाहते थे जो अंग्रेजों के आने के पूर्व इस देश में थीं, और जिनके कारण अंग्रेजों का भारत आना संभव हो सका था। मुगलकालीन सामंती व्यवस्था अत्यंत घनीभूत थी। भारतीय समाज में इसके दौरान जटिल किस्म का स्तरीकरण हुआ। जातिवाद, जो केवल हिन्दू समाज में था, वह मुस्लिम समाज में भी कुछ ज्यादा ही त्रासद अंदाज में स्थान पा गया। दुनिया के, खासकर यूरोप के, इतिहास में यह दौर ज्ञान-विज्ञान का दौर था। यूरोप में जहां विश्वविद्यालय बन रहे थे, वहीं यहां के बादशाह किले पर किले बनाये जा रहे थे। तेरहवीं सदी में आक्सफोर्ड खड़ा हुआ था और ठीक उसी समय नालंदा का पतन हुआ था।

पीछे लौटना कदापि संभव नहीं था। ग्रामीण अर्थसंस्कृति की ओर लौटना, आर्किडिया में लौटने की तरह, सोच में चाहे जितना कवित्वपूर्ण महसूस हो, यथार्थ में इसलिए संभव नहीं था क्योंकि जनतांत्रिक सोच इसकी इजाजत नहीं देती थी। गाँधी ने जिस ग्राम स्वराज की कल्पना की थी, वह उनके सामाजिक सोच पर खड़ी थी। स्मरणीय है कि गांधी आखिरी समय तक वर्णवाद के हिमायती बने रहे। उनका ‘हिन्द स्वराज’ (1909) एक प्रतिगामी सामाजिक दर्शन है, जो रेल, डाक्टर और वकील के विरोध के नाम पर, टेक्नोलाजी, साइंस और लॉजिक के विरोध पर टिका था। मनुवादी सामाजिक व्यवस्था इस सोच के तहत पूरी तरह सुरक्षित थी। और इस सोच के सहारे किसी आधुनिक समाज का निर्माण मुश्किल था।

नेहरु ने ‘हिन्द स्वराज’ की गांधीवादी सोच को खारिज कर दिया था, जिसे बहुत पहले कांग्रेस के ‘माडरेट’ नेता व गांधी के गुरु गोपाल कृष्ण गोखले खारिज कर चुके थे। लेकिन अभिनव मनुवादी गांधीवादियों को ‘हिन्द स्वराज’ के दर्शन में कुछ मोहक और विराट तत्व दिख रहा था। गाँधी और नेहरु के विचारों की यह रस्साकशी चल रही थी। नेहरु ने दिशा ठीक पकड़ी थी। पब्लिक सेक्टर की मजबूत आधारशिला, जो दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान रखी गयी थी, उसके नतीजे आगे आने वाले थे, आये भी, लेकिन तभी एक हादसा हुआ।

1962 में भारत-चीन विवाद ने भारत की प्राथमिकताओं को बदल देने के लिए मजबूर कर दिया। प्रतिगामी सामाजिक शक्तियों को नेहरु को झुठलाने का एक अवसर मिला और उन लोगों ने इसका पूरा फायदा उठाया। भारी उद्योगों की नीति की उतनी भत्सर्ना नहीं हुई जितनी कृषि क्षेत्र में किये गये बुनियादी कार्यों की हुई। भूमि सुधार का मामला राज्यों के पास था और राज्य सरकारों पर सामंती ताकतें ज्यादा मजबूती से पकड़ बनाये हुई थीं। लगभग सभी राज्यों में भूमि सुधार के मामलों को निलंबित कर दिया गया। भूमि सुधार के बिना पर जो कृषि क्रांति हुई, वह 1970 के इर्दगिर्द हरित क्रांति के रुप में प्रकट हुई और इसने ग्रामीण इलाकों में सामंतों की पकड़ को ज्यादा मजबूत कर दिया।

1964 में नेहरु का निधन हो गया। भारत-चीन युद्ध में भारत ने जो पराजय झेली थी, उसे 1965 के भारत-पाक युद्ध में अपनी विजय से आंशिक रुप से ही सही, पर धोया गया। भारतीय मध्यम वर्ग (जिसका निर्माण तीन-चौथायी उच्च जातियों और एक-चौथाई मंझोली जातियों से हुआ है) के एक नये नायक लालबहादुर शास्त्री, प्रधानमंत्री बन गये। समाज की प्रतिगामी ताकतें, नेहरु युग से मुक्ति के हिंडोले पर झूल ही रही थी कि शास्त्री जी का ताशकंद में निधन हो गया। और तब इंदिरा गाँधी का आना हुआ।

इंदिरा के काल में हुआ पहला प्रयास

इंदिरा, सामाजिक प्रतिगामी ताकतों के हाथों का खिलौना नहीं हो सकती थी। लेकिन सामंती-पुरोहिती ताकतों से नेहरु के अंदाज में जूझ भी नहीं सकती थीं। उनके आगमन के वर्ष 1966 में 8 जून को उनके वित्तमंत्री सचीन्द्र चौधरी ने रुपये का 57.5 प्रतिशत अवमूल्यन कर, अर्थव्यवस्था को राह पर लाने की कोशिश की। ग्लोबल मार्केट से भारतीय मार्केट को जोड़ऩे का यह पहला प्रयास या दुस्साहस था। ऐसी ही कोशिश 1991 में डॉ. मनमोहन सिंह ने भी की, जब दो बार उन्होंने रुपये का अवमूल्यन किया।

इसके लिए तब का भारतीय जनमानस तैयार नहीं था। दरअसल, बहुत कम लोग तब इस अवमूल्यन के अर्थ को समझ पाये थे। मार्क्सवादी पार्टियां तब कांग्रेस के विरुद्ध थीं और 1967 के चुनावों में उन्होंने इसके लिए इंदिरा गाँधी को काफी कुछ कहा। विश्व स्तर पर रूस एक बड़ी ताकत थी। दूसरे शब्दों में, तब दुनिया एक-ध्रुवीय नहीं हुई थी। रुपये के अवमूल्यन को भारतीय अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी दबाव माना गया। इंदिरा गाँधी फजीहत झेलने के लिए मजबूर थीं।

इस ‘मजबूर’ प्रधानमंत्री ने लोगों को सकते में डालते हुए, 1969 में बैंकों का राष्टीकरण कर दिया और लगे हाथ भूतपूर्व राजाओं-महाराजाओं को मिलने वाले प्रीवीपर्स को भी खत्म कर दिया। समाज पर हावी प्रतिगामी शक्तियां चौकस हुर्इं कि क्या इंदिरा गाँधी भूमि का भी राष्टीयकरण कर सकती है। यह तकलीफदेह बात है कि इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस शासित राज्यों पर भी व्यापक भूमि सुधार के लिए कोई दबाव नहीं बनाया। उनके बेटे संजय गाँधी के रूप में उनके घर में ही एक प्रतिगामी स्वर उभरना आरंभ हो चुका था। 1980 आते-आते इंदिरा गाँधी ने समाजवाद से कुट्टी कर ली। अब वे भारत माता हो चुकी थीं। समाजवादी पाउडर की उन्हें अब कोई जरुरत नहीं थी।

इंदिरा गाँधी नये अवतार और मूड में थीं। उन्हें दलितों की चिन्ता अब नहीं थी, क्योंकि उनकी जय-जयकार के लिए मध्यमवर्ग बेताब था। यह 1980 से 84 तक का समय था। एक नयी आर्थिक नीति की पूर्व पीठीका बननी शुरु हो गयी थी। 1984 में राजीव गाँधी के राजा वित्तमंत्री ने स्थितियां और स्पष्ट कर दीं। बुनियाद तैयार थी। 1991 में नरसिम्हाराव सरकार के अर्थशास्त्री वित्तमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दुनिया की आर्थिक हलचल से भारत को जोड़ते हुए, आर्थिक उदारीकरण की घोषणा कर दी। 1991 में ही सोवियत संघ बिखर चुका था। क्रेमलिन से लाल सितारा उतर चुका था। अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया एक ध्रुवीय हो चुकी थी। भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपना नया रास्ता तय कर लिया था।

(फारवर्ड प्रेस के अगस्त 2013 अंक में प्रकाशित)

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